आज मनाया जा रहा है 56वां राष्ट्रीय प्रेस दिवस

National Press Day 2022: भारतीय प्रेस परिषद (PCI) को स्वीकार करने और सम्मानित करने के लिए हर साल 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिन देश में एक स्वतंत्र और जिम्मेदार प्रेस की उपस्थिति का प्रतीक है. प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया भी भारतीय प्रेस के रिपोर्ताज की गुणवत्ता की जांच करती है और पत्रकारिता गतिविधियों पर नजर रखती है.

इस बार 16 नवंबर 2022 को भारत में 56वां राष्ट्रीय प्रेस दिवस मनाया जा रहा है। राष्ट्रीय प्रेस दिवस पहली बार 1966 में मनाया गया था, जब प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) की स्थापना हुई थी और देश में इसका संचालन शुरू हो गया था। पीसीआई की स्थापना 4 जुलाई 1966 को संसद द्वारा की गई थी, जिसका लक्ष्य ‘स्वतंत्र’ और साथ ही ‘जिम्मेदार’ प्रेस के दोहरे उद्देश्य को प्राप्त करना था। इसका संचालन शुरू करने में चार और महीने लगे, जिससे इसकी शुरुआत 16 नवंबर 1966 को शुरुआत हुई।

प्रेस स्वतंत्रता का महत्व
स्वतंत्र प्रेस को अक्सर बेजुबानों की आवाज कहा जाता है, जो सर्वशक्तिशाली शासकों और दलित शासितों के बीच की कड़ी है. यह व्यवस्था की बुराइयों और अस्वस्थता को सामने लाता है और शासन की लोकतांत्रिक प्रणाली के मूल्यों को मजबूत करने की प्रक्रिया में सरकार को इनका समाधान खोजने में मदद करता है. कोई आश्चर्य नहीं कि इसे एक मजबूत लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक क्यों कहा जाता है, और एकमात्र ऐसा जहां आम लोग सीधे भाग लेते हैं. अन्य 3 कार्यपालिका, विधायी और न्यायपालिका हैं – कुछ चुनिंदा लोगों का गिरोह है.


परिषद भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका निर्माण स्वाभाविक रूप से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी स्वतंत्र प्रेस की रक्षा के लिए किया गया था. इसलिए यह सुनिश्चित करने के लिए लगातार काम करता है कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता से समझौता नहीं किया गया है.

इतिहास
वर्ष 1956 में प्रथम प्रेस आयोग ने वैधानिक प्राधिकरण के साथ एक निकाय बनाने का निर्णय लिया. जिसके पास पत्रकारिता की नैतिकता को बनाए रखने की जिम्मेदारी है. आयोग ने महसूस किया कि प्रेस के लोगों से जुड़ने के लिए और उत्पन्न होने वाले किसी भी मुद्दे पर मध्यस्थता करने के लिए एक प्रबंध निकाय की आवश्यकता थी. 1966 में 16 नवंबर को पीसीआई का गठन किया गया था. भारत का राष्ट्रीय प्रेस दिवस तब से हर साल 16 नवंबर को परिषद की स्थापना के उपलक्ष्य में मनाया जाता है.पीसीआई अधिनियम को बाद में 1978 में पेश किया गया, जिसके माध्यम से संगठन को अधिक जिम्मेदारियाँ सौंपी गईं। इसके साथ सूचीबद्ध पीसीआई की कुछ शक्तियां हैं जो देश में प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं।

~पीसीआई अनियंत्रित व्यवहार के लिए किसी मीडिया एजेंसी या मीडियाकर्मी को चेतावनी दे सकता है, तलब कर सकता है और उसकी आलोचना कर सकता है।
~यह या तो नीतियां बना सकता है या सरकार को प्रेस से जुड़ी नीतियों का मसौदा तैयार करने में मदद कर सकता है।
परिषद मानक पत्रकारिता अभ्यास और नैतिकता को भी संहिताबद्ध करती है जिसका पालन करने की आवश्यकता होती है।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, परिषद की अध्यक्षता परंपरागत रूप से सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश और 28 अतिरिक्त सदस्य करते हैं, जिनमें से 20 भारत में संचालित मीडिया आउटलेट्स के सदस्य हैं. पांच सदस्यों को संसद के सदनों से नामित किया जाता है और शेष तीन सांस्कृतिक, कानूनी और साहित्यिक क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

प्रेस की स्वतंत्रता सर्वोपरि है, क्योंकि यह शासकों (सरकार) और शासितों (नागरिकों) के बीच की खाई को पाटने में मदद करती है। इसके अलावा, यह सिस्टम की खामियों की पहचान करने में मदद करता है और प्रचलित मुद्दों के संभावित समाधान के साथ आता है, जिससे ‘लोकतंत्र के चौथे स्तंभ’ के शीर्षक को सही ठहराया जा सके। प्रेस की अन्य बेजोड़ विशेषताओं में से एक यह है कि यह लोकतंत्र के अन्य तीन स्तंभों – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के विपरीत आम आदमी की भागीदारी को बढ़ावा देती है।

…नहीं रहे डॉ. मैनेजर पांडे

दु:खद…बहुत ही दु:खद…
सुना है डॉ. मैनेजर पांडे नहीं रहे

आज एक दु:खद खबर सुनाई दी। मैनेजर पांडे नहीं रहे। आदरणीय पांडे जी से सीधा अपना कोई वास्ता कभी नहीं जुड़ा लेकिन आचार्य स्मृति संरक्षण अभियान के तहत रायबरेली में आचार्य स्मृति दिवस मनाने की वर्ष 2004 में शुरू हुई परंपरा के क्रम में वर्ष 2011 में उन्हें डॉ. राम मनोहर की पार्टी लोक सेवा सम्मान से विभूषित किया गया था। उस कार्यक्रम में उनका खराब मौसम के चलते आना संभव नहीं हो सका था लेकिन मोबाइल पर उनके उद्बोधन को हम सब ने सभागार में सार्वजनिक रूप से सुना और गुना था। एक नई प्रेरणा और संकल्प उनके उस उद्बोधन से मन में जागा था।
वर्ष 2015 में उनसे व्यक्तिगत मुलाकात पुनर्प्रकाशित द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के लोकार्पण अवसर पर नई दिल्ली के प्रवासी भवन सभागार में संभव हुई थी। यह ग्रंथ समिति के अनुरोध पर और श्री पंकज चतुर्वेदी सहायक संपादक हिंदी के प्रयासों से नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया था। पुनर्प्रकाशित ग्रंथ की नई भूमिका डॉक्टर मैनेजर पांडे ने ही लिखी है। छोटे से लोकार्पण समारोह में बड़े-बड़े व्यक्तित्व के स्वामी डॉक्टर मैनेजर पांडे के अतिरिक्त डॉक्टर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, नेशनल बुक ट्रस्ट की तत्कालीन निदेशक डॉ. रीता दास, पर्यावरणविद् श्री अनुपम मिश्र, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के वर्तमान अध्यक्ष एवं श्रेष्ठ पत्रकार श्री राम बहादुर राय, नीदरलैंड की साहित्यकार श्रीमती पुष्पिता अवस्थी, श्री पंकज चतुर्वेदी, श्री अरविंद कुमार सिंह उपस्थित रहे थे। 7 वर्ष पुरानी स्मृतियां आज भी जेहन में जिंदा हैं।
आज डॉक्टर मैनेजर पांडे के देहावसान की खबर से पुरानी स्मृतियां फिर जागृत हो गई और मन खिन्न हो गया।
ईश्वर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान प्रदान करें।
ओम शांति।

नोट~फोटो वर्ष 2015 में द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ के नई दिल्ली में लोकार्पण अवसर की है।

~गौरव अवस्थी, रायबरेली उन्नाव

एक सांस्कृतिक अभियान की रजत भूमिका

एक सांस्कृतिक अभियान की रजत भूमिका
कृपाशंकर चौबे

युग प्रवर्तक साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृति को संरक्षित करने का अभियान 25 साल पहले द्विवेदी जी की निर्वाण स्थली रायबरेली में कुछ पत्रकारों और हिंदी प्रेमियों ने शुरू किया था। वह अभियान आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली के बैनरतले शुरू हुआ था, जिसके संयोजक गौरव अवस्थी हैं। गौरव अवस्थी और उनके समानधर्मा साहित्यप्रेमियों ने द्विवेदी जी के स्मृति संरक्षण अभियान को पिछले 25 वर्षों में जिस तरह आगे बढ़ाया है, यह उनकी सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का विरल उदाहरण है। स्मृति संरक्षण अभियान के परिणामस्वरूप 21 दिसंबर 1998 को रायबरेली शहर के राही ब्लाक परिसर में और 30 नवंबर 2010 को द्विवेदी जी के जन्मस्थान दौलतपुर में द्विवेदी जी की आवक्ष प्रतिमाएं स्थापित हुई। गौरव अवस्थी ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्मान में 1933 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ को खोज कर उसे 2015 में नेशनल बुक ट्रस्ट से पुनर्प्रकाशित कराया। उस पुनर्प्रकाशन में नेशनल बुक ट्रस्ट के संपादक (हिंदी) पंकज चतुर्वेदी और लेखक अरविंद कुमार सिंह की बड़ी भूमिकाएं रहीं। अभिनंदन ग्रंथ में आचार्य द्विवेदी का व्यक्तित्व-कृतित्व ही नहीं, साहित्य की तमाम विधाओं पर गहन मंथन है। उस ग्रंथ में महात्मा गांधी, थियोडोर वान विंटरस्टीन, नूट हामजून ग्रिम्सटैड, जार्ज ग्रियर्सन, एल.डी. बोमन, सुमित्रानंदन पंत, ज्वाला दत्त शर्मा, देवी दत्त शुक्ल, हरि भाऊ उपाध्याय, सत्यदेव परिव्राजक, रूपनारायण पांडेय, लल्लीप्रसाद पांडेय, रामबिहारी शुक्ल, लक्ष्मीधर वाजपेयी, ज्योतिप्रसाद मिश्र निर्मल, यज्ञदत्त शुक्ल, राम दास गौड़, केदारनाथ पाठक, चंद्रशेखर शास्त्री, देवी प्रसाद शुक्ल, भाई परमानंद और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की श्रद्धांजलियां हैं। जिस तरह महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सरस्वती’ को साहित्य की सभी विधाओं-कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध, जीवनी, आलोचना के समांतर समाज शास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, नागरिक शास्त्र, इतिहास और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को भी महत्व देकर उसका फलक विस्तृत कर दिया था, उसी तरह अभिनंदन ग्रंथ में भी विषयों की विपुल विविधता है। ज्ञान के सभी अनुशासनों पर इस ग्रंथ में निबंध हैं। अभिनंदन ग्रंथ की प्रस्तावना में नंददुलारे वाजपेयी ने द्विवेदी जी के समय के हिंदी साहित्य को द्विवेदी युग का साहित्य कहा है। द्विवेदी जी की साहित्य की धारणा अत्यंत व्यापक थी। वे केवल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और आलोचना को ही साहित्य नहीं मानते थे। उनके अनुसार किसी भाषा में मौजूद संपूर्ण ज्ञानराशि साहित्य है। साहित्य का यही अर्थ वांगमय शब्द से व्यक्त होता है। अपनी इसी धारणा को ध्यान में रखकर उन्होंने कविता, कहानी और आलोचना के साथ अर्थशास्त्र, भाषाशास्त्र, इतिहास, पुरातत्व, जीवनी, दर्शन, समाजशास्त्र, विज्ञान आदि पर लिखा। उनके साहित्य निर्माण की प्रक्रिया जितनी व्यापक है, उतनी ही विविधतामयी भी। वैसे तो इसका नाम अभिनंदन ग्रंथ है किंतु आज कल जैसी परिकल्पना से परे यह आचार्य द्विवेदी का प्रशंसा-ग्रंथ नहीं है, बल्कि हिंदी साहित्य, समाज, भाषा व ज्ञान का विमर्श है। यह ग्रंथ हमें यह प्रेरणा भी देता है कि अभिनंदन ग्रंथ में वस्तुतः युग का आकलन होना चाहिए। सम्यक आकलन के कारण ही यह ग्रंथ ज्ञानराशि का संचित कोश बल्कि भारतीय साहित्य का विश्वकोश है।

काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 1933 में द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ समर्पित करने के अवसर पर महाप्राण

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने आचार्य द्विवेदी की महानता का बखान किया था। मैथिली शरण गुप्त ने कहा था कि हिंदी की आजीवन सेवा करने वाले और बोलियों में बंटी भाषा हिंदी को खड़ी बोली हिंदी का रूप देने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी भाषा का परिमार्जन कर खड़ी बोली का रूप दिया। भाषा को नया व्याकरण दिया और नए-नए लेखक, साहित्यकार, कवि तैयार किए। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी ने आचार्य द्विवेदी के प्रति आदर भाव प्रकट करते हुए कहा था,”आज हम जो कुछ भी हैं, वह आचार्य द्विवेदी के बनाए हुए हैं। उन्होंने पथ बनाया और पथ प्रदर्शक का काम भी किया।” डॉ. नामवर सिंह ने आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग प्रेरक सम्मान रायबरेली में ग्रहण करते समय कहा था कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के प्रथम आचार्य हैं। उनके पहले सिर्फ संस्कृत के विद्वानों को ही आचार्य की पदवी से विभूषित किया जाता था।

द्विवेदी जी के स्मृति संरक्षण अभियान का एक और सुफल यह भी रहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली के संयोजक गौरव अवस्थी की पहल पर राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान, रायबरेली के निदेशक भारत साह ने 2018 में मुंशी प्रेमचंद द्वारा 1930 में अपने संपादन में प्रकाशित कराई गई ‘विज्ञान वार्ता’ पुस्तक को पुनर्प्रकाशित किया। यह पुस्तक आचार्य द्विवेदी के तकनीक तथा विज्ञान पर आधारित लेखों का संग्रह है।
वर्ष 1964 में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्म शताब्दी पर दौलतपुर में मेला लगा था। उस मेले में देशभर के सैकड़ों साहित्यकारों ने पधारकर अपने पूर्वज साहित्यकार व संपादक आचार्य द्विवेदी को दिल से याद किया था। उस मेले में महादेवी वर्मा समेत अनेक चोटी के साहित्यकार उपस्थित हुए थे। साहित्यकारों की अत्यधिक संख्या के चलते मेला अनवरत चार दिन तक चला था। 58 साल बाद रायबरेली में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति द्वारा एक बार फिर द्विवेदी मेला आयोजित किया जा रहा है। आचार्य द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान का यह 25वां वर्ष है। रजत जयंती समारोह राष्ट्रीय आयोजन समिति का गठन कर पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर, राम बहादुर राय और सूर्य प्रसाद दीक्षित को उसका संरक्षक, अरविंद कुमार सिंह को अध्यक्ष और गौरव अवस्थी को संयोजक बनाया गया है।
रजत जयंती वर्ष को यादगार बनाने के लिए समिति ने 11 और 12 नवंबर 2022 को रायबरेली जिला मुख्यालय पर ‘द्विवेदी मेला’ के रूप में मुख्य वार्षिक समारोह आयोजित किया है। इसमें देशभर से कई लेखक जुटेंगे। मेले के तहत दौलतपुर से लेकर रायबरेली तक विभिन्न कार्यक्रम मसलन-सम्मान समारोह, कवि सम्मेलन, संगोष्ठियां, ‘आचार्य पथ’ स्मारिका का विशेषांक, आचार्य द्विवेदी के जीवन वृत्त एवं स्वाधीनता संग्राम पर आधारित प्रदर्शनी, गीत एवं नृत्य, नाटक का मंचन होगा। इसी क्रम में छह नवंबर से 12 नवंबर तक फिरोज गांधी कालेज सभागार परिसर में पुस्तक मेला भी आयोजित किया गया है जो सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक सभी लोगों के लिए खुला रहेगा। द्विवेदी मेले में पहली बार ऐसी प्रदर्शनी भी लगने जा रही है, जिसमें साहित्य और स्वाधीनता संग्राम का इतिहास नई पीढ़ी को पढ़ने और जानने को मिलेगा। प्रदर्शनी में आचार्य द्विवेदी का जीवन वृत्त और उनका कृतत्व जाना जा सकेगा। अपने समय में देश दुनिया की खबरों और खोजों से बाखबर करने वाली ‘सरस्वती’ पत्रिका के मुखपृष्ठ प्रदर्शनी के खास आकर्षण होंगे। द्विवेदी जी ने 1903 से 1920 तक ‘सरस्वती’ का संपादन किया था। प्रदर्शनी में आकर प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महानायक राना बेनी माधव बक्श सिंह और किसान आंदोलन का इतिहास भी जाना जा सकेगा। द्विवेदी मेले कা लोगो भी जारी किया गया है। लोगो का थीम रजत जयंती वर्ष पर नए सूर्योदय पर आधारित है। मेले के तहत होने वाले कार्यक्रम सूर्य की रश्मियों की तरह चित्रित किए गए हैं। लोगो का निर्माण राजीव कुमार ने किया है।
आचार्य द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान भारत के दूसरे हिस्सों में भी पहुंच रहा है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान रजत जयंती वर्ष को यादगार बनाने के लिए डॉ. राममनोहर त्रिपाठी सेवा समिति, मुंबई ने 27 अक्टूबर 2022 को महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के सान्निध्य एवं गीतकार मनोज मुंतशिर के मुख्य आतिथ्य में राजभवन में सम्मान समारोह एवं कवि सम्मेलन आयोजित किया। समारोह में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति, रायबरेली के संयोजक गौरव अवस्थी को सम्मानित किया गया। आचार्य द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान अब सात समंदर पार कर विदेश भी पहुंच गया है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिकी इकाई की भी स्थापना हो गई है। मंजु मिश्रा उसकी अध्यक्ष हैं। अमेरिकी इकाई के सहयोग से व्याख्यान व निबंध प्रतियोगिता के आयोजन हो चुके हैं। इन सारी सफलताओं का सारा श्रेय गौरव अवस्थी को जाता है। भारत और भारत के बाहर सांस्कृतिक जागरण लाने का जो बड़ा काम श्री अवस्थी कर रहे हैं, उसके लिए वे साधुवाद के अधिकारी हैं।

(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर हैं)

शरदकालीन गन्ना बुवाई को वृहद किसान गोष्ठी

शरदकालीन गन्ना बुवाई को वृहद किसान गोष्ठी। बिंदल ग्रुप की निर्माणाधीन शुगर मिल पर किसान गोष्ठी का आयोजन।

बिजनौर। बिंदल ग्रुप की निर्माणाधीन शुगर मिल चंगीपुर (नूरपुर) के जनपद बिजनौर के प्रांगण में शरदकालीन गन्ना बुवाई वास्ते एक वृहद किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया।

गोष्ठी में कृषकों को शरदकालीन गन्ने की वैज्ञानिक ढंग से खेती के महत्त्वपूर्ण आयाम, पंचामृत विधि से गन्ने की खेती, बीज के चयन, बीज एवम भूमि उपचार, ट्रेंच विधि से गन्ने की खेती, सहफसली खेती, ट्राईकोडर्मा का प्रयोग, प्रजाति बदलाव, गन्ने में लगने वाले रोग, बीमारियों के रोकथाम एवम बचाव के उपाय आदि के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। गोष्ठी में 500 से अधिक कृषकों ने भाग लिया।

गोष्ठी में बिंदल ग्रुप के प्रोपराइटर अशोक बिंदल, संस्कार बिंदल, वैज्ञानिक डाक्टर विकास मालिक, सहायक निदेशक गन्ना किसान संस्थान मनोज श्रीवास्तव, पीएन सिंह जिला गन्ना अधिकारी बिजनौर, इफको जिला प्रबन्धक अरूण कुमार, एसएमएस गन्ना किसान संस्थान लखनऊ अरूण कुमार, सचिव गन्ना समिति नूरपुर मनोज कांट, ज्येष्ठ गन्ना विकास निरीक्षक ने प्रतिभाग किया।

आज विश्व डाक दिवस: 9-13 अक्टूबर तक राष्ट्रीय डाक सप्ताह का आयोजन

9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस, 9-13 अक्टूबर तक राष्ट्रीय डाक सप्ताह का आयोजन

देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में डाक विभाग की अहम भूमिका – पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव

लखनऊ। डाक विभाग देश के सबसे पुराने विभागों में से एक है जो कि देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह एक ऐसा संगठन है जो न केवल देश के भीतर बल्कि देश की सीमाओं से बाहर अन्य देशों तक पहुँचने में भी हमारी मदद करता है। पूरे विश्व में 9 अक्टूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय डाक दिवस’ मनाया जाता है। इस बार इसकी थीम ‘पोस्ट फॉर प्लेनेट’ है। उक्त जानकारी देते हुए वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि इसी क्रम में 9-13 अक्टूबर तक भारत में ‘राष्ट्रीय डाक सप्ताह’ मनाया जायेगा और हर दिन को एक उत्पाद या सेवा विशेष पर फोकस किया जायेगा।

9 अक्टूबर – विश्व डाक दिवस
10 अक्टूबर – वित्तीय सशक्तिकरण दिवस
11 अक्टूबर – फिलेटली दिवस : आज़ादी का अमृत महोत्सव सेलिब्रेशन
12 अक्टूबर – मेल एवं पार्सल दिवस
13 अक्टूबर – अंत्योदय दिवस

इसलिए मनाया जाता है विश्व डाक दिवस

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने बताया कि विश्व डाक दिवस का उद्देश्य विश्व भर में लोगों के दैनिक जीवन, व्यापार और सामाजिक तथा आर्थिक विकास में डाक की भूमिका के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। ‘एक विश्व-एक डाक प्रणाली’ की अवधारणा को साकार करने हेतु 9 अक्टूबर, 1874 को ‘यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन’ की स्थापना बर्न, स्विटजरलैण्ड में की गई, जिससे विश्व भर में एक समान डाक व्यवस्था लागू हो सके। भारत प्रथम एशियाई राष्ट्र था, जो कि 1 जुलाई 1876 को इसका सदस्य बना। कालांतर में वर्ष 1969 में टोकियो, जापान में सम्पन्न यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन कांग्रेस में इस स्थापना दिवस को ‘विश्व डाक दिवस’ के रूप में मनाने हेतु घोषित किया गया।

पोस्टमास्टर जनरल श्री यादव ने बताया कि डाक सप्ताह के दौरान डाक सेवाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार एवं राजस्व अर्जन में वृद्धि पर जोर दिया जायेगा। वहीं डाक सेवाओं की कार्य-प्रणाली को समझने हेतु स्कूली बच्चों द्वारा डाकघरों का भ्रमण, फिलेटली क्विज, स्टैम्प डिजाइन एवं ढाई आखर पत्र लेखन प्रतियोगिता, सेमिनार, वर्कशॉप, उत्कृष्टता हेतु डाक कर्मियों का सम्मान, कस्टमर मीट, बचत सेवाओं, डाक जीवन बीमा, सुकन्या समृद्धि योजना और इण्डिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक उत्पादों इत्यादि को लेकर हर जिले में वित्तीय सशक्तिकरण मेलों का आयोजन किया जायेगा।

जयंती विशेष (24 सितंबर): जपो निरन्तर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान…

जयंती विशेष (24 सितंबर)

जपो निरन्तर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान..

भारतेंदु युग के प्रमुख स्तंभ पंडित प्रताप नारायण मिश्र की अल्प आयु में पिता की मृत्यु के चलते औपचारिक पढ़ाई तो बहुत नहीं हो पाई लेकिन स्वाध्याय के बल पर वह पत्रकारिता और साहित्य के प्रकांड पंडित बने। परवर्ती साहित्यकारों और संपादकों में तो उनके प्रति सम्मान का भाव था ही पूर्ववर्ती साहित्यकार भी उनके पांडित्य से प्रभावित रहा करते थे।
24 सितंबर 1856 को जन्मे पंडित प्रताप नारायण मिश्र के जन्म स्थान को लेकर साहित्यकारों में कुछ मतभेद हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ सुरेश चंद्र शुक्ल ने उनके जन्म स्थान के रूप में कानपुर को मान्यता दी है। इनका मत है कि पंडित प्रताप नारायण के पिता पंडित संकटा प्रसाद मिश्र को परिवार पालन के लिए 14 वर्ष की अल्पायु में कानपुर आना पड़ा। इसलिए उनका (प्रताप नारायण) जन्म कानपुर में ही हुआ होगा लेकिन अपने संपादन में ‘प्रताप नारायण मिश्र कवितावली’ प्रकाशित करने वाले नरेश चंद्र चतुर्वेदी और डॉ शांति प्रकाश वर्मा उनका जन्म उन्नाव जनपद के बैजेगांव (अब बेथर) ही मानते हैं। ‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ पुस्तक में रामचंद्र तिवारी लिखते हैं-‘मिश्रा जी का जन्म बैजेगांव में हुआ हो या ना हुआ हो उनकी रचनाओं में गांव का अंश कुछ अधिक ही है।’

मासिक पत्र ब्राह्मण का प्रकाशन :
भारतेंदु हरिश्चंद्र की परंपरा जारी रखने के लिए आर्थिक कठिनाइयों के बाद भी पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने मार्च 1883 में ब्राह्मण नाम से मासिक पत्र प्रकाशित करना शुरू किया। ब्राह्मण के प्रथम अंक में अपना उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था-‘अंतः करण से वास्तविक भलाई चाहते हुए सदा अपने यजमानों (ग्राहकों) का कल्याण करना ही हमारा मुख्य कर्म होगा’। 550 रुपए का घाटा सहकर वह 7 वर्षों तक ब्राम्हण का निरंतर प्रकाशन करते रहे। इसके बाद प्रकाशन का दायित्व खड्गविलास प्रेस बांकीपुर के मालिक बाबू रामदीन सिंह को सौंप दिया।

हिंदी के लिए पूर्णत: समर्पित:
पंडित प्रताप नारायण मिश्र हिंदी के बहुत बड़े हिमायती थे। अपने मासिक पत्र ब्राह्मण में हिंदी को लेकर वह जब का लेख लिखते रहते थे। एक बार समकालीन प्रकाशन ‘फतेहगढ़ पंच’ ने उनकी हिंदी पक्षधरता के खिलाफ लेख प्रकाशित किया। इस पर उनका गुस्सा बढ़ गया। उन्होंने फतेहगढ़ पंच के लेख के जवाब में ब्राह्मण में कई महीने तक लिखा। दोनों के बीच कई महीने विवाद चलता रहा। उसी बीच उन्होंने हिंदी पर एक कविता लिखी, जो काफी चर्चित हुई-

चहहु जो सांचे निज कल्यान, तो सब मिलि भारत संतान
जपो निरंतर एक ज़बान -हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान
तबहि सुधरिहे जन्म-निदान; तबहिं भलो करिहे भगवान

मसखरी की मिसालें :
प्रताप नारायण मिश्र स्वभाव से मस्त मौला थे। मसखरे थे। नाटकों में अभिनय भी करते थे। कानपुर की सड़कों पर वह लावनी गाते हुए कभी रिक्शे पर कभी पैदल निकलते थे। फागुन में इकतारा लेकर वह उपदेशपूर्ण, हास्य, होली, कबीर और पद आदि भी गाते थे। वह सांस बंद कर के घंटों तक मुर्दा से पड़े रहते थे। अपने कान एक या दोनों उन्हें हिलाते या फड़काते थे। तब उनके दूसरे अंग स्थिर रहते थे। उनकी मसखरी की मिसालें भी खूब चर्चित हैं।
एक बार नाटक में उनको स्त्री का रूप लेना था। मूछों का मुंड़ाना जरूरी था। भक्ति भाव से अपने पिता के सामने हाजिर हुए और बोले यदि आप आज्ञा दीजिए तो इनको (मूंछों) मुड़वा डालूं। मैं अनाज्ञाकारी नहीं बनना चाहता।’ पिता ने हंसकर आज्ञा दे दी। इसी तरह एक बार कानपुर म्युनिसिपिलटी में इस बात पर विचार हो रहा था कि भैरव घाट में मुर्दे बहाए जाएं या नहीं। चर्चा के बीच किसी ने कहा कि जले हुए मुर्दे की पिंडी यदि इतने इंच से अधिक न हो तो बहाई जाए। दर्शकों में प्रताप नारायण भी मौजूद थे। वह तत्क्षण खड़े होकर बोले- ‘अरे दैया रे दैया! मरेउ पर छाती नापी जाई!’ इस पर खूब जोर के ठहाके लगे।
ऐसा ही एक किस्सा पादरी से बातचीत का है। पादरी ने व्यंग्य पूर्ण लहजे में कहा-आप गाय को माता कहते हैं। उन्होंने कहा- हां। पादरी बोला तो बैल को आप चाचा कहेंगे। इस पर उनका जवाब था- बेशक रिश्ते से क्या इंकार है? पादरी ने तंज कसते हुए कहा-हमने तो 1 दिन अपनी आंखों से एक बार को महिला खाते देखा था। मिश्र जी ने कहा- अजी साहब, वह इसाई हो गया होगा! हिंदू समाज में ऐसे भी बैल होते हैं।’ पादरी मुंह लटका कर चला गया।

लावनी सुनकर कन्नौज के कसाइयों ने छोड़ दी थी गोहत्या:

पंडित प्रताप नारायण मिश्र गोरक्षा के बहुत बड़े हिमायती थे। कई कविताओं में उन्होंने गोरक्षा पर जोर दिया। अपने निबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं-‘सुनते हैं कानपुर में जो इस समय गौशाला है उसकी स्थापना के लिए प्रयत्न करने वालों में प्रताप नारायण भी थे। एक बार स्वामी भास्कर आनंद के साथ वह कन्नौज गए और गौ रक्षा पर व्याख्यान दिया। व्याख्यान में एक लावनी कही-

बां-बां करि तृण दाबि दांत सों, दुखित पुकारत गाई है

आचार्य द्विवेदी अपने निबंध में लिखते हैं- मिश्र जी की इस लावनी में करुण रस का इतना अतिरेक था कि मुसलमानों तक पर इसका असर हुआ और एक आध कसाइयों ने गौ हत्या से तौबा कर ली थी।

