भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़

भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश बने न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़, राष्ट्रपति ने दिलाई शपथ


नई दिल्ली। न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने बुधवार को भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक संक्षिप्त समारोह में उन्हें शपथ दिलाई।

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित से भारत की न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में पदभार ग्रहण किया, जिन्होंने मंगलवार को पद छोड़ दिया।

जस्टिस चंद्रचूड़ दो साल के लिए चीफ जस्टिस के रूप में काम करेंगे। चंद्रचूड़ के नाम की सिफारिश यूयू ललित ने की थी, जिसके बाद कानून मंत्रालय ने राष्ट्रपति से मंजूरी मांगी थी, जिस पर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने अपनी मुहर लगा दी।

एकमात्र पिता-पुत्र की जोड़ी: जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के पिता यशवंत विष्णु चंद्रचूड़ भी चीफ जस्टिस रह चुके हैं। यह एकमात्र पिता-पुत्र की जोड़ी है, जो इस शीष पद पर पहुंची है। पूर्व चीफ जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ 1978 में मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए गए थे और 1985 में सेवानिवृत्त हुए थे। 7 साल तक कार्य करने का सबसे लंबा कार्यकाल भी उन्हीं के नाम है। डीवाई चंद्रचूड़ ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से कानून में दो डिग्री प्राप्त की थी। 39 वर्ष की उम्र में वह वरिष्ठ अधिवक्ता बनने वाले भारत के सबसे कम उम्र के वकीलो में थे।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ 13 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त किए गए थे। इससे पहले वो 31 अक्टूबर 2013 से इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे। उससे पहले 29 मार्च 2000 को वो बॉम्बे हाईकोर्ट के जज बनाए गए थे। 1998 में उन्हें भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया था।

पत्रकार को लिखने से रोका नहीं जा सकता- सुप्रीम कोर्ट

जिस तरह वकील को बहस करने से नहीं रोका जा सकता, उसी तरह पत्रकार को भी लिखने से रोका नहीं जा सकता-न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड ने बहुत बड़ी बात कही है। एक फैसले में उन्होंने पत्रकारों को कुछ कहने या लिखने से नहीं रोकने की व्यवस्था देते हुए कहा कि यह बिल्कुल वैसा होगा कि हम एक वकील से यह कहें कि आपको बहस नहीं करनी चाहिए।

दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार के अधिवक्ता ने पत्रकार द्वारा सरकार के खिलाफ भविष्य मे न लिखने की शर्त के साथ जमानत देने का अनुरोध किया था।

अखिल भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार परिषद संगठन के  राष्ट्रीय अध्यक्ष/ संस्थापक एडवोकेट हरिमोहन दूबे ने अपने समर्थकों के साथ सुप्रीम कोर्ट के इस सुप्रीम फैसले का स्वागत करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति को पूरे देश के पत्रकार संगठनों की तरफ से धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि पत्रकार को देश में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। वह हमेशा देश को मजबूत करने और स्वस्थ समाज की परिकल्पना की आवाज को अपनी लेखनी से उजागर करता है। इसलिए उसके स्वस्थ लेखन पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक ना लगा कर देश के  प्रशासनिक अधिकारियों को, एक बड़ा संदेश दिया है। उन्होंने अपने संगठन के लोगों की तरफ से उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा; “जिस तरह न्यायालय में वकील को बहस करने से नहीं रोका जा सकता है। उसी तरीके पत्रकार को खबर लिखने से रोका नहीं जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय है। यह निर्णय लोकतंत्र को मजबूत करने का स्तंभ है।”

नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट इंडिया की अयोध्या इकाई ने सुप्रीम कोर्ट के इस सुप्रीम फैसले का स्वागत करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति को पूरे देश के पत्रकार संगठनों की तरफ से धन्यवाद ज्ञापित किया है और कहा है कि पत्रकार को देश का चौथा स्तंभ माना जाता है और वह हमेशा देश को मजबूत करने और स्वस्थ समाज की परिकल्पना की आवाज को अपनी लेखनी से उजागर करता है। इसलिए उसके स्वस्थ लेखन पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक ना लगा कर देश की प्रशासनिक अधिकारियों को एक संदेश दिया।

