प्रदेशीय नेतृत्व के लाडले मूलचन्द्र कटा सकते हैं भाजपा की नाक

संजय श्रीवास्तव- प्रधान सम्पादक

माधौगढ़ मे भाजपा को पड़ गया राम से काम, वही कर सकतें हैं अब नईया पार

मूलचन्द्र और उनकी शातिर चौकड़ी द्वारा जनता की उपेक्षा का हो सकता है घातक अंजाम

अपने कार्यकाल में मूलचन्द्र में हुए भेदभाव का पूरा हिसाब चुकता करने के मूड में है मतदाता

जनपद मे प्रशासन के सबसे प्रिय रहे मूलचन्द्र को खूब मिली वरीयता, मगर जनता भेज सकती है उन्हे हाशिए पर

निरंजनों का बहुमत भी कर रहा है मूलचन्द्र से किनारा

उरई(जालौन)। जनपद जालौन की तीन विधानसभाओं में सबसे ज्यादा रूतबा भाजपा के सत्ता काल मे माधौगढ के विधायक मूलचन्द्र निरंजन का रहा। वजह बडे़ नेताओं का आशीर्वाद उनके साथ था, जिस कारण पहली बार विधायक बने मूलचन्द्र सत्ता का सुख और अधिकारियों को अपने पीछे देख कर कुछ इस कदर मुग्ध रहे कि उन्हें वारे न्यारे करने के अलावा जनता की सेवा के दायित्व का कभी ख्याल ही नहीं आया।
पुराने राजा महाराजों का गढ़ और दस्यु राजों का प्रिय रहा माधौगढ़ विधानसभा क्षेत्र की जनता ने पिछले चुनाव मे मोदी लहर के चलते जब मूलचन्द्र को विजयश्री सौपीं तो आपे से बाहर हुए सत्ताधारी विधायक और उनकी चौकड़ी ने क्षेत्र का न सिर्फ दम से शोषण किया बल्कि भाजपा के आदर्श ईमानदारी और सेवा जैसे दावों की यहां खुल कर धज्जियां उड़ा दी। प्रान्तीय नेताओं की लटक बने मूलचन्द्र का अधिकांश समय राजधानी लखनऊ में बीतता था और अगर वो जिले मे आए तो डीएम और एसपी से ही चिपके दिखायी देते थे। सत्ता की ललक और उसकी ताकत का भरपूर दुरूपयोग करने वाले मूलचन्द्र ने अच्छे काम तो कम किए मगर अपने ही जनपद के लोगों का प्रशासन से उत्पीड़न कराने मे उन्होंने तीनों विधायकों में अव्वल स्थान प्राप्त किया। यहीं नहीं प्रदेशीय नेतृत्व के दम पर उन्होंने पुलिस के मामलों में जबरदस्त हस्ताक्षेप किया और तमाम प्रतिष्ठित और अच्छे लोगों के पुलिस का डंडा करवाने में वे नही चूके। यही वजह रही कि मूलचन्द्र शरीफ और प्रतिष्ठित लोगों के मन से उतर गए। वे सत्ता के मद में यह भी नही समझ पाए कि उनकी हरकतों के कारण विधानसभा क्षेत्र की जमीन उनके पैरों के नीचे से सरक गयी है। अब जब चुनाव का एलान हुआ तो सारे सत्ताधारियों के ताम झाम धर गए तो अभिमानी मूलचन्द्र काफी अकेले पड़ गए। क्योंकि खाने कमाने वाले स्वार्थी तत्व तो सत्ता जाते ही सबसे पहले भाग जाते हैं। ऐसी विपरीत स्थिति का सामना करने के लिये भी मूलचन्द्र मानसिक रूप से तैयार नहीं थे, क्योंकि उनके चापलूसों और खाउ कमाउ रिश्तेदारों ने उन्हें पूरा क्षेत्र “सॉलिड” करते रहने की झूठी डींगे हांक कर ऐसे अंधेरे मे रखा था कि जब चुनाव का उजाला हुआ तो जनता का बदला रूख देख कर मूलचन्द्र के तो मानो होश ही उड़ गए। मगर भाजपा के चन्द समर्थकों, रिश्तेदारों के दम पर जब वे दोबारा जीतने के लिये क्षेत्र में गए तो जनता के कड़े “रिएक्शन” का उन्हें सामना करना पड़ा। चुनाव प्रचार की बोहनी ही इतनी खराब हुई कि मूलचन्द्र की इस चुनावी पिच पर लाइन लेन्थ ही बिगड़ गयी और वह बुरी तरह घबरा गए। पूर्व विधायक ने चुनावी “महाभारत” में अपने को दिग्गज महारथियों से घिरा पाया। वास्तविकता यह है कि अब इस जंग में मूलचन्द्र से काफी ज्यादा तवज्जो वोटर बसपा प्रत्याशी शीतल कुशवाहा और सपा प्रत्याशी ठा.राघवेन्द्र प्रताप सिंह को खुलेआम दे रहा है। दूसरी बात यह कि अपनी उपेक्षा के चलते मूलचन्द्र का सजातीय कुर्मी वोट भी बहुमत में उनके साथ नहीं दिखता। वास्तविकता तो यह है कि इस ठाकुर बाहुल्य विधानसभा में ठाकुरों का इन्हें तो आंशिक वोट ही मिल पाएगा वह भी ठाकुरों में सबसे लोकप्रिय हो चुके भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बल पर। मुख्य मुकाबला यहां त्रिकोणीय होने के आसार नजर आ रहे हैं, जिनमें सपा बसपा के मुकाबले मूलचन्द्र (फिसडृडी) माने जा रहे हैं।

कहने का मतलब यह है कि सेवा के इस क्षेत्र मे सत्ता का मद पाकर अगर कोई जन प्रतिनिधि सरकारी ठाठ बाट से मदांध हो जाता है तो लोकतंत्र के पर्व, यानी कि चुनाव में जनता उसकी दुर्दशा भी कर देती है। यह सबक भी मूलचन्द्र की दशा को देख कर अन्य नेता गणों को भी लेना चाहिये, क्योंकि अब भाजपा का बेड़ा जो भवर मे फंसा है, राम नाम जपने से ही हो सकता है पार।

संजय श्रीवास्तव-प्रधान सम्पादक एवम स्वत्वाधिकारी, अनिल शर्मा- निदेशक, शिवम श्रीवास्तव- जी.एम.

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