38 बरस में पूरी हो गई जीवन यात्रा:
अपने दैनंदिन जीवन में सदैव अस्त व्यस्त रहने वाले पंडित प्रताप नारायण मिश्र अक्सर बीमार रहा करते थे। इसी के चलते 38 वर्ष की कम उम्र में 1894 में उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूरी की। अपने इस छोटे से जीवन में उन्होंने साहित्य की हर विधा में लिखा। रामचंद्र तिवारी के अनुसार, प्रताप नारायण ग्रंथावली में उनके 190 निबंध और प्रताप नारायण मिश्र कवितावली में छोटी बड़ी 197 कविताएं संग्रहीत हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को समृद्ध किया। उनके गद्य में लोक प्रचलित मुहावरे और कहावतें की भरमार है। डॉ शांति प्रकाश वर्मा ने उनके गद्य से छांटकर मुहावरे और कहावतों का पूरा कोष ही तैयार कर दिया। मुहावरा कोष लगभग 110 प्रश्न का है और कहावतें कुल 16 पृष्ठों में। मिश्रा जी ने अपने लेखों में संस्कृत की जिन सूक्तियों और श्लोकों का उदाहरण दिया है, उनकी संख्या 220 है। उर्दू और फारसी की सूक्तियां कुल 66 हैं। (‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ लेखक-रामचंद्र तिवारी, पृष्ठ-68)
उनके निधन पर पूर्ववर्ती साहित्यकार बालकृष्ण भट्ट ने असमय निधन पर प्रताप नारायण मिश्र के प्रताप का उल्लेख कुछ यूं किया था-‘प्रातः स्मरणीय बाबू हरिश्चंद्र को जो हिंदी का जन्मदाता कहे तो प्रताप मिश्र को नि:संदेह उस स्तन अधन्या दूध मोहि बालिका का पालन पोषण करता कहना पड़ेगा क्योंकि हरिश्चंद्र के उपरांत उसे अनेक रोग दोष से सर्वथा नष्ट न हो जाने से बचा रखने वाले यही देख पड़े’।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1906 की सरस्वती में एक निबंध ‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र’ लिखा था। वह लिखते हैं-‘मैं कोई संदेह नहीं कि प्रताप नारायण में प्रतिभा थी और थोड़ी नहीं बहुत थी। विधता होने से कविता शक्ति में कोई विशेषता नहीं आ सकती उल्टे हानि चाहे उससे कुछ हो जाए। प्रताप नारायण की कविता में प्रतिभा का प्रमाण अनेक जगह मिलता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार प्रताप नारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट जी की एक साथ चर्चा करते हुए लिखा है-‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी गद्य साहित्य में वही काम किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडिसन और स्टील ने किया था’। (हिंदी साहित्य का इतिहास- पृष्ठ 467)

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/ उन्नाव

चेला नंबर वन- छुटभैया ने फेल किया; मेरा रंग दे बसंती चोला

चेला नंबर वन- छुटभैया ने फेल किया; मेरा रंग दे बसंती चोला http://www.targettv.live/?p=1913

चेला नंबर वन- छुटभैया ने फेल किया; मेरा रंग दे बसंती चोला

वो खुद माहिर है रंग बदलने में… । जी हां, सोलह आने सच है ये बात। कुछ समय पहले तक राष्ट्रीय स्तर के जनप्रतिनिधि का चेला बनकर सत्ता की मलाई चाटने वाला नई राह पर है। अब वह प्रदेश स्तर के (…और की और के) खास नुमाइंदों को पछाड़ कर चेला नंबर वन बन चुका है। वैसे भी पहली वाली घरवाली को छोड़कर निचली वाली को हमराह बनाकर खासी रकम बटोर रहा है। शहर में गंदगी फैली रहे, लेकिन अपने लिबास की चकमक का खासा ध्यान रखना आदत में शुमार है।

ये जो “के” और “की” हैं, इनका का खेल भी अजब गजब बताया जाता है। जब यूपी की सर्वेसर्वा मैडम जी थीं, तब “के” साहब को उनकी औकात हिंदी में याद दिलाई गई थी। जलेबियों के लिए बहुत ज्यादा मशहूर चौराहे पर मैडम जी के जिला स्तर के पदाधिकारी के गाड़ी चालक ने सरेआम उनकी मां-बहनों को बेहतरीन अंदाज में याद करते हुए बीच सड़क से चलता कर दिया। फिर एक दौर ऐसा भी आया कि बिल्ली के भाग्य से छींका फूटा। “के” साहब के ऐसे पंख निकले कि नेतागिरी को एक नया अंजाम दे डाला।

मोदी जी की भी लानत_मनानत करते हैं “की” के ये “के”: ये भी बिलकुल सौ फीसदी सच है कि “की” के ये “के” देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी ऊपर खुद को मानते हैं। एक मामले में उनके दर पर पहुंचे खबरनवीस के सामने वो तो हत्थे से ही उखड़ गए। दोनों ही महानुभावों को उनकी नीतियों को लेकर जमकर गरियाने लगे।

…और रही बात छुटभैया की…तो मजाल है कि कोई उनके सामने “चूं” तक कर सके। कुछ ही साल में जलेबियां तार कर रंक से राजा बने “भाई जी” के दर पर सलाम बजाते भले ही शुगर का मरीज बन जाए, परवाह नहीं। लोगों की हैल्थ की फ़िक्र करने वाले भीमकाय की हैल्थ को भी जमकर चट कर डाला। यही नहीं फोटो प्रेम भी रग-रग में घुसा है उनकी। मीडिया के कैमरों की आंखों में कैद होने के लिए कूद कर भइया जी खुद को किसी न किसी प्रकार फिट कर ही लेते हैं।

अब कुछ दर बदर की भी…: इन सब के मास्टर माइंड फिलहाल दर बदर भटकते हुए चापलूसों को दरकिनार कर सर्वेसर्वा बन बैठे हैं। आसमान और पाताल के बीच इनका खेल बखूबी चल रहा है।

राम नाम जपना, पराया माल अपना की तर्ज पर वीर तुम बढ़े चलो अभियान अभी जारी है। …और वो पिछले वाले जाने कहां गए वो दिन को याद कर मन मसोसे बैठे हैं।

आज मिला था हिन्दी को राजभाषा का दर्जा

सतेंद्र चौधरी कम्भौर, बिजनौर (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

देश में राजभाषा हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए हर साल 14 सिंतबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन को मनाने का मकसद लोगों में हिन्दी भाषा के प्रति जागरूकता लाना है. वैसे तो हमारे देश में कई भाषाएं व बोलियां बोली जाती हैं, लेकिन देश में 77 फीसदी से ज्यादा लोग बोलचाल के लिए सिर्फ हिन्दी का ही इस्तेमाल करते हैं. इसके साथ ही हिन्दी को विश्व में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली चौथी भाषा का खिताब भी हासिल है. 

वर्ष 1949 में 14 सिंतबर के दिन ही संविधान सभा द्वारा हिन्दी को राज भाषा का दर्जा दिया गया था. इसके बाद  1953 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की सलाह पर देश में पहली बार हिन्दी दिवस के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया गया. तभी से हर साल 14 सितंबर को स्कूल, कॉलेज, शिक्षण संस्थानों में हिन्दी दिवस के अवसर पर निबंध प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगता, कविता पाठ, नाटक समेत अन्य लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है, साथ ही सरकारी दफ्तरों में हिंदी पखवाड़े का भी आयोजन किया जाता है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी गई है. सबसे पहले हिंदी को राज भाषा बनाये जाने का प्रस्ताव साल 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी द्वारा रखा गया था. 

फारसी भाषा का शब्द है हिन्दी

बहुत ही कम लोगों को ये पता होगा कि हिन्दी खुद एक फासरी शब्द है. जी हां, आप ने सही पढ़ा है हिन्दी शब्द मूलत फासरी भाषा का शब्द है, यह फारसी लोगों द्वारा सिन्धी की जगह पर बोला जाता था. फारसी में ‘स’ वर्ण होता ही नहीं है, वो लोग ‘स’ के जगह पर ‘ह’ का इस्तेमाल करते थे, जिसकी वजह से सिंध-हिन्द हो गया. सिन्धू के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को हिन्दू और उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को हिन्दी कहा जाने लगा.

1900 में हुई थी आज की हिंदी की शुरुआत

भाषाविदों की मानें तो हिन्दी के वर्तमान स्वरूप, जिसमें आज हम पढ़ व लिख रहे हैं; की शुरूआत 1900 ईसवी में हुई थी. खड़ी बोली यानी हिंदी में लिखी गई पहली कहानी इंदुमती थी. इसे किशोरीलाल गोस्वामी ने लिखा था. इसकी हिंदी भाषा काफी हद तक वैसी ही है जैसी आज लिखी और बोली जाती है.

हिन्दी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ ) हैं, जिनमें अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, हड़ौती, भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुमाउँनी, मगही, मेवाती आदि प्रमुख हैं. इनमें से कुछ में अत्यन्त उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है. ऐसी बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं. यह बोलियाँ हिन्दी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी. वे हिन्दी की जड़ों को गहरा बनाती हैं. हिन्दी की बोलियाँ और उन बोलियों की उप बोलियाँ हैं जो न केवल अपने में एक बड़ी परंपरा, इतिहास, सभ्यता को समेटे हुए हैं वरन स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना संसार सचेत है.

पश्चिमी हिन्दी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है. इसके अंतर्गत पाँच बोलियाँ हैं खड़ी बोली, हरियाणवी,  ब्रजभाषा, कन्नौजी और बुंदेली. खड़ी बोली अपने मूल रूप में मेरठ, रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, बागपत के आसपास बोली जाती है. इसी के आधार पर आधुनिक हिंदी और उर्दू का रूप खड़ा हुआ. बांगरू को जाटू या हरियाणवी भी कहते हैं. यह पंजाब के दक्षिण पूर्व में बोली जाती है. कुछ विद्वानों के अनुसार बांगरू खड़ी बोली का ही एक रूप है, जिसमें पंजाबी और राजस्थानी का मिश्रण है. ब्रजभाषा मथुरा के आसपास ब्रजमंडल में बोली जाती है. हिंदी साहित्य के मध्ययुग में ब्रजभाषा में उच्च कोटि का काव्य निर्मित हुआ. इसलिए इसे बोली न कहकर आदरपूर्वक भाषा कहा गया. मध्यकाल में यह बोली संपूर्ण हिंदी प्रदेश की साहित्यिक भाषा के रूप में मान्य हो गई थी, पर साहित्यिक ब्रजभाषा में ब्रज के ठेठ शब्दों के साथ अन्य प्रांतों के शब्दों और प्रयोगों का भी ग्रहण है. कन्नौजी गंगा के मध्य दोआब की बोली है. इसके एक ओर ब्रजमंडल है और दूसरी ओर अवधी का क्षेत्र. यह ब्रजभाषा से इतनी मिलती जुलती है कि इसमें रचा गया जो थोड़ा बहुत साहित्य है, वह ब्रजभाषा का ही माना जाता है. बुंदेली बुंदेलखंड की उपभाषा है. बुंदेलखंड में ब्रजभाषा के अच्छे कवि हुए हैं, जिनकी काव्यभाषा पर बुंदेली का प्रभाव है.

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के पैरोकार एकमात्र अहिंदी भाषी लक्ष्मी नारायण साहू

संदर्भ हिंदी दिवस-13 सितंबर

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के पैरोकार एकमात्र अहिंदी भाषी लक्ष्मी नारायण साहू

हिंदी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा बनाए जाने के प्रश्न पर संविधान सभा की तीन दिन तक चली गर्मागर्म बहस में 13 सितंबर की तारीख भी अहम थी। इस प्रश्न पर बहस दो धुरियों पर ही टिकी रही। हिंदी या रोमन अंकों के उपयोग पर पक्ष-विपक्ष में लंबी बहसें हुईं। अलग-अलग प्रांतों के प्रतिनिधियों ने उम्मीद के मुताबिक ही अपने-अपने तर्क और विचार प्रस्तुत किए। पंडित जवाहरलाल नेहरू, सभापति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित रविशंकर शुक्ल सरीखे सदस्यों ने जरूर बीच का रास्ता अपनाया। अधिकतर अहिंदी भाषी प्रतिनिधियों ने भारी मन से हिंदी को राजभाषा स्वीकार करते हुए सभा में आए संशोधन प्रस्तावों पर अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर संदेह प्रकट किए लेकिन संविधान परिषद में उड़ीसा प्रांत के प्रतिनिधि लक्ष्मी नारायण साहू एकमात्र अहिंदी भाषी थे जिन्होंने बहुत किंतु-परंतु लगाए बिना हिंदी को राजभाषा के बजाय राष्ट्रभाषा माने जाने की वकालत की। संविधान सभा के वाद-विवाद की सरकारी रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 2144-46 में बहस में भाग लेते हुए लक्ष्मी नारायण साहू के संशोधन और वक्तव्य दर्ज हैं।

उड़ीसा प्रांत के बालासोर में 3 अक्टूबर 1890 को जन्मे लक्ष्मी नारायण साहू ने पांच-पांच विषयों में परास्नातक की परीक्षा पास की। उन्होंने उड़ीसा राज्य के गठन के पहले 1936 में ‘उत्कल यूनियन कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना के साथ सहकार, वैतरणी और स्टार आफ उत्कल पत्रों का संपादन भी किया। 1947 में उड़ीसा विधानसभा और संविधान परिषद के सदस्य चुने गए। छुआछूत और महिलाओं की स्थिति में सुधार आंदोलन में भी अपनी अहम भूमिका निभाई। आजादी के बाद उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। 18 जनवरी 1963 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

संशोधन प्रस्तावों पर चर्चा के दौरान लक्ष्मी नारायण साहू ने कहा- ‘ कोई सज्जन संशोधन लाए हैं कि बांग्ला भाषा राष्ट्रीय भाषा हो सकती है। तब मैं कहता हूं कि मेरी उड़िया भाषा बंगाली के मुकाबले प्राचीन है। जब उड़िया भाषा, भाषा के रूप में दिखाई दे चुकी थी तब बांग्ला भाषा का जन्म भी नहीं हुआ था। इस तरह दक्षिण के भाई कहेंगे कि उनकी भाषा बहुत प्राचीन है। यह सब ठीक नहीं है। जब भारत को एक राष्ट्र समझते हैं या बनाने की कोशिश करते हैं तो ऑफिशियल लैंग्वेज क्यों? इस (हिंदी) को नेशनल लैंग्वेज भी बना लेना चाहिए। हिंदी भाषा-भाषी देश में ज्यादा तादाद में हैं। इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा होना ही चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि हिंदी में शब्द भंडार पूर्ण नहीं है तो दूसरी भाषाओं के शब्दों को लेकर हिंदी भाषा की समृद्धि की जानी चाहिए। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने पर दूसरी प्रांतीय भाषाओं के रास्ते में रुकावट पैदा न हो। सब प्रांतीय भाषाएं अपनी-अपनी जगह उन्नति कर सकें, उनकी प्रगति रुके नहीं इसका भी ख्याल करना चाहिए। जब एक प्रांत और प्रांतीय भाषा दृढ़ हो जाएगी तो राष्ट्रभाषा भी दृढ़ होगी ही।’

राजभाषा के प्रश्न पर संविधान सभा में हुई बहस में कुछ प्रतिनिधियों ने अपना अंग्रेजी का मोह भी प्रकट किया था। ऐसे लोगों को भी आईना दिखाते हुए हिंदी भाषी लक्ष्मी नारायण साहू ने कहा था कि कुछ लोग समझते हैं कि अंग्रेजी नहीं होगी तो हम मर जाएंगे। यह तो ऐसा ही हुआ कि शराब पीना बंद हो जाए तो कुछ लोग मर जाएंगे अगर अंग्रेजी जाने से कुछ थोड़े आदमी मर जाते हैं तो क्या हुआ? हमें तो सारे राष्ट्र और देश हित को ध्यान में रखकर कदम उठाना चाहिए। रोमन में हिंदी लिखे जाने की वकालत करने वाले लोगों को जवाब देते हुए लक्ष्मी नारायण साहू ने कहा था कि ऐसे लोग यह नहीं समझते हैं कि स्क्रिप्ट कैसे बनती है। स्क्रिप्ट तो बनती है भाषा के स्वर से। रोमन कैरेक्टर में हिंदी भाषा को लिखने से वह समझ में नहीं आती और उसमें ठीक-ठीक उच्चारण नहीं कर पाते। इसलिए रोमान स्क्रिप्ट एकदम अग्रहणीय है। वह बहुत भद्दी और उसका साइंटिफिक बेसिस भी नहीं है। देवनागरी से लिखी जाने वाली हिंदी साइंटिफिक है और उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।अहिंदी भाषी लक्ष्मी नारायण साहू की इन बातों पर संविधान परिषद के सदस्यों ने अगर गौर किया होता तो आज देश में ‘अंग्रेजी राज’ के बजाय हिंदी और भारतीय भाषाओं का बोलबाला ही होता।

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली

संविधान सभा में आज ही शुरू हुई थी हिंदी राजभाषा के प्रश्न पर बहस

संदर्भ हिंदी दिवस-1

संविधान सभा में आज ही शुरू हुई थी हिंदी राजभाषा के प्रश्न पर बहस

आज 12 सितंबर है। संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाए जाने के तैयार किए गए मसौदे पर आए 300 से अधिक संशोधनों पर दिलचस्प बहस आज ही शुरू हुई थी। हिंदी और अहिंदी भाषी राज्यों के प्रतिनिधियों के बीच गरमागरम यह बहस लोकसभा सचिवालय द्वारा 1994 में प्रकाशित की गई ‘भारतीय संविधान सभा के वाद विवाद की सरकारी रिपोर्ट’ का अहम दस्तावेज है। हिंदी को राज या राष्ट्रभाषा बनाए जाने से जुड़े संशोधनों पर संविधान सभा में हुई बहस में पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सेठ गोविंद दास, एन गोपालस्वामी आयंगर, अलगू राय शास्त्री, आरबी धुलेकर, मौलाना हसरत मोहानी, वीएन गाडगिल, नजीरउद्दीन अहमद, मौलाना हिफजुररहमान, श्रीमती जी. दुर्गाबाई, डॉ रघुवीर, मोहम्मद इस्माइल, शंकरराव देव, पंडित रविशंकर शुक्ल, रामसहाय, बीएम गुप्ते, रेवरेंड जिरोम डिसूजा, कुलधार चालिया, टीटी कृष्णमाचारी, आरके सिधवा, डॉ. पी सुब्बरायन, बी. दास, डॉ पीए चक्को, काजी सैयद करीमुद्दीन, पंडित गोविंद मालवीय, पंडित लक्ष्मीकांत मैत्र द्वारा पक्ष विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्क-वितर्क और बहस पृष्ठ संख्या 2055 से 2332 (277 पृष्ठ) में दर्ज है। तमाम सहमति-असहमति के बीच सभा के कुछ सदस्यों ने बीच का रास्ता भी अपनाया था। इनमें पंडित जवाहरलाल नेहरू और संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद प्रमुख थे।
हिंदी को राजभाषा के प्रश्न पर हिंदी और अहिंदी भाषी तो लगभग तमाम वाद-विवाद के बाद सहमत हो गए थे लेकिन विवाद के केंद्र में हिंदी और रोमन अंकों के उपयोग का मसला ही था। अंत में अंग्रेजी अंकों के उपयोग पर सभी की सहमति के साथ राजभाषा का यह मसला 12 सितंबर से शुरू होकर 14 सितंबर 1949 की शाम को समाप्त हुआ था। 3 दिनों में करीब 24 घंटे तक बहस चली। कई संशोधन प्रस्ताव एक से होने की वजह से कुछ लोगों को ही बात रखने का अवसर मिला। कुछ संशोधन प्रस्ताव वापस ले लिए गए और हाथ उठाकर मतों के जरिए हिंदी को राजभाषा, देवनागरी लिपि और रोमन अंकों के उपयोग पर सहमति बनी।

आखिर अंक हैं क्या? संविधान सभा में भाषा के प्रश्न पर हुई इस बहस का समापन करते हुए अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने कहा-‘मैं आश्चर्य कर रहा था कि हमें छोटे से मामले (रोमन अंकों के उपयोग) पर इतनी बहस करने की, इतना समय बर्बाद करने की क्या आवश्यकता है? आखिर अंक हैं क्या? वैसे दस ही तो हैं। इन दस में मुझे याद पड़ता है कि तीन तो ऐसे हैं जो अंग्रेजी और हिंदी में एक से हैं–२, ३ और ०। मेरे ख्याल से चार और है जो रूप में एक से है किंतु उनमें अलग-अलग अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के लिए हिंदी का ४ अंग्रेजी के 8 से बहुत मिलता जुलता है। मैं अपने हिंदी के मित्रों से कहूंगा कि वह इसे (दक्षिण भारतीयों की रोमन अंकों के उपयोग के प्रस्ताव) उस भावना से स्वीकार करें। इसलिए स्वीकार करें कि हम उनसे हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि स्वीकार करवाना चाहते हैं। मुझे प्रसन्नता है कि सदन ने बहुमत से सुझाव को स्वीकार कर लिया है।

अंकों के उपयोग पर चले वाद विवाद का समापन करते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद ने एक छोटा सा मनोरंजक दृष्टांत भी अपने वक्तव्य में सुनाया-‘हम चाहते हैं कि कुछ मित्र हमें निमंत्रण दें। वे निमंत्रण दे देते हैं। वह कहते हैं, आप आकर हमारे घर में ठहर सकते हैं। उसके लिए आपका स्वागत है, किंतु जब आप हमारे घर आएं तो कृपया अंग्रेजी चलन के जूते पहनिए। भारतीय चप्पल मत पहनिए, जैसे कि आप अपने घर में पहनते हैं। इस निमंत्रण को केवल इस आधार पर ठुकराना मेरे लिए बुद्धिमत्ता नहीं होगी कि मैं चप्पल को नहीं छोड़ना चाहता। मैं अंग्रेजी जूते पहन लूंगा और निमंत्रण को स्वीकार कर लूंगा और इसी सहिष्णुता की भावना से राष्ट्रीय समस्याएं हल हो सकती हैं’

उन्होंने इस बात के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया-‘हमारी परंपराएं एक ही हैं। हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं। अतएव यदि हम इस सूत्र (अंग्रेजी अंकों के उपयोग) को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते। हमने यथासंभव बुद्धिमानी का कार्य किया है। मुझे हर्ष है। मुझे प्रसन्नता है और मुझे आशा है कि भावी संतति इसके लिए हमारी सराहना करेगी।

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली

12 सितंबर: संविधान सभा में आज ही शुरू हुई थी हिंदी राजभाषा के प्रश्न पर बहस

संदर्भ हिंदी दिवस-12 सितंबर। संविधान सभा में आज ही शुरू हुई थी हिंदी राजभाषा के प्रश्न पर बहस। संविधान सभा में आज ही शुरू हुई थी हिंदी राजभाषा के प्रश्न पर बहस।

लखनऊ। आज 12 सितंबर है। संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा बनाए जाने के तैयार किए गए मसौदे पर आए 300 से अधिक संशोधनों पर दिलचस्प बहस आज ही शुरू हुई थी। हिंदी और अहिंदी भाषी राज्यों के प्रतिनिधियों के बीच गरमागरम यह बहस लोकसभा सचिवालय द्वारा 1994 में प्रकाशित की गई ‘भारतीय संविधान सभा के वाद विवाद की सरकारी रिपोर्ट’ का अहम दस्तावेज है। हिंदी को राज या राष्ट्रभाषा बनाए जाने से जुड़े संशोधनों पर संविधान सभा में हुई बहस में पंडित जवाहरलाल नेहरू, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सेठ गोविंद दास, एन गोपालस्वामी आयंगर, अलगू राय शास्त्री, आरबी धुलेकर, मौलाना हसरत मोहानी, वीएन गाडगिल, नजीरउद्दीन अहमद, मौलाना हिफजुररहमान, श्रीमती जी. दुर्गाबाई , डॉ रघुवीर, मोहम्मद इस्माइल, शंकरराव देव, पंडित रविशंकर शुक्ल, रामसहाय, बीएम गुप्ते, रेवरेंड जिरोम डिसूजा, कुलधार चालिया, टीटी कृष्णमाचारी, आरके सिधवा, डॉ. पी सुब्बरायन, बी. दास, डॉ पीए चक्को, काजी सैयद करीमुद्दीन, पंडित गोविंद मालवीय, पंडित लक्ष्मीकांत मैत्र द्वारा पक्ष विपक्ष में प्रस्तुत किए गए तर्क-वितर्क और बहस पृष्ठ संख्या 2055 से 2332 (277 पृष्ठ) में दर्ज है। तमाम सहमति-असहमति के बीच सभा के कुछ सदस्यों ने बीच का रास्ता भी अपनाया था। इनमें पंडित जवाहरलाल नेहरू और संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद प्रमुख थे।
हिंदी को राजभाषा के प्रश्न पर हिंदी और अहिंदी भाषी तो लगभग तमाम वाद-विवाद के बाद सहमत हो गए थे लेकिन विवाद के केंद्र में हिंदी और रोमन अंकों के उपयोग का मसला ही था। अंत में अंग्रेजी अंकों के उपयोग पर सभी की सहमति के साथ राजभाषा का यह मसला 12 सितंबर से शुरू होकर 14 सितंबर 1949 की शाम को समाप्त हुआ था। 3 दिनों में करीब 24 घंटे तक बहस चली। कई संशोधन प्रस्ताव एक से होने की वजह से कुछ लोगों को ही बात रखने का अवसर मिला। कुछ संशोधन प्रस्ताव वापस ले लिए गए और हाथ उठाकर मतों के जरिए हिंदी को राजभाषा, देवनागरी लिपि और रोमन अंकों के उपयोग पर सहमति बनी।

संविधान सभा में भाषा के प्रश्न पर हुई इस बहस का समापन करते हुए अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने कहा-‘मैं आश्चर्य कर रहा था कि हमें छोटे से मामले (रोमन अंकों के उपयोग) पर इतनी बहस करने की, इतना समय बर्बाद करने की क्या आवश्यकता है? आखिर अंक हैं क्या? वैसे दस ही तो हैं। इन दस में मुझे याद पड़ता है कि तीन तो ऐसे हैं जो अंग्रेजी और हिंदी में एक से हैं–२, ३ और ०। मेरे ख्याल से चार और है जो रूप में एक से है किंतु उनमें अलग-अलग अर्थ निकलते हैं। उदाहरण के लिए हिंदी का ४ अंग्रेजी के 8 से बहुत मिलता जुलता है। मैं अपने हिंदी के मित्रों से कहूंगा कि वह इसे (दक्षिण भारतीयों की रोमन अंकों के उपयोग के प्रस्ताव) उस भावना से स्वीकार करें। इसलिए स्वीकार करें कि हम उनसे हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि स्वीकार करवाना चाहते हैं। मुझे प्रसन्नता है कि सदन ने बहुमत से सुझाव को स्वीकार कर लिया है।

अंकों के उपयोग पर चले वाद विवाद का समापन करते हुए डॉ राजेंद्र प्रसाद ने एक छोटा सा मनोरंजक दृष्टांत भी अपने वक्तव्य में सुनाया-‘हम चाहते हैं कि कुछ मित्र हमें निमंत्रण दें। वे निमंत्रण दे देते हैं। वह कहते हैं, आप आकर हमारे घर में ठहर सकते हैं। उसके लिए आपका स्वागत है, किंतु जब आप हमारे घर आएं तो कृपया अंग्रेजी चलन के जूते पहनिए। भारतीय चप्पल मत पहनिए, जैसे कि आप अपने घर में पहनते हैं। इस निमंत्रण को केवल इस आधार पर ठुकराना मेरे लिए बुद्धिमत्ता नहीं होगी कि मैं चप्पल को नहीं छोड़ना चाहता। मैं अंग्रेजी जूते पहन लूंगा और निमंत्रण को स्वीकार कर लूंगा और इसी सहिष्णुता की भावना से राष्ट्रीय समस्याएं हल हो सकती हैं’

उन्होंने इस बात के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया-‘हमारी परंपराएं एक ही हैं। हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता में सब बातें एक ही हैं। अतएव यदि हम इस सूत्र (अंग्रेजी अंकों के उपयोग) को स्वीकार नहीं करते तो परिणाम यह होता कि या तो इस देश में बहुत सी भाषाओं का प्रयोग होता या वे प्रांत पृथक हो जाते जो बाध्य होकर किसी भाषा विशेष को स्वीकार करना नहीं चाहते। हमने यथासंभव बुद्धिमानी का कार्य किया है। मुझे हर्ष है। मुझे प्रसन्नता है और मुझे आशा है कि भावी संतति इसके लिए हमारी सराहना करेगी।

