सरकार क्यों टाल रही जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव!

लखनऊ। कोरोना संक्रमण के जोखिम के बीच सम्पन्न चुनाव में ग्राम प्रधान, जिला पंचायत और ब्लॉक के सदस्य चुन लिए गए। योगी सरकार अब निर्वाचित प्रतिनिधियों को शपथ नहीं दिला रही है। बहाना कोविड संक्रमण का फैलाव है। जानकारों का कहना है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में उम्मीद के मुताबिक सफलता न मिलने की वजह से भाजपा संगठन के कहने पर सरकार अभी न तो जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव चाहती है न ही निर्वाचित प्रतिनिधियों को शपथ दिलाने में कोई जल्दबाजी। भाजपा अभी समीकरण दुरुस्त करने में जुटी है। जब उसे विश्वास हो जाएगा कि उसके कम से कम 60 जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष चुन लिए जाएंगे तब वह एक साथ दोनों काम करेगी। निर्वाचित सदस्यों का शपथ ग्रहण समारोह और जिला पंचायत अध्यक्षों का निर्वाचन।

20 से 25 जिलों में भाजपा का बहुमत
यूपी के 75 जिलों में से सिर्फ 20 से 25 जिले ही ऐसे हैं जहां भाजपा के जिला पंचायत सदस्यों का बहुमत है। यहां भाजपा अध्यक्ष बन सकते हैं, जबकि 50 जिलों में निर्दलीयों और सपा का बहुमत है। भाजपा की मंशा कम से कम 60 से 65 जिलों में अपना जिला अध्यक्ष बनवाना है। यही हाल ब्लॉक प्रमुखों का भी है। भाजपा अभी आधे से कम ब्लॉक प्रमुख अपने बूते बना पाने की स्थिति में है। इसलिए जिलों में भाजपा सांसदों और विधायकों को समीकरण सही करने में जुटाया गया है। बागियों और निर्दलीयों को मनाया जा रहा है। उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन दिए जा रहे हैं। अपने पाले में लाने के लिए हर जतन किए जा रहे हैं।

तो अध्यक्ष बनने के लिए चुकाने होंगे 23 करोड़
पंचायत अध्यक्ष के लिए जोड़-तोड़ में सभी दल जुटे हैं। इस चुनाव में निर्दलीयों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। कहा तो यह भी जा रहा है कि एक वोट की कीमत इस बार एक करोड़ तक जा सकती है। जिला पंचायत सदस्य यानी डीडीसी को अध्यक्ष पद के दावेदार 50 लाख से लेकर एक करोड़ तक का ऑफर कर रहे हैं। इसी तरह ब्लॉक प्रमुख के लिए एक वोट की कीमत तीन से पांच लाख आंकी गयी है। 2015 में सपा की सरकार में 62 जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष सपाई थे। तब जिला पंचायत सदस्यों को एक वोट के बदले एक स्कॉर्पियो देने की चर्चा आम थी। लेकिन इस साल यह रेट बढ़ गया है। अमूमन एक जिले में कम से कम 45 डीडीसी हैं। अध्यक्ष बनने के लिए इस तरह कम से कम 23 सदस्यों का वोट चाहिए। एक करोड़ का गणित मानें तो एक अध्यक्ष बनने के लिए कम से कम 23 करोड़ की कीमत चुकानी होगी।

तत्काल चुनाव कराने की बाध्यता नहीं
निर्वाचित जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल 12 जनवरी और ब्लॉक प्रमुख का कार्यकाल 21 मार्च को समाप्त हुआ था। बाद में सरकार ने इन पदों पर प्रशासक नियुक्ति कर दिया था। इसके बाद अब जिपं के लिए 12 जुलाई और ब्लॉक प्रमुख के लिए 21 सितंबर तक चुनाव करा लेना जरूरी होगा।

निर्वाचित सदस्यों में अकुलाहट
शपथ ग्रहण न होने से नवनिर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों में अकुलाहट है। जोखिम में चुनाव लड़कर जीत जाने के बाद भी अभी वे विधिवत प्रतिनिधि नहीं बने हैं। इसलिए जिलों में इन्हें अधिकारी समुचित सम्मान नहीं दे रहे हैं। पंचायतों के पास खूब फंड है ग्राम प्रधान इसका इस्तेमाल भी नहीं कर पा रहे हैं।

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