डंपिंग ग्राउंड में दफन किये जा रहे तेजतर्रार पुलिस अधिकारी!

फील्ड के महारथी माने जाने वाले कई पुलिस अफसरों की डंपिंग सेंटर जैसी जगहों पर विचित्र तैनाती के कई मामले हाल में सामने आये हैं जो कानून व्यवस्था को अपने एजेंडे में सर्वोच्च स्थान देने वाली सरकार के मद्देनजर बड़े विपर्यास की बानगी है। नवनीत सिकेरा की ख्याति एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के रूप में रही है। वे जाति से यादव जरूर हैं लेकिन उनकी प्रतिष्ठा इस बात के लिए है प्रोफेशनल ईमानदारी से समझौता करना किसी राग विराग के कारण उन्होंने प्रायः मंजूर नहीं किया। इसलिए अखिलेश की सरकार उनसे कुपित हो गई थी उनकी क्षमताओं और विशेषताओं का लाभ उठाने की उत्सुकता योगी सरकार में होनी तो चाहिए थी लेकिन पता नहीं क्यों इस सरकार ने केवल उन्हें भाव नहीं दिया बल्कि अभी तक वे पुलिस महानिदेशक कार्यालय से संबद्ध थे पर अब तो उन्हें पुलिस ट्रेनिंग स्कूल उन्नाव में एडीजी बनाकर एकदम कूड़े में फैंक दिया गया है। यही किस्सा एडीजी ज्योति नारायण के साथ किया गया। जबकि वे तो यादव भी नहीं है जो जातिगत पूर्वाग्रह के कारण इस सरकार में संदेह के शिकार बनाये जाने चाहिए थे। पर आश्चर्य जनक रूप से वे भी मौजूदा सत्ताधारियों की प्रताड़ना लिस्ट में दर्ज दिख रहे हैं।
ज्योति नारायण जहां भी जिले के पुलिस प्रमुख रहे उन्होंने पीड़ित फरियादियों के बीच मसीहा की छवि बनायी। राजनीतिक दबाव कितना भी पड़ा हो पर वे अन्याय के शिकार व्यक्ति के संरक्षण के अपने दायित्व से मुकरते नहीं थे जिससे महीना दो महीना में ही ट्रांसफर होना उनकी नियति बन गया था। एक बार तो सरकारी पक्ष के दबंगों के खिलाफ एक्शन लेने की जिद के कारण उनका फिरोजाबाद से रातों-रात तबादला कर दिया गया। यह तबादला जालौन जिले के लिए किया गया था लेकिन यहां वे कार्यभार संभाल पाते इसके पहले ही उन्हें अगले आदेश की प्रतीक्षा करने के लिए कह दिया गया। वे 24 घंटे अधर में रहे। इस बीच उन्होंने अपनी उपस्थिति को लेकर डीजीपी कार्यालय से मार्गदर्शन मांगा तो मालूम हुआ कि डीजीपी खुद ही उन्हें चार्ज लेने से रोके जाने के आदेश से अवगत नहीं हैं। किसी ईमानदार अधिकारी को जलील करने की यह पराकाष्ठा थी।
उनकी कार्यशैली की वजह से खासतौर पर सपा के समय का निजाम उनसे इस कदर नाराज था कि जब डेपूटेशन पर उन्हें एनआईए में शामिल किया जा रहा था तो तत्कालीन प्रदेश सरकार ने उनको रिलीव करने पर स्टाप लगा दिया। उन दिनों ज्योति नारायण का परिवार भी बहुत तनाव में आ गया था। उनकी पत्नी का कहना था कि हम जहां भी जाते हैं अपने सामान की पैकिंग खोल नहीं पाते कि नये तबादले का आदेश थमा दिया जाता है। खानाबदोशी की इस जिंदगी से वे तंग आ चुकी हैं इसलिए बेहतर होगा कि नौकरी छोड़कर अपने पुस्तैनी कारोबार को सेटिल करें। खुद ज्योति नारायण भी इतने मायूस थे कि पत्नी की बात मानकर आईपीएस के शानदार कैरियर के मोह को तिलांजलि देकर इस्तीफा देने की तैयारी में लग गये थे। वह तो भला हो उस समय के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का। तत्कालीन एनआईए डीजी ने व्यक्तिगत रूप से अखिलेश से मुलाकात की और उनसे अनुरोध किया कि ज्योति नारायण जैसे बेहतरीन अफसर की एनआईए को प्रभावी ढ़ंग से खड़ा करने के लिए उन्हें बेहद जरूरत है इसलिए वे ज्योति नारायण को उत्तर प्रदेश से कार्यमुक्त कर दें। अखिलेश को बात समझ में आयी और उन्होंने ज्योति नारायण को छोड़ दिया।
केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति से उत्तर प्रदेश वापस आने पर पहले तो योगी सरकार ने उनके प्रोफाइल का ध्यान रखकर उन्हें बेहतर ढ़ंग से नवाजा और आईजी एलओ बना दिया कुछ समय बाद वे एडीजी के रूप में प्रोन्नत हो गये लेकिन तब तक उत्तर प्रदेश में पुलिस और प्रशासन में चल रही गिरोहबंदी के निशाने पर चढ़ जाने की वजह से उनके सितारे डगमगा चुके थे। उन्हें एडीजी यातायात और सड़क सुरक्षा बनाया गया जबकि उम्मीद की जा रही थी कि किसी महत्वपूर्ण जोन की कमान उन्हें सौंपी जायेगी क्योंकि इसके लिए उनकी उपयोगिता अधिक थी।