गौरव अवस्थी
रायबरेली

साहित्य की ‘सरस्वती’ के इतिहास में 20 अगस्त

20 अगस्त : तारीख जो तवारीख बन गई

साहित्य की ‘सरस्वती’ के इतिहास में 20 अगस्त का अपना अलग ही महत्व है। साहित्य की इस ‘सरस्वती’ का उद्गम 20 अगस्त 1899 को ही हुआ था। वैसे, उद्गम का अर्थ स्थान से जोड़ा जाता है लेकिन साहित्य की ‘सरस्वती’ के उद्गम का अर्थ यहां तारीख से है। यह वही तारीख है जो आधुनिक हिंदी साहित्य की तवारीख बन गई। इसी दिन इंडियन प्रेस (प्रयागराज) के संस्थापक-स्वामी बाबू चिंतामणि घोष ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा को सचित्र मासिक पत्रिका के प्रकाशन संबंधी पत्र भेजकर संपादन का भार संभालने का प्रस्ताव दिया था। इस पत्र में पत्रिका के शीर्षक का कोई उल्लेख नहीं था। मासिक पत्रिका का नाम ‘सरस्वती’ कैसे पड़ा? यह अब तक रहस्य ही है।
1893 में स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा हिंदी के प्रचार- प्रसार में सक्रिय में सक्रिय थी। 7 वर्षों में वह हिंदी को स्थापित करने में कई सफलताएं भी अर्जित कर चुकी थी। दस्तावेज देखने से पता चलता है कि इंडियन प्रेस के सचित्र मासिक पत्रिका के प्रकाशन संबंधी प्रस्ताव को नागरी प्रचारिणी सभा ने पहले- पहल बहुत गंभीरता से नहीं लिया। श्री गोविंददास जी के सभापतित्व में 21 अगस्त 1899 को संपन्न हुए सभा के साधारण अधिवेशन के कुल 25 विचारणीय विषयों में इंडियन प्रेस के सचित्र मासिक पत्रिका के प्रकाशन का विषय 23वें नंबर पर था। 24वें नंबर पर चार पुस्तकों के प्रकाशन संबंधी सूचना और अंतिम विषय के रूप में सभापति का धन्यवाद प्रस्ताव। इसी से स्पष्ट है कि मासिक पत्रिका के प्रकाशन का प्रकरण सभा के लिए कितना महत्वपूर्ण था? नागरी प्रचारिणी सभा के साधारण अधिवेशन में इंडियन प्रेस का यह पत्र विचारार्थ प्रस्तुत तो किया गया लेकिन कार्य अधिक होने के कारण उस दिन उस पत्र पर कोई विचार नहीं किया जा सका। सभा की कार्यवाही में लिखा गया-“(23) इंडियन प्रेस का 20 अगस्त का सचित्र मासिक पत्र संबंधी पत्र सभा में उपस्थित किया गया। आज्ञा हुई कि आगामी अधिवेशन में विचारार्थ उपस्थित किया जाए।”
11 सितंबर 1899 को श्री गोविंददास जी की ही अध्यक्षता में ही संपन्न हुए अधिवेशन में इंडियन प्रेस के पत्रिका प्रकाशन संबंधी प्रस्ताव पर निर्णय लिया गया- ‘इंडियन प्रेस के 20 अगस्त के मासिक सचित्र पत्र संबंधी पत्र पर निश्चय हुआ कि सभा उस पत्र के संपादन करने का वा उसके संबंध में और किसी कार्य का भार अपने ऊपर नहीं ले सकती है परंतु इंडियन प्रेस को सम्मति देती है कि वह उस पत्र को अवश्य निकालें क्योंकि उससे भाषा के उपकार की संभावना है और यदि इंडियन प्रेस के स्वामी चाहे तो सभा उन्हें ऐसे कुछ लोगों के नाम बता सकती है जो संपादक का कार्य करने के उपयुक्त हों। वे उनसे सब बातें स्वयं निश्चय कर लें’। सभा ने मासिक पत्र के प्रकाशन पर अपनी सम्मति तो दी लेकिन संपादन संबंधी कार्यभार स्वीकार नहीं किया लेकिन इंडियन प्रेस के संस्थापक बाबू चिंतामणि घोष ने हार नहीं मानी। वह जानते थे कि प्रस्तावित पत्रिका की सफलता के लिए सभा का सहयोग नितांत आवश्यक है। उन्होंने अपना प्रयत्न जारी रखा और 14 अक्टूबर को पुनः एक मासिक पत्र प्रकाशन संबंधी प्रस्ताव नागरी प्रचारिणी सभा के समक्ष प्रस्तुत किया।
इस नए प्रस्ताव पर 13 नवंबर 1899 को पंडित सुदर्शनदास जी के सभापतित्व में संपन्न हुए नागरी प्रचारिणी सभा के साधारण अधिवेशन में प्रस्तावित मासिक पत्र के लिए संपादक समिति बनाने पर निर्णय लिया गया। सभा की साधारण सभा ने क्रमशः बाबू श्यामसुंदर दास, बाबू राधा कृष्ण दास, बाबू जगन्नाथ दास, बाबू कार्तिक प्रसाद खत्री और पंडित किशोरी लाल गोस्वामी के नाम संपादक समिति के लिए प्रस्तावित किए। अपने प्रयासों की शुरुआती सफलता से उत्साहित बाबू चिंतामणि घोष ने डेढ़ माह में ही सचित्र मासिक पत्रिका के प्रकाशन की व्यवस्था सुनिश्चित की। इस तरह 1 जनवरी 1900 को सरस्वती का जन्म हुआ। उद्गम के साथ ही ‘सरस्वती’ के मुख्य पृष्ठ पर संपादक समिति के सदस्यों के नाम इस क्रम से प्रकाशित किए गए-
बाबू कार्तिक प्रसाद खत्री
पंडित किशोरी लाल गोस्वामी
बाबू जगन्नाथदास बीए
बाबू राधा कृष्ण दास
बाबू श्यामसुंदर दास बीए
सरस्वती के मुख्य पृष्ठ पर संपादक समिति के इन सदस्यों के नाम के ठीक ऊपर ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अनुमोदन से प्रतिष्ठित’ भी बड़े- बड़े अक्षरों में छापा गया। सरस्वती के 1 वर्ष पूर्ण होने पर 12वें अंक में बाबू चिंतामणि घोष का प्रकाशकीय वक्तव्य (पृष्ठ 399) पर ‘प्रकाशक का निवेदन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। प्रकाशक का यह निवेदन बताता है कि उस समय हिंदी की मासिक पत्रिका निकालना कितने जोखिम का काम था। वह लिखते हैं-‘इसे नष्ट करने के लिए उतारू इतने ही लोगों के कटाक्षों की वज्रवर्षा भी होती रही।’
सरस्वती के दूसरे वर्ष के प्रथम अंक से संपादन संबंधी दायित्व संपादक समिति के स्थान पर अकेले बाबू श्यामसुंदरदास जी ने संभाला। दो वर्ष तक अकेले सरस्वती का संपादन करने के बाद बाबू श्यामसुंदर दास ने व्यस्तता के चलते अपने को संपादन कार्य से अलग कर लिया। दिसंबर 1902 के अंतिम अंक के आरंभ में उन्होंने अपना वक्तव्य ‘विविध वार्ता’ शीर्षक से प्रकाशित किया। उन्होंने लिखा- ‘इस मास की संख्या के साथ सरस्वती का तीसरा वर्ष पूरा होता है। पहले वर्ष से लेकर आज तक मेरा संबंध इस पत्रिका से घनिष्ट बना रहा। पहले वर्ष में एक समिति इस पत्रिका का संपादन करती रही और मैं भी उस समिति का सभासद रहा। दूसरे और तीसरे वर्ष में इसके संपादन का भार पूरा-पूरा मेरे ऊपर रहा परंतु चौथे वर्ष के प्रारंभ से यह कार्य हिंदी के प्रसिद्ध लेखक पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के अधीन रहेगा। इस परिवर्तन का मुख्य कारण यह हुआ कि मैं समय के अभाव से सरस्वती के संपादन में इतना दत्त चित्त न रह सका जितना कि मुझे होना उचित था। इसलिए केवल नाम के लिए संपादक बना रहना मैंने उचित नहीं समझा परंतु मैं अपने पाठकों और पत्रिका के लिए को विश्वास दिलाता हूं कि यद्यपि आगामी संख्या से मैं इसका संपादक न रहूंगा पर इस पत्रिका के साथ मेरी वैसी ही सहानुभूति बनी रहेगी जैसी अब तक रही और मैं सदा इसकी उन्नति से पसंद होऊंगा। अंत में मुझे अपने उन मित्रों से प्रार्थना करनी है जो लेखों के द्वारा 3 वर्ष तक मेरी सहायता करते रहे। आशा है कि वह अगले वर्ष में भी इसी प्रकार सहायता करते रहेंगे। अब भविष्य में सरस्वती में प्रकाशनार्थ सब लेख परिवर्तन के संवाद पत्र तथा समालोचनार्थ पुस्तक आदि निम्नलिखित पते से भेजे जाने चाहिए-
पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी
संपादक सरस्वती,
झांसी।
पत्रिका का प्रबंध तथा मूल्य संबंधी पत्र व्यवहार पूर्ववत प्रयाग के इंडियन प्रेस से ही रहेगा।’
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादकत्व में निकलने वाली सरस्वती से वर्ष 1903 से लेकर 1905 तक अर्थात 3 वर्ष तक सभा का अनुमोदन संबंध यथावत रहा लेकिन कुछ अपरिहार्य कारणों से सभा को सरस्वती पत्रिका पर से अपना अनुमोदन हटाना पड़ा। वर्ष 1905 में प्रकाशित सभा के वार्षिक विवरण पत्र में इस संबंध में दर्ज है-
‘मासिक पत्रों में अब सबसे श्रेष्ठ सरस्वती है। यद्यपि कई कारणों से अब इस पत्रिका के साथ सभा का कोई संबंध नहीं है पर यह सभा इस पत्रिका की उन्नति देखकर प्रसन्न होती है। सरस्वती में सब प्रकार के लोगों की रूचि के अनुसार सरल भाषा में लेखों के रहने से इसका आदर दिनोंदिन बढ़ता जाता है। सभा को दुख है कि सरस्वती के प्रकाशक ने उसमें अपवादपूर्ण लेखों का रोकना उचित न जानकर सभा से अपना संबंध तोड़ना उचित समझा परंतु सभा को विश्वास है कि इस पत्रिका द्वारा हिंदी का हित निरंतर साधन होता रहेगा।’

काशी नागरी प्रचारिणी सभा का 5 वर्षों तक ‘सरस्वती’ के उत्थान में निरंतर सहयोग और साथ आधुनिक हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण परिघटना के रूप में देखी जाती है। माना भी जाता है कि अगर ‘सरस्वती’ प्रकट न हुई होती तो हिंदी और हिंदी साहित्य इस रूप में हम सबके सामने तो और न ही होता।

सरस्वती के पूर्व संपादक
बाबू श्यामसुंदर दास
किशोरी लाल गोस्वामी
बाबू कार्तिक प्रसाद खत्री
जगन्नाथदास रत्नाकर
बाबू राधा कृष्ण दास
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
पंडित देवी दत्त शुक्ल
पंडित उमेश चंद्र मिश्र
पंडित देवी दयाल चतुर्वेदी मस्त
पंडित देवी प्रसाद शुक्ल
पंडित श्री नारायण चतुर्वेदी ‘भैया साहब’
नितीश कुमार राय

प्रोफेसर देवेंद्र कुमार शुक्ला

पूर्व संयुक्त संपादक
ठाकुर श्री नाथ सिंह
श्रीमती शीला शर्मा

पंडित बलभद्र प्रसाद मिश्र

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

अपना दल ने मनाई बाल गंगाधर तिलक जी की पुण्यतिथि

बिजनौर। अपना दल (एस) द्वारा बाल गंगाधर तिलक जी की पुण्यतिथि चौधरी कॉन्प्लेक्स नजीबाबाद पर शैलेंद्र चौधरी एडवोकेट पूर्व चेयरमैन की उपस्थिति में मनाई गई। शैलेंद्र चौधरी ने बाल गंगाधर तिलक की पुण्यतिथि पर कहा कि तिलक जी भारत के स्वतंत्रता सेनानियों में बाल गंगाधर तिलक का नाम बड़े ही सम्मान से लिया जाता है। वे हिन्दुस्तान के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने हमारे देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्‍त करवाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूंगा।* के नारे के साथ तिलक जी ने भारत की आजादी में एक नई क्रांति की चिंगारी जला दी थी। केंद्रीय मंत्री बहन अनुप्रिया पटेल सड़क से संसद तक वर्तमान में दबों, पिछड़ों, शोषित एवं वंचितों की आवाज को बुलंद कर रही हैं। पुण्यतिथि मनाने के लिए सूर्य प्रताप सिंह जिलाध्यक्ष आईटी सेल, हिमांशु राजपूत जिला महासचिव, दिनेश चौहान एडवोकेट, अंकुर प्रधान, राजीव शर्मा, अमर सिंह, चेतराम सिंह, शोएब मलिक आदि गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

देश की पहली महिला डॉक्टर व विधायक का जन्मदिन आज

डॉक्टर मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी (30 जुलाई 1886 — 22 जुलाई, 1968) भारत की पहली महिला विधायक थीं। वे ही लड़कों के स्कूल में प्रवेश लेने वालीं देश की पहली महिला थीं। इसके आलावा मुत्तुलक्ष्मी ही देश पहली महिला डॉक्टर (मेडिकल ग्रेजुएट) भी थीं। मुत्तुलक्ष्मी जीवन भर महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़तीं रहीं और देश की आज़ादी की लड़ाई में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर सहयोग दिया।

30 जुलाई 1886 में तमिलनाडु (तब मद्रास) में जन्मीं मुत्तुलक्ष्मी को भी बचपन से ही पढ़ने के लिए काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनके पिता एस नारायणस्वामी चेन्नई के महाराजा कॉलेज के प्रधानाचार्य थे। उनकी मां चंद्रामाई ने समाज के तानों के बावजूद उन्हें पढ़ने के लिए भेजा। उन्होंने भी मां-बाप को निराश नहीं किया और देश की पहली महिला डॉक्टर बनीं।

अपनी मेडिकल ट्रेनिंग के दौरान की एक बार मुत्तुलक्ष्मी को कांग्रेस नेता और स्वतन्त्रता सेनानी सरोजिनी नायडू से मिलने का मौका मिला। तभी से उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और देश की आजादी के लिए लड़ने की कसम खा ली। यहां तक कि उन्हें इंग्लैंडजाकर आगे पढ़ने का मौका भी मिला लेकिन उन्होंने इसे छोड़कर विमेंस इंडियन असोसिएशन के लिए काम करना ज्यादा जरूरी समझा। मुत्तु को सन् 1927 में मद्रास लेजिस्लेटिव काउंसिल से देश की पहली महिला विधायक बनने का गौरव भी हासिल हुआ। उन्हें समाज और महिलाओं के लिए किए गए अपने काम के लिए काउन्सिल में जगह दी गई थी। 1956 में उन्हें समाज के लिए किये गए अपने कार्यों के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

विधायक के रूप में काम करते हुए उन्होंने लड़कियों की कम आयु में शादी रोकने के लिए नियम बनाए और अनैतिक तस्करी नियंत्रण अधिनियम को पास करने के लिए परिषद से आग्रह किया। सन् 1954 ई. में उन्होंने ‘अद्यार कैंसर इंस्टिट्यूट’ (Adyar Cancer Institute) की नींव रखी थी, जहां आज सालाना करीब 80 हजार कैंसर के मरीजों का इलाज होता है। 

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान रजत जयंती वर्ष समारोह का वार्षिक कैलेंडर

लीजिए, हाजिर है..

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान रजत जयंती वर्ष समारोह का वार्षिक कैलेंडर

∆ अब से 8 मई 2023 तक प्रतिमाह कम से कम एक कार्यक्रम की योजना आप सबके सहयोग और स्नेह से प्रतिफलित होनी तय..

∆ आचार्य द्विवेदी की धर्मपत्नी द्वारा बनवाए गए महावीर चौरे पर 25 जून को शाम 4:00 बजे से सुंदरकांड के पाठ के साथ रजत जयंती वर्ष का शुभारंभ हो चुका है
और
∆ 9 जुलाई शनिवार नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार से कार्यक्रमों की श्रंखला का आगाज

∆ दिसंबर 2022 तक के सभी आयोजनों की तारीखें आपके कैलेंडर में,

आगे के महीनों की तारीखें तय होते ही नई सूचना आपके व्हाट्सएप पर होगी,

समिति के सभी सदस्यों, समस्त सहयोगियों और शुभचिंतकों को हृदय से धन्यवाद!!!

आपका
गौरव अवस्थी रायबरेली

आज है विश्व संगीत दिवस

शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसे संगीत पसंद ना हो। संगीत ऐसी चीज है, जो लोगों के दिल और दिमाग पर गहरा प्रभाव डालती है। इसी वजह से दुनिया भर के गायकों और संगीतकारों को म्यूजिक के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मान देने के उद्देश्य से आज (21 जून) विश्व भर में ‘वर्ल्ड म्यूजिक डे’ सेलिब्रेट किया जाता है। इस दिन कई देशों में संगीत प्रोग्राम आयोजित किए जाते हैं।

हर साल 21 जून को मनाए जाने वाले विश्व संगीत दिवस की एक खास थीम होती है। संगीत दिवस 2022 की थीम ‘चौराहों पर संगीत’ (Music At Intersections) है। इसी थीम पर इस साल के सभी कार्यक्रम आयोजित होंगे। संगीत दिवस का उद्देश्य दुनियाभर के गायकों और संगीतकारों का संगीत के क्षेत्र में योगदान को सम्मान देना है।

फ्रांस में 1982 में जब पहला संगीत दिवस मनाया गया तो इसे 32 से ज्यादा देशों का समर्थन मिला। इस दौरान कई कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। उसके बाद से अब भारत समेत इटली, ग्रीस, रूस, अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, पेरू, ब्राजील, इक्वाडोर, मैक्सिको, कनाडा, जापान, चीन, मलेशिया और दुनिया के तमाम देश विश्व संगीत दिवस हर साल 21 जून को मनाते हैं।

योग भारत की धरती से पूरे विश्व को एक बहुत बड़ी देन- मण्डलायुक्त आञ्जनेय कुमार सिंह


आठवें अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस पर मंडलायुक्त मुरादाबाद मंडल आन्जनेय कुमार सिंह की अध्यक्षता में नेहरू स्टेडियम बिजनौर में हुआ सामूहिक योगाभ्यास कार्यक्रम

जनपद में अष्टम अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर आयोजित हुए कार्यक्रम

योग को बनाएं जीवन का हिस्सा, नियमित योग अभ्यास रोग दूर करने में सहायक- मण्डलायुक्त आंजनेय कुमार सिंह

कोई भी देश, समाज व विश्व बिना स्वस्थ नागरिकों के विकास नहीं कर सकता- मण्डलायुक्त

योग शारीरिक और मानसिक स्वास्थय की कुंजी -जिलाधिकारी

योग जीवन को स्वस्थ व निरोग रखने में सहायक- जिलाधिकारी उमेश मिश्रा

देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।।

बिजनौर। जनपद मे आज अष्टम अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर मुख्य कार्यक्रम का आयोजन नेहरू स्टेडियम व गंगा बैराज घाट पर किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि आयुक्त मुरादाबाद मण्डल, पूर्व सांसद व जिलाधिकारी ने दीप प्रज्जवलन कर किया। मण्डलायुक्त आंजनेय कुमार सिंह ने कहा कि आज योग दिवस पूरे विश्व मे मनाया जा रहा है। योग भारत की धरती से पूरे विश्व को एक बहुत बडी देन है। गंगा बैराज घाट पर मां गंगा को दूध व पुष्प अर्पित कर मां गंगा की आरती की गयी। सभी अधिकारियों कर्मचारियों व आमजन ने योगाभ्यास में प्रतिभाग किया।

आयुक्त श्री सिंह ने कहा कि किसी भी देश के लिए उसकी सबसे महत्वपूर्ण संपदा उसकी मानव संपदा होती है। आज योग दिवस पूरे विश्व में मनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दक्ष मानव संपदा है तो बेहतर है लेकिन उसके साथ-साथ स्वस्थ मानव संपदा का होना अत्यन्त आवश्यक है। मनुष्य का शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ होना आवश्यक है। शारीरिक स्वास्थय के साथ-साथ मन का स्वस्थ होना भी आवश्यक है। योग के माध्यम से मानसिक स्वास्थय का व शारीरिक स्वास्थय दोनो को ठीक रखा जा सकता है।

आयुक्त ने कहा कि योग हमारे शारीरिक व मन को स्वस्थ रखने मे सहायक होता है और अगर हम शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ है तो देश व समाज के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। हमारे प्रधानमंत्री ने योग को आगे बढाया और आज पूरा विश्व इसे स्वीकार कर रहा है। योग भारत की धरती से पूरे विश्व को एक बहुत बडी देन है। योग एक बहुत बडी संपदा है जो हमारे पूर्वजो, ऋषियों व मुनियों ने हमें सौंपी है। योग को स्वीकार व अंगीकार करते हुए अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। कोई भी देश समाज व विश्व बिना अपने स्वस्थ नागरिकों के विकास नहीं कर सकता। नियमित योग अभ्यास रोग दूर करने मे सहायक होता है। योग पांचवी चिकित्सीय परामर्श के रूप मे माना जाने लगा है।

जिलाधिकारी उमेश मिश्रा ने कहा कि योग शारीरिक और मानसिक स्वास्थय की कुंजी है। उन्होंने आमजन से योग अपनाने की अपील की। योग जीवन को स्वस्थ व निरोग रखने मे सहायक होता है। उन्होंने बताया कि आठवें अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2022 की थीम मानवता के लिए योग घोषित की गयी है।

नेहरू स्टेडियम मे आयोजित कार्यक्रम में प्रशांत महर्षि ने योगाभ्यास सिखाया और भारती गौड व विनोद गोस्वामी का सहयोग रहा। वहीं गंगा बैराज घाट पर आयोजित कार्यक्रम में योग प्रशिक्षक तिलकराम ने योगाभ्यास सिखाया और सदभावना, हिमानी आदि का सहयोग रहा।

योग दिवस पर आयोजित योगाभ्यास कार्यक्रम में योग प्रशिक्षकों द्वारा प्राणायाम, भ्रामरी, शीतली प्राणायाम, कपाल भाती, अनुलोम विलोम सहित करीब 35 योगा आसन सिखाये गए। योग प्रशिक्षकों ने कहा कि योेग हमें अनुशासन सिखाता है। इस अवसर पर ब्रहम कुमारी ने मण्डलायुक्त को पुस्तिका भेंट की।

इस अवसर पर पूर्व सांसद भारतेन्द्र सिंह, पुलिस अधीक्षक डा0 धर्मवीर सिंह, जिला वन अधिकारी डा0 अनिल पटेल, मुख्य विकास अधिकारी केपी0 सिंह, अपर जिलाधिकारी प्रशासन विनय कुमार सिंह, पीडी डीआरडीए ज्ञानेश्वर तिवारी सहित अन्य अधिकारी, कर्मचारी, क्रीडा भारती के सदस्य व बड़ी संख्या में आमजन उपस्थित रहे।

घास की चिता पर जली थी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की निर्जीव देह

164वें बलिदान दिवस (18 जून) पर विशेष

1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में जान की कुर्बानी देने वाले योद्धाओं की शौर्य गाथाएं खूब गाईं गईं। सैकड़ों लोकगीत, नाटक, उपन्यास और अनेक भाषाओं में शूरवीरों के जीवन चरित्र लिखे गए लेकिन ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचारों के डर से लोकगीत दबी जुबान ही गाए जाते थे। खुलकर इन्हें गाने की हिम्मत अच्छे-अच्छों में नहीं थी। स्वाधीन भारत में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता-शूरता का इतिहास लिखना आसान था। महाश्वेता देवी से लेकर सैकड़ों लेखकों ने लेखनी चलाई लेकिन ‘सिपाही विद्रोह’ या ‘गदर’ कहे गए 1857 के भीषण संग्राम पर गुलामी के दौर में कलम उठाना उतना ही खतरे से खाली नहीं था, जितना सिपाही विद्रोह में कृपाण उठाना।


यह वह दौर था जब अंग्रेज लेखक अपने अत्याचारों पर पर्दा डालने के लिए गदर का मनमाना इतिहास लिखकर भारतीयों की हिंसात्मक कार्यवाही को बढ़ा-चढ़ा कर पेश कर रहे थे। अप्रतिम वीर और भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ने वाली झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में दुष्प्रचार किया जा रहा था कि विद्रोह के समय अंग्रेजों को सहायता देनी कबूल की। उनके चरित्र को इस तरह चित्रित किया गया कि मानो झांसी की रानी बिना चाहे ही अंग्रेजों से लड़कर वीर नारी बन गई हों।
ऐसे वक्त में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी गदर के संबंध में अंग्रेजी लेखकों द्वारा लिखे जा रहे/ लिखे गए ‘झूठे’ इतिहास को कैसे बर्दाश्त कर सकते थे? उन्हें सरस्वती का संपादन संभाले हुए एक साल ही बीता था। प्रेस मालिकों के नियम और अंग्रेजी कानूनों के डर के बीच अंग्रेज़ों के झूठ के पदार्फाश और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरता-शूरता को हिंदी भाषी समाज के सामने लाने की उत्कंठा अंदर से रोज-ब-रोज जोर मार ही रही थी। उसी बीच उन्हें झांसी की रानी पर मराठी लेखक दत्तात्रेय बलवंत‌ पारसनीस की मराठी में लिखी पुस्तक ने रास्ता दिखाया। पुस्तक पढ़ने के बाद झांसी की रानी की वीरता पर अंग्रेज हुकूमत द्वारा फैलाए गए भ्रम को दूर करने के लिए पारसनीस की नीति अपनाते हुए ही उन्होंने 1904 में सरस्वती के जनवरी और फरवरी अंक में पर क्रमश: दो लेख ‘झांसी की रानी लक्ष्मी बाई’ प्रकाशित किए।


द्विवेदी जी ने सरस्वती में लिखे गए अपने पहले लेख के साथ झांसी के किले और रानी के महल के दो चित्र भी लगाए। दूसरी किस्त के साथ झांसी के म्यूटिनी के स्मारक का चित्र और एक चित्र रानी के युद्ध का, जिसमें रानी एक हाथ में तलवार और दूसरे में भाला लिए अंग्रेजों पर वार करती हुई दिखाई गई हैं। चित्र के नीचे कैप्शन दिया गया कि ग्वालियर के एक पुराने चित्र से सरस्वती के लिए यह फोटोग्राफ उतारा गया है। इन लेखों को सुंदर ढंग से सजाकर छापने में द्विवेदी जी ने काफी परिश्रम भी किया।
उन्होंने पारसनीस की चार सौ पृष्ठ की पुस्तक के आधार पर लेखों में विद्रोही सिपाहियों को दुष्ट कहा। बच्चों की प्रचारित हत्या की निंदा की और झांसी की रानी की वीरता की प्रशंसा। द्विवेदी जी ने पारसनीस के प्रमाण संग्रह और इतिहास के अध्ययन की प्रशंसा करते हुए लेख की शुरूआत पारसनीस की पुस्तक के प्रभाव का महत्व स्वीकार करते हुए इस तरह की-‘इस पुस्तक को पढ़कर लक्ष्मीबाई का अतुल पराक्रम, उनका अतुल धैर्य और उनकी अतुल वीरता आंखों के सम्मुख आ जाती है। ऐसी वीर नारी इस देश में क्या और देशों में भी शायद ही हुई होगी।’ हालांकि, सर एडविन अर्नाल्ड ने लक्ष्मी बाई की उपमा फ्रांस की प्रसिद्ध बाला जोन आप आर्क से दी है। लक्ष्मीबाई को परास्त करने वाले सर ह्यूरोज ने भी रानी की वीरता की प्रशंसा की है। द्विवेदी जी लिखते हैं कि ऐसी पुस्तक लिख कर पारसनीस ने इस देश के साहित्य का बड़ा उपकार किया। वह पारसनीस की प्रशंसा करते हुए हिंदी पाठकों से सिफारिश करते हैं कि मराठी न आती हो तो इस एक ही पुस्तक को पढ़ने के लिए ही सही मराठी सीखें जरूर।
पारसनीस की किताब के हवाले से द्विवेदीजी ने झांसी की रानी की वीरता और संग्राम का बखान करते हुए झांसी की लड़ाई के बारे में लिखा-’23 मार्च 1818 को यह आरंभ हुआ झांसी को चारों ओर से अंग्रेजी सेना ने घेर लिया। 24 और 18 पौंडर्स नाम की तोपें शहर की दीवार पर चलने लगीं और दूसरी तोपों से बम के गोले शहर के भीतर फेंके जाने लगे। झांसी के चारों ओर जो दीवार है उसकी चौड़ाई कोई 16 फुट है। उस पर और किले के बुर्ज पर रानी साहब ने सब मिलाकर कोई 50 के ऊपर तोपें लगा दीं। उनमें से भवानी शंकर, कड़क बिजुली, घनगर्ज, नालदार आदि तोपे बड़ी ही भयंकर थीं। रानी साहब खुद युद्ध की देखभाल करने लगी और समय-समय पर अपने योद्धा और सेना नायकों को उत्साहित करने लगीं। उनके युद्ध कौशल का ही कमाल था कि अंग्रेजों ने झांसी की सेना की वीरता और युद्ध कौशल की प्रशंसा की। सर ह्यूरोज ने रानी की प्रशंसा करते हुए लिखा-‘स्त्रियां तक तोपखाने में काम करती थीं और गोला-बारूद लाने में सहायता देती थीं। अंग्रेज 11 दिन का झांसी का घेरा डाले रहे। विकट युद्ध हुआ तथापि रानी साहब के धैर्य और दृढ़ निश्चय के सामने दूसरे पक्ष की कुछ न चली।’
लेख के इस एक अंश से आपको उनके अंग्रेज हुकूमत के प्रति दृष्टिकोण का अंदाज करना आसान होगा–‘महाप्रबल और परम दयालु अंग्रेजी सरकार’ से शत्रुता करने का फल झांसी वालों को मिला। लड़ाई में जो सैनिक मारे गए, उनके अलावा अंग्रेजी फौज ने शहर में पहुंचकर प्रलय आरंभ कर दिया। एक और शहर में उसने आग लगा दी और दूसरी ओर से लड़के और स्त्रियों को छोड़कर बिजन बोल दिया। सात दिन तक लूटमार और फूंक-फांक होती रही। आठवें दिन प्रजा को अभय वचन दिया गया और जिनका कोई वारिस न था, ऐसे मृतकों के ढेर रास्ते में फूंक दिए गए। ये तमाम लोग जो मारे गए थे, निहत्थे थे और उन्होंने न तो किसी कत्लेआम में भाग लिया था न ले सकते थे।’
लेख में झांसी की रानी की वीरता का उल्लेख इस तरह है-‘उनके साथ उनकी दासी मुंदर भी एक घोड़े पर थी। उस पर एक गोरे ने प्राणहारक आघात किया। वह चिल्ला उठी। रानी साहब ने उसको मारने वाले के कंठ में एक निमिष मात्र अपनी तलवार रख दी। अंग्रेजी सेना के वीरों ने रानी साहब को कोई महाशूर सेनानायक समझकर चारों ओर से घेर लिया। इस पर भी वह जरा भयभीत नहीं हुईं। उनकी तलवार अपना काम बड़ी भी भीषणता से बराबर करती रही परंतु एक कोमल और अल्पवयस्क अबला अनेक वीरों के बीच कब तक सजीव रह सकती है? एक अंग्रेज योद्धा ने उनके सिर पर पीछे से तलवार का वार किया जिससे उनके सिर का दाहिना भाग छिल गया और एक आंख निकल आई। इस योद्धा ने रानी साहब की छाती पर किर्च का भी प्रहार किया परंतु धन्य रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, धन्य उनका धैर्य और धन्य उनका साहस! इस दशा को प्राप्त होकर भी उन्होंने इस वीर से पूरा बदला लिया। उसे तत्काल ही उन्होंने धरा तीर्थ को भेजकर अपना जीवन सार्थक किया!! धन्य वह शौर्य और धन्य वह पराक्रम!!!
घायल रानी ने सरदार रामचंद्रराव के साथ एक झोपड़ी में प्रवेश किया। 18 जून 1858 को ग्वालियर के पास समरांगण में भारतवर्ष का महा शौर्यशाली दिव्य स्त्री रत्न खो गया। रानी साहब के सेवक और सरदारों ने एक घास की गंजी से घास लाकर उसकी चिता बनाई और उसी पर रानी साहब की निर्जीव देह रखकर उसे अग्निदेवता के अर्पण कर दिया।’ मुगल शासकों को लोहे के चने चबवाने वाले महाराणा प्रताप ने भले घास की रोटियां खाईं थीं लेकिन यह किताब प्रामाणिक रूप से बताती है कि अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त करने वाली झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की देह घास की चिता पर ही पंचतत्व में विलीन हुई थी। इतिहास में रुचि रखने वाले लोग भले ही इस तथ्य को जानते हों लेकिन नई पीढ़ी इस इतिहास से शायद ही परिचित होंगे।
पारसनीस से प्रभावित आचार्य द्विवेदी लिखते हैं कि यह बहुत अच्छा क्रांतिकारी साहित्य है। वैसा साहित्य है, जिसे पढ़कर भारत के नौजवान अंग्रेजी अंग्रेजी राज्य से नफरत करना सीखते थे और जिन्हें संवैधानिक तरीकों पर या अहिंसात्मक तरीकों पर विश्वास नहीं था वे लक्ष्मीबाई की तरह हथियार को उठाकर अंग्रेजों से लड़ने का प्रयत्न करते थे। आचार्य द्विवेदी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के वास्तविक इतिहास को जानने- समझने के लिए हिंदी भाषी समाज को पारसनीस की मराठी पुस्तक पढ़ने का मंत्र दे रहे थे। वह भी भाषण या मौखिक नहीं बल्कि लेख में बाकायदा लिखकर। उस दौर में झांसी की रानी के वास्तविक इतिहास से हिंदी भाषी समाज को परिचित कराने के थोड़े से होने वाले प्रयासों में एक प्रयास आचार्य द्विवेदी का भी था। यह भारत के उन महान योद्धाओं के प्रति उनकी अपनी श्रद्धा का भी प्रमाण है। आइए! हम सब मिलकर शूरवीर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करें।

जय प्रथम स्वाधीनता संग्राम!!
जय झांसी की रानी लक्ष्मीबाई!!