‌यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष त्रियुग नारायण तिवारी, जिला अध्यक्ष नाथ बख्श सिंह, प्रदीप पाठक, जयप्रकाश सिंह सहित अनेक पत्रकारों ने उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा “जिस तरह न्यायालय में वकील को बहस करने से नहीं रोका जा सकता, उसी तरीके पत्रकार को खबर लिखने से रोका नहीं जा सकता”; सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लोकतंत्र को मजबूत करने का  स्तंभ है।

 दरअसल ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर को उत्तर प्रदेश में उनके खिलाफ दर्ज सभी प्राथमिकी में अंतरिम जमानत देते हुए न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ए. एस. बोपन्ना की पीठ ने कहा कि जुबैर को लगातार हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है। पीठ ने कहा कि जुबैर उत्तर प्रदेश पुलिस और दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज सभी प्राथमिकियों को रद्द करने के अनुरोध को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय जा सकते हैं, क्योंकि ये सभी प्राथमिकियां अब एक साथ जुड़ गई हैं। दिल्ली की अदालत ने उन्हें दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ द्वारा दर्ज प्राथमिकी में जमानत दे दी, जो पहले से ही उनके संगठन के ट्वीट और वित्तपोषण की पूरी जांच कर रही है। पीठ ने कहा कि यदि सभी मामलों की जांच विभिन्न अधिकारियों द्वारा अलग-अलग किये जाने के बजाय एक प्राधिकरण द्वारा की जाती है तो यह निष्पक्ष और उचित होगा। उच्चतम न्यायालय ने जुबैर को भविष्य में ट्वीट करने से रोकने से इंकार करते हुए कहा कि क्या एक वकील को बहस करने से रोका जा सकता है?

जारी रहेगा ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे

नई दिल्ली (एजेंसी)। वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे जारी रहेगा। सर्वे पर तत्काल रोक लगाने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका के जरिए इस सर्वे पर रोक लगाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पेपर देखने के बाद ही कुछ बताएंगे। हालांकि इस संबंध में अर्जी पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जाहिर करते हुए कहा कि इस पर सुनवाई बाद में की जाएगी।

बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई अगले हफ्ते कर सकता है। वाराणसी के लोकल कोर्ट ने कमिश्नर को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के सर्वे का आदेश दिया है। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की ओर से दायर अर्जी को लेकर चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि इस मामले में हमे कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में हम तत्काल कोई आदेश कैसे जारी कर सकते हैं? हम इस मामले की लिस्टिंग कर सकते हैं। चीफ जस्टिस ने कहा कि इस मामले से जुड़ी फाइलों को हमने पढ़ा नहीं है। उनके अध्ययन के बाद ही कोई आदेश जारी किया जा सकता है।

FASTER सिस्टम से अब जमानत मिलने के बाद कैदियों की रिहाई प्रक्रिया होगी और तेज

नई दिल्ली (एजेंसी) देश में अब जमानत मिलने के बाद कैदियों की रिहाई प्रक्रिया और तेज हो जाएगी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायधीश एनवी रमणा आज फास्ट एंड सिक्योर ट्रांसमिशन आफ इलेक्ट्रानिक रिका‌र्ड्स को लॉन्च करेंगे। बताया गया है कि मुख्य न्यायाधीश FASTER सॉफ्टवेयर को वर्चुअली लॉन्च करेंगे। कार्यक्रम में CJI समेत सुप्रीम कोर्ट के अन्य जज और सभी हाईकोर्ट के जज शामिल होंगे। इस सिस्टम के आने के बाद कैदियों को जमानत के दस्तावेजों की हार्ड कॉपी के जेल प्रशासन तक पहुंचने का इंतजार नहीं करना होगा।

सितंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला लेते हुए अपने आदेशों को संबंधित पक्षों तक पहुंचाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन के सिस्टम को लागू करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने आदेश देते समय जमानत मिलने के बावजूद कैदियों को जेल से रिहाई में होने वाली देरी पर चिंता जताई थी। FASTER के जरिए अदालत के फैसलों की तेजी से जानकारी मिल सकेगी और उस पर तेजी से आगे की कार्यवाही संभव हो सकेगी।

इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स या फास्टर का तेज और सुरक्षित ट्रांसमिशन जेलों में ड्यूटी-होल्डर्स को अंतरिम आदेशों, जमानत आदेशों, स्थगन आदेशों और कार्यवाही के रिकॉर्ड की ई-प्रमाणित प्रतियों को भेजने में मदद करेगा, ताकि एक सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन चैनल के माध्यम से अनुपालन और उचित निष्पादन हो सके। पिछले साल मुख्य न्यायाधीश एनवी रमणा, न्यायमूर्ति नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की तीन सदस्यीय पीठ ने राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों, जेल विभागों और अन्य संबंधित अधिकारियों को ई-प्रमाणित प्रतियों को स्वीकार करने के लिए जेलों में व्यवस्था करने का निर्देश दिया था।

कोरोना से मौत: मुआवजे के फर्जी दावों पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित

नई दिल्ली (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कोविड से हुई मौत के संबंध में मुआवजे के फर्जी दावों पर अपनी चिंता जताई और कहा कि वह इस मामले में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) को जांच का निर्देश दे सकता है। शीर्ष अदालत ने सुझाव दिया कि कथित फर्जी मौत के दावों की जांच महालेखा परीक्षक कार्यालय को सौंपी जा सकती है।

न्यायमूर्ति एम.आर. शाह और न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने कहा: हमने कभी नहीं सोचा था कि इस तरह के फर्जी दावे आ सकते हैं। हमने कभी नहीं सोचा था कि इस योजना का दुरुपयोग किया जा सकता है। पीठ ने कहा कि अगर इसमें कुछ अधिकारी भी शामिल हैं तो यह बहुत गंभीर है। अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने आपदा प्रबंधन अधिनियम की धारा 52 की ओर इशारा किया, जो इस तरह की चिंताओं को दूर करता है। न्यायमूर्ति शाह ने कहा, हमें शिकायत दर्ज करने के लिए किसी की आवश्यकता है।

एक वकील ने राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरणों द्वारा मुआवजे के दावों की रैंडम जांच करने का सुझाव दिया। बच्चों को मुआवजे के पहलू पर, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके द्वारा आदेशित 50,000 रुपये का अनुग्रह भुगतान, कोविड -19 के कारण प्रत्येक मृत्यु के लिए किया जाना है, न कि प्रभावित परिवार के प्रत्येक बच्चे को। 7 मार्च को, सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों द्वारा कोविड की मौतों के लिए अनुग्रह मुआवजे का दावा करने के लिए लोगों को नकली चिकित्सा प्रमाण पत्र जारी करने पर चिंता व्यक्त की, और कहा कि वह इस मामले की जांच का आदेश दे सकता है।

डाक्टरों को महंगे गिफ्ट! फार्मा कंपनियां भी जिम्मेदार

डाक्टरों को मिलने वाले महंगे उपहार का मामला, केंद्र सरकार को नोटिस

नई दिल्ली (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट ने फार्मा कंपनियों की ओर से डाक्टरों को दिए जाने वाले गिफ्ट और महंगे उपहारों को रेगुलेट करने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। वर्तमान में फार्मा कंपनियों की ओर से डाक्टरों को गिफ्ट देने के लिए डाक्टरों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है।

याचिका में मांग की गई है कि महंगे उपहारों के लिए फार्मा कंपनियों को भी जिम्मेदार ठहराया जाए। इसके पहले एक दूसरी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि डाक्टरों को महंगे उपहार देना कानून सम्मत नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि फार्मा कंपनियां डाक्टरों को महंगे गिफ्ट देकर कानून से भाग नहीं सकती हैं।

शादी के वक्त मिली ज्वेलरी-संपत्ति महिला के नाम करने की अर्जी

शादी के वक्त मिली ज्वेलरी-संपत्ति महिला के नाम करने की अर्जी, सुप्रीम कोर्ट बोला- दहेज कानून पर दोबारा विचार की जरूरत