सरकार में हावी जातिवाद- दुर्भाग्य यह है कि इस सरकार में संवेदनशील पदों पर नियुक्तियों के मामले में जातिवाद हावी है। उदाहरण के तौर पर जेएन सिंह जैसे अफसर जोन की कमान के हकदार बने हुए हैं जिन्हें योगी की सरकार आने पर पहले लखनऊ रेंज का डीआईजी बनाया गया था पर उनसे यह जिम्मेदारी नहीं संभली, जिससे उनको हटाना पड़ गया था। उस समय प्रदेश की राजधानी में एसएसपी और आईजी जोन पुलिस की पूरी व्यवस्था को कैप्चर किये हुए थे। जोन एडीजी अभय कुमार प्रसाद थे जो अनु0जाति के थे इसलिए कोई इंस्पेक्टर और थानाध्यक्ष उनकी नहीं सुनता था। यह जानते हुए भी एसएसपी और आईजी जोन की नाकामी के लिए एडीजी जोन बिना बात में ही नाप दिये गये जो अभी तक ईओडब्ल्यू में दिन गुजार रहे हैं जबकि जेएन सिंह कुछ दिनों लूपलाइन में रहने के बाद फिर मुख्यधारा में वापस आ गये और आईजी के बाद एडीजी बनने पर भी उनका जलबा बरकरार है।
बहरहाल ज्योति नारायण यातायात और सड़क सुरक्षा के ही एडीजी बने रहते तो भी गनीमत थी पर जब उन्हें जालौन में एडीजी ट्रेनिंग के रूप में स्थानांतरित किये जाने का आदेश जारी हुआ तो लोगों को बहुत अटपटा लगा है। वैसे भी पुलिस के ट्रेनिंग स्कूलों में एडीजी स्तर के अधिकारियों की तैनाती का कोई औचित्य नहीं है। यह तो पुलिस में सक्षम मानव संसाधन की बर्बादी है। फिर भी अगर पीटीएस में एडीजी की तैनाती किसी नियमगत बाध्यता के कारण अपरिहार्य ही हो तो ऐसे चुके हुए अफसर इसके लिए तलाशे जाने चाहिए जिनमें काम की कोई उमंग न बची हो और ऐसे अफसरों की भी उत्तर प्रदेश में कमी नहीं है।
दरअसल ऐसा लगता है कि पुलिस सेटअप के कर्ताधर्ता के रूप में कोई काकस हावी हो गया है जिसने किसी तिकड़म से मुख्यमंत्री का भरोसा जीत रखा है और इसका गलत फायदा उठाने में कसर नहीं छोड़ रहा। यह सही है कि संगठित अपराधों पर इस सरकार ने लगभग लगाम लगा दी गई है पर रोजमर्रा के अन्याय और भ्रष्टाचार को रोकने के दायित्व को लेकर यह सरकार वीतराग हो चुकी है। जबकि खतरनाक स्थितियों के निर्माण के लिए इस तरह की अनदेखी बीज का काम करती है। पुलिस में जब रिश्वत लेने की आदत को पनपने दिया जाता है तो भले ही पहले मामला सीमित रहे पर इसके बाद अनिवार्य रूप से लालच और दुस्साहस बढ़ने की परिणति तक स्थितियां पहुंच जाती हैं। फिर बड़ी रिश्वत का लालच जहां बढ़ा वहीं पुलिस संगीन से संगीन अपराधो में सहभागी तक बनने लगती है और यहीं से माफिया तंत्र को फिर से सिर उठाने का मौका मिल जाता है। इसलिए पुलिस रूटीन में भी ईमानदार रहे इसका संकल्प सरकार में अनिवार्य रूप से होना चाहिए।