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली

मातृभाषा प्रेमी पंडित माधव राव सप्रे

151वीं जयंती पर विशेष

मातृभाषा प्रेमी पंडित माधव राव सप्रे

हिंदी नवजागरण और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में बढ़चढ़ कर योगदान देने वाले पंडित माधव राव सप्रे का मातृभाषा प्रेम महात्मा गांधी और महावीर प्रसाद द्विवेदी से कतई कमतर नहीं था। गुलाम भारत में प्रभुत्व जमाती अंग्रेजी के खिलाफ मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर ‘म’ अक्षर वाले तीनों महारथी- महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे और महावीर प्रसाद द्विवेदी ही मोर्चा संभालने वाले लोगों में अग्रणी थे। यह तीनों ही महानुभाव राष्ट्रभाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के महत्व पर जोर देते हुए हिंदी नवजागरण और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को अपनी-अपनी तरह से गतिशील बना रहे थे।
1917 की ‘सरस्वती’ में माधव राव सप्रे का एक लेख छपा था-‘राष्ट्रीयता की हानि का कारण’। इस लेख में उन्होंने कहा-‘अंग्रेजी भाषा के अधिक प्रचार और देशी भाषाओं के अनादर से राष्ट्रीयता की जो हानि हो रही है, उसका पूरा पूरा वर्णन करना कठिन है। जब तक अंग्रेजी भाषा का अनावश्यक महत्व न घटाया जाएगा और जब तक शिक्षा का द्वार देशी भाषाओं को बनाकर वर्तमान शिक्षा पद्धति में उचित परिवर्तन न किया जाएगा, तब तक ऊपर लिखी गई बुराइयों से हमारा छुटकारा नहीं हो सकता।’
इसी एक में उनका कथन है-‘किसी समय रूस में उच्च वैज्ञानिक शिक्षा जर्मन और फ्रेंच भाषाओं के द्वारा दी जाती थी परंतु अब वहां यह बात नहीं है। सन् 1880 ईस्वी में एक प्रोफेसर ने रूसी भाषा में वैज्ञानिक शिक्षा देना आरंभ किया। दूसरे प्रोफेसरों ने भी उसका अनुकरण किया। फल यह हुआ कि अब रूसी भाषा बोलने वाले रूस के समस्त प्रांतों में वैज्ञानिक शिक्षा रूसी भाषा ही के द्वारा दी जा रही है।’ अपने उसी लेख में सप्रे जी यह भी लिखते हैं-‘जापान के विश्वविद्यालयों का भी यही हाल है। वहां कठिन से कठिन और गहन से गहन तत्वपूर्ण विषयों पर व्याख्यान जापानी भाषा में ही होते हैं। जापानी भाषा का साहित्य थोड़े समय पहले ऐसा था कि उसकी तुलना भारतीय देशी भाषाओं के साहित्य से करना उसको सम्मान देना कहा जा सकता है। ऐसी अवस्था में भारतवासी ही अपनी मातृभाषा में शिक्षा पाने से वंचित क्यों रहें?
अपने इस लेख में वह राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषा के सवाल को इस तरह भी रेखांकित करते हुए आलोचनात्मक जस्ट भ डालते हैं-‘संसार के अग्रगण्य वैज्ञानिकों में भारतवर्ष के सुप्रसिद्ध अध्यापक जगदीश चंद्र बसु भी हैं। वे अपने सभी आविष्कारों का वर्णन अंग्रेजी भाषा में करते हैं और ग्रंथ लेखन भी उसी भाषा में यदि वे बंगला भाषा का उपयोग करने लगे तो देशी भाषाओं में वैज्ञानिक ग्रंथों का आंशिक अभाव दूर हो सकता है।’ सप्रे जी केवल राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषाओं के महत्व पर ही जोर नहीं दे रहे थे। अपने समकालीन और अपनी से आगे की पीढ़ी के महत्वपूर्ण लोगों को यह आईना भी दिखा रहे थे कि मातृभाषा को महत्व देना देश की उन्नति, राष्ट्र की एकता, भारत और भारतीय भाषाओं को गुलामी की दास्तां से मुक्ति दिलाने का एकमात्र माध्यम मातृभाषा ही है।
महात्मा गांधी का मातृभाषा और राष्ट्रभाषा प्रेम जगजाहिर ही है। गांधीजी भारतीय भाषाओं के व्यवहार के प्रबल समर्थक थे। उन्हें हिंदी बोलने पर ही नहीं गुजराती का व्यवहार करने पर भी धक्के खाने पड़े थे। राष्ट्रभाषा और मातृभाषा को महात्मा गांधी देशोद्धार और देशोन्नति का प्रधान साधन समझते थे। दक्षिण अफ्रीका की जेल में बंद रहते समय महात्मा गांधी को अपनी पत्नी की बीमारी का तार मिलने का किस्सा सबको पता ही है। महात्मा गांधी यदि जुर्माना अदा कर देते तो उन्हें जेल से छुटकारा मिल जाता और वे अपने घर जाकर अपनी पत्नी की सेवा आदि कर सकते थे पर उन्होंने अपने सिद्धांत से समझौता नहीं किया। जेलर की आज्ञा प्राप्त करके अपनी पत्नी को उन्होंने गुजराती में एक पत्र लिखा। पत्र देखकर जेलर चौंक गया, क्योंकि वह उसे पढ़ न सका। जेलर ने उस पत्र को तो जाने दिया पर आज्ञा दी कि गांधीजी अपने अगले पत्र अंग्रेजी में ही लिखेंगे। गांधी जी ने उस जेलर से कहा-‘ मेरे हाथ के गुजराती पत्र इस बीमारी की दशा में मेरी पत्नी के लिए दवा का काम करेंगे। इस कारण आप मुझे गुजराती में ही लिखने की आज्ञा दीजिए’ पर जेलर नहीं माना और फल यह हुआ कि गांधी जी ने अंग्रेजी में लिखने से इंकार कर दिया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे दृढ़ प्रतिज्ञ और मातृभाषा भक्त महात्मा गांधी को इंदौर के आठवें हिंदी साहित्य सम्मेलन का सभापति बनाए जाने की भी प्रशंसा की थी।
महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती के माध्यम से मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के सवाल पर खुद तो लिख ही रहे थे और दूसरे लेखकों के लेख भी प्रमुखता से छपते हुए अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई को अपने ढंग और सरस्वती के मालिकों की रीति-नीति पर खरा उतरते हुए नई ताकत दे रहे थे। द्विवेदी जी ने बहुतसंख्यक जनता को शिक्षित करने की नीति अपनाई थी। उनका स्पष्ट मानना था कि विभिन्न प्रदेशों की जनता अपनी-अपनी मातृभाषाओं के माध्यम से ही शिक्षित हो सकती थी। द्विवेदी जी ने कहा कि शिक्षित होने का अर्थ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है। वे लगातार सवाल उठा रहे थे-‘अच्छा शिक्षा के मानी क्या? अंग्रेजी भाषा में धड़ल्ले के साथ बोलना और लिखना आ जाना ही क्या शिक्षा है? द्विवेदी जी ने लिखा था-’30 करोड़ भारतवासियों की ज्ञान वृद्धि क्या इन अंग्रेजी के मुट्ठी भर शुद्ध लेखकों से हो जाएगी?’ अंग्रेजी राज से निराश होकर उन्होंने लिखा-‘लक्षणों से तो यही मालूम होता है कि घर के धान भी पयाल में जाना चाहते हैं। इस दशा में जब तक हम लोग स्वयं ही अपने उद्योग से अपने स्कूल खोल कर अपने मन की शिक्षा न देंगे तब तक यथेष्ट उद्धार की आशा नहीं है।’
पंडित माधव राव सप्रे की आज 151वीं जयंती है। जयंती पर हम मराठी भाषी सप्रे जी के मातृभाषा और राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए दिए गए योगदान को याद रखने नई पीढ़ी को याद दिलाना महत्वपूर्ण है। उनके उठाए हुए कदम 100 साल पहले भी प्रासंगिक थे और आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक ही बने हुए हैं।

ऐसे माधव राव सप्रे जी को शत्-शत् नमन!!!

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

आचार्य द्विवेदी स्मृति अभियान के रजत जयंती समारोह में होगा देशभर के साहित्यकारों-पत्रकारों का जमावड़ा

आचार्य द्विवेदी स्मृति अभियान का 25वां वर्ष

रजत जयंती समारोह में होगा देशभर के साहित्यकारों-पत्रकारों का जमावड़ा

मुख्य आकर्षण
-दौलतपुर में महावीर चौरा पर सुंदरकांड पाठ से रजत जयंती समारोह की शुरुआत
-दो दिवसीय मुख्य वार्षिक समारोह 11-12 नवंबर को
-ऐतिहासिक दस्तावेजों और दुर्लभ फोटो वाली प्रदर्शनी का आयोजन
-रायबरेली शहर में आचार्य द्विवेदी स्मृति खेल महाकुंभ
-गीत-संगीत, नृत्य और नाटक के माध्यम से आचार्य द्विवेदी के जीवन वृत्त की प्रस्तुति
-“आचार्य पथ” स्मारिका/पत्रिका का विशेषांक

रायबरेली से शुरू हुआ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर गया है। अभियान की रजत जयंती धूमधाम से मनाई जाएगी। रजत जयंती वर्ष को यादगार बनाने की तैयारियां अभी से शुरू हो गई हैं। 11-12 नवंबर 2022 को आयोजित होने वाले रजत जयंती समारोह में देशभर के साहित्यकारों पत्रकारों को आमंत्रित किया जाएगा। लखनऊ और दिल्ली में भी कार्यक्रम आयोजित करने का संकल्प लिया गया। आचार्य पथ स्मारिका का विशेषांक भी निकालने की तैयारी है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की रायबरेली के आशीर्वाद इन होटल में आयोजित बैठक में तय किया गया कि रजत जयंती वर्ष में आचार्य द्विवेदी की स्मृतियों को नए रूप में संजोया जाएगा। वर्ष पर्यंत कार्यक्रमों की श्रंखला चलेगी। इसकी शुरुआत आचार्य द्विवेदी के जन्म ग्राम दौलतपुर में सुंदरकांड के पाठ के साथ होगी। आचार्य द्विवेदी स्मृति खेल महाकुंभ के साथ ही जनपद के साहित्यिक स्वाधीनता संग्राम इतिहास को समेटने वाली प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी। 12 नवंबर को वार्षिक आयोजन भी इस बार दो दिवसीय होगा। इसमें देशभर के पत्रकार-साहित्यकार शामिल होंगे। आचार्य द्विवेदी के जीवन वृत्त को गीत-संगीत, नाटक और नृत्य के माध्यम से भी प्रस्तुत करने की तैयारी की जा रही है।


अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने बताया कि स्मृति संरक्षण अभियान 9 मई 1998 को समाज और सरकार को जगाने के लिए ध्यानाकर्षण धरने के माध्यम से प्रारंभ हुआ था। यह स्मृति अभियान 9 मई से रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर गया है। 25 वर्ष के सफर में कई सोपान तय किए गए। शहर से लेकर गांव तक तीन स्मृति द्वार बनाए गए। कई सरकारी और निजी संस्थाओं में सभागार आचार्य द्विवेदी के नाम पर रखे गए।
उन्होंने बताया कि आचार्य द्विवेदी की स्मृतियां सात समंदर पार अमेरिका तक पहुंच गई। अमेरिका इकाई की कमान श्रीमती मंजु मिश्रा एवं सदस्य श्रीमती रचना श्रीवास्तव, श्रीमती शुभ्रा ओझा, कुसुम नैपसिक, डॉक्टर ममता त्रिपाठी संभाले हुए हैं। अमेरिका इकाई साल में आचार्य द्विवेदी की स्मृति और हिंदी के प्रचार- प्रसार के लिए ऑनलाइन चार कार्यक्रम आयोजित कर रही है। इनमें बच्चों की प्रतियोगिताएं भी शामिल हैं।

कार्यक्रमों के लिए अलग-अलग प्रभारियों की नियुक्ति-
महामंत्री अनिल मिश्र ने बताया कि कार्यक्रमों के लिए अलग-अलग प्रभारियों की नियुक्ति की गई है। खेल प्रतियोगिताओं के लिए मुन्ना लाल साहू, स्मिता दुबे, अनुपमा रावत और हिमांशु तिवारी को प्रभारी बनाया गया है। नाटक-नृत्य आदि के लिए अमित सिंह, रवि प्रताप सिंह और क्षमता मिश्रा को जिम्मेदारी दी गई है। प्रदर्शनी का प्रभार अभिषेक द्विवेदी, नीलेश मिश्रा और अरुण पांडे को सौंपा गया है।
बैठक के अंत में डॉ सुशील चंद्र मिश्र ने सभी को रजत जयंती वर्ष की शुभकामनाएं दीं। बैठक में राजीव भार्गव, दिनेश शुक्ला, सुधीर द्विवेदी, स्वतंत्र पांडे, राजेश वर्मा, श्रीमती रजनी सक्सेना, रामेंद्र मिश्रा, अमर द्विवेदी, दीपक तिवारी, लंबू बाजपेई, शशिकांत अवस्थी, घनश्याम मिश्रा, राकेश मोहन मिश्रा, राजेश द्विवेदी, कृष्ण मनोहर मिश्रा, अभिषेक मिश्रा, रोहित मिश्रा, यशी अवस्थी, शिखर अवस्थी, हर्षित द्विवेदी आदि मौजूद रहे।

आचार्य द्विवेदी के नाम पर चौराहे का सुंदरीकरण करने का सुझाव

रजत जयंती वर्ष की तैयारियों के सिलसिले में आयोजित बैठक में कई सुझाव भी आए। समिति के सदस्य राजेश वर्मा ने सुझाव दिया कि आचार्य द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान के रजत जयंती वर्ष को यादगार बनाने के लिए शहर के एक चौराहे को विकसित किया जाए। सदस्य चंद्रमणि बाजपेई ने छात्र-छात्राओं के लिए पुस्तकालय- वाचनालय स्थापित किए जाने पर जोर दिया।

आचार्य द्विवेदी के साहित्य का डिजिटलाइजेशन भी होगा

रजत जयंती वर्ष मनाने की तैयारियों से संबंधित बैठक में आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिका इकाई की अध्यक्ष श्रीमती मंजु मिश्रा भी ऑनलाइन शामिल हुईं। उन्होंने आचार्य द्विवेदी के साहित्य समेत अन्य विषयों पर लिखी गई पुस्तकों को डिजिटल फॉर्म पर उपलब्ध कराने का सुझाव दिया। अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने आश्वस्त किया कि इस दिशा में भी काम तेज किया जाएगा।

…अब कुतुब मीनार की खुदाई की तैयारी

नई दिल्ली (एजेंसी)। कुतुब मीनार को लेकर छिड़े विवाद के बीच ऐतिहासिक परिसर में खुदाई की जाएगी। संस्कृति मंत्रालय ने निर्देश दिए हैं कि कुतुब मीनार में मूर्तियों की Iconography कराई जाए। एक रिपोर्ट के आधार पर कुतुब मीनार परिसर में खुदाई का काम किया जाएगा। इसके बाद ASI संस्कृति मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।

संस्कृति सचिव ने अधिकारियों के साथ निरीक्षण करने के बाद यह फैसला लिया है। लिहाजा कुतुब मीनार के साउथ में और मस्जिद से 15 मीटर दूरी पर खुदाई का काम शुरू किया जा सकता है। बता दें कि कुतुब मीनार ही नहीं, अनंगताल और लालकोट किले पर भी खुदाई का काम किया जाएगा।

कुतुब मीनार परिसर में खुदाई के निर्णय से पहले संस्कृति सचिव गोविंद मोहन ने 12 लोगों की टीम के साथ निरीक्षण किया। इस टीम में 3 इतिहासकार, ASI के 4 अधिकारी और रिसर्चर मौजूद थे। इस मामले में ASI के अधिकारियों का कहना है कि कुतुबमीनार में 1991 के बाद से खुदाई का काम नहीं हुआ है।

ASI के अधिकारियों का कहना है कि कुतुब मीनार में 1991 के बाद से खुदाई का काम नहीं हुआ है। इसके अलावा कई रिसर्च भी पेंडिंग हैं, जिसकी वजह से ये फैसला लिया गया है।

विष्णु स्तम्भ नाम देने की मांग- कुतुब मीनार का नाम बदलने की मांग भी हाल ही में की गई थी। इसके बाद वहां हिंदू संगठनों के कुछ कार्यकर्ताओं ने हनुमान चालीसा का पाठ किया था। हिंदू संगठनों ने कुतुब मीनार का नाम बदलकर विष्णु स्तम्भ करने की मांग की थी। हिंदू संगठन के एक कार्यकर्ता ने कहा था कि मुगलों ने हमसे इसे छीना था। इसे लेकर हम अपनी मांगों को रख रहे हैं। हमारी मांग है कि कुतुब मीनार का नाम बदलकर विष्णु स्तम्भ किया जाए।

जारी रहेगा ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे

नई दिल्ली (एजेंसी)। वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे जारी रहेगा। सर्वे पर तत्काल रोक लगाने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका के जरिए इस सर्वे पर रोक लगाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पेपर देखने के बाद ही कुछ बताएंगे। हालांकि इस संबंध में अर्जी पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जाहिर करते हुए कहा कि इस पर सुनवाई बाद में की जाएगी।

बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई अगले हफ्ते कर सकता है। वाराणसी के लोकल कोर्ट ने कमिश्नर को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के सर्वे का आदेश दिया है। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की ओर से दायर अर्जी को लेकर चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि इस मामले में हमे कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में हम तत्काल कोई आदेश कैसे जारी कर सकते हैं? हम इस मामले की लिस्टिंग कर सकते हैं। चीफ जस्टिस ने कहा कि इस मामले से जुड़ी फाइलों को हमने पढ़ा नहीं है। उनके अध्ययन के बाद ही कोई आदेश जारी किया जा सकता है।

रजत जयंती वर्ष: हम हैं राही स्मृति अभियान के

रजत जयंती वर्ष: हम हैं राही स्मृति अभियान के

यही तारीख थी नौ मई। साल 1998। अपने ही गांव-घर, जनपद, प्रदेश और देश में भुला-बिसरा दिए गए हिंदी के प्रथम आचार्य हम सबको एक भाषा, एक बोली-बानी और नवीन व्याकरण देने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृतियों को संजोने से जुड़ा अभियान शुरू हुआ। शुरुआत 42 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी के बीच रायबरेली शहर के शहीद चौक से ध्यानाकर्षण धरने के माध्यम से हुई। यह एक शुरुआत भर थी। कोई खाका नहीं। कोई आका नहीं। कुल जमा 40-50 और पवित्र संकल्प इस अभियान की नींव में थे। प्रकृति या यूं कहें खुद आचार्य जी ने शहीद चौक पर जुटे अनुयायियों की परीक्षा ली। टेंट के नीचे बैठे लोग अपने इस पूर्वज और हिंदी के पुरोधा की यादों को जीवंत बनाने का संकल्प ले ही रहे थे कि तेज अंधड़ से 18×36 का टेंट उड़ गया। लोग बाल बाल बचे लेकिन कोई डिगा न हटा। ध्यानाकर्षण धरना अपने तय समय पर ही खत्म हुआ।

पहली परीक्षा में पास होने के बाद चल पड़ा स्मृति संरक्षण अभियान आप सब के सहयोग-स्नेह और संरक्षण से कई पड़ाव पार करते हुए आज यहां तक पहुंचा है। अभियान का यह 25वां वर्ष प्रारंभ हुआ है। किसी भी परंपरा के 25 वर्ष कम नहीं होते। इस दरमियान कुछ बदला, कुछ छूटा और बहुत कुछ नया शामिल भी हुआ। इस टूटे-फूटे ही सही अभियान के भवन में न जाने कितने लोगों का पैसा, पसीना और प्यारभाव ईंट-गारे के रूप में लगा है। सबके नाम गिनाने बैठे तो कागज नामों से ही भर जाए। मन की बहुत बातें मन में ही रखनी पड़ जाएं। इसलिए बात केवल उन पड़ावों की जो यादों में अंकित-टंकित हो चुकी हैं।
    अभियान का शुरुआती मुख्य मकसद साहित्यधाम दौलतपुर को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में घोषित कराने से जुड़ा था। इसके प्रयास भी दिल्ली से लेकर लखनऊ तक हुए। खूब हुए लेकिन हिंदी के पुरोधा का जन्मस्थान राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन पाया तो नहीं बन पाया। अब इसके लिए हम खुद को गुनाहगार ठहराएं या शासन सत्ता को? राष्ट्रीय स्मारक तो छोड़िए जन्मस्थान पर एक ऐसा स्थान तक नहीं बन पाया जहां बैठकर आज  हिंदी भाषा और अपने पुरोधाओं से प्रेम करने वाली पीढ़ी प्रेम से बैठ ही सके। बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, इसलिए जरूरी है दूसरी तरफ चला जाए। अभियान से जुड़ी कुछ ऐसी तारीखें हैं, जो तवारीख बन गई।
   भला हो, कांग्रेस के सांसद रहे कैप्टन सतीश शर्मा का, जिन्होंने अभियान से प्रभावित होकर अपनी सांसद निधि से पुस्तकालय-वाचनालय का भवन जन्म स्थान के सामने आचार्य जी के सहन की भूमि पर ही निर्मित कराया। भला हिंदी के उन पुरोधा डॉ नामवर सिंह का भी हो जिन्होंने उस पुस्तकालय-वाचनालय भवन का लोकार्पण किया। यह अलग बात है कि तमाम मुश्किलों की वजह से पुस्तकालय वाचनालय संचालित नहीं हो पाया।
     साल वर्ष 2004 में एक नई शुरुआत आचार्य स्मृति दिवस के बहाने हुई। देश के शीर्षस्थ कवियों में शुमार रहे बालकवि बैरागी के एकल काव्य पाठ से शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है। वर्ष-प्रतिवर्ष यह परंपरा नई होती गई। निखरती गई। आज ‘आचार्य स्मृति दिवस’ अभियान का मुख्य केंद्र है। इस दिवस के बहाने देश भर के न जाने कितने स्नावनामधन्य साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और खिलाड़ियों को सुनने-गुनने, देखने-समझने के अवसर हम सबको मिल चुके हैं।
   

अभियान का एक असल पड़ाव तो ‘आचार्य पथ’ स्मारिका-पत्रिका भी है। प्रधान संपादक साहित्यकार -गीतकार आनंद स्वरूप श्रीवास्तव के कुशल संपादन में निरंतर 11 वर्षों से प्रकाशित हो रही इस स्मारिका ने आचार्य द्विवेदी की स्मृतियों को जीवंत बनाने में कम योगदान नहीं दिया है। देशभर के साहित्यकार आचार्य द्विवेदी पर केंद्रित लेख लिखते हैं। छपते हैं। प्रधान संपादक ने स्मारिका को ‘सरस्वती’ की तरह ही विविध ज्ञान की पत्रिका बनाने का उपक्रम भी लगातार किया है और कर रहे हैं।
    अभियान वर्ष 2015 कि वह तारीख भी नहीं भूल सकता जब ‘द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ’‌ का पुन: प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट-नई दिल्ली ने किया। इस काम में अभियान की भूमिका दुर्लभ ग्रंथों को उपलब्ध कराने भर की ही थी पर यह भूमिका भी कम नहीं थी। अभियान अपने अग्रज-बुजुर्ग रमाशंकर अग्निहोत्री को हमेशा याद करता है और रहेगा, जिन्होंने यह दुर्लभ ग्रंथ अभियान से जुड़ी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति को खुशी-खुशी सौंपा और नेशनल बुक ट्रस्ट के सहायक संपादक हिंदी पंकज चतुर्वेदी के योगदान को भी हम नहीं भूल सकते। ग्रंथ का पुनः प्रकाशन उन्हीं की बदौलत हुआ।
    हम नहीं भूल सकते राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट रायबरेली) के निदेशक डॉ. भारत साह के उस योगदान को जो एक ऐसी किताब के रूप में दर्ज है, जिसका ऐतिहासिक महत्त्व है। इस किताब का नाम है विज्ञान वार्ता। आचार्य द्विवेदी द्वारा सरस्वती के संपादन के दौरान लिखे गए तकनीक, विज्ञान और नई नई खोजों से संबंधित लेखों को मुंशी प्रेमचंद ने अपने संपादन में संग्रहित कर वर्ष1930 में विज्ञान वार्ता नाम से पुस्तक प्रकाशित की थी। इस दुर्लभ पुस्तक को भी समिति ने निफ्ट रायबरेली के निदेशक को उपलब्ध और उन्होंने पुनः प्रकाशित कराया।
    तारीख तो नहीं भूलने वाली है,10 जनवरी 2021भी। ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग प्रेरक सम्मान’ से सम्मानित प्रवासी भारतीय और कैलिफोर्निया अमेरिका में हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान देने वाली हिंदीसेवी श्रीमती मंजू मिश्रा ने आचार्य जी की स्मृतियों को सात समंदर पार जीवंत बनाने और इस बहाने प्रवासी भारतीयों की नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़े रखने का बीड़ा अपनी प्रवासी साथी श्रीमती ममता कांडपाल त्रिपाठी, श्रीमती रचना श्रीवास्तव, श्रीमती शुभ्रा ओझा और श्रीमती कुसुम नैपसिक से प्राप्त नैतिक-भौतिक-साहित्यिक-सामाजिक सहयोग के बल पर इसी दिन उठाया था। आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिकी इकाई की शुरुआत इसी दिन हुई। एक छोटे से शहर की छोटी सी शुरुआत के दुनिया के सबसे संपन्न देश अमेरिका तक पहुंचना हम जैसे अकंचिनों के लिए स्वप्न सरीखा है। समिति शुक्रगुजार है अमेरिका इकाई की सभी सदस्यों की।
     हमें याद है, 21 दिसंबर 1998 को रायबरेली शहर के राही ब्लाक परिसर में तत्कालीन खंड विकास अधिकारी श्री विनोद सिंह और (अब दिवंगत) की अगुवाई में स्थापित की गई आचार्य श्री की आवक्ष प्रतिमा के अनावरण समारोह में पधारे अनेक साहित्यकार अपने संबोधन में महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम गिना रहे थे लेकिन अनवरत 25 वर्षों के प्रयासों से अब लोगों के दिल-दिमाग में महावीर प्रसाद द्विवेदी पुनर्जीवित हो चुके हैं।
     एक साहित्यकार-संपादक की स्मृतियों को भूलने बिसराने वाले समाज के मन में पुनः स्थापित करने का काम बिना समाज के सहयोग के संभव कहां था? इस मामले में आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति समाज के सभी वर्गों-धर्मो-जातियों के लोगों की हमेशा ऋणी थी, है और रहेगी। आचार्य द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान समाज के सहयोग से आज अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर चुका है। आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति अभियान को सहयोग देने वाले ऐसे सभी गणमान्य, सामान्य और कार्यक्रमों की शोभा बढ़ाने वाले श्रोताओं-दर्शकों के प्रति हृदय से कृतज्ञता ज्ञापित करती है और आशा भी करती है कि अभियान की स्वर्ण जयंती पूर्ण कराने में भी आपका पूर्ण सहयोग-स्नेह-संरक्षण बना रहेगा।

