नमामि गंगे: गंगा सफाई का क्या है जमीनी सच?

गंगा सफाई का क्या है जमीनी सच? सरकार के दावों पर नाराज क्यों है हाईकोर्ट?


लखनऊ: उत्तर प्रदेश में गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की जमीनी स्थिति क्या है? सरकार का दावा है कि तेजी से काम हो रहा है। नमामि गंगे प्रोजैक्ट से गंगा की अविरलता और निर्मलता दोबारा प्राप्त हुई है। वहीं दूसरी तरफ हाईकोर्ट का मानना है कि गंगा प्रदूषण मुक्त करने के काम में तमाम विभागों में तालमेल का ही अभाव है। हाईकोर्ट काे कहना पड़ रहा है कि रिपोर्ट बहुत अच्छी है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और दिखाई दे रही है। रिपोर्ट में नाले टैप है, गंदा पानी नहीं जा रहा। लेकिन गंगा का प्रदूषण खत्म नहीं हो रहा, जितना उत्सर्जन है, शोधन क्षमता उससे काफी कम है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि गंगा सफाई को लेकर सच क्या है?
गंगा सफाई को लेकर खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सराहना करते हुए कहते हैं कि पहले गंगा का जल आचमन योग्य नहीं होता था लेकिन आज गंगा में डॉल्फिन भी दिखाई पड़ती है। सीएम योगी ने मंगलवार को ग्रेटर नोएडा में आयोजित 5 दिवसीय इंडिया वाटर वीक-2022 के दौरान कहा कि प्रदेश में पहले गंगा का सबसे क्रिटिकल प्वाइंट कानपुर हुआ करता था, लेकिन आज नमामि गंगे प्रोजेक्ट से कानपुर का सीसामऊ सीवर प्वाइंट सेल्फी प्वाइंट बन गया है। इतना ही नहीं नमामि गंगे परियोजना के पहले और बाद के बदलाव का असर अब अविनाशी काशी में भी दिखाई पड़ता है। पहले गंगा का जल आचमन करने योग्य नहीं होता था। एनडीआरएफ की टीम ने बताया कि दो से तीन दिन गंगा में जाने के कारण शरीर पर लाल-लाल चकत्ते पड़ जाते थे,  लेकिन आज गंगा में डॉल्फिन भी दिखाई पड़ती हैं। गंगा की अविरलता और निर्मलता दोबारा नमामि गंगे प्रोजेक्ट से प्राप्त हुई है।

विभागों, निगमों और अधिकरणों के हलफनामे विरोधाभासी
वहीं दूसरी तरफ इलाहाबाद हाईकोर्ट गंगा प्रदूषण के लिए चल रहे सरकारी काम से खुश नहीं है। हाईकोर्ट ने अब गंगा प्रदूषण मामले में विभागों, निगमों व अधिकरणों में तालमेल न होने और विरोधाभासी हलफनामा दाखिल कर एक-दूसरे को जवाबदेह ठहराने पर सख्त रवैया अपना लिया है। कोर्ट ने प्रदेश के मुख्य सचिव को निर्देश दिया है कि वह इस मामले में आपसी तालमेल बैठाने के लिए सभी विभागों के अधिकारियों की एक कमिटी गठित करें, जो प्रदेश के महाधिवक्ता को कोर्ट की कार्यवाही में सहयोग करेंगे। कोर्ट ने इसके लिए मुख्य सचिव को जरूरी दिशा-निर्देश जारी करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने महाधिवक्ता अजय कुमार मिश्र से कहा है कि सभी विभागों, निगमों, स्थानीय निकायों व अधिकरणों की तरफ से पर्यावरण सचिव का आदेशों के अनुपालन पर एक हलफनामा दाखिल करें।

केंद्रीय प्रदूषण नियमंत्र बोर्ड और आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट में भिन्नता
कोर्ट में जल निगम ग्रामीण के अधिवक्ता ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट व गंगा जल प्रदूषण पर दाखिल रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए और कहा कि आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट बोर्ड की रिपोर्ट से भिन्न है। कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिवक्ता कुंवर बाल मुकुंद सिंह से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। उन्होंने जानकारी लेने के लिए समय मांगा। दूसरी तरफ, कोर्ट ने राष्ट्रीय ग्रीन ट्राइब्यूनल और केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के प्रदूषण मानकों में भिन्नता को लेकर एएसजी आई शशि प्रकाश सिंह व भारत सरकार के अधिवक्ता राजेश त्रिपाठी से जानकारी मांगी है। जनहित याचिका की अगली सुनवाई एक दिसंबर को होगी।

रिपोर्ट अच्छी लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और दिख रही: हाईकोर्ट
में याचिका की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल, न्यायमूर्ति एमके गुप्ता और न्यायमूर्ति अजित कुमार की फुल बेंच कर रही है। भारत सरकार के एएसजीआई ने जल शक्ति मंत्रालय की तरफ से दाखिल हलफनामे में गंगा स्वच्छता अभियान के मद में 3000 करोड़ धन देने व खर्च का ब्योरा पेश किया और कहा कि केंद्र सरकार इसकी मानिटरिंग कर रही है। कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट बहुत अच्छी है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और दिखाई दे रही है। रिपोर्ट में नाले टैप है, गंदा पानी नहीं जा रहा, लेकिन गंगा का प्रदूषण खत्म नहीं हो रहा, जितना उत्सर्जन है, शोधन क्षमता उससे काफी कम है

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