काकस चला रहा सिस्टम? मोदी-योगी युग शुरू होने के पहले हमारे लोकतंत्र की दिशा कुछ और मानी जाती थी। यह धारणा थी कि सरकार आती जाती रहेगी लेकिन ऐसी स्थिति बनाई जाये जिससे सिस्टम राजनैतिक उठा पटक से अछूता रहकर अपना काम स्थापित नियमों और परंपराओं के मुताबिक करता रहे। जोर इस बात पर था कि सिस्टम को ज्यादा से ज्यादा कारगर बनाया जाये इसके लिए समय-समय पर संस्थागत मजबूती के कदम उठाये जाते रहें। तब हमारे रोल माडल अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस आदि यूरोपीय देशो की लोकतांत्रिक व्यवस्था थी। पर आज भले ही देश की मौजूदा सरकार कम्युनिष्ट चीन से वैचारिक तौर पर विपरीत ध्रुव पर हो पर व्यवहारिक तौर पर वह उसके वन पार्टी रूल के माडल को आत्मसात करने में लगी है। प्रशासनिक नार्मस से लेकर हर चीज को इस उद्देश्य के लिए झोंका जा रहा है। इसमें सिस्टम को निरपेक्ष तौर पर मजबूत किये जाने की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है। उत्तर प्रदेश में वह काकस जिसका केन्द्र शासन में है पुलिस सिस्टम को भी इस उद्देश का उपकरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और हावी नजर आ रहा है। इसलिए संस्थान को बाईपास करके पुलिस को संचालित करने की नई लीक शुरू की गई है। चर्चा इस बात की है कि पुलिस के मुखिया का पद अब कागजी बनाकर रखने की कोशिशें चल रही हैं जबकि विभाग का पूरा नियंत्रण कहीं और से होता है। इसी का असर है कि पुलिस में महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती के लिए संबंधित जिम्मेदारी के अनुरूप अधिकारी की रूचि व क्षमता को आधार बनाने का रिवाज ओझल कर दिया गया है आशंका है कि इसके दूरगामी नतीजे सुशासन की संकल्पना पर भारी पड़ेंगे। वैसे कहा यह भी जाता है कि यह गड़बड़ियां तभी तक चल पायेंगी जब तक सीएम योगी को वस्तुस्थिति पता नहीं चलती। जिस दिन उन्हें पता चल जायेगा कोई अपने को उनका कितना भी चहेता क्यों न समझता हो उसे निपटाने में वे देर नहीं करेंगे।

केपी सिंह, जालौन टाइम्स

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