गौरव अवस्थी
रायबरेली

9 मई ही है आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की वास्तविक जन्मतिथि

महापुरुषों की जन्मतिथि को लेकर अक्सर मत-विमत और मतभेद होते आए हैं। ऐसा ही एक मतभेद हिंदी के युग प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर भी हिंदी पट्टी में अरसे से चला आ रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि आचार्य द्विवेदी की जन्म तिथि 6 मई है। कुछ विद्वान 5 मई या 15 मई को भी उनकी जन्मतिथि के रूप में मान्यता देते हैं। हालांकि अधिकतर विद्वान 9 मई को ही प्रामाणिक जन्मतिथि मानते-जानते हैं। यह अलग बात है कि आज के इंटरनेटिया ज्ञानी ‘गूगल बाबा’ और ‘विकीपीडिया’ ‘कुछ’ विद्वानों की मान्यता को बल देते हुए आचार्य द्विवेदी की जन्मतिथि 15 मई देश और दुनिया को बताते चले जा रहे हैं। वैसे भी, माना जाता है कि इन इंटरनेटिया ज्ञानियों को वास्तविक और प्रामाणिक तिथि से कोई लेना-देना नहीं होता। जिसने जो बता दिया वह हमेशा के लिए फीड कर दिया। हालांकि, बिना छानबीन और पुख्ता आधार के गलत जानकारी पाठकों तक पहुंचाना अक्षम्य अपराध है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर उठे विवाद के मूल में भारतीय पंचांग के अनुसार उनकी जन्मतिथि का हर जगह लिखा होना है। भारतीय पंचांग के अनुसार, आचार्य द्विवेदी का जन्म वैशाख शुक्ल चतुर्थी संवत 1921 को हुआ था। तिथि का उल्लेख स्वयं आचार्य द्विवेदी ने भी किया है। भारतीय पंचांग के अनुसार की तिथि को अंग्रेजी कैलेंडर से परिवर्तित करने को लेकर ही जन्मतिथि को लेकर भ्रम पैदा हुआ।
जन्मतिथि के विवाद के आधार के रूप में आचार्य द्विवेदी का 13 मई 1932 को प्रयागराज से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘भारत’ में प्रकाशित आचार्य द्विवेदी का वह पत्र ही उपयोग किया जाता रहा है। यह पत्र आचार्य द्विवेदी ने “भारत” के संपादक पंडित ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ को लिखा था। दरअसल, 1932 में काशी से नए निकलने वाले पाक्षिक ‘जागरण’ के प्रस्ताव पर आचार्य द्विवेदी की 68 वीं वर्षगांठ देश के कई नगरों में धूमधाम से मनाई गई थी। इस संबंध में ‘कृतज्ञता ज्ञापन’ के लिए आचार्य द्विवेदी ने स्वयं एक पत्र भारत के संपादक पंडित ज्योति प्रकाश मिश्र ‘निर्मल’ को लिखा। कहा जाता है कि इस पत्र को प्रकाशित करते समय मुद्रण की गलती से 9 मई की जगह 6 मई प्रकाशित हो गया। या बाद के वर्षों में आचार्य द्विवेदी का वह पत्र प्रकाशित करने में दूसरे पत्र या पत्रिकाओं में मुद्रण की गलती से 9 मई की जगह 6 मई टाइप हो गया। यह गलती ही आचार्य द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर भ्रम पैदा करने में सहायक सिद्ध हुई।
कुछ विद्वान मानते हैं कि अपने समय की महत्वपूर्ण मासिक पत्रिका सरस्वती का संपादन करते हुए 10 करोड़ हिंदी भाषा-भाषियों का साहित्यिक अनुशासन करने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर हिंदी वालों में कई मतभेद और भ्रम जानबूझकर पैदा किए गए हैं। अपने समय के कुछ विद्वानों ने अपनी बात को मनवाने के लिए ही अपनी- अपनी अंग्रेजी तिथियों पर जोर देना शुरू किया। विद्वानों की इसी अखाड़ेबाजी से हिंदी भाषा भाषी समाज में आचार्य द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर भ्रम बढ़ता गया और इसे दूर करने की कोशिशें न के बराबर ही हुईं। आचार्य द्विवेदी के बाद सरस्वती का संपादन का भार संभालने वाले पंडित देवी दत्त शुक्ल के पौत्र और प्रयागराज निवासी पंडित वृतशील शर्मा भी 9 मई को ही मान्यता देते हैं। आचार्य द्विवेदी की जन्म तिथि को लेकर उठे विवाद से वह अपने को आज तक आहत महसूस करते हैं। उनका कहना है कि आचार्य जी की जन्म तिथि से जुड़ा यह विवाद निर्मूल और अकारण है।
वर्तमान में हिंदी समालोचना के सशक्त हस्ताक्षर एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष आचार्य डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित 9 मई को ही आचार्य द्विवेदी की वास्तविक और प्रामाणिक जन्मतिथि मानते हैं। इस लेखक से उन्होंने स्वयं यह बात अधिकार पूर्वक कहीं की सब लोग 9 मई को जन्मतिथि मानने की बात पर सहमत हैं। वह कहते हैं कि आचार्य द्विवेदी की जन्म तिथि से जुड़े विवाद के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए उन्होंने स्वयं कई किताबों का अध्ययन किया और पाया कि 9 मई ही आचार्य द्विवेदी की प्रामाणिक जन्मतिथि है क्योंकि अपने कृतज्ञता ज्ञापन में भी उन्होंने 9 मई का ही उल्लेख किया है।
आचार्य द्विवेदी पर शोधपरक पुस्तक ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी’ लिखने वाले रायबरेली के साहित्यकार केशव प्रसाद बाजपेई की मान्यता भी 9 मई पर ही केंद्रित है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति द्वारा पिछले 11 वर्षों से प्रकाशित की जा रही स्मारिका ‘आचार्य पथ-2021’ के अंक में प्रकाशित अपने लेख में श्री बाजपेई कहते हैं कि जन्मतिथि के विवाद के निराकरण के लिए सबसे उपयुक्त उपाय संवत 1921 के पंचांग को देखने से जुड़ा था। इस विषय में खोजबीन करने पर पता चला है कि सन 1864 में 10 मई को हिंदू पंचांग के अनुसार संवत 1921 के वैशाख मास की पंचमी तिथि थी और दिन मंगलवार था। इस दिन आदि गुरु शंकराचार्य जी की जयंती पड़ी थी। उसके अनुसार वैशाख शुक्ल चतुर्थी दिन सोमवार 9 मई 1864 को पड़ता है।
वह अपने इस लेख में लिखते हैं- ‘इस विवेचना में अंग्रेजी की तिथि 6 मई असंगत है तथा 9 मई ही संगत है। 6 मई या तो मुद्रण की भूल से पत्र में अंकित हुई है या आचार्य जी का ध्यान ही कभी इस ओर नहीं गया कि पंचांग से इसकी संगति नहीं बैठती मेरी समझ में मुद्रण की त्रुटि से ही यह भ्रम पैदा हुआ है इनसे इतर तिथियां विचारणीय ही नहीं है। अतः यह निर्णय हुआ कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की वास्तविक जन्मतिथि अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 9 मई 1864 है, जो हिंदू पंचांग के संवत 1921 बैशाख शुक्ल चतुर्थी दिन सोमवार से पूरी तरह मेल खाती है। एक दिन गणितीय विधि के अनुसार 9 मई 1864 को सोमवार का दिन आता है और आचार्य जी का जन्मदिन सोमवार ही है। अतः इस से भी उनकी जन्मतिथि 9 मई 1864 होनी ही पुष्टि होती है।’

इन प्रमाणों के आधार पर हिंदी भाषा भाषी समाज को खड़ी बोली हिंदी का उपहार देने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्म तिथि को लेकर जानबूझ कर पैदा किए गए विवाद से बचते हुए 9 मई को ही जन्मतिथि की मान्यता देकर अपने इस महापुरुष के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए।
हालांकि, महापुरुष के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए खास तिथि का कोई महत्व नहीं है। वर्ष पर्यंत हम उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते रह सकते हैं, लेकिन दिन विशेष की बात आने पर हमें अपने इस पूर्वज को 9 मई (जन्मतिथि) और 21 दिसंबर 1938 (निर्वाण तिथि) को ही याद रखना होगा।

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति निबंध प्रतियोगिता 22 को

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति निबंध प्रतियोगिता 22 को

रायबरेली। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृति में भारत और अमेरिका के बच्चों की निबंध प्रतियोगिता आयोजित की गई है। प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा 22 मई को ऑनलाइन कार्यक्रम में की जाएगी।


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिका इकाई की अध्यक्ष श्रीमती मंजू मिश्रा ने बताया कि आचार्य द्विवेदी की जयंती 9 मई के उपलक्ष में 18 वर्ष के बच्चों की यह प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। छात्र छात्राओं के लिए निबंध के तीन विषय निर्धारित किए गए हैं।
निर्धारित किए गए तीन विषयों-
1-आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के लेखन की वर्तमान युग में प्रासंगिकता,
2-हिंदी को युवा वर्ग में लोकप्रिय कैसे बनाया जाए
3-हिन्दी की विदेशों में गूंज; पर ही निबंध स्वीकार किया जाएगा। उन्होंने बताया कि निबंध भेजने की अंतिम तारीख 15 मई है। अंतिम तिथि के बाद कोई भी निबंध स्वीकार नहीं किया जाएगा। निबंध प्रतियोगिता में भाग लेने वाले छात्र छात्राएं अपने निबंध गूगल फॉर्म भरते समय ही भेज सकेंगे।
समिति की  भारत इकाई के अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने बताया कि पुरस्कार समारोह को भारत और अमेरिका के हिंदी के विद्वान संबोधित करेंगे। विजेता बच्चों को भी अपने निबंध पढ़ने का अवसर प्रदान किया जाएगा। 

गुरु तेग बहादुर जी के त्याग व बलिदान को नमन

गुरु तेग बहादुर अपने त्याग और बलिदान के लिए वह सही अर्थों में ‘हिन्द की चादर’ कहलाए। अपने धर्म, मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए विश्व इतिहास में जिन लोगों ने प्राणों की आहुति दी, उनमें गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अग्रिम पंक्ति में हैं।  

बिजनौर। श्री गुरु गोविंद सिंह खालसा विद्यालय खासपुरा ऊमरी में हिंद की चादर गुरु तेग बहादर जी का 400वां  प्रकाश पर्व गुरबाणी पाठ उपरांत अरदास के द्वारा मनाया गया।

इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य सरदार अभिषेक सिंह कोमल ने गुरु जी के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने देश धर्म की रक्षा के लिए उनके बलिदान को नमन करते हुए अपना प्रेरणास्रोत बताया।

विदित हो कि देश भर में सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। गुरु तेग बहादुर सिंह एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे और उनका जन्म वैसाख कृष्ण पंचमी को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गुरु साहिब के इतिहास और शहादत के बारे में बताया जाता है।

गुरुद्वारा शीशगंज साहिब के अंदर का दृश्य (फाइल फोटो)

श्री गुरु तेग बहादुर जी
अमृतसर में जन्मे गुरु तेग बहादुर; गुरु हरगोविन्द जी के पांचवें पुत्र थे। 8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी के निधन के बाद इन्हें 9वां गुरु बनाया गया था। इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे। वे बचपन से ही बहादुर, निर्भीक स्वभाव के और आध्यात्मिक रुचि वाले थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया।

उन्होंने मुगल शासक औरंगजेब की तमाम कोशिशों के बावजूद इस्लाम धारण नहीं किया और तमाम जुल्मों का पूरी दृढ़ता से सामना किया। औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम कबूल करने को कहा तो गुरु साहब ने कहा शीश कटा सकते हैं केश नहीं। औरंगजेब ने गुरुजी पर अनेक अत्याचार किए, परंतु वे अविचलित रहे। वह लगातार हिन्दुओं, सिखों, कश्मीरी पंडितों और गैर मुस्लिमों का इस्लाम में जबरन धर्मांतरण का विरोध कर रहे थे, जिससे औरंगजेब खासा नाराज था। 

आठ दिनों की यातना के बाद गुरुजी को दिल्ली के चांदनी चौक में शीश काटकर शहीद कर दिया गया। उनके शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा बनाया गया, जिसे गुरुद्वारा शीशगंज साहब नाम से जाना जाता है। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। उनकी शहादत ने मानवाधिकारों की सुरक्षा को सिख पहचान बनाने में मदद की”।”नौवें गुरु को बलपूर्वक धर्मान्तरित करने के प्रयास ने स्पष्ट रूप से शहीद के नौ वर्षीय बेटे, गोबिन्द पर एक अमिट छाप डाली, जिन्होंने धीरे-धीरे सिख समूहों को इकट्ठा करके इसका प्रतिकार किया और खालसा पहचान को जन्म दिया।”

प्रख्यात ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार के नाम से जाना जाएगा बिजनौर पुस्तकालय एवं सांस्कृतिक केंद्र

मंडलायुक्त ने किया पुस्तकालय, सांस्कृतिक केंद्र में नवनिर्मित लाइब्रेरी कक्ष, पुराने लाइब्रेरी कक्ष का जीर्णोद्धार

बिजनौर। अब बिजनौर पुस्तकालय एवं सांस्कृतिक केंद्र को देश के मशहूर कवि हिंदी के पहले गजलकार दुष्यंत कुमार के नाम से जाना जाएगा। मंडलायुक्त ने नवनिर्मित लाइब्रेरी कक्ष, पुराने लाइब्रेरी कक्ष का जीर्णोद्धार किया। काफी समय से जिले के लोग दुष्यंत कुमार के नाम पर पुस्तकालय की मांग कर रहे थे।

मुरादाबाद के मंडलायुक्त आन्जनेय कुमार सिंह ने सीतापुर नेत्र चिकित्सालय परिसर स्थित गजलकार दुष्यंत कुमार पुस्तकालय एवं सांस्कृतिक केंद्र का लोकार्पण किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इंटरनेट के दौर में भी किताबों की अहमियत बरकरार है। उन्होंने कहा, बिजनौर की धरती पौराणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, एतिहासिक रूप से बहुत मूल्यवान है। यह केंद्र इस विरासत को संवारने में उपयोगी सिद्ध होगा। डीएम को निर्देशित किया कि वह इस पुस्तकालय को साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र के रूप में विकसित करें, ताकि बिजनौर शहर और आसपास क्षेत्रों के युवा लाभान्वित हो सकें। उन्होंने डीएम उमेश मिश्रा एवं एसडीएम सदर विक्रमादित्य मलिक के प्रयासों की सराहना की। डीएम ने कहा कि इस पुस्तकालय का निर्माण अकौर विकास जनसहयोग से हुआ है। इसके निर्माण का उद्देश्य स्थानीय युवाओं की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना है। एसडीएम सदर विक्रमादित्य मलिक ने कहा कि कई स्थानों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रयास जारी है। जनपद की साहित्यिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, एतिहासिक और प्राचीन ध रोहरों को सहेजने, लिपिबद्ध करने और उनके लिए संग्रहालय बनाने का काम भी चल रहा है। सीडीओ केपी सिंह, तहसीलदार सदर प्रीति सिंह, सूर्यमणि रघुवंशी, अनिल चौधरी, नवीन किशोर, खान जफर सुल्तान, डा. राहुल बिश्नोई, तौसिफ अहमद, शकील बिजनौरी आदि मौजूद रहे।

गौरतलब है कि बिजनौर जिले के राजपुर नवादा गांव के रहने वाले देश के मशहूर कवि, हिंदी के पहले गजलकार दुष्यंत कुमार के नाम पर बिजनौर पुस्तकालय का नाम रखा गया है। बहुत दिनों से जिले के लोग मांग कर रहे थे कि दुष्यंत कुमार के नाम पर पुस्तकालय होना चाहिए।

खुदा के यहां इन चार लोगों की नहीं होगी बख़्शीश: मुफ्ती रियाज क़ासमी


बिजनौर। अफजलगढ़ नगर में बस स्टैंड पर स्थित अबु बकर मस्जिद में शब ए बराअत की रात में मुफ्ती रियाज क़ासमी ने नमाजियों को उन चार लोगों के बारे में बताया, जिनकी शब ए बराअत को खुदा के यहां बख़्शीश नहीं होगी।

शुक्रवार को शब ए बराअत के मौके पर इशा की नमाज पढ़ने के बाद मुफ्ती रियाज साहब क़ासमी ने बयान करते हुए लोगों से कहा कि इस रात में उन चार लोगों की खुदा के यहां बख़्शीश नहीं होगी जो शराब पीकर लोगों सहित अपने परिवार के साथ मारपीट करते हुए और शराब पीने के आदी बन चुके हैं और जो लोग एक दूसरे की बुराई करने से बाज नहीं आते है और एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हो और जो लोग अपने मां बाप की इज्जत नहीं करते है और अपने मां बाप की ना फरमानी कर उनकी बातों को नहीं सुनते हैं और आखिरी उन लोगों की जो रिश्तेदारों में लड़ाई कराकर दूरी बनाने की कोशिश करते हैं उन लोगों की खुदा के यहां शब ए बराअत की रात में बख़्शीश नहीं होगी। इस मौके पर उन्होंने मुस्लिम समाज के लोगों से कहा कि अपने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दो लेकिन दीनी तालीम पहले हासिल करानी चाहिए क्योंकि जब बच्चा अच्छा आदमी होगा तो वह अच्छा अधिकारी भी होगा अच्छा इंजीनियर भी होगा दीनी तालीम का इंतिज़ाम पहले किया जाये उसके साथ साथ दुनयावी तालीम जितना ज्यादा हो अपने बच्चों को दिलायें और अच्छे मां बाप बनकर अच्छी शिक्षा दिलाकर अपना फर्ज निभाने का काम करें। शबे बराअत ये समझें के अल्लाह की तरफ से बंदों को बख्शने का एक बहाना है और ये रमज़ान की तैयारी है ताके हम अभी से रमज़ान के लिए तैयार हो जाये। आखिर में पूरे मुल्क के अमनो अमान के लिये दुआ कराई गई। इस मौके पर पुलिस बल की तरफ़ से की गई तैयारी और इंतिज़ाम क़ाबिल ए तारीफ़ रहा और पूरे प्रदेश में दोनों त्योहारों को अमन शांति से गुज़र जाने पर पुलिस प्रशासन की सराहना करते हुए हिन्दुस्तान की गंगा जमुना तहज़ीब की जमकर सराहना की।

द कश्मीर फाइल्स के बाद दूसरा धमाका लाल बहादुर शास्त्री; देखने के लिए हो जाएं तैयार…

कश्मीर फाइल्स के बाद दूसरा धमाका देखने के लिए हो जाओ तैयार…

लालबहादुर शास्त्री https://youtu.be/yq9TOW43TYs

लालबहादुर शास्त्री (जन्म: 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय (वाराणसी) : मृत्यु: 11 जनवरी 1966 ताशकन्द, सोवियत संघ रूस), भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री थे। वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे। इस प्रमुख पद पर उनका कार्यकाल अद्वितीय रहा। शास्त्री जी ने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की भारत  की  स्वतन्त्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। गोविंद बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया। परिवहन मन्त्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी। पुलिस मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारम्भ कराया। 1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होंने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिये बहुत परिश्रम किया।

साफ सुथरी छवि- जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमंत्री का पद भार ग्रहण किया। उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी। ताशकंद में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी सादगीदेशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त भारत रत्‍न से सम्मानित किया गया।

लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिवस पर 2 अक्टूबर को शास्त्री जयन्ती व उनके देहावसान वाले दिन 11 जनवरी को लालबहादुर शास्त्री स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

श्रीवास्तव से बने शास्त्री– लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में एक कायस्थ परिवार में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटे होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने के हुए तो दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उनकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उनके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया।

1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता और शास्त्रीजी की छ: सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र – हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। उनके चार पुत्रों में से दो दिवंगत हो चुके हैं। अनिल कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं जबकि सुनील शास्त्री भाजपा के नेता हैं।

देशसेवा का व्रत- संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् वे भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गांधीवादी, थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उल्लेखनीय हैं।

“मरो नहीं, मारो!”किया बुलंद- दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने इलाहाबाद पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक “मरो नहीं, मारो!” में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये।

गृहमन्त्री के बाद प्रधानमंत्री- शास्त्रीजी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में पुरुषोत्तमदास टंडन और पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। सबसे पहले 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने टण्डन जी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढ़ी। इसके बाद तो शास्त्रीजी का कद निरन्तर बढ़ता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढ़ते हुए वे नेहरूजी के मंत्रिमण्डल में गृहमन्त्री के प्रमुख पद तक जा पहुँचे। और इतना ही नहीं, नेहरू के निधन के पश्चात भारत वर्ष के प्रधान मन्त्री भी बने।

जय जवान-जय किसान का नारा- उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी शीर्ष प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है और वे ऐसा करने में सफल भी रहे। उनके क्रियाकलाप सैद्धान्तिक न होकर पूर्णत: व्यावहारिक और जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप थे। निष्पक्ष रूप से यदि देखा जाये तो शास्त्रीजी का शासन काल बेहद कठिन रहा। पूँजीपति देश पर हावी होना चाहते थे और दुश्मन देश हम पर आक्रमण करने की फिराक में थे। 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया। परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख व मन्त्रिमण्डल के सदस्य शामिल थे। संयोग से प्रधानमन्त्री उस बैठक में कुछ देर से पहुँचे। उनके आते ही विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ। तीनों प्रमुखों ने उनसे सारी वस्तुस्थिति समझाते हुए पूछा: “सर! क्या हुक्म है?” शास्त्रीजी ने एक वाक्य में तत्काल उत्तर दिया: “आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है?” शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

अमेरिका ने की युद्धविराम की अपील- भारत पाक युद्ध के दौरान 6 सितम्बर को भारत की 15वीं पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्तृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के बहुत बड़े हमले का डटकर मुकाबला किया। इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी। इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। भारतीय थलसेना ने दूनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने में सफलता अर्जित की। इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की।

रूस और अमरिका की मिलीभगत? आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्रीजी पर जोर डाला गया। उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकंद न जायें और वे भी मान गयीं। अपनी इस भूल का श्रीमती ललिता शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा। जब समझौता वार्ता चली तो शास्त्रीजी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं। काफी जद्दोजहेद के बाद शास्त्रीजी पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये। उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधान मन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि क्या वाकई शास्त्रीजी की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी? कई लोग उनकी मौत की वजह जहर को ही मानते हैं।

शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हें मरणोपरान्त वर्ष 1966 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

शास्त्रीजी की अंत्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्तिवन (नेहरू जी की समाधि) के आगे यमुना किनारे की गयी और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया। जब तक कांग्रेस संसदीय दल ने इंदिरा गांधी को शास्त्री का विधिवत उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया, गुलजारी लाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे।

पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया? शास्त्रीजी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मानते है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं बल्कि जहर देने से ही हुई। पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी ऐसा बताया गया। मजे की बात यह कि इण्डियन पार्लियामेण्ट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है। यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्रीजी का पोस्ट मार्टम भी नहीं हुआ। 2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जबाव दिया गया कि शास्त्रीजी के प्राइवेट डॉक्टर आर०एन०चुघ और कुछ रूस के कुछ डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जाँच तो की थी परन्तु सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। बाद में प्रधानमन्त्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी माँगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी।

आउटलुक पत्रिका ने खोली पोल- शास्त्रीजी की मौत में संभावित साजिश की पूरी पोल आउटलुक नाम की एक पत्रिका ने खोली। 2009 में, जब साउथ एशिया पर सीआईए की नज़र (अंग्रेजी CIA’s Eye on South Asia) नामक पुस्तक के लेखक अनुज धर ने सूचना के अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी पर प्रधानमन्त्री कार्यालय की ओर से यह कहना कि “शास्त्रीजी की मृत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथल-पुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस भी पहुँच सकती है। ये तमाम कारण हैं जिससे इस सवाल का जबाव नहीं दिया जा सकता।”।

ललिता के आँसू- सबसे पहले सन् 1978  में प्रकाशित एक हिन्दी पुस्तक ललिता के आँसू में शास्त्रीजी की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढँग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था। उस समय (सन् उन्निस सौ अठहत्तर में) ललिताजी जीवित थीं। यही नहीं, कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकन्द में शास्त्रीजी के साथ गये थे, इस घटना चक्र पर विस्तार से प्रकाश डाला है। जुलाई 2012 में शास्त्रीजी के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की माँग की थी। मित्रोखोन आर्काइव नामक पुस्तक में भारत से संबन्धित अध्याय को पढ़ने पर ताशकंद समझौते के बारे में एवं उस समय की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में विस्तरित जानकारी मिलती है।

कृष्ण जन्मभूमि की अद्भुत-अवर्णनीय लठामार होली

मथुरा यात्रा-२
कृष्ण जन्मभूमि की अद्भुत-अवर्णनीय लठामार होली

रंगभरनी एकादशी कृष्ण जन्मभूमि और यहां की होली देखने आने वालों दोनों के लिए एक खास अवसर है। इस बार की मथुरा यात्रा का खास मकसद ही जन्म भूमि की लठामार होली ही थी। कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट द्वारा संचालित अंतरराष्ट्रीय विश्राम गृह का कमरा नंबर- 6 ही अपना ठिकाना बना। मथुरा की होली ऐसे ही आकर्षित करती है। उस पर रंगभरनी एकादशी का दिन हो तो नींद कहां से आए?
सुबह 5 बजे ही आंख खुल गई। चाय की तलब जन्म भूमि के मुख्य द्वार के सामने “दनादन चायवाले” की तरफ खींच ले गई। कई युवा, महिलाएं रंगभरनी एकादशी की होली का मजा लेने के लिए बाहर बरामदे में, खुले में रात बिताती नजर आई। गेट पर कतार लगनी शुरू हो चुकी थी। कुछ लड़कियां फोटो खींचने में मशगूल थीं और कुछ लड़के सेल्फी लेने में। सुबह का आगाज ही यह एहसास कराने लगा था कि आज मंदिर में कुछ खास है।
घड़ी की सुई बढ़ती जा रही थी और अपनी होली वाली टोली (विनय द्विवेदी, करुणाशंकर मिश्रा, सुधीर द्विवेदी, अमर द्विवेदी, यादवेंद्र प्रताप सिंह, चंद्रमणि बाजपेई, सुनील मिश्रा “सेनानी”) की धड़कन। ट्रस्ट के ही भोजनालय में दोपहर का भोजन ग्रहण करने के बाद विश्राम गृह के सेवादार प्रेम शंकर दीक्षित उर्फ पप्पू मंदिर में प्रवेश कराने के लिए सक्रिय हो चुके थे। कृष्ण जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट के सचिव श्री कपिल शर्मा जी और भाई वात्सल्य राय जी ने विश्राम गृह के केयरटेकर रणधीर सिंह एवं पप्पू को ही लट्ठमार होली महोत्सव स्थल केशव वाटिका तक पहुंचाने की हम सबकी जिम्मेदारी इन्हीं दोनों को सौंपी थी।
दो बजते-बजते हम सब जन्मभूमि परिसर में शॉर्टकट से दाखिल हो गए। धूप तेज थी और होली महोत्सव देखने की जिज्ञासा उससे भी ज्यादा। उस समय केशव वाटिका का मैदान लगभग खाली ही था। अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए हम सब एक जगह कुर्सियों पर जम गए। थोड़ी देर बाद होली गीतों की धुन, आर्केस्ट्रा के कलाकार बजानी शुरू करते हैं। एंकरिंग के लिए एक मोटी सी महिला स्टेज पर ही कपिल‌ शर्मा के साथ कुछ होमवर्क के साथ अवतरित होती है और शुरू हो जाता है लठामार होली महोत्सव।
ब्रज और बुंदेलखंड से आए कलाकारों-गायकों से सुसज्जित होली महोत्सव के मंच पर गणेश वंदना के बाद शुरू होते हैं होली के गीत। श्री श्री 1008 स्वामी गुरुशरणानंद जी महाराज की उपस्थिति इस मंच और महोत्सव दोनों की शोभा बढ़ाती है। धीरे-धीरे-धीरे-धीरे माहौल होली मय होना शुरू होता है तो होता ही चला जाता है। कभी कृष्ण कन्हाई और राधा रानी के वेश में सजे दो बच्चों की झांकी धूम-धड़ाके के साथ पहुंचती है। घड़ी की सुई जैसे ही 5:00 बजे के आगे बढ़नी शुरू होती है वैसे-वैसे होली का मजा भी बढ़ता चला जाता है। ब्रज का प्रसिद्ध चरकुला नृत्य (जिसमें कलाकार सिर पर मटकी, जलते हुए दीपकों को रखकर नृत्य प्रस्तुत करते हैं) देखकर होली का रोमांच बढ़ गया।
फूलों की होली के बीच ही द्वारकाधीश मंदिर से उठने वाला जन्मभूमि का डोला पुराने केशव देव मंदिर होते हुए केशव वाटिका पहुंचना शुरू होता है। डोले के साथ सैकड़ों गोपियां और ग्वाल बाल लट्ठमार होली खेलते हुए चल रहे हैं। यह होरिहारे और गोपियां बरसाना वृंदावन और नंदी गांव से खास तौर पर होली खेलने के लिए आई हैं। होली के उल्लास में डूबे होरिहारों में गोपियों के लट्ठे से बचने के लिए बीच-बीच में भगदड़ मचती है और यह भगदड़ आपको मजा भी देती है और डराती भी है। होरिहारों और लट्ठ से लैस इस जत्थे केशव वाटिका पहुंचते ही शुरू होता है जन्मभूमि की लठामार होली। मंच पर होली गीतों पर थिरकते कलाकार और मैदान में और होरिहारों पर लठ बरसाती गोपियों के दृश्य अद्भुत हैं और अवर्णनीय भी।
लठामार होली देखने-सुनने के आई भक्तों की भारी भीड़ से केशव वाटिका का मैदान छोटा पड़ गया। जन्मभूमि की सारी व्यवस्थाएं छोटी पड़ गई। सुरक्षा बौनी हो गई। वाटिका में तैनात पुलिस वाले खुद होली के रंग में डूब से गए। पूरे देश से आए लोगों से खचाखच भरे मैदान में अबीर गुलाल से आसमान रंगीन हो गया। लाल-हरे-नीले-पीले-बैगनी रंगों से पटे इस आसमान के नीचे चल रही लट्ठमार होली के दौरान कभी इस हिस्से में भगदड़ कभी उस हिस्से में भगदड़। लट्ठ लगने से कुछ होरिहारे लंगड़ाते हुए भी गए। गोपियों के लट्ठ से खाकी वर्दीधारी भी बच नहीं पाते। हमेशा दूसरों पर लाठी बरसाने वाले यह खाकी वर्दीधारी आज गोपियों के लट्ठ हंसते हुए खा रहे हैं। भाग रहे हैं।
एक घंटे तक चलने वाली इस लट्ठमार होली में टैंट के स्ट्रक्चर के ऊपर लगी पिचकारियों से टेसू के फूल वाले बरसते रंग में भीगते हुए होली की मस्ती में डूबना अब सपना ही है। इस सपने को सच करता है रंगभरनी एकादशी पर कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की ओर से आयोजित लठमार होली महोत्सव। स्थानीय और विभिन्न राज्यों के हजारों-हज़ार महिलाएं-पुरुष-बच्चे भाग लेने पहुंचे हुए हैं। लट्ठ लगने का डर भी सभी को मजा लूटने से रोक नहीं पाता। जय श्री कृष्ण- जय श्री राधे

द्वारकाधीश मंदिर
कृष्ण जन्म भूमि से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर दूर चौक बाजार में स्थित दो-ढाई सौ वर्ष पुराने द्वारकाधीश मंदिर की होली का भी अपना अलग ही मजा है। रंगभरनी एकादशी पर हम सबकी होली खेलने की शुरुआत द्वारकाधीश मंदिर से ही हुई। ई-रिक्शा की सवारी का मजा लेते हुए हम सब सुबह 8:00 बजे ही द्वारकाधीश मंदिर पहुंच गए। मुगल काल में मथुरा के मंदिर तोड़े जाने के बाद लक्ष्मीचंद जैन ने द्वारिकाधीश मंदिर बनवाया। आजकल पुष्टिमार्गीय संतों की देखरेख में द्वारकाधीश मंदिर संचालित है। सुबह 8:25 मिनट पर श्रंगार आरती और 10:00 बजे द्वारिकाधीश को भोग के बाद शुरू हुआ होली गीत-फाग और अबीर-गुलाल उड़ने का सिलसिला। एक घंटे तक गीत गूंजते रहे और अबीर गुलाल उड़ता रहा। नाचते गाते एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाते कब 11:00 बज गए पता ही नहीं चला। आरती के बाद पट बंद होने पर मंदिर की होली ने विश्राम ले लिया।

यमुना जी का तट और विश्राम घाट
जगदीश मंदिर में होली के बाद हम सब यमुना जी के दरस परस के लिए हम सब विश्राम घाट की ओर बढ़े।
घाट पर पहुंचने के पहले ही भाई-बहन के पवित्र प्रेम के लिए प्रसिद्ध धर्मराज यमराज और यमुना जी के मंदिर में माथा टेकने का सुयोग भी इस बार ही बना। इस मंदिर में यम द्वितीया पर यमुना जी में स्नान में बाद भाई बहन के साथ-साथ पूजा-प्रार्थना की परंपरा है। यह मंदिर देखकर मन अपने आप भावुक इसलिए हुआ कि भैया (स्मृति शेष नीरज अवस्थी) पहले कई बार हमसे और दीदी (गरिमा मिश्रा) से यह द्वितीया पर यहां आने के लिए कहते रहे लेकिन शायद द्वारकाधीश को यह मंजूर नहीं था। यमुना जी के दरस-परस के बाद बोटिंग के दौरान यमुना जी के बदबूदार काले पानी को देखकर मन खिन्न हो गया। हालांकि, पढ़ाई के साथ-साथ गाइड काम करने वाली युवा माधव चतुर्वेदी लगातार इस बात पर ही जोर देता रहा कि यमुना मिशन अच्छे से चल रहा है और नाले का गंदा पानी साफ होकर ही यमुना में गिर रहा है।
अथ होली यात्रा समाप्तम..

