क्या भाजपाइयों के चूड़ी पहनने का सही समय आ गया है

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क्या भाजपाइयों के चूड़ी पहनने का सही समय आ गया है-मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”

1985 में शाहबानो केस के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड सुर्खियों में आया था। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक के बाद शाहबानो के पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था। इसी मामले में माननीय न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि पर्सनल लॉ में यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक सहिंता) लागू होना चाहिए। राजीव गांधी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में बिल पास कराया था।

यहां यह जानना ज़रूरी है कि समान नागरिक सहिंता आख़िर क्या है. संविधान के भाग 4 में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का ब्योरा है। संविधान के आर्टिकल 36 से 51 के जरिए राज्य को कई मुद्दों पर सुझाव दिए गए हैं। इनमें उम्मीद जताई गई है कि राज्य अपनी नीतियां तय करते समय इन नीति-निर्देशक तत्वों का ध्यान रखेंगे। इन्हीं में से आर्टिकल 44 राज्य को सही समय पर सभी धर्मों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने का निर्देश देता है। आसान शब्दों में समझें, तो यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी देश के सभी नागरिकों के लिए एक जैसा पर्सनल लॉ लागू करना राज्य का कर्तव्य बनता है।

मीणा जनजाति की एक महिला और उसके हिंदू पति के बीच तलाक के मुकदमे की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। इस केस में पति हिन्दू मैरिज एक्ट के हिसाब से तलाक चाहता था, जबकि पत्नी का कहना था कि वह मीणा जनजाति की है, ऐसे में उस पर हिन्दू मैरिज एक्ट लागू नहीं होता। पत्नी ने मांग की थी कि उसके पति की तरफ से फैमिली कोर्ट में दायर तलाक की अर्जी खारिज की जाए। उसके पति ने हाईकोर्ट में पत्नी की इसी दलील के खिलाफ याचिका लगाई थी। इस पर टिप्पणी करते हुए माननीय उच्चन्यायालय ने कहा कि देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत है और इसे लाने का यही सही समय है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मामले में जरूरी कदम उठाने को कहा है।
माननीय न्यायालय ने कहा कि भारतीय समाज में जाति, धर्म और समुदाय से जुड़े फर्क खत्म हो रहे हैं। इस बदलाव की वजह से दूसरे धर्म और दूसरी जातियों में शादी करने और फिर तलाक होने में दिक्कतें आ रही हैं। आज की युवा पीढ़ी को इन दिक्कतों से बचाने की जरूरत है। इस समय देश में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए। आर्टिकल 44 में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर जो बात कही गई है, उसे हकीकत में बदलना होगा। यहां ध्यान देने योग्य है कि देश में अभी हिंदू और मुसलमानों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं। इसमें प्रॉपर्टी, शादी, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामले आते हैं।

समान नागरिक सहिंता भारतीय संविधान का ही एक अंग है और एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए इसका होना बेहद ज़रूरी है, परन्तु कांग्रेस और वामपंथियों की तुष्टिकरण की राजनीति के चलते इसे आजतक धरातल पर नहीं लाया जा सका। दरअसल इसमें सबसे बड़ी अड़चन कट्टरपंथियों ने पैदा की है। कट्टरपंथी वह लोग हैं जिनके लिए उनके मज़हबी कानून का दर्जा भारतीय संविधान से हमेशा ऊपर ही रहा है और जिन्होंने अपने मज़हब को राष्ट्रधर्म से अधिक महत्व दिया है। ऐसे कट्टरपंथियों को शह देने में “कथित सेक्युलर जमात” ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।

लेकिन उससे भी बड़ी विडंबना यह है कि अपने आपको “राष्ट्रवाद का चौकीदार” बताने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने भी समान नागरिक सहिंता कानून को लागू करने पर अभी तक गम्भीरता से कोई विचार नहीं किया है। यह दुःखद है कि स्वयं दिल्ली उच्च न्यायालय को केंद्र सरकार से इस कानून को बनाने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहना पड़ा है। जबकि केंद्र में बैठी भाजपा सरकार ने ख़ुद हमेशा इस कानून को देशभर में लागू कराने का आश्वासन दिया था। और यह उनके चुनावी एजेंडे में प्राथमिकता पर था।

हमेशा कांग्रेस की तुष्टिकरण और डरपोक राजनीति को पानी पी-पीकर कोसने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने जनसंख्या नियंत्रण, समान नागरिक सहिंता जैसे महत्वपूर्ण कानून बनाने के वायदों और 56 इंच के सीने की दुहाई देकर ही अपने राजनीतिक संगठन भाजपा को 2019 में पुनः सत्ता में स्थापित करने पर सफलता हासिल कर ली थी। परन्तु अब लगता है कि कल तक कांग्रेस के प्रधानमंत्री को चूड़ियां पहनाने के लिए उतावले भाजपाइयों को अब ख़ुद चूड़ी पहनने का समय आ गया है। बार-बार “मन की बात” करने वाले मोदी जी भी बताएं कि वह “समान नागरिक सहिंता” जैसे राष्ट्रहित के मुद्दों पर अपना “मौनव्रत” कब तोड़ेंगे ?

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र एवं newsdaily24 के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

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