सरेआम होती इस लूट को रोकने के लिए सख्ती कीजिये

भारत के लोग रोज लुट रहे हैं। ठगी के शिकार हो रहे हैं। धोखा देकर उनके खातों से रकम निकाली जा रही है। युवा फर्जी  विश्वविद्यालय में प्रवेश लेकर धन और समय बर्बाद कर रहे हैं। इतना  होने पर भी रोकने के लिए जिम्मेदार संस्थाएं आंखें मूंदे बैठी हैं। वह कुछ नहीं कर पा रहीं। आम उपभोक्ता, देश का युवा नागरिक रोज लुट-पिट कर घर बैठ जाता है। शिकायत करने के बाद भी कुछ भी नहीं कर पाता।

भारतीय स्टेट बैंक ने अपने खाताधारकों से कहा है कि वह बैंक का कस्टमर केयर नंबर गूगल या किसी और प्लेटफार्म पर सर्च ना करें। स्टेट बैंक की सही वेबसाइट का प्रयोग करें। उसने यह भी कहा है उसके नाम (स्टेट बैंक) से मिलती -जुलती लगभग आधा दर्जन वेब साइट गूगल और अन्य ऐसे ही प्लेटफार्म पर मौजूद थे। जरा सी  गलती से आप इन पर लॉगिन करके ठगी के शिकार हो सकते हैं। यह आदेश स्टेट बैंक के नहीं हैं, आज सभी बैंक इस तरह के आदेश कर रहे हैं। बैंक खाताधारकों को जानकारी दे रहे हैं कि वे बैंक के नाम पर हो रही ठगी से कैसे बचेंॽ

यही हालत यूजीसी ग्रांट कमीशन (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) की है। उसे पता है कि देश में कितने फर्जी विश्वविद्यालय चल रहे हैं। वह साल में कई बार इन विश्वविद्यालयों की सूची अखबार में छपवाता  है। वह सिर्फ सूची छपवा कर अपनी जिम्मेदारी  से मुक्त हो जाता है। अपनी जिम्मेदारी से छूट जाता है। सही विश्वविद्यालयों की जानकारी संज्ञान में ना होने पर जो युवा इन फर्जी विश्वविद्यालयों में प्रवेश ले लेते हैं, उनके साल तो बर्बाद होते ही है पढ़ाई के दौरान व्यय हुआ धन भी बेकार जाता है।

कुछ यही हालत राम मंदिर की साइट की भी है। मंदिर का निर्माण कार्य कराने का निर्णय हुआ। धन संग्रह के लिए मंदिर निर्माण समिति ने साइट बनाई। उसकी साइट तो बाद में बनी, उस जैसी मिलते- जुलते नाम की कई साइट और बनकर खड़ी हो गई। आम आदमी राम मंदिर को चंदा देना चाहता है। उसकी मंदिर में आस्था है, लेकिन  ये फर्जी साइट बनाने वाले  उनकी आस्था और विश्वास का लाभ उठाकर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं। उनकी मेहनत की कमाई लूट रहे हैं। राम मंदिर ही नहीं, अन्य प्रसिद्ध मंदिरों के नाम से मिलती −जुलती साइट भी मौजूद हैं।

भारतीय सेना के लिए धन संग्रह वाली अलग साइट है। इसके लिए जो दान करना चाहता है, वहाँ जाकर कर सकता है, लेकिन इसके नाम से मिलती-जुलती कई साइट पहले ही मौजूद हैं। पिछले साल जब चीन से तनातनी चली, तब  इन फर्जी संस्थाओं में दान देने के  बारे में पब्लिक प्लेटफॉर्म, व्हाट्सएप, ट्विटर और फेसबुक आदि पर लगातार मैसेज आए। जनता से अपील की गई  कि सेना को मजबूत करने सैनिकों की सुविधा विस्तार के लिए खुले मन से इनमें दान करें। बाद में पता चलता है कि इन इन सब का अधिकृत एजेंसी से कोई लेना-देना नहीं। यह तो देशवासी की आस्थाओं पर डाका डालने में लगे हुए है। ऐसी ही साइट के बारे में लोगों ने रक्षा मंत्रालय और केंद्र की कई जिम्मेदार संस्थाओं को मेल कर वस्तु स्थिति जाननी चाही। एक साल बीतने पर भी कोई  उत्तर नहीं मिला।

जिम्मेदार संस्थाएं बैंक, विश्व विद्यालय अनुदान आयोग आदि इन धोखेबाज के खिलाफ मुकदमे दर्ज क्यों नहीं करते?
हम जानते हैं कि ठगी हो रही है। लोगों की आस्थाओं का गलत लाभ उठाया जा रहा है। कुछ चोर −लुटेरे आराम से लोगों की मेहनत की कमाई पर अय्याशी कर रहे हैं।

इस तरह की ठगी, लूट और धोखाधड़ी रोकने के लिए केंद्र सरकार के स्तर पर कोई संस्था होनी चाहिए। ऐसा करने वालों पर कठोर दंड की व्यवस्था हो, तुरत-फुरत न्याय हो, कठोर साइबर कानून हो। इसके साथ जरूरी है कि अपराधी के प्रति कोई दया या कृपा न बरती जाए। उत्तर प्रदेश की तरह अपराधियों की संपत्ति पर तुरंत सरकार कब्जा कर ले। तभी जाकर इन अपराधों पर रोक लग सकती है, अन्यथा ये तो चलता ही रहेगा।

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