गौरव अवस्थी
रायबरेली/ उन्नाव

भारतीय राजनीति को बदलकर रख देगी द कश्मीर फाइल्स!

द कश्मीर फाइल्स! विवेक की ये चिंगारी जो है न! भारतीय राजनीति को बदलकर रख देगी। खासकर युवा वर्ग को सुन्न कर जाएगी। मन और दिमाग सिहर जाना है। भले बी-टाउन के बड़े मॉन्स्टर ने इसे स्क्रीन काउंट नहीं जाने दिए । महज 500 स्क्रीन काउंट मिली है।

लेकिन…लेकिन! इसका जो वर्ड ऑफ माउथ है न! इसे कहाँ तक ले जाने वाला है ट्रेड पंडितों को भी नहीं मालूम है। दर्शक घरों से निकल रहे है और एक बार नहीं, बल्कि रिपीट वैल्यू है। पहले दिन कश्मीर फाइल्स ने साढ़े तीन करोड़ का बिज़नेस किया है। जो अब बढ़ता ही जाएगा। ग्राफ नीचे न आना। कल्ट, क्लासिक, मास्टरपीस कोई भी स्टेटस इसे न माप पाएंगे।

स्टीवन स्पीलबर्ग की ‘द शिंडलर लिस्ट’ के बाद ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने सनक के होलोकॉस्ट में इंसानियत को शर्मसार होते देखा है। स्टीवन अपनी फिल्म से यहूदियों के दर्द में डूब कर निकले थे। उसी प्रकार विवेक ने कश्मीरी पंडितों की डल में तैरकर उनतक पहुँचे है और उन्हें धैर्य से सुना है। इस फाइल्स को ज्यादा से ज्यादा दर्शक मिलने चाहिए। ताकि देखें की सत्ता की पॉवर में आने पर क्या कर जाते है। राष्ट्र को सुरक्षित रखने के किये कैसा नेतृत्व आवश्यक है। इससे पहले किसी फिल्म मेकर को कश्मीर जाने की हिम्मत न होती थी। जाते भी तो सिर्फ़ बाहर से झाँकर निकल आते। दिल तक उतरने में डर लगता था ।

विवेक की कहानी व विज़ुअल्स देखकर दिमाग डिस्टर्ब है । वे दृश्य आँखें की स्क्रीन से हटने का नाम न ले रहे है। वे कहते है मास्टर का बेटा था। भटका हुआ मासूम नौजवान था। फौज के अत्याचारों से तंग आकर भटक गया। तो भैया ऐसा है अगर यूँ रहता तो कश्मीरी पंडित क्यों न भटके। काहे जुल्म सहते रहे। उनके दर्द पर झूठ के नैरेटिव रचे गए। इस काम में ख़ूब फंड व सारा तंत्र लगा बैठा। अब सच जूते भी पहन चुका है और दुनिया की सैर को भी निकल चुका है। भले सच को जूते पहनने में देर लगी। लेकिन बाहर निकला अवश्य ।

विवेक ने कश्मीर के बारे में जो मोनोलॉग लिखा है न! उसे बेहतरी से दर्शन कुमार ने कृष्णा पंडित के साथ मिलकर दर्शकों के बीच फेंका है। कश्मीर फाइल्स फिल्मी कंटेंट नहीं है बल्कि इमोशन है। बॉलीवुडिये रहनुमाओं ने तो आतताई खलनायकों को नायक के तौर पर पेश किया है और आगे भी करेगा। विवेक की मेहनत को समर्थन देकर आगे अनछुए विषयों को उठाने का हौसला दे। इस फाइल्स को आर्थिक तौर पर बड़ी सफलता देवे। इंटरनेशनल मूवी डेटा बेस यानी आईएमडीबी पर जाकर रेट अवश्य दे। इसे वहाँ भी अव्वल बनाएं।

साभार फेसबुक

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का कारण?

देवेश प्रताप सिंह राठौर (AMJA)

रूस और यूक्रेन का विवाद इतना तूल क्यों पकड़ा, युद्ध जैसी स्थिति बनी और युद्ध शुरू हो गया। अमेरिका का इतिहास रहा है देशों को लड़ाना और राज्य करना। उसी का एक हिस्सा यूक्रेन अमेरिका के बहकावे में आ गया और आज पूरा विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के मुंह में जाने को खड़ा है। इस बार अगर तीसरा विश्व युद्ध हुआ उसकी कल्पना नहीं कर सकते कौन बचेगा, कौन नहीं!…क्योंकि अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम डाले थे। हिरोशिमा और नागासाकी शहर पर क्या स्थिति बनी? उसके बाद परमाणु बम के कार्यक्रम को रोकने के लिए प्रावधान बनाया गया। वही स्थिति फिर बन रही है।

यूक्रेन और रूस के बीच का लड़ाई का मुख्य कारण क्या है संक्षेप में जानते हैं। यूक्रेन पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिशों में जुटा है, रूस को यह बात पसंद नहीं है। वह नहीं चाहता कि यूक्रेन पश्चिमी देशों से अच्छे संबंध रखे या नाटो का सदस्य बने। अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया के 30 देश इस संगठन के सदस्य हैं। नाटो का सदस्य होने का मतलब है कि अगर सगंठन के किसी भी देश पर कोई तीसरा देश हमला करता है तो सभी सदस्य एकजुट होकर उसका मुकाबला करेंगे। रूस का कहना है कि अगर नाटो की तरफ से यूक्रेन को मदद मिली तो उसका अंजाम सबको भुगतना होगा। यूक्रेन की राजधानी पर लगातार मिसाइलें दागी गईं। इनमें से एक मिसाइल कीव के बाहरी इलाके स्थित एक आवासीय बहुमंजिला इमारत की 16वीं और 21वीं मंजिल के बीच से गुजर गई और इमारत की दो मंजिलें आग से घिर गईं। हमले में कम से कम छह नागरिक गंभीर रूप से घायल हो गए जबकि 80 को बचाकर निकाला गया। एक अन्य मिसाइल कीव को पानी की आपूर्ति करने वाले बांध को निशाना बनाकर दागी गई लेकिन यूक्रेन ने इसे हवा में ही मार गिराया। देश के इंफ्रास्ट्रक्चर मंत्री ने बताया कि अगर यह मिसाइल निशाने पर गिरती तो कीव के उपनगरों में बाढ़ आ जाती। वहीं, रूस के रक्षा प्रवक्ता इगोर कोनाशेंकोव ने फिर दावा किया रूसी मिसाइलें सिर्फ यूक्रेन के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर दागी जा रही हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर इस विवाद की जड़ क्या है

यूक्रेन की सीमा पश्चिम में यूरोप और पूर्व में रूस से जुड़ी है। 1991 तक यूक्रेन पूर्ववर्ती सोवियत संघ का हिस्सा था। रूस और यूक्रेन के बीच तनाव नवंबर 2013 में तब शुरू हुआ जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का कीव में विरोध शुरू हुआ, जबकि उन्हें रूस का समर्थन था।

यानुकोविच को अमेरिका-ब्रिटेन समर्थित प्रदर्शनकारियों के विरोध के कारण फरवरी 2014 में देश छोड़कर भागना पड़ा।इससे खफा होकर रूस ने दक्षिणी यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वहां के अलगाववादियों को समर्थन दिया। इन अलगाववादियों ने पूर्वी यूक्रेन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। वर्ष 2014 के बाद से रूस समर्थक अलगाववादियों और यूक्रेन की सेना के बीच डोनबास प्रांत में संघर्ष चल रहा था। इससे पहले जब 1991 में यूक्रेन सोवियत संघ से अलग हुआ था तब भी कई बार क्रीमिया को लेकर दोनों देशों में टकराव हुआ। 2014 के बाद रूस व यूक्रेन में लगातार तनाव व टकराव को रोकने व शांति कायम कराने के लिए पश्चिमी देशों ने पहल की। फ्रांस और जर्मनी ने 2015 में बेलारूस की राजधानी मिन्स्क में दोनों के बीच शांति व संघर्ष विराम का समझौता कराया। 

हाल ही में यूक्रेन ने नाटो से करीबी व दोस्ती गांठना शुरू किया। यूक्रेन के नाटो से अच्छे रिश्ते हैं। 1949 में तत्कालीन सोवियत संघ से निपटने के लिए नाटो यानी ‘उत्तर अटलांटिक संधि संगठन’ बनाया गया था। यूक्रेन की नाटो से करीबी रूस को  नागवार गुजरने लगी। अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया के 30 देश नाटो के सदस्य हैं। यदि कोई देश किसी तीसरे देश पर हमला करता है तो नाटो के सभी सदस्य देश एकजुट होकर उसका मुकाबला करते हैं। रूस चाहता है कि नाटो अपना विस्तार न करे। राष्ट्रपति पुतिन इसी मांग को लेकर यूक्रेन व पश्चिमी देशों पर दबाव डाल रहे थे।आखिरकार रूस ने अमेरिका व अन्य देशों की पाबंदियों की परवाह किए बगैर यूक्रेन पर हमला बोल दिया। अब तक तो नाटो, अमेरिका व किसी अन्य देश ने यूक्रेन के समर्थन में जंग में कूदने का एलान नहीं किया है। वे यूक्रेन की अपरोक्ष मदद कर रहे हैं, ऐसे में  कहना मुश्किल है कि यह जंग क्या मोड़ लेगी। यदि यूरोप के देशों या अमेरिका ने रूस के खिलाफ कोई सैन्य कार्रवाई की तो समूची दुनिया के लिए मुसीबत पैदा हो सकती है। यूक्रेन को अमेरिका से दूरी बनानी होगी, नाटो के संगठन से हटना पड़ेगा; तभी रूस बातचीत करने में रुचि रखेगा ऐसा मेरा मानना है।

चंद्रशेखर आजाद और उनका फरारी जीवन

शहादत के 91वें साल (27 फरवरी) पर विशेष

शहादत के 91वें साल (27 फरवरी) पर विशेष

चंद्रशेखर आजाद और उनका फरारी जीवन

गुलाम भारत को आजाद कराने में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले शहीद-ए-आजम चंद्रशेखर आजाद की शूरता-वीरता के किस्से आम हैं। काकोरी कांड के बाद आजाद; कभी हरिशंकर ब्रह्मचारी बने, कभी पंडित जी और कभी अंग्रेज सरकार के अफसर के ड्राइवर भी। क्रांतिकारी दल को मजबूत करने के लिए उन्होंने गाजीपुर के एक मठ के बीमार महंत से दीक्षा इसलिए ली कि उनके निधन के बाद मठ की संपत्ति क्रांति के काम आएगी। तीन-चार महीने महंत के मठ में समय बिताने के बाद जब संपत्ति प्राप्त करने के कोई आसार नजर नहीं आए तो वह पुनः क्रांति दल में सक्रिय हो गए। काकोरी कांड में फरारी के बाद आजाद के यह किस्से इतिहास में ही दफन होकर रह गए। आम लोगों के जेहन में उनके फरारी जीवन की जिंदगी घर नहीं कर पाई। आज उनकी शहादत का 91वां वर्ष है। आइए! आजाद के जीवन से जुड़े इन किस्सों से जुड़ा जाए..

सातार नदी का तट और हरिशंकर ब्रह्मचारी

काकोरी कांड में कई साथी तो अंग्रेज हुकूमत के हत्थे चढ़ गए लेकिन आजाद ‘आजाद’ ही रहे। हिंदुस्तानी विभीषण और अंग्रेजी सेना की खुफिया आजाद को पकड़ने के लिए पूरे देश में सक्रिय रही लेकिन आजाद पकड़े नहीं जा सके। फरार होने के बाद आजाद का अगला ठिकाना झांसी बना। खतरा देख आजाद ढिमरापुर में सातार नदी के तट पर कुटी बनाकर रहने लगे। यहां उन्होंने अपना नाम रखा ‘हरिशंकर ब्रह्मचारी’। इस बीच उनका झांसी आना-जाना भी बना रहा। ब्रह्मचारी के रूप में आजाद प्रवचन देते थे और बच्चों को पढ़ाते-लिखाते भी थे। एक दिन झांसी से साइकिल से लौटते समय इनाम के लालच में‌ दो सिपाहियों ने रोक कर उनसे थाने चलने को कहा।
सिपाहियों ने कहा-‘ क्यों तू आजाद है?’ आजाद ने उन्हें समझाते हुए कहा- आजाद जो है सो तो है। हम बाबा लोग होते ही आजाद हैं। हमें क्या बंधन? आजाद ने हर तरह से बचने की कोशिश की। सिपाहियों को हनुमान जी का डर भी दिखाया लेकिन वह मानने को तैयार नहीं हुए। सिपाहियों के साथ थोड़ी दूर चलकर आजाद बिगड़े और कहा कि तुम्हारे दरोगा से बड़े हमारे हनुमान जी हैं। हम तो हनुमान जी का ही हुक्म मानेंगे। हमें हनुमान जी का चोला चढ़ाना है। कहते हुए आजाद भाग खड़े हुए। बलिष्ठ शरीर देखकर सिपाही पकड़ने के लिए उनके पीछे भागने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

अचूक निशाने की अग्निपरीक्षा!

फरारी के दौरान झांसी के पास खनियाधाना के तत्कालीन नरेश खड़क सिंह जूदेव के यहां आजाद का आना-जाना हो गया। आजाद अपने साथी मास्टर रूद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर और भगवानदास माहौर के साथ जूदेव के यहां अतिथि बनकर गए। वह राजा साहब के छोटे भाई बने हुए थे और उनके दरबार के अन्य लोगों के लिए ‘पंडित जी’। राजा साहब की कोठी के बगीचे में दरबार जमा हुआ था। बात निशानेबाजी की शुरू हुई। आजाद की बातें दरबार में उपस्थित ठाकुरों को पसंद नहीं आई। राजा के दरबारियों ने निशानेबाजी की परीक्षा लेनी चाही। बातों-बातों में आजाद के हाथों में बंदूक भी थमा दी गई। उनके साथी मास्टर रूद्र नारायण को आजाद की परीक्षा लेना उचित नहीं लगा। उन्हें डर था कि कहीं भेद खुल न जाए। उन्होंने बहाने से आजाद से बंदूक ले ली। भगवानदास माहौर ने बाल हठ करते हुए निशाना साधने की जिद की। बंदूक भगवानदास के हाथ में आ गई । एक पेड़ की सूखी टहनी पर सूखा अनार खोसा हुआ था। आजाद ने उन्हें अचूक निशानेबाजी की बारीक बातें बताई। भगवानदास माहौर के एक निशाने में सूखी टहनी पर खोसा हुआ अनार उड़ गया। इसके बाद माहौल सामान्य हुआ और आजाद अपने साथियों के साथ लौट आए।

बनारसी पितांबर और रेशमी कुर्ता-साफा

आजाद और उनके साथियों का क्रांतिकारी दल शुरुआती दौर में आर्थिक संकटों से गुजर रहा था। इसी बीच बनारस में क्रांति दल के साथियों को पता चला कि गाजीपुर में एक मठ के महंत बीमारी की अवस्था के चलते ऐसे लड़के की तलाश में थे, जिसको सन्यासी बनाकर मठ जिम्मेदारी सौंप दें। क्रांतिकारी दल की आर्थिक दिक्कतों को दूर करने के लिए आजाद ने अपने साथियों का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्हें महंत का शिष्य बनना था। साथी लोग लेकर उन्हें गाजीपुर के मठ में पहुंचे। यहां आजाद का नाम चंद्रशेखर तिवारी बताया गया। ‘आजाद’ उपनाम की चर्चा ही नहीं की गई। पंडित लड़का पाकर महंत जी काफी खुश हुए और अगले ही दिन मठ में आजाद को दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया। दीक्षा के पहले सिर मुंड़ाकर उन्हें रेशमी साफा पहनाया गया। शरीर पर कीमती बनारसी पीतांबर और रेशमी कुर्ता हल्के भगवा रंग का धारण कराया गया। माथे पर शुद्ध चंदन-केसर का लेप भी। इस सबमें मठ के हजार रुपए तक खर्च हुए होने का अनुमान भी क्रांतिकारी दल के सदस्यों ने लगाया था। आजाद मठ में करीब 4 महीने रहे। इस बीच महंत पूरी तरह स्वस्थ हो गए। आजाद को जब यह महसूस हुआ कि उनका क्रांतिकारी दल का संपत्ति प्राप्ति का सपना यहां पूरा नहीं होगा तो आजाद एक दिन चुपके से वहां से खिसक लिए।

मजदूर जीवन

छात्र जीवन में आजाद का पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मन युद्ध कौशल सीखने, तलवार आदि चलाने में लगता था। इसके बाद भी उन्हें तहसील में नौकरी मिल गई थी लेकिन आजाद ‘आजाद’ थे। उन्हें अंग्रेजों की नौकरी पसंद कैसे आती? एक दिन वह एक मोती बेचने वाले के साथ मुंबई चले गए। कुछ मजदूरों की सहायता से उन्हें जहाजों को रंगने वाले रंगसाज का काम भी मिल गया। मजदूरी से मिले पैसों से वह अपना जीवन चलाते थे। मजदूरों की मदद से लेटने भर की जगह भी एक कोठरी में मिली लेकिन उस घुटन भरे माहौल में आजाद का मन नहीं लगा। कभी-कभी तो वह रात भर सिनेमा हाल में बैठे रहते। नींद लगने पर ही अपने बिस्तर पर आते। मुंबई का यंत्रवत जीवन आजाद को रास नहीं आया लेकिन मजदूर जीवन का अनुभव लेकर एक दिन बनारस जाने वाली ट्रेन में बिना टिकट बैठ गए। यहां उन्नाव के शिव विनायक मिश्र से उनकी भेंट हुई। उनकी मदद से संस्कृत पाठशाला में उन्हें प्रवेश मिल गया। 1921 के असहयोग आंदोलन में संस्कृत कॉलेज बनारस पर धरना देते हुए ही वह पहली बार गिरफ्तार हुए थे और 15 बेंतों की सजा हुई थी। यहीं से बालक चंद्रशेखर तिवारी चंद्र शेखर आजाद बना और आजीवन आजाद ही रहा।

जब अंग्रेज सिपाही को पटक-पटक कर मारा

चंद्रशेखर आजाद बनारस रेलवे स्टेशन पर रामकृष्ण खत्री और बनवारी लाल (जो काकोरी केस में इकबाली मुलजिम बने और 4 वर्ष की सजा मिली थी) के साथ प्लेटफार्म पर टहल रहे थे। कुछ अंग्रेज सिपाही भी प्लेटफार्म पर थे। एक अंग्रेज सिपाही ने प्लेटफार्म पर जा रही हिंदुस्तानी नौजवान बहन के मुंह पर सिगरेट का धुआं फेंका। आजाद को अपनी हिंदुस्तानी बहन के साथ इस तरह की अभद्रता बर्दाश्त नहीं हुई और तुरंत अंग्रेज सिपाही पर झपट पड़े। लात, घूंसा थप्पड़ मारकर अंग्रेज सिपाही को गिरा दिया। अंग्रेज सिपाही इतना डर गया कि अपने दोनों हाथ ऊपर करके मार खाता रहा और कहता रहा-‘आई एम सॉरी, रियली आई एम वेरी सॉरी’। उसके अन्य साथी तो भाग ही खड़े हुए। आजाद ने तब अपने साथियों से कहा भी था कि इस साले अंग्रेज को सबक सिखाना जरूरी था ताकि आगे किसी हिंदुस्तानी बहन-बेटी के साथ छेड़खानी न कर सके।

ब्रह्मचारी का ‘ब्रम्हचर्य’ तोड़ने की वह कोशिशें

चंद्र शेखर आजाद ने देश को आजाद कराने की खातिर शादी न करने का वृत ले रखा था। आजीवन ब्रम्हचर्य भी उनका दृढ़ संकल्प था। उनके जीवन से जुड़े यह दो किस्से बड़े महत्वपूर्ण हैं। फरारी जीवन में ढिमरापुर में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से सातार नदी के किनारे रहते समय गांव की एक बाला उनके पीछे पड़ गई। किसी भी तरह उसके प्रभाव में न आने पर उस बाला ने अश्रु सरिता से मोहित-प्रभावित करने की भी कोशिश की लेकिन आजाद तो आजाद थे। गांव की बाला उनके पीछे लगाने में गांव के ही एक चतुर नंबरदार की साजिश थी। किसी भी तरह आजाद के बाला के प्रभाव में न आने पर वह नंबरदार आजाद का भक्त हो गया। उस नंबरदार ने आजाद को अपना पांचवा भाई मान लिया। उसे अपने सगे भाइयों से ज्यादा आजाद पर विश्वास हो चुका था। यहां तक कि उसने अपनी तिजोरी की चाबी भी आजाद को सौंप दी थी। बंदूकें भी उन्हीं की देखरेख में रहने लगीं। यह किस्सा स्वयं आजाद ने झांसी में अपने साथियों को सुनाया था।
दूसरा किस्सा, आजाद की एक जमींदार मित्र के घर का है। आजाद एक बार अपने धनी जमींदार मित्र के यहां रुके थे। मित्र को अचानक एक दिन के लिए बाहर जाना पड़ा। आजाद ने अन्यत्र रुकने का प्रस्ताव किया लेकिन जमींदार मित्र नहीं माने। आजाद उनके विशाल भवन के ऊपरी खंड में ठहरे थे। रात में कमरे में सो रहे थे। आधी रात के बाद जमींदार की विधवा बहन कमरे में आ गई। उसने कामेच्छा से धीरे से आजाद को जगाया। 24:00 अपने कमरे में विधवा बहन को देखकर आजाद को काटो तो खून नहीं। उन्होंने बहन को समझाया। बताया भी कि सांसारिक बंधन में बंधने का उनके पास अवसर ही नहीं है। विधवा बहन के न समझने पर आजाद बिजली की गति से बाहर निकले और तिमंजिले भवन की दीवार से नीचे कूद गए। कड़ाके की सर्दी वाली वह रात आजाद ने जंगल में एक पेड़ के नीचे गुजारी। कूदने के कारण चोट भी लगी लेकिन अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया।

आजीवन आजाद रहे आजाद जी को बलिदान दिवस पर शत शत नमन!

∆ गौरव अवस्थी ‘आशीष’
रायबरेली/उन्नाव

आजादी का अमृत महोत्सव एवं चौरी-चौरा शताब्दी समारोह की थीम पर किया जाएगा: डीएम उमेश मिश्रा

बिजनौर। जिलाधिकारी उमेश मिश्रा ने कहा कि उत्तर प्रदेश शासन के निर्देशों के अनुपालन में 24 जनवरी, 2022 को “उत्तर प्रदेश दिवस” के रूप में मनाने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 से प्रतिवर्ष 24 जनवरी को उत्तर प्रदेश राज्य की स्थापना दिवस के रूप में उत्तर प्रदेश दिवस का आयोजन किया जा रहा है। विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी आगामी 24 जनवरी को उत्तर प्रदेश दिवस का आयोजन सभी जिलों में वर्तमान समय में लागू आदर्श आचार संहिता तथा प्रोटोकॉल का पालन करते हुए किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष उत्तर प्रदेश दिवस का आयोजन आजादी का अमृत महोत्सव एवं चौरी-चौरा शताब्दी समारोह की थीम पर किया जाएगा। इस अवसर पर जिला स्तर पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय गीत का गायन, पुलिस बैंड द्वारा रामधुन का वादन आदि भी सम्मिलित होंगे। उन्होंने बताया कि जिले की स्थानीय बोली भाषा में आजादी से जुड़े लोगों के गीतों का गायन आजादी की कथाओं पर आधारित नाटक तथा नृत्य नाटिकाओं तथा जिले की समृद्ध संस्कृति को प्रदर्शित करने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का जन सहभागिता के आधार पर आयोजन भी किया जाएगा।
उन्होंने निर्देश दिए कि कार्यक्रम स्थल पर जिले के गौरवशाली इतिहास, चौरी-चौरा गोरखपुर की घटना तथा स्वतंत्रता संग्राम में जिले के योगदान, शहीद स्मारकों एवं स्थानों पर आधारित अभिलेख एवं चित्र दृश्यों का आयोजन करना सुनिश्चित करें तथा कार्यक्रम के अंतर्गत जिले की शहीद स्मारकों, पर्यटन स्थलों पर आधारित ऑनलाइन फोटोग्राफी तथा पेंटिंग प्रतियोगिताओं का भी आयोजन कर युवा वर्ग को कार्यक्रम में भागीदार बनाएं। उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि कार्यक्रम स्थल पर “एक जनपद एक उत्पाद” के अंतर्गत पारंपरिक विशिष्ट उत्पाद के शिल्पी/ कर्मकारों की कला का प्रदर्शन स्वयं सहायता समूह के माध्यम से तथा यूपी के स्टार्टअप पर आधारित प्रदर्शनियों का आयोजन सुनिश्चित किया जाए।


जिलाधिकारी श्री मिश्रा ने उक्त संबंध में आदेशित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश दिवस के आयोजन के अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में कोविड-19 की परिस्थितियों के दृष्टिगत अनिवार्य रूप से कोविड हैल्थ डैस्क मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पर्यवेक्षण में स्थापित कराई जाए तथा सोशल डिस्टेंसिंग का भी अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए। उन्होंने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि जिले में उत्तर प्रदेश दिवस कार्यक्रम का आयोजन उसकी मूल मंशा के अनुरूप कराना सुनिश्चित करें और कार्यक्रमों के फोटोग्राफ्स एवं विवरण ईमेल आईडी updivas1@gmail.com पर प्रेषित किया जाना सुनिश्चित करें।

सामाजिक न्याय के मामले में बेनकाब होने के बावजूद भाजपा का पलड़ा क्यों है भारी!