● दहेज मामलों को रोकने वाले कानून को और मजबूत करने की है जरूरत: सुप्रीम कोर्ट

● सुप्रीम कोर्ट बोला, सुझावों पर कानूनी बदलाव के लिए लॉ कमीशन कर सकता है विचार

नई दिल्ली (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मामलों पर चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि इस रोकने वाले कानून को मजबूत करने की जरूरत है। मौजूदा कानूनों पर फिर से विचार की जरूरत है। अदालत से दहेज निरोधक कानून को सख्त करने के साथ शादी के समय दी जाने वाली जूलरी और दूसरी संपत्ति 7 साल तक लड़की के नाम किए जाने की गुहार लगाई गई है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये मामला बेहद अहम है, लेकिन याचिकाकर्ता के लिए सही होगा कि वह लॉ कमिशन के सामने यह सुझाव दे। लॉ कमीशन चाहे तो कानून को सख्त करने पर विचार कर सकता है।

अर्जी में कहा गया है कि शादी से पहले एक प्री मैरिज काउंसलिंग की व्यवस्था हो। इसके लिए कुरिकुलम कमीशन बनना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसमें संदेह नहीं है कि दहेज समाज के लिए हानिकारक है। याचिकाकर्ता ने मामले में जो गुहार लगाई है उसमें कहा गया है कि दहेज निरोधक ऑफिसर होना चाहिए, जैसे आरटीआई ऑफिसर होता है। कोर्ट ऐसे आदेश पारित नहीं कर सकता है, क्योंकि ये विधायिका का काम है। जूलरी और संपत्ति महिलाओं के नाम 7 साल करने की गुहार पर कोर्ट ने कहा कि विधायिका को इस पर विचार करना चाहिए।

अदालत से गुहार लगाई गई है कि शादी से पहले प्री मैरिज कोर्स होना चाहिए। इसके लिए कुरिकुलम कमीशन हो, जिसमें लीगल एक्सपर्ट, शिक्षाविद, मनोविज्ञानिक वगैरह हों, ताकि शादी से पहले कपल की काउंसलिंग हो सके। शादी के बाद रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो। याचिकाकर्ता ने कहा कि इस मामले में नोटिस जारी होना चाहिए। इस पर जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की बेंच ने कहा कि नोटिस से कुछ नहीं होगा। जो भी आपका सुझाव है, वह लॉ कमीशन के सामने रख सकते हैं। वह उस पर विचार कर सकता है और कानून को सख्त बनाने की दिशा में विचार कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि प्री मैरिज काउंसलिंग और रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता की गुहार का जहां तक सवाल है, तो गांव मे यह व्यवहारिक नहीं है। इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं, क्योंकि ऐसे कपल को काउंसलिंग के लिए शहर जाना पड़ेगा। यह सब देखना विधायिका का काम है।

राकेश अस्थाना की बतौर पुलिस कमिश्नर नियुक्ति पर SC का केंद्र को नोटिस

राकेश अस्थाना को पुलिस कमिश्नर नियुक्त करने के मामले में SC का केंद्र को नोटिस, 14 दिन में मांगा जवाब

नई दिल्ली (एजेंसी)। उच्चतम न्यायालय ने राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस आयुक्त नियुक्त करने के मामले में शुक्रवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब-तलब किया है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की पीठ ने केंद्र सरकार के अलावा गुजरात कैडर के 1984 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी अस्थाना को नोटिस जारी किया है।

केंद्र सरकार द्वारा अस्थाना की नियुक्ति को दिल्ली उच्च न्यायालय ने 12 अक्टूबर को कानून सम्मत बताया था तथा नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर आज उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और अस्थाना को नोटिस जारी कर उन्हें दो सप्ताह में जवाब देने को कहा है।शीर्ष अदालत ने 18 नवंबर को शीघ्र सुनवाई की वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण गुहार पर इस मामले में आज सुनवाई की अनुमति दी थी। भूषण ने ‘विशेष उल्लेख’ के तहत गुहार लगाई थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया था।

राकेश अस्थाना की बतौर पुलिस कमिश्नर नियुक्ति पर SC का केंद्र को नोटिस

राकेश अस्थाना को पुलिस कमिश्नर नियुक्त करने के मामले में SC का केंद्र को नोटिस, 14 दिन में मांगा जवाब

नई दिल्ली (एजेंसी)। उच्चतम न्यायालय ने राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस आयुक्त नियुक्त करने के मामले में शुक्रवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब-तलब किया है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना की पीठ ने केंद्र सरकार के अलावा गुजरात कैडर के 1984 बैच के भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी अस्थाना को नोटिस जारी किया है।

