उत्तर प्रदेश को पश्चिम बंगाल बनने में ज़्यादा समय नहीं

🙏बुरा मानो या भला🙏

उत्तरप्रदेश को पश्चिम बंगाल बनने में ज़्यादा समय नहीं है

————मनोज चतुर्वेदी

कहते हैं कि घर में कुत्ता भी पालो तो हमेशा नस्ल देखकर ही पालो। लेकिन कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भाजपा वालों ने कुनबा जोड़ा। अब यह ईंट-रोड़ा भाजपा की जीत की राह में आ रहा है और लगतार उसकी छवि ख़राब कर रहा है।

2014 में भाजपा ने वीर सावरकर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों को अपनाया और मोदी जी की उग्र हिंदूवादी छवि पर वह चुनाव जीत गए। 2019 में सबका साथ-सबका विकास के नारे ने फिर से मोदी जी को गद्दी पर बैठा दिया। लेकिन इस बार भाजपा ने सावरकरवाद को छोड़कर गांधीवाद को अपना लिया और मोदी जी ने अति उदारवाद की राह पर चलते हुए सबका साथ-सबका विकास के साथ-साथ एक और नारा जोड़ दिया और वह था- “सबका विश्वास”। इस दोगलावाद यानी “सबका विश्वास” जीतने के चक्कर में भाजपा ने अपनों का भी विश्वास खो दिया।
यहां फ़िल्म आंखें का एक गीत याद आता है-
ग़ैरों पे करम, अपनों पे सितम।
ऐ जानेवफ़ा ये ज़ुल्म न कर।।

जिन्होंने भाजपा का गला काटा उन्हीं को भाजपा ने गले लगा लिया। सच कहें तो सत्तामोह में भाजपा ने अपनी मूल विचारधारा को ही दांव पर लगा दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो मोदी जी महाभारत के युधिष्ठिर बन गए और सबकुछ जीतने की चाह में द्रौपदी (अपने आदर्श और सिद्धांतों) को ही दांव पर लगा दिया, यहां आरएसएस ने धृष्टराष्ट्र की भूमिका निभाई।

नीतिशास्त्र कहता है कि कोई भी व्यक्ति अथवा संगठन जब अपने मूल सिद्धांतों और आदर्शों से समझौता करने लगता है तो उसका स्वयं का ही अस्तित्व मिटने लगता है।

गौमाता, गंगा मैया और गुरुकुल संस्कृति की रक्षा और उनके संवर्धन के स्थान पर मदरसों के आधुनिकीकरण और तीन तलाक ख़त्म करने, जैसे अनावश्यक मुद्दों पर ध्यान दिया गया, जिसका कोई लाभ भाजपा को न कभी होना था और न ही हुआ।

जातिवाद, तुष्टिकरण और परिवारवाद को ख़त्म करने का दावा करने वाली भाजपा ने उत्तरप्रदेश में खुलकर जातिवादी राजनीति को प्रश्रय दिया, जिसके दुष्परिणाम 2022 में सामने आ सकते हैं। यह एक अच्छी बात है कि अभी भी भाजपा परिवारवाद और तुष्टिकरण की राजनीति से दूर है।

कड़वा सच यह है कि जो भाजपा भारत को कांग्रेस मुक्त बनाने का दावा कर रही थी, वह ख़ुद कांग्रेस युक्त होने लगी है। दूसरे शब्दों में इसे ऐसे समझिए कि कल तक जो भाजपा राष्ट्रवाद के रास्ते पर चल रही थी, वह अब सत्तावाद के झूले में झूलने लगी है।

उधर आरएसएस को भी यह ग़लतफ़हमी हो गई है कि एकमात्र वही हिंदुत्व का चेहरा हैं और हिन्दू विशेषकर सवर्ण समाज उनके हाथों की कठपुतली है, जिसे वह जब चाहे, और जैसा चाहे नचा सकते हैं। यह सारी गलतफहमियां 2022 में दूर हो जाएंगी।

यह हमारी भविष्यवाणी है कि यदि समय रहते भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और संघ परिवार नहीं चेता तो उत्तरप्रदेश को पश्चिम बंगाल बनने में ज्यादा समय नहीं है।। और इसके लिए भाजपा का दोगलावाद और संघ का उदारवाद दोषी होंगे।

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है।

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