सामाजिक न्याय के मामले में बेनकाब होने के बावजूद क्यों भारी है भाजपा का पलड़ा


भारतीय जनता पार्टी ने हिन्दुत्व की छतरी को विराट बनाकर सामाजिक न्याय की मांग को उसके नीचे दबा दिया था लेकिन उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद भाजपा के कई मंत्रियों और विधायकों ने जिन आरोपों को लगाते हुए अपनी पार्टी छोड़ी है उसके कारण सामाजिक न्याय का मुद्दा फिर केन्द्र बिन्दु बन गया है। यहां तक कि सपा के मुखिया अखिलेश यादव तक सामाजिक न्याय के मुद्दे पर रक्षात्मक खेल खेलने को मजबूर हो गये थे और उन्होंने सवर्णों को प्रसन्न रखने की नीति पर अपना ध्यान जमा दिया था। अब वे भी पिछड़ों की राजनीति करने पर फिर से उतर आये हैं। उन्होंने ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं से मेल मिलाप किया है, जो तीखे शब्दों में खुलेआम वर्ण व्यवस्थावादी वर्चस्व के खिलाफ बोलने के आदी हैं। अब उनके साथ होने से सवर्णों के बिदकने की बहुत परवाह अखिलेश यादव नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा को भी अपनी दशा और दिशा बदलनी पड़ी है। पार्टी के उत्तर प्रदेश के प्रत्याशियों की पहली सूची में जहां सवर्णों को मात्र 43 टिकट दिये गये हैं वहीं पिछड़े और दलितों के उम्मीदवारों की संख्या 63 है।

संकेत है कि बाद की सूचियों में भी वंचितों का बाहुल्य रहेगा। लेकिन शायद यह केवल चुनावी नैया पार करने की रणनीति है। भाजपा का असली लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र का निर्माण, जिसमें न केवल अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे पर धकेलने का भाव निहित है बल्कि पिछड़ों और दलितों को भी सेवक की भूमिका तक ही सीमित करने का उद्देश्य भी निहित है। इस मामले में केवल इतनी उदारता अब बरती जा रही है कि समायोजन भर के लिए दलित और पिछड़ों को भी राजनीति व प्रशासन में प्रतिनिधित्व दिया जाये न कि समावेशी राजनैतिक प्रशासनिक गठन के लिए उन्हें मजबूत भागीदारी देना।


जब तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर नहीं मिला था तब तक आरएसएस ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए प्राथमिकता पर इस कारण मात्र प्रस्तावित किया था कि वे मुसलमानों के मामले में गुजरात में नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने कार्यकाल में किये गये प्रदर्शन का सफल संस्करण उत्तर प्रदेश में बन सकते हैं। हालांकि सामाजिक न्याय के मामले में उनसे संघ को बहुत अपेक्षायें नहीं थी क्योंकि वे गोरखपुर की उस गोरक्षा पीठ के वारिस हैं, जिसका गठन मनुवाद के खिलाफ हुआ था और यह पीठ सवर्णों के बीच ही आपस में सत्ता सघर्ष का गवाह शुरू से रही है; पर वर्ण व्यवस्था का पालन कराने की कसौटी पर योगी भाजपा के किसी भी दूसरे सत्ताधीश की तुलना में अधिक खरे साबित हुए हैं। अभी जिन पिछड़े नेताओं ने उनकी जातिगत आधार पर भेदभाव परक नीति के विरोध में आवाज उठाकर पार्टी छोड़ी है, उन्हें यह आरोप लगाकर खारिज करने की कोशिश की जा रही है कि वे लोग अपने परिवार को टिकट दिलाने या अपनी सीट बदलवाने की कोशिश में थे जो पार्टी को मंजूर नहीं था। इसलिए वे पार्टी छोड़ने के पीछे दूसरी जगह यह मंशा पूरी होने की आशा में बहानेबाजी कर रहे हैं; पर यह आरोप अचानक सामने नहीं आये हैं। इसके पहले स्व0 कल्याण सिंह जब वीपी सिंह की जयंती में मुख्य अतिथि बनकर लखनऊ आये थे तो पिछड़े वर्ग और दलितों को प्रशासन में बेहतर पोस्टिंग के मामले में उपेक्षित किये जाने का आरोप उन्होंने भी प्रकारांतर से लगाया था। अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने भी की पोस्टिंग में पिछड़ों को समुचित भागीदारी दिलाने के लिए आवाज बुलंद की थी, जिसके कारण उन्हें कुछ दिनों तक को केन्द्रीय मंत्रिमंडल से बाहर हो जाना पड़ा था। उपेक्षित जातियों के नेताओं में ही नहीं उनमें निचले स्तर तक उपेक्षित किये जाने का एहसास था, जिसकी वजह से भाजपा छोड़ने वाले मंत्री, विधायकों द्वारा यह मुद्दा उठाये जाने से उनके जख्म खुरच गये और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा की स्थिति खराब हुई। साथ-साथ में गवर्नेंस का परिचय न दे पाने की वजह से भी उत्तर प्रदेश में एन्टी कोम्बेंसी फैक्टर गाढ़ा हुआ। कहने की जरूरत नहीं कि योगी की वजह से भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता में दोबारा लौटना मुश्किल हो रहा है, जिसके चलते उन्हें चुनाव अभियान में पीछे किया गया है। फिर भी कोई यह समझे कि चुनाव नतीजों में भाजपा को अगर मामूली बहुमत मिला तो योगी फिर से मुख्यमंत्री नहीं बन पायेंगे ऐसा सोचने वाले गलतफहमी में हैं। संघ की जरूरतों के लिए तो शूद्र नेता नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में वरण करना मजबूरी की अंतरिम व्यवस्था है। संघ तो हिन्दू राष्ट्र का सामाजिक माडल साकार करना चाहता है, तभी हिन्दू राष्ट्र का सपना साकार हो सकता है। योगी इसके लिए सबसे मुफीद हैं, इसलिए संघ अब योगी का कद नहीं गिरने देगा और चाहे पर्याप्त बहुमत मिले या सीमांत बहुमत; मुख्यमंत्री की कुर्सी से योगी टस से मस नहीं किये जायेंगे।
वैसे भी मोदी ऐसे सामाजिक माडल वाले हिन्दू राष्ट्र की ओर ही कदम बढ़ाने वाले मोहरे साबित हो रहे हैं। अपने पहले प्रधानमंत्रित्व काल में अपने पिछड़ी जाति का होने का वे जिस तरह दम भरते थे, वैसी दुहाई देना उन्होंने अब बंद कर दिया है। उनके मंत्रिमंडल में भी कोई पिछड़ा महत्वपूर्ण पद पर नहीं है। आरक्षण को धता बताने के लिए उन्होंने लेटरिल इंट्री का फार्मूला तय किया है। वे पिछले कार्यकाल में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की विचारधारा का बहुत हवाला देते रहे हैं, लेकिन अपने कृतित्व में उन्होंने अपने को वर्ण व्यवस्था का स्वामी भक्त सिपाही सिद्ध किया है। मोदी संघ की मंशा को अच्छी तरह भांपते हैं, इसलिए योगी द्वारा कई बार अपनाई जा चुकी अवज्ञाकारी मुद्राओं को भी झेलना अब उन्हें मंजूर हो गया है। सवाल यह है कि सवर्णों का मानसिक और बौद्धिक प्रभुत्व क्या अभी भी इतना मजबूत है कि बाहुल्य में होने के बावजूद हिन्दू समाज के वंचित तबके उनकी उंगलियों पर अपने को नाचने के लिए मजबूर पा रहे हैं।
बाबा साहब अम्बेडकर के साथ-साथ सवर्ण होते हुए भी डा0 राम मनोहर लोहिया ने राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता के लिए सामाजिक लोकतंत्र कायम करने को अनिवार्य माना था। इन दोनों महापुरूषों का सोचना था कि देश में सही तरीके से नागरिक तंत्र स्थापित करने के लिए वर्ण व्यवस्था का टूटना लाजिमी हो गया है, लेकिन दोनों किसी भी रूप में वर्ण व्यवस्था की वापिसी नहीं चाहते थे। यानी यह नहीं चाहते थे कि वर्ण व्यवस्था के पिरामिड में अभी जिस तरह से सवर्ण हैं, उस तरह से दलित और पिछड़े स्थापित कर दिये जायें। उनके लिए वर्ण व्यवस्था की समाप्ति का चरण साफ सुथरे और आदर्श लोकतंत्र को कायम करना था। यानी लोकतांत्रिक मूल्य सर्वोच्च थे, जिनके निर्वाह के लिए डा0 लोहिया ने केरल की पहली गैर कांग्रेसी सरकार को भंग करा दिया था और जिसकी वजह से डा0 लोहिया की पार्टी विभाजित हो गई थी। दोनों महापुरूष सोचते थे कि अगर सत्ता पिछड़ों और दलितों के पास आयेगी तो वह लोकतंत्र के लिए अधिक समर्पित होंगे, क्योंकि उन्होंने समाज व्यवस्था के औपनिवेशिक स्वरूप के दंश को झेला है। …पर उनके वैचारिक उत्तराधिकारी इस कसौटी पर अपने को खरा साबित नहीं कर पाये। उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने पर अम्बेडकरवादी मायावती ने सामंती तौर तरीके अपनाकर लोकतंत्र को सूली पर लटका दिया। डा0 अम्बेडकर तो ईमानदारी के लिए इतना प्रतिबद्ध थे कि जब उनके इकलौते पुत्र को जरिया बनाकर उन्हें इमोशनल ब्लैकमेल करके उनसे गलत काम कराने की कोशिश की गई तो उन्होंने अपने पुत्र का दिल्ली से पुणे का वापिसी का टिकट कटवा दिया; पर मायावती ने तो ट्रांसफर पोस्टिंग में रुपए लेने व मासिक वसूली तय करने का ऐसा रिवाज चलाया कि स्वच्छ प्रशासन की कल्पना ही दूभर हो गई। उत्तर प्रदेश और बिहार की पिछड़ी सरकारों ने फासिस्टशाही की ऐसी इंतहा कर डाली गई कि अगर डा0 लोहिया जिंदा होते तो ऐसी समाजवादी संतानों को नकारने में देर न लगाते। साम्प्रदायिकता के विरोध और दलितों के संदर्भ में सामाजिक न्याय को लेकर इनके विचार बहुत दूषित रहे। डा0 लोहिया ने तो चुनाव हारना मंजूर किया लेकिन तुष्टीकरण नहीं। उनका लक्ष्य बहुसंख्यक हठधर्मिता की तरह ही अल्पसंख्यक हठधर्मिता के आगे भी सिर न झुकाना था। पर उनके एकलव्य मुलायम सिंह और लालू यादव ने अल्पसंख्यक कट्टरता को हवा देने के सारे रिकार्ड तोड़ दिये और भाजपा को इसी की बदौलत अपने सर्वसत्तावादी पैर देश में जमाने में सफलता मिली।


वीपी सिंह का डा0 लोहिया और उनकी विचारधारा से प्रत्यक्ष तौर पर कोई संबंध नहीं था पर कांग्रेसी संस्कार लेकर जब वे तथाकथित समाजवादियों से जुड़े तो उन्होंने डा0 लोहिया और जयप्रकाश नारायण के विचारों व संकल्पों को आगे ले जाने का बेहतरीन प्रयास किया। डा0 लोहिया कहते थे कि समाज व्यवस्था में जो लोग सबसे नीचे रखे गये हैं, सबसे पहले उन्हें आगे किया जाये। यानी दलितों और इसके बाद पिछड़ों को सवर्ण कुछ दशकों के लिए नेतृत्व की अभिलाषा छोड़ दें। इसी के तहत वीपी सिंह ने जब रामविलास पासवान को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पहल की तो अपने को उनका लेफ्टिनेंट घोषित करने वाले लालू प्रसाद यादव ने अंतिम समय में उन्हें अपना बैरी मान लिया। ऐसा लगता है कि पिछड़ी जातियों के नेतृत्व का मकसद वर्ण व्यवस्था से लड़ने की बजाय उनकी महत्वाकांक्षा यह रही कि उन्हें जनेऊ पहनने का अधिकार मिल जाये ताकि वे भी वर्ण व्यवस्था में सम्मानजनक ढं़ग से खप सकें और दलितों पर वैसी ही अन्यायपूर्ण हुकूमत चला सकें जैसी सवर्ण चलाते रहे हैं। जब-जब वे सत्ता में आये उन्होंने दलितों के प्रति अपने द्वेष का परिचय दिया जबकि सवर्णों के कृपा पात्र बनने की कोशिश करते रहे।


वीपी सिंह ने जनता दल के समय डा0 लोहिया और जेपी की मंशा के राजनीतिक सुधारों को अमल में लाने की कोशिश की, जिसके कारण उन्हें समाजवादी थिंक टैंकों का समर्थन मिलना चाहिए था, पर डाह के कारण समाजवादी चिंतक इस रास्ते से भटक गये और मुलायम सिंह जैसों की वंशवादी, परिवारवादी व फासिस्ट नीतियों को बल देने के लिए अभिशप्त हो गये, जिससे समाजवादी आंदोलन की पूरी साख मटियामेट हो गई।
आज अगर सामाजिक भेदभाव का शिकंजा कसने के खतरे के बावजूद पिछड़ों और दलितों में भाजपा की पैठ बहुत कमजोर नहीं हो पा रही है तो उसकी वजह साफ है। भाजपा के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से पूरी तरह ईमानदार हैं। नियमों के तहत प्रशासन चलाने के हामी हैं। योजनाओं के क्रियान्वयन में पक्षपात नहीं होने दे रहे हैं। उनकी सरकारों के यह सकारात्मक गुण उनका पलड़ा भारी किये हुए हैं, इसलिए तमाम बवंडरों के बावजूद सारे सर्वे उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत का निष्कर्ष प्रतिपादित कर रहे हैं।

केपी सिंह (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

’57 की क्रांति के गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह

शौर्य दिवस (18 जनवरी) पर विशेष

57 की क्रांति के गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह

पिछले दिनों पत्रकार-इतिहासकार सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ में मुक्तिसंग्राम और आदिवासी’ पढ़ते हुए 57 की क्रांति में छत्तीसगढ़ में विद्रोह की ज्वाला भड़काने वाले वीर नारायण सिंह के साथ हनुमान सिंह की वीरगाथा सामने आई। गाथा में इस बात का जिक्र पढ़कर मन और गौरवान्वित हो गया कि अंग्रेजी सेना के शिविर में ही सार्जेंट कैप्टन सिडवेल की तलवार के वार से हत्या करने वाले 5 फीट 4 इंच लंबे बलिष्ठ वीर हनुमान सिंह बैसवारे ( उत्तर प्रदेश के रायबरेली-उन्नाव के विशेष भू-भाग को मिलाकर बना क्षेत्र) के ही रहने वाले थे। पुस्तक में संदर्भ के तौर पर इतिहासकार डॉ राम कुमार बेहार किताब ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास’ को भी उद्धृत किया गया।
इतिहास कि इन किताबों में दर्ज संक्षिप्त कथा बताती है कि बैसवारे के इस गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह ने छत्तीसगढ़ में महाविद्रोह के समय रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी) में आज से 163 साल पहले 18 जनवरी 1858 को अंग्रेजी सेना के कैंप में कैप्टन सिडवेल को तलवार के वार करके मार डाला था। कैप्टन सिडवेल के नेतृत्व में नागपुर से 100 सैनिकों की अंग्रेजी पल्टन को छत्तीसगढ़ में विद्रोह दबाने के लिए रायपुर भेजा गया था। इसी पल्टन‌ में बैसवारे के वीर हनुमान सिंह मैगजीन लश्कर के रूप में शामिल थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महानायक पहाड़ी अंचल सोनाखान के जमींदर वीर नारायण सिंह को 10 दिसंबर 1857 को खुलेआम रायपुर के प्रमुख चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया। वीर नारायण सिंह को चौराहे पर तोपों से उड़ाकर छत्तीसगढ़ अंचल में महाविद्रोह को दबाने की चेष्टा अंग्रेज हुकूमत ने की थी। अंग्रेजों ने यह मान लिया था कि अब छत्तीसगढ़ अंचल में विद्रोह नहीं होगा लेकिन उन्हें यह अंदाज नहीं था कि क्रांति की ज्वाला उनके अपने सैन्य शिविर में ही धधक रही है। वीर नारायण सिंह की शहादत पर वीर हनुमान सिंह का खून खौल उठा और बदला लेने के लिए ही उन्होंने 18 जनवरी 1858 की रात अपने दो साथियों की मदद से कैप्टन सिडवेल को तलवार से 9 वार करके मौत की नींद सुला दिया था। सिडवेल को मारने के बाद वीर हनुमान सिंह ने सैन्य शिविर में घूम घूम कर बदला लेने का ऐलान किया और भारतीय सिपाहियों को विद्रोह में शामिल होने के लिए खुले रुप में साथ देने के लिए ललकारा लेकिन कोई दूसरा सिपाही उनकी जैसी हिम्मत नहीं जुटा पाया। सिडवेल की हत्या के बाद अंग्रेजी सेना के शिविर में हड़कंप मच गया। अंग्रेजी सेना ने हनुमान सिंह का साथ देने वाले दोनों सिपाहियों को पकड़ लिया लेकिन वीर हनुमान सिंह साथियों का साथ ना मिलने पर छत्तीसगढ़ अंचल के पहाड़ी जंगलों में छिप गए। सिडवेल की हत्या के बाद भी वीर हनुमान सिंह का अंग्रेजों से बदला लेने का जज्बा कम नहीं हुआ। 2 दिन बाद 20 जनवरी 1858 की आधी रात को वीर हनुमान सिंह तलवार लेकर अकेले ही शेर की मांद में शेर के शिकार का जज्बा रखते हुए रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की हत्या के इरादे से उसके बंगले में घुसे और इलियट जिस कमरे में सो रहा था, उसका दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया लेकिन दरवाजे के मजबूत होने से प्रयास असफल रहा। इसके बाद अपनी खून की प्यासी तलवार के साथ वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ों में गुम हो गए। उसके बाद उनका कोई भी पता नहीं चला। चार्ल्स इलियट के आदेश पर ही वीर नारायण सिंह को रायपुर के चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया था। इसीलिए वीर हनुमान सिंह इलियट को भी मार डालना चाहते थे लेकिन उनके मजबूत इरादों पर एलियट के बंगले के मजबूत दरवाजों ने पानी फेर दिया। अंग्रेज हुकूमत ने उनको पकड़ने के लिए हजारों जासूसों और गुप्तचरों का जाल बिछाया। ₹500 का इनाम भी घोषित किया (यह आज के 5‌ लाख रुपए से ज्यादा ही है) लेकिन अंग्रेज सेना वीर हनुमान सिंह को पकड़ने में कभी भी कामयाब नहीं हो सकी। बैसवारे के महानायक राना बेनी माधव बक्श सिंह की तरह ही वीर हनुमान सिंह भी अंग्रेजों के हत्थे नहीं चढ़े। राना बेनी माधव की तरह बाकी का जीवन उन्होंने जंगलों-पहाड़ों में ही गुजार कर जीवन लीला पूरी की। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट के साथ उस रात बंगले में ही सोए हुए लेफ्टिनेंट स्मिथ ने उस रात के भयानक मंजर के बारे में लिखा भी-"यदि उस रात हम लोग जगाए ना गए होते तो लेफ्टिनेंट इलियट और मैं तो सोए सोए ही काट डाले गए होते और बंगले के अंदर अन्य निवासियों का भी यही हाल हुआ होता।"

सिडवेल की हत्या के तुरंत बाद अंग्रेज सेना ने वीर हनुमान सिंह के दो साथ ही सिपाहियों को कैद कर लिया था। डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की अदालत में सुनवाई चली और 2 दिन बाद ही रायपुर के चौराहे पर सरेआम वीर हनुमान सिंह के नेतृत्व में अल्पकालिक विद्रोह में साथ देने वाले उनके 17 साथियों-गाजी खान (हवलदार), अब्दुल हयात, ठाकुर सिंह, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुर सिंह, अकबर हुसैन, बुलेहू दुबे, लल्ला सिंह, बदलू, परमानंद, शोभाराम, दुर्गा प्रसाद, नजर मोहम्मद, देवीदीन और जय गोविंद (सभी गोलंदाज) को 22 जनवरी 1957 को खुलेआम फांसी पर चढ़ा कर सजा-ए-मौत दे दी गई। (रायपुर गजेटियर पेज 71)

वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ में सन’ 57 की क्रांति के अग्रणी नायकों में गिने-माने जाते हैं। हालांकि महाविद्रोह की चर्चा जब भी चलती है, तब छत्तीसगढ़ अंचल से वीर नारायण सिंह का ही नाम लिया जाता है, जबकि हनुमान सिंह का दुस्साहस और शौर्य वीर नारायण सिंह से ज्यादा बड़ा था। वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत द्वारा अपनी ज़मीदारी छीने जाने के विरोध में विद्रोह किया था लेकिन वीर हनुमान सिंह तो एक साधारण सिपाही थे। उनकी संपत्ति अंग्रेजों ने जब्त नहीं की थी। इतिहास में उन्हें वीर नारायण सिंह से ज्यादा नहीं तो कम भी आंका नहीं जाना चाहिए था लेकिन इतिहास ने वीर हनुमान सिंह के साथ न्याय नहीं किया। इतिहासकार मानते हैं कि अगर अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों ने साथ दिया होता तो वीर हनुमान सिंह की बहादुरी से छत्तीसगढ़ अंचल में एक बार फिर क्रांति की ज्वाला भड़क उठती। अंग्रेजों को छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता। रायबरेली-उन्नाव के विशेष भू-भाग को मिलाकर बना बैसवारा अपने शौर्य और वीरता के लिए जाना जाता है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में राना बेनी माधव सिंह (शंकरपुर-रायबरेली) और राजा राव राम बक्श सिंह (बक्सर-उन्नाव) की शौर्य गाथा यहां जन-जन के मन में बसी है। 1857 के विद्रोह में बेगम हजरत महल का साथ देने वाले राना बेनी माधव बख्श सिंह के किले को अंग्रेजों ने तोपों से उड़ा दिया था। राना बेनी माधव बहराइच होते हुए हिमालय की वादियों में खो गए। अंग्रेज हुकूमत उनका कोई पता नहीं लगा पाई। राजा राव राम बक्स सिंह अंग्रेजों ने बक्सर में पेड़ पर सरेआम फांसी पर लटकाकर विद्रोह को कुचलने की हिमाकत की थी। '57 की क्रांति के इस गुमनाम योद्धा ने छत्तीसगढ़ अंचल में अकेले ही क्रांति की लौ जलाकर अपना और बैसवारे का नाम इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। समय रहते समाज और सरकार की ओर से वीर हनुमान सिंह के इतिहास को ढूंढने का उद्यम किया जाता तो आज वह अपने बैसवारे में ही गुमनाम न होते। होना तो यह चाहिए था कि 18 जनवरी (अंग्रेजी सैन्य अफसर सिडवेल की हत्या की तारीख) को उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ अंचल में शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता। दुर्भाग्यवश अपने इस महान सपूत के बारे में बैसवारे के लोग भी डेढ़ सौ वर्ष से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद अपरिचित ही हैं जबकि जरूरत थी कि वीर हनुमान सिंह की गौरव गाथा का गान राना बेनी माधव सिंह एवं राजा राव राम बक्स सिंह की तरह ही इस अंचल में जन-जन के बीच गाया जाता। आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा है। इस अमृत महोत्सव में भी आजादी का यह महानायक विस्मृत ही है। न छत्तीसगढ़ की सरकार ने वीर हनुमान सिंह को वह सम्मान दिया और न उत्तर प्रदेश सरकार ही सम्मान देने के बारे में सोच पाई है। समाज तो सोया हुआ है ही।

बैसवारे के इस गुमनाम योद्धा को शौर्य दिवस (18 जनवरी 1858) पर कोटि-कोटि नमन!!

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

लखनऊ में मनाई गई गुरु गोविंद सिंह जी महाराज जयंती

ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब यहीआ गंज लखनऊ में गुरु गोविंद सिंह जी महाराज मनाई गई जयंती

लखनऊ। गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब यहीआ गंज एक पावन पवित्र स्थान है। यहां पर महान बलिदानी सतगुरु श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी आकर 3 दिन रुके थे एवं नगर के आसपास की साध संगत को एक प्रभु परमात्मा के साथ जुड़कर मानव सेवा में अच्छे कार्य करने का उपदेश दिया। इसके पश्चात सन 1672 ईस्वी में बाल अवस्था में सतगुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज अपनी माता, माता गुजरी जी एवं मामा कृपाल चंद जी के साथ इस पवित्र स्थान पर 2 महीने रुके थे।

इस पवित्र स्थान से श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज का सदैव भावनात्मक संबंध रहा है। श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने वर्ष 1686 में पोटा साहिब से हस्तलिखित गुरु ग्रंथ साहिब अपने हस्ताक्षर करके इस स्थान पर भेजे थे। प्राप्त जानकारी के आधार पर इस प्रकार के हस्तलिखित श्री गुरु ग्रंथ साहिब के दर्शन भारत में बहुत दुर्लभ हैं और इसी स्थान पर मौजूद हैं ।

इसके पश्चात वर्ष 1693 ईस्वी में एवम् वर्ष 1701 ईसवी में गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के दो हुक्मनामे (हस्तलिखित चिट्ठी) यहां की संगत को भेजे गए थे, जो भाग्यवश इस पवित्र स्थान पर मौजूद एवं सुरक्षित हैं, जिनके दर्शन करके संगत अपने आप को सौभाग्यशाली महसूस करती है ।

ऐसे महान तेजस्वी युगपुरुष 700 वर्ष से बना मुगलों का साम्राज्य समाप्त करने वाले श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज का प्रकाश पर्व मनाने के लिए 9 जनवरी दिन रविवार सुबह 4:00 बजे से ही संगत आने लगी थी। गुरुद्वारा याहिया गंज साहिब में जो कि शीश महल की तरह बहुत शोभनीय दिखाई दे रहा था, उस अति शोभनीय पावन दरबार हाल में सुबह 4:00 बजे से दीवान की आरंभ था। नितनेम की 5 बाणीयों को पढ़कर की गई। उसके उपरांत श्री सुखमणि साहिब का पाठ एवं संगत मुख्य ग्रंथी ज्ञानी परमजीत सिंह जी द्वारा किया गया। उसके उपरांत श्री अखंड पाठ साहिब की संपूर्णता की गई; फिर बंगला साहिब दिल्ली से आए भाई अमनदीप सिंह जी ने आसा की वार का कीर्तन किया, फिर ज्ञानी जगजीत सिंह जाचक जी ने गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के बाल्यावस्था एवं उनके सामाजिक संघर्षों के बारे में कथा करके संगत को गुरु महाराज के सिद्धांतों से अवगत कराया। उसके उपरांत याहिया गंज के हजूरी रागी भाई वीर सिंह जी ने कीर्तन किया। लखनऊ की रहने वाली बीवी सिमरन कौर जी ने संगत को कीर्तन द्वारा निहाल किया उसके उपरांत गुरुद्वारा शीश गंज साहिब दिल्ली से आए ज्ञानी अंग्रेज सिंह जी ने संगत को गुरु महाराज के इतिहास से अवगत कराया। अमृतसर से आए भाई गुरकीरत सिंह जी ने संगत को कीर्तन श्रवण कराकर भावविभोर किया। इसके साथ ही जो गुरसिक्खी बड़ा मुकाबला रखा गया था, उसके तहत छोटे-छोटे बच्चे एवं नवयुवक सभी सिख धर्म की परंपरागत वेशभूषा में सज धज कर आए हुए थे, जिन्होंने अपने परंपरागत पोशाक का बहुत अच्छे से प्रदर्शन किया। उनको देखकर पुरातन समय की सीखी की याद आने लगी। सभी संगत के लोग उन बच्चों की परंपरागत पोशाक की सराहना कर रहे थे। गुरुद्वारा अध्यक्ष डॉ गुरमीत सिंह जी ने विजेताओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इसके साथ साथ 8 जनवरी शाम को जो प्रश्नोत्तरी जारी की गई थी, उसमें भी सैकड़ों पत्र जवाब लिखकर आए विजेताओं को गुरुद्वारा अध्यक्ष डॉक्टर गुरमीत सिंह, महासचिव सरदार परमजीत सिंह, कोषाध्यक्ष गुलशन जोहर, मनजीत सिंह तलवार, सतनाम सिंह सेठी, एस.पी.सेठी, हरमिंदर सिंह मिंदी सहित सभी सम्मानित महानुभाव ने बच्चों को पुरस्कृत कर उनका उत्साह बढ़ाया।

तत्पश्चात रात्रि के समय गुरु महाराज के प्रकाश के समय ज्ञानी अंग्रेज सिंह जी ने प्रकाश कथा की और भाई वीर सिंह जी ने नाम सिमरन वह जयकारों की गूंज से फूलों की वर्षा करते हुए गुरु महाराज का प्रकाश पर्व मनाया फूलों की वर्षा होते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि फूल गुरुद्वारा साहिब की बालकनी से नहीं मानो सीधे स्वर्ग से देवताओं द्वारा बरसाई जा रहे हो क्यों ना हो क्योंकि संगत में ही देवताओं का निवास रहता है बड़ी ही श्रद्धा भावना प्यार सम्मान सत्कार के साथ गुरुद्वारा यहीआ गंज में गुरु गोविंद सिंह जी का प्रकाश पर्व मनाया गया साथ ही जितने भी मीडिया कर्मी गुरुद्वारा साहिब में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया जो कवरेज करने के लिए पहुंचे हुए थे एवम् प्रशासनिक अधिकारियों सहित सभी श्रद्धालु जनों सभी को डॉक्टर अमरजोत सिंह देवेंद्र सिंह गगनदीप सिंह सेठी गगन बग्गा ,जसप्रीत सिंह गुरजीत छाबड़ा सन्नी आनंद द्वारा सभी का स्वागत करते हुए उनको सम्मान भेंट किया सारा दिन गुरु का लंगर अटूट वितरित किया गया।

दुनिया का सबसे पहला प्रेम पत्र!