केंद्र सरकार द्वारा अस्थाना की नियुक्ति को दिल्ली उच्च न्यायालय ने 12 अक्टूबर को कानून सम्मत बताया था तथा नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर आज उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और अस्थाना को नोटिस जारी कर उन्हें दो सप्ताह में जवाब देने को कहा है।शीर्ष अदालत ने 18 नवंबर को शीघ्र सुनवाई की वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण गुहार पर इस मामले में आज सुनवाई की अनुमति दी थी। भूषण ने ‘विशेष उल्लेख’ के तहत गुहार लगाई थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया था।

बिजनेस बन जायेगा चिकित्सा शिक्षा के लिए एक त्रासदी: सुप्रीम कोर्ट

बिजनेस बन चुकी है चिकित्सा शिक्षाः सुप्रीम कोर्ट

बिजनेस बन चुकी है चिकित्सा शिक्षाः सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय पात्रता-सह-प्रवेश परीक्षा-सुपर स्पेशियलिटी (नीट-एसएस) 2021 पैटर्न में बदलाव पर केंद्र की खिंचाई करते हुए कहा कि देश में चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सा नियमन एक व्यवसाय बन गया है और प्रतीत होता है कि सारी जल्दबाजी खाली सीटों को भरने के लिए है। न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा, हमें यह धारणा मिलती है कि चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सा विनियमन एक व्यवसाय बन गए हैं। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्न की पीठ ने कहा कि यह देश में चिकित्सा शिक्षा के लिए एक त्रासदी बन जाएगा।

पीठ ने केंद्र के वकील से कहा, यदि आपकी ओर से अभद्रता है, तो इसे रोकने के लिए कानून के हथियार काफी लंबे हैं। पीठ ने कहा, आमतौर पर सरकारी कॉलेजों में सीटें खाली नहीं होती हैं, बल्कि यह हमेशा निजी कॉलेज होते हैं। हमारा अनुमान है कि सरकारी कॉलेजों में सीटें खाली नहीं पड़ी हैं। यह एक उचित अनुमान है। ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी जल्दबाजी खाली सीटों को भरने के लिए है। दो घंटे से अधिक लंबी सुनवाई में पीठ ने जोर देकर कहा कि छात्रों की रुचि संस्थानों और निजी संस्थानों की तुलना में कहीं अधिक है और इस परिदृश्य में संतुलन बनाने की जरूरत है। पीठ ने कहा, अब सभी प्रश्न सामान्य चिकित्सा से हैं। क्या यह उन छात्रों को विशेषाधिकार देता है, जिन्होंने अन्य सभी फीडर विशिष्टताओं की कीमत पर सामान्य चिकित्सा की पढ़ाई की है?

पाठ्यक्रम में बदलाव के पहलू पर पीठ ने राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड (एनबीई) के वकील से कहा, जल्दबाजी क्या थी? आपके पास परीक्षा पैटर्न है जो 2018 से 2020 तक चल रहा था..। पीठ ने केंद्र से पुराने पाठ्यक्रम को बहाल करने और अगले साल से बदलाव लाने पर विचार करने को कहा और केंद्र के वकील को एक दिन का समय दिया। केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और एनबीई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह पेश हुए। पीठ बुधवार को भी मामले की सुनवाई जारी रखेगी। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि उसने फैसला किया है कि 2021 के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) सुपर स्पेशियलिटी परीक्षा दो महीने की अवधि के लिए टाल दी जाए और 10-11 जनवरी, 2022 को आयोजित की जाए।

सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार एक साथ 9 जजों ने ली शपथ

शीर्ष अदालत के नये भवन परिसर के सभागार में शपथ ग्रहण समारोह। आमतौर पर कोर्ट कक्ष में दिलाई जाती है शपथ। कोविड नियमों के पालन की दृष्टि से किया गया ऐसा। दूरदर्शन पर हुआ प्रसारण। 9 जज में से 8 हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस या जज हैं। एक वरिष्ठ वकील भी सीधे सुप्रीम कोर्ट जज नियुक्त हुए।

Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट में आज पहली बार एक साथ 9 जजों ने ली शपथ, रचा  गया इतिहास - पर्दाफाश

नई दिल्ली (एजेंसी)। नौ नवनियुक्त न्यायाधीशों को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने शपथ दिलाई। शीर्ष अदालत के नये भवन परिसर के सभागार में शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन किया गया। ऐसा पहली बार हुआ कि न्यायाधीशों के शपथ ग्रहण कार्यक्रम का सीधा प्रसारण दूरदर्शन से किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार एक साथ 9 जजों ने ली शपथ, दूरदर्शन पर हुआ प्रसारण 

आमतौर पर नवनियुक्त न्यायाधीशों को सीजेआई के कोर्ट कक्ष में शपथ दिलाई जाती है, लेकिन यह पहला मौका था कि यह कार्यक्रम सीजेआई कोर्ट के बाहर आयोजित किया गया। ऐसा कोविड नियमों के पालन की दृष्टि से किया गया था।

सीजेआई की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 17 अगस्त को आयोजित बैठक में हाईकोर्ट के चार मुख्य न्यायाधीशों, चार न्यायाधीशों और एक वरिष्ठ अधिवक्ता के नाम की सिफारिश उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पद के लिए की थी।

शपथ लेने वाले न्यायाधीशों में न्यायमूर्ति एएस ओका, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी, न्यायमूर्ति हीमा कोहली शामिल हैं। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार, न्यायमूर्ति एमएम सुन्दरेश, न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा को भी न्यायाधीश पद की शपथ दिलायी गई। ऐसा पहली बार हुआ कि न्यायाधीशों के शपथ ग्रहण कार्यक्रम का सीधा प्रसारण दूरदर्शन से किया गया।

SC Judges oath: For the first time in history 9 Supreme Court judges took  oath live telecast on TV

आमतौर पर चीफ जस्टिस के कोर्ट रूम में होने वाला यह कार्यक्रम इस बार कुछ अलग था. नए जजों का शपथ ग्रहण कार्यक्रम सुप्रीम कोर्ट के नए भवन में बने सभागार में हुआ. इस ऑडिटोरियम में 900 लोगों के बैठने की व्यवस्था है. साथ ही पहली बार जजों के शपथ ग्रहण कार्यक्रम का दूरदर्शन पर सीधा प्रसारण भी किया गया.

2027 में जस्टिस नागरत्ना बन सकती हैं पहली महिला CJI

वहीं बताया गया है कि भविष्य में इन जजों में से जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बीवी नागरत्ना और पीएस नरसिम्हा के भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने की संभावना है। अब तक सुप्रीम कोर्ट में कोई भी महिला चीफ जस्टिस नहीं हुई। सितंबर 2027 में जस्टिस नागरत्ना के रूप में भारत को पहली महिला चीफ जस्टिस मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट में करीब 2 साल बाद हुई नई नियुक्तियों के बाद जजों के कुल 34 पदों में से 33 इन नियुक्तियों के बाद भर गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट से आजम खां को बेटे समेत मिली राहत

आजम खां और बेटे अब्दुल्ला को मिली सुप्रीम कोर्ट से राहत। पासपोर्ट और पैन गड़बड़ी मामले में जमानत।

सुप्रीम कोर्ट से आजम खां और बेटे अब्दुल्ला को मिली राहत, पासपोर्ट और पैन गड़बड़ी मामले में जमानत

नई दिल्ली (एजेंसी)। पासपोर्ट, पैनकार्ड बनाने में गड़बड़ी से जुड़े मामले में सपा नेता आजम खां और बेटे अब्दुल्ला को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। महीनों से जेल में बंद पिता-पुत्र को इस मामले में अंतरिम जमानत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस आपराधिक मामले में निचली अदालत को चार सप्ताह के भीतर मामले में बयान दर्ज करने के बाद उन्हें जमानत पर रिहा करने को कहा है।