कृष्ण कुमार यादव; पोस्ट मास्टर जनरल वाराणसी परिक्षेत्र

हम में से हर किसी ने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में प्रेम-पत्र लिखा होगा। प्रेम-पत्रों का अपना एक भरापूरा संसार है। प्रेम जैसी अनुपम भावना को व्यक्त करने के लिए शब्द सचमुच नाकाफी होते हैं। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने प्रेम-पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह नेपोलियन हों, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नार्ड शॉ हों। आज ये पत्र एक धरोहर बन चुके हैं। ऐसे में यह जानना अचरज भरा लगेगा कि दुनिया का सबसे पुराना प्रेम पत्र बेबीलोन के खंडहरों से मिला था। बेबिलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने वहां तक पहुंचा, तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिटटी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ‘मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।’ यह छोटा-सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी, जिसके लिए इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र ईसा से बहुत पहले का है और इसे ही दुनिया का प्रथम प्रेम पत्र माना जाता है।

यशस्वी व्यक्तित्व के धनी उत्तमचंद इसराणी

5 दिसम्बर/पुण्य-तिथि
यशस्वी व्यक्तित्व के धनी उत्तमचंद इसराणी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक का काम ऐसे समर्पित लोगों के बल पर खड़ा है, जिन्होंने गृहस्थ होते हुए भी अपने जीवन में संघ कार्य को सदा प्राथमिकता दी। ऐसे ही एक यशस्वी अधिवक्ता थे श्री उत्तमचन्द इसराणी। श्री इसराणी का जन्म 10 नवम्बर, 1923 को सिन्ध प्रान्त में सक्खर जिले की लाड़काणा तहसील में स्थित गाँव ‘मियाँ जो गोठ’ (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। बालपन में ही वे संघ के स्वयंसेवक बन गये थे।

उन दिनों सिन्ध में मुस्लिम गतिविधियाँ जोरों पर थीं। पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए मजहबी गुंडे रात भर हिन्दू बस्तियों में घूमते थे। ऐसे में हिन्दू समाज का विश्वास केवल संघ पर ही था। शाखा पर सैकड़ों स्वयंसेवक आते थे। शायद ही कोई हिन्दू युवक ऐसा हो, जो उन दिनों शाखा न गया हो। …पर इसके बाद भी देश का विभाजन हो गया। कांग्रेसी नेताओं की सत्ता लिप्सा ने सिन्ध, पंजाब और बंगाल के करोड़ों हिन्दुओं को अपना घर, खेत, कारोबार और वह मिट्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जिसमें वे खेल कर बड़े हुए थे। लाखों हिन्दुओं को अपनी प्राणाहुति भी देनी पड़ी।

श्री इसराणी अपने परिवार सहित मध्य प्रदेश के भोपाल में आकर बस गये। भोपाल में उन्होंने अपना परिवार चलाने के लिए वकालत प्रारम्भ कर दी। इसी के साथ वे संघ कार्य में भी सक्रिय हो गये। बहुत वर्षों तक सिन्धी कालोनी वाला उनका मकान ही संघ का प्रान्तीय कार्यालय बना रहा। इस प्रकार उत्तमचन्द जी और भोपाल का संघ कार्य परस्पर एकरूप हो गयेे। प्रारम्भ में उन्हें संघ के भोपाल विभाग कार्यवाह का दायित्व दिया गया। इसके बाद प्रान्त कार्यवाह और फिर प्रान्त संघचालक की जिम्मेदारी उन्हें दी गयी। जब मध्य भारत, महाकौशल और छत्तीसगढ़ प्रान्तों को मिलाकर एक क्षेत्र की रचना की गयी, तो उन्हें क्षेत्र संघचालक का काम दिया गया।

1975 में जब देश में आपातकाल लगा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, तो इसराणी जी पूरे समय जेल में रहे। वह अत्यन्त कठिन समय था। वकालत बन्द होने से घर की आय रुक गयी, फिर भी एक स्थितप्रज्ञ सन्त की भाँति उन्होंने धैर्य रखा और जेल में बन्द सभी साथियों को भी साहसपूर्वक इस परिस्थिति का सामना करने का सम्बल प्रदान किया। इसराणी जी को पूर्ण विश्वास था कि सत्य की जय होगी और यह स्थिति बदलेगी, चूँकि संघ ने कभी कोई गलत काम नहीं किया। 1977 में आपातकाल की समाप्ति और प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद वे फिर संघ कार्य में सक्रिय हो गये। जब उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा, तो उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से आग्रह कर दायित्व से मुक्ति ले ली। इसके बाद भी ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते जो सम्भव हुआ, काम करते रहे।

एक बार जबलपुर प्रवास में उन्हें भीषण हृदयाघात हुआ। उसके बाद उन्हें भोपाल लाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया; पर इसके बाद उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका और 5 दिसम्बर, 2007 को उनका शरीरान्त हुआ। माननीय सुदर्शन जी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ‘‘उत्तमचन्द जी ने राष्ट्र के हित में सर्वांग यशस्वी जीवन कैसे बिताया जा सकता है, इसका अनुकरणीय उदाहरण हमारे सम्मुख रखा है। यशस्वी गृहस्थ, यशस्वी अधिवक्ता, यशस्वी सामाजिक कार्यकर्ता, यशस्वी स्वयंसेवक, यशस्वी कार्यवाह और यशस्वी संघचालक जैसी भूमिकाओं को विभिन्न स्तरों पर निभाते हुए दैनन्दिन शाखा जाने के अपने आग्रह में उन्होंने कभी कमी नहीं आने दी।’’

रीवा: रोचक भी-ऐतिहासिक भी…

यात्रा संस्मरण-2
रीवा: रोचक भी-ऐतिहासिक भी…


रीवा राज्य की स्थापना गुजरात के महाराजा व्याघ्रराव (बाघ राव) ने करीब 12 सौ वर्ष पहले की थी। इन्हें बघेलवंशी राजा माना जाता है। इन्हीं की वजह से रीवा राज्य बघेलखंड कहलाया। रीवा राज्य छत्तीसगढ़ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला था। आज महाराजा बाघराव की 36 वीं पीढ़ी यहां मौजूद है। राजवंश के मौजूदा प्रतिनिधि पुष्पराज सिंह हैं।


रायबरेली-रीवा के मिलन का माध्यम रीवा की सामाजिक कार्यकर्ता अंजू दिवेदी बनीं। सोशल मीडिया पर संपर्क के बाद वह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अनुयाई परिवार का सदस्य खुद तो बनी ही अपनी सामाजिक कार्यकर्ता मित्र वंदना गुप्ता को भी स्पाई वालों से मिला दिया। आचार्य स्मृति दिवस पर 2 वर्ष से लगातार वह पधार रही हैं। पिछले साल आयोजित कार्यक्रम में वह अपनी सामाजिक कार्यकर्ता मित्र वंदना गुप्ता के साथ पधारीं थीं। ठीक एक साल बाद 21 नवंबर 2021 को हम प्रज्ञा (धर्मपत्नी) के साथ रीवा में थे। उनकी आत्मीयता और वंदना जी का केक के साथ पधारना, संबंधों के दिन पर दिन प्रगाढ़ होने का सबूत है।


महान भजन गायक प्रदीप का यह भजन.. “अपना सोचा कभी नहीं होता..”आपने सुना ही होगा। यही आज घटित हुआ। घर से सोचकर चले थे कि रीवा में आचार्य द्विवेदी अनुयाई परिवार से मिला-भेंटी के बाद अगला पड़ाव रामवन होगा। सतना के पर्यटन स्थल रामवन के बारे में प्रसिद्ध है कि भगवान राम सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के समय इधर से गुजरे थे। यहां हनुमान जी की विशाल मूर्ति और मंदिर के साथ ही तुलसी संग्रहालय काफी ख्यात है। यह संग्रहालय 1936 में सतना के एक सेठ ने स्थापित किया था। अब यह पुरातत्व विभाग के पास है। यहां एक से एक पांडुलिपियां होने का पता चला था। यहां आने के बाद रामवन जाना स्थगित हो गया। हम दोनों अंजू जी के परिवार के साथ पहुंच गए रीवा से 20 किलोमीटर दूर गोविंदगढ़। यहां पहाड़ों के ऊपर स्थित खन्धो माई के मंदिर में माथा टेकना भाग्य में बदा था।
मंदिर में काली माई की मूर्ति विराजित है। गोविंदगढ़ के कांग्रेस नेता अभय पांडे “पंकज” बता रहे थे कि रीवा रियासत के महाराजा रघुराज सिंह ने करीब 350 वर्ष पहले माई का मंदिर बनवाया था। वह रीवा रियासत के तीसवें वंश के शासक थे। इस समय रीवा रियासत में 36वें वंश के शासक मौजूद हैं। स्थानीय लोग यहां स्थापित काली माई की मूर्ति को मैहर की काली माई के रूप में मानते हैं। मैहर में शारदा माता विराजित हैं। अंजू जी की नवविवाहित ननद के आशीर्वाद समारोह में शामिल होने का अवसर अपने आप मिला।

व्हाइट लायन सफारी
रीवा से करीब 15 किलोमीटर दूर मुकुंदपुर गांव में व्हाइट लायन सफारी भी छोटे-बड़े सबके देखने के लिए अच्छी जगह है। यहां जू के साथ-साथ सफारी है। इसमें सफेद शेरों के अलावा अन्य शेर और जंगली जीव भी हैं। 365 एकड़ में बने इस सफारी को अस्तित्व में लाने का श्रेय स्थानीय विधायक और मंत्री रहे राजेंद्र शुक्ला जी को है। वर्ष 2011 में उन्होंने व्हाइट लायन सफारी सरकार से मंजूर किया था। वर्ष 1916 में यह लोगों के लिए खोल दिया गया। व्हाइट लायन का इतिहास भी बहुत पुराना है। दुर्लभ सफेद बाघों की कहानी यहां आप देख भी सकते हैं और पढ़ भी सकते हैं। सफेद बाघ को संरक्षित करने की कोशिश 27 मई 1951 को शुरू हुई थी। तभी से मोहन नाम दिया गया था गोविंदगढ़ के बाद महल में आज 1976 को आखरी सफेद बाघ विराट में अंतिम सांस ली। दुनिया में विंध्य का नाम रोशन करने वाले सफेद बाघ इतिहास बन गए। इतिहास को वर्तमान बनाने में राजेंद्र शुक्ल की कोशिश कामयाब हुई और आज लोग व्हाइट लायन सफारी बड़ी संख्या में देखने, सुनने और घूमने आते हैं।

रीवा के प्रसिद्ध चिरहुला और पपरा हनुमान मंदिर

रीवा में हनुमान जी के इंदौर प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में दर्शन किए बिना लौटना अपने साथ ही इंसाफ नहीं होगा। शहर से 5 किलोमीटर दूर चिरहुला हनुमान मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। यहां हनुमान जी का विग्रह मनमोहक है। मंदिर की तीनों दीवारों पर हनुमान जी के नौ ग्रहों की मूर्तियों की स्थापना इस मंदिर को सबसे अलग पहचान देती है। अभी तक हमने किसी भी हनुमान मंदिर की दीवारों पर विभिन्न मुद्रा के विग्रह के दर्शन का सौभाग्य नहीं प्राप्त किया था। यह केवल यहीं मिला। पपरा का हनुमान मंदिर रीवा से करीब 30 किलोमीटर दूर गोविंदगढ़-शहडोल-मैहर मार्ग पर स्थित है। मान्यता है कि हनुमान जी का विग्रह स्वयंभू है। पहाड़ के पत्थर काटते समय हनुमान जी का यह विग्रह प्रकट हुआ था। हनुमान जी की मूर्ति आधी पत्थर में धंसी हुई है और आधी बाहर निकली हुई है। यहां भव्य पक्का मंदिर निर्माण के कई प्रयास हुए, लेकिन सफलता नहीं मिली। टीन शेड और लोहे के पाइप पर ही अस्थाई मंदिर बना हुआ है।

जीवन लेने-देने से जुड़ा गोविंदगढ़ तालाब

कस्बे के गोमती चौराहे से बेला रोड पर भारी भरकम गोविंदगढ़ तालाब के उस छोर पर अस्ताचलगामी सूर्यदेव की छटा शब्दों के बयान करना मुश्किल है। गोविंदगढ़ तालाब की कहानी सुख और दु:ख दोनों से पटी है। दो दशक पहले लगातार चार-पांच साल बारिश ना होने पर तालाब के पानी ने रीवा की प्यास बुझाई थी। तालाब के पानी को रीवा ले जाया गया था। रीवा के महाराजा ने गोविंदगढ़ में अपने किले की सुरक्षा के लिए चारों तरफ तालाब खुदवाए थे। दशकों पहले सूखा पड़ने पर लोगों का जीवन बचाने के लिए महाराजा ने गोविंदगढ़ तालाब खुदवाकर लोगों को रोजगार दिया था। सैकड़ों एकड़ भूमि पर तालाब से जुड़ा एक दु:खद कथानक 15 साल पहले का है। जब एन धनतेरस के दिन सवारियों से भरी एक बस तालाब में गिर गई थी। 99 लोग इस हादसे में मारे गए थे। हादसे वाली जगह पर स्मृति स्तंभ का निर्माण भी कराया गया है। स्तंभ में हादसे में मारे गए लोगों के नाम दर्ज हैं। ऐसे ही एक नाव के डूबने का दु:खद हादसा भी तालाब में हो चुका है। जितेंद्र अंजू द्ववेदी के फार्म हाउस पर आ मॉल अमरूद की बगिया का आनंद भी इस यात्रा में हमको और प्रज्ञा दोनों को मिला। ताजे अमरूद मिलते कहां हैं? जितेंद्र द्विवेदी के साथ ही स्कूल में पढ़ाने वाले महेंद्र मिश्रा जी ने विस्तार से गोविंदगढ़ के इतिहास से भी परिचित कराया। रीवा की यात्रा जाते और आते दोनों वक्त आनंददाई रही। इस यात्रा को भविष्य में भी भूल पाना संभव नहीं होगा।

∆ गौरव अवस्थी आशीष
रायबरेली/उन्नाव (लेखक दैनिक हिंदुस्तान के प्रभारी हैं)

शमी के पौधे का हमारे जीवन में महत्व

शमी के पौधे का हमारे धर्म ग्रंथों रामायण, महाभारत और पुराणों में भी जिक्र आता है। धार्मिक रूप से भी शमी का बहुत महत्व है। इसका संबंध भगवान राम और पाण्डवों से भी रहा है। शमी की लकड़ी का कुछ विशेष यज्ञों में भी प्रयोग किया जाता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, शमी के पौधे का पूजन करने से शनि ग्रह को शांत किया जा सकता है। जिस व्यक्ति पर शनि का दुष्प्रभाव चल रहा हो, उसे अपने घर में शमी का पौधा लगाना चाहिए।

शनि के प्रभाव को शांत करता है शमी- ज्योतिष आचार्यों के अनुसार, शमी और पीपल ये दो पेड़ ऐसे हैं, जिनका प्रयोग शनि देव के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है। शनि देव या शनि ग्रह का प्रभाव हर व्यक्ति के जीवन में एक बार जरूर पड़ता है। शनि के दुष्प्रभाव से बचने के लिए घर में या घर के आस-पास शमी का वृक्ष लगाएं तथा शनिवार को इसके नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इसके अलावा शमी के फूल तथा पत्तों का भी प्रयोग शनि ग्रह के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है। मान्यता है कि घर में शमी का पेड़ लगा रहने से टोने, टोटके और नकारात्मक ऊर्जा का घर पर प्रभाव नहीं पड़ता।

शमी का धार्मिक महत्व

शमी के वृक्ष का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है, इसका वर्णन रामायण और महाभारत दोनों जगह किया गया है। रामायण में उल्लेख है कि जब लंका पर युद्ध से पहले भगवान राम ने विजय मुहूर्त में हवन किया था , तो शमी का वृक्ष उसका साक्षी बना था। इसी प्रकार महाभारत में जब अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने बृह्न्नलला का रूप लिया था, तो अपना गाण्डीव धनुष शमी के वृक्ष पर ही छिपाया था। विराट नगर के युद्घ में यहां पर से ही गाण्डीव निकाल कर कौरवों को अकेले ही भागने पर मजबूर कर दिया था। शमी के पत्तों का प्रयोग भगवान गणेश और दुर्गा मां की पूजा में भी किया जाता है।

खेजड़ी या शमी एक वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। यह वहां के लोगों के लिए बहुत उपयोगी है। इसके अन्य नामों में घफ़, खेजड़ी, जांट/जांटी, सांगरी, छोंकरा, जंड, कांडी, वण्णि, शमी, सुमरी आते हैं। इसका व्यापारिक नाम कांडी है। यह वृक्ष विभिन्न देशों में पाया जाता है जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। वैज्ञानिक नाम: Prosopis cineraria कुल: फ़ाबाकेऐवर्ग: माग्नोल्योफ़ीता

ज्योतिष और औषधि महत्व को देखते हुए आप छत पर पौधे शमी के पौधे को लगा सकते हैं। इसे दक्षिण दिशा में रखने की कोशिश करें। दक्षिण दिशा में अगर रोशनी नहीं आ पा रही है तब आप इसे पूर्व दिशा या ईशान कोण में भी लगा सकते हैं।

डिसक्लेमर

‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।’

52 राजाओं को साथ लेकर रिहा हुए थे छठे पातशाही हरगोबिंद सिंह

गुणवंत सिंह राठौर

सिक्ख धर्म में महत्त्वपूर्ण है बंदी छोड़ दिवस।
52 राजाओं को साथ लेकर रिहा हुए थे छठे पातशाही हरगोबिंद सिंह। दीवाली की तरह मनाया जाता है यह दिन।


नूरपुर (बिजनौर)। सिक्ख धर्म में बंदी छोड़ दिवस का विशेष महत्त्व है। इस दिन को सिक्ख धर्म में दीवाली की तरह मनाया जाता है। इतिहासकारों के मुताबिक मध्यप्रदेश के ग्वालियर का किला जब मुगलों के कब्जे में आया तो उन्होंने इसे जेल बना दिया। यहां राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण और बादशाहत के लिए खतरा माने जाने वाले लोगों को कैद रखा जाता था। मुगल बादशाह जहांगीर ने भी इसमें 52 अन्य राजाओं के साथ 6 वें सिख गुरू हरगोविंद साहब को कैद रखा था। कहा जाता है कि किसी रूहानी हुक्म से बादशाह ने आज के दिन ही गुरू हरगोविंद साहब को उनकी इच्छा के मुताबिक 52 राजाओं के साथ रिहा किया था। इसकी याद में किले पर गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ का निर्माण कराया गया।  

हरगोविंद साहिब के साथ रिहा हुए 52 कैदी

इतिहास के मुताबिक जहाँगीर ने गुरु हर गोबिंद साहिब को ग्वालियर के किले में बंदी बनाया था। उन्हें लगभग दो साल तक कैद में रखा।किंवदंतियों के मुताबिक गुरू हरगोविंद को कैद किए जाने के बाद से जहांगीर को स्वप्न में किसी फकीर से गुरू जी को आजाद करने का हुक्म मिलने लगा। जहांगीर मानसिक रूप से परेशान रहने लगा। इसी दौरान मुगल शहंशाहों के किसी करीबी फकीर ने उसे मशविरा दिया कि वह गुरू हरगोविंद साहब को तत्काल रिहा कर दे। …लेकिन गुरू अड़ गए कि उनके साथ 52 राजाओं को भी रिहा किया जाए। लिहाजा उनके साथ 52 कैदियों को भी छोड़ दिया गया।

 
52 कलियों के अंगरखे को पकड़ बाहर आए राजा

जहांगीर के मुताबिक उन 52 राजाओं को रिहा करना मुगल साम्राज्य के लिए खतरनाक था, लिहाजा उसने कूटनीतिक आदेश दिया। जहांगीर का हुक्म था कि जितने राजा गुरू हरगोविंद साहब का दामन थाम कर बाहर आ सकेंगे, वो रिहा कर दिए जाएंगे। सिख गुरू चाहते थे कि उनके साथ कैद सभी राजा रिहा हों, लिहाजा गुरू जी के भाई जेठा ने युक्ति सोची। जेल से रिहा होने पर नया कपड़ा पहनने के नाम पर 52 कलियों का अंगरखा सिलवाया गया। गुरू जी ने उस अंगरखे को पहना, और हर कली के छोर को 52 राजाओं ने थाम लिया। इस तरह सब राजा रिहा हो गए।
गुरू जी के इस कारनामे की वजह से उन्हें दाता बंदी छोड़ कहा गया। बाद में उनकी इस दयानतदारी की याद बनाए रखने के लिए ग्वालियर किले पर उस स्थान पर एक गुरुद्वारा स्थापित कराया गया, जहां गुरू हरगोविंद साहब 52 राजाओं के साथ कैद रहे थे। गुरू जी के नाम पर इसका नाम भी गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब रखा गया।

‘जटाकुंड’ में मनाया गया भव्य दीपोत्सव

2 दिसंबर को स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पुण्यतिथि। इस अवसर पर सुंदरकांड पाठ व विशाल भंडारे का आयोजन।

लखनऊ। अयोध्या जिला अंतर्गत सोहावल तहसील की नंदीग्राम ग्राम सभा में स्थित जटाकुंड पर स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव स्मृति ट्रस्ट द्वारा भव्य दीपोत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

ज्ञात हो कि जटा कुंड वही पौराणिक स्थल है, जहां वनवास से अयोध्या आगमन पर प्रभु श्रीराम व लक्ष्मण जी ने जटाएं बनवाने के लिए उपरांत स्नान किया था। इस अवसर पर जटा कुंड की साफ सफाई करके ट्रस्ट के सदस्यों एवं स्थानीय लोगों ने कुंड के चारों तरफ दिए जलाए। जटाकुंड पर स्थित हनुमान मंदिर पर पूजा अर्चना कर दीपावली मनाई गई। ट्रस्ट के सूत्रों द्वारा जानकारी दी गई कि आगामी 2 दिसंबर को स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पुण्यतिथि के अवसर पर सुंदरकांड पाठ व विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाएगा

कायस्थ 24 घंटे के लिए क्यों नहीं करते कलम का उपयोग?

जब भगवान राम के राजतिलक में निमंत्रण छूट जाने से नाराज भगवान् चित्रगुप्त ने रख दी थी कलम !! उस समय शुरू हो चुका था परेवा काल।

लखनऊ (शैली सक्सेना)। परेवा के दिन कायस्थ समाज के लोग कलम का प्रयोग नहीं करते हैं। यानी किसी भी तरह का का हिसाब – किताब नहीं करते हैं। आखिर ऐसा क्यूँ है कि पूरी दुनिया में कायस्थ समाज के लोग दीपावली के दिन पूजन के बाद कलम रख देते हैं और फिर यम द्वितीया के दिन कलम-दवात के पूजन के बाद ही उसे उठाते हैं?

इसको लेकर सर्व समाज में कई सवाल अक्सर लोग कायस्थों से करते हैं। ऐसे में अपने ही इतिहास से अनभिग्य कायस्थ युवा पीढ़ी इसका कोई समुचित उत्तर नहीं दे पाती है। जब इसकी खोज की गई तो इससे सम्बंधित एक बहुत रोचक घटना का संदर्भ किवदंतियों में मिला….

…कहते हैं कि जब भगवान राम दशानन रावण का वध कर अयोध्या लौट रहे थे, तब उनके खडाऊं को राज सिंहासन पर रख कर राज्य चला रहे राजा भरत ने गुरु वशिष्ठ को भगवान राम के राजतिलक के लिए सभी देवी देवताओं को सन्देश भेजने की व्यवस्था करने को कहा। गुरु वशिष्ठ ने ये काम अपने शिष्यों को सौंप कर राज्यतिलक की तैयारी शुरू कर दीं।

भगवान राम ने पूछा- ऐसे में जब राज्यतिलक में सभी देवी देवता आ गए तब भगवान राम ने अपने अनुज भरत से पूछा भगवान चित्रगुप्त नहीं दिखाई दे रहे हैं। इस पर जब खोजबीन हुई तो पता चला कि गुरु वशिष्ठ के शिष्यों ने भगवान चित्रगुप्त को निमंत्रण पहुंचाया ही नहीं था। इसके चलते भगवान चित्रगुप्त नहीं आये। इधर भगवान चित्रगुप्त सब जान चुके थे और इसे प्रभु राम की महिमा समझ रहे थे। फलस्वरूप उन्होंने गुरु वशिष्ठ की इस भूल को अक्षम्य मानते हुए यमलोक में सभी प्राणियों का लेखा जोखा लिखने वाली कलम को उठा कर एक किनारे रख दिया।

रुके स्वर्ग और नरक के सारे काम- सभी देवी देवता जैसे ही राजतिलक से लौटे तो पाया कि स्वर्ग और नरक के सारे काम रुक गये थे, प्राणियों का लेखा-जोखा न लिखे जाने के चलते ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि किसको कहां भेजें?
तब गुरु वशिष्ठ की इस गलती को समझते हुए भगवान राम ने अयोध्या में भगवान विष्णु द्वारा स्थापित भगवान चित्रगुप्त के मंदिर (श्री अयोध्या महात्मय में भी इसे श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है। धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता।) में गुरु वशिष्ठ के साथ जाकर भगवान चित्रगुप्त की स्तुति की और गुरु वशिष्ठ की गलती के लिए क्षमा याचना की। इसके बाद भगवान राम का आग्रह मानकर भगवान चित्रगुप्त ने लगभग ४ पहर (२४ घंटे बाद ) पुन: कलम दवात की पूजा करने के पश्चात उसको उठाया और प्राणियों का लेखा-जोखा लिखने का कार्य आरम्भ किया।

कायस्थ, ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय- कहते हैं कि तभी से कायस्थ दीपावली की पूजा के पश्चात कलम को रख देते हैं और यम द्वितीया के दिन भगवान चित्रगुप्त का विधिवत कलम दवात पूजन करके ही कलम को धारण करते हैं। तभी से कायस्थ, ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय हुए और इस घटना के पश्चात मिले वरदान के फलस्वरूप सबसे दान लेने वाले ब्राह्मणों से दान लेने का हक़ सिर्फ कायस्थों को ही है।
श्री चित्रगुप्त भगवान की जय

गोवर्धन पूजा पर मांगी खुशहाली और समृद्धि की मनौती

लखनऊ (शैली सक्सेना)। पांच दिवसीय दीपावली पर्व श्रृंखला में शुक्रवार को गोवर्धन पर्व मनाया गया। लोगों ने अपने घर में गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर उसे फूलों से सजाया। गोवर्धन पर्वत के पास ग्वाल-बाल और पेड़ पौधों की आकृति भी बनाई। इसके बीच में भगवान कृष्ण की मूर्ति रख कर षोडशोपचार विधि से पूजन किया। लोगों ने गोवर्धन पूजा सुबह और शाम के समय मुहूर्त के अनुसार की। इस अवसर पर भगवान को तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाने के साथ ही गोवर्धन पूजा की व्रत कथा सुन कर प्रसाद वितरित किया गया।

गोवर्धन पूजा का महत्व: मान्यता के अनुसार  गोवर्धन पूजा करने से धन, संतान और गौ रस की वृद्धि होती है। प्रकृति और भगवान श्री कृष्ण को समर्पित इस पर्व के दिन कई मंदिरों में धार्मिक आयोजन और अन्नकूट यानी भंडारे होते हैं। पूजन के बाद लोगों में प्रसाद बांटा जाता है। इस दिन आर्थिक संपन्नता के लिए गाय को स्नान कराकर उसका तिलक किया जाता है। गाय को हरा चारा और मिठाई खिलाने के बाद गाय की 7 बार परिक्रमा की जाती है। इसके बाद गाय के खुर की पास की मिट्टी एक कांच की शीशी में लेकर उसे अपने पास रख लिया जाता है।मान्यता है ऐसा करने से धन-धान्य की कभी कमी नहीं होगी। 

गोवर्धन पूजा की शुरुआत- गोवर्धन पूजा को लोग अन्नकूट पूजा के नाम से भी जानते हैं। दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का विधान है। इस दिन गोवर्धन पर्वत, गोधन यानि गाय और भगवान श्री कृष्ण की पूजा का विशेष महत्व है। इसके साथ ही वरुण देव, इंद्र देव और अग्नि देव आदि देवताओं की पूजा का भी विधान है। गोवर्धन पूजा में विभिन्न प्रकार के अन्न को समर्पित और वितरित किया जाता है, इसी वजह से इस उत्सव या पर्व का नाम अन्नकूट पड़ा है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं अनुसार द्वापर युग में जब इंद्र ने अपना मान जताने के लिए ब्रज में तेज बारीश की थी तब भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर ब्रज वासियों की मूसलाधार बारिश से रक्षा की थी। जब इंद्रदेव को इस बात का ज्ञात हुआ कि भगवान श्री कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं तो उनका अहंकार टूट गया। इंद्र ने भगवान श्री कृष्ण से क्षमा मांगी। गोवर्धन पर्वत के नीचे सभी गोप-गोपियाँ, ग्वाल-बाल, पशु-पक्षी सुख पूर्वक और बारिश से बचकर रहे। कहा जाता है तभी से गोवर्धन पूजा मनाने की शुरुआत हुई।

बहादुर शाह ज़फ़र ने रखी थी बरतानिया हुकूमत के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई की नींव

लखनऊ। बहादुर शाह ज़फ़र ने बरतानिया हुकूमत के खिलाफ जो किया उसे चाहे बगावत कहा जाए, चाहे आजादी की लड़ाई, पर आजादी की नींव वहीं से रखी गई थी। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी ने राजधानी लखनऊ में ‘बहादुर शाह ज़फ़र जयन्ती समारोह’ में बोलते हुए कही।

राजधानी लखनऊ में आयोजित ‘बहादुर शाह ज़फ़र जयन्ती समारोह’ में बोलते हुए विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी ने कहा कि बहादुर शाह ज़फ़र ने बरतानिया हुकूमत के खिलाफ जो किया उसे चाहे बगावत कहा जाए, चाहे आजादी की लड़ाई पर आजादी की नींव वहीं से रखी गई थी। ऐसे ही