आजम और उनके बेटे अब्दुल्ला पर कई मामलों में केस दर्ज हैं। लंबे वक्त से दोनों उत्तर प्रदेश की सीतापुर जेल में बंद थे। हाल ही में जब आजम खां की तबीयत बिगड़ी तो उन्हें लखनऊ के मेदांता अस्पताल में शिफ्ट किया गया है। आजम खां और उनके बेटे पर जमीन हड़पने, फर्जी कागजात समेत अन्य मामलों में उत्तर प्रदेश की अलग-अलग अदालतों में केस चल रहे हैं। कुछ वक्त पहले ही आजम खां की पत्नी को जमानत मिली थी और वो बाहर आई थीं।

इस मामले में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सपा नेता आज़म खान और उनके बेटे अबुल्लाह आज़म की ज़मानत याचिका का विरोध किया। उत्तर प्रदेश की तरफ से वकील एसवी राजू ने कहा कि आज़म खान पर कई संगीन मामलो में एफआईआर दर्ज है। अपराधिक पृष्टभूमि की वजह से उनको जमानत नहीं दी जानी चाहिए। आजम खां और अब्दुल्ला आजम पर आरोप है कि पहला पैन कार्ड मौजूद होने के बाद भी दूसरा पैन कार्ड बनवाया और पहले पैन कार्ड की जानकारी छिपाई।

आजम के वकील सिब्बल ने कहा कि सरकार ने पासपोर्ट और पैन कार्ड मामले में अलग-अलग एफआईआर दर्ज की है, जबकि इस मामले में मुख्य एफआईआर में आजम खा को जमानत मिल चुकी है। आरोपी को जेल में रखने के लिए सरकार ने एक ही मामले में अलग-अलग एफआईआर दर्ज की है। यही हाल अबुल्लाह आजम का है। कपिल सिब्बल ने कहा कि आज़म खां को तीन मामलों को छोड़ कर सभी मामलों मे ज़मानत मिल चुकी है। गौरतलब है कि आज के आदेश के बाद आजम और अब्दुल्लाह आजम को थोड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन वो दोनों फिलहाल जेल से रिहा नही हो पाएंगे। अभी उनके खिलाफ तीन और मामले लंबित हैं, जिसमें जमानत मिलनी बाकी है।

सुप्रीम कोर्ट का पंचायत चुनाव मामले में दखल से इंकार

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के मामले में योगी आदित्यनाथ सरकार को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के मामले में किसी भी प्रकार का दखल देने से इंकार करने के साथ याचिका दायर करने वाले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील दायर करने को कहा है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। ऐसे में पंचायत चुनाव से जुड़ी याचिकाओं के निस्तारण पर सब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी थी। सुप्रीम कोर्ट में आरक्षण को लेकर दाखिल सीतापुर जिले के दिलीप कुमार की 186 पन्ने की याचिका पर आज सुनवाई थी। याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट ने आरक्षण को लेकर जो आदेश दिया है उसे बदला जाये। इस याचिका में दिलीप कुमार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि 1995 को ही आधार वर्ष मानकर इस चुनाव के लिए सीटों का आरक्षण किया जाये। उन्होंने कहा है कि सरकार ने फरवरी में ऐसा ही करने का शासनादेश जारी किया था। इसको लेकर आरक्षण हो भी गया था, लेकिनबाद में हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया और 2015 को आधार वर्ष मानकर सरकार को नये सिरे से आरक्षण के आदेश दे दिये।

उत्तर प्रदेश सरकार ने इससे पहले ही बीते मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक कैविएट अर्जी भी दाखिल की थी। इसमें कहा गया कि कोर्ट इस याचिका पर कोई भी निर्णय करने से पहले एक बार उनका पक्ष भी जरूर सुने। कैविएट याचिका में प्रदेश सरकार की ओर से कहा गया कि जब पंचायत चुनाव को लेकर दाखिल याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा तब कोर्ट में सरकार का भी पक्ष सुना जाए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कुछ दिन पहले ही पुरानी आरक्षण सूची पर रोक लगाते हुए 2015 के आधार पर चुनाव कराने को लेकर फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि वर्ष 2015 को आधार मानते हुए सीटों पर आरक्षण लागू किया जाए। इसके पहले राज्य सरकार ने कहा कि वह वर्ष 2015 को आधार मानकर आरक्षण व्यवस्था लागू करने के लिए तैयार है। ऐसे में उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव से जुड़ी याचिकाओं को लेकर सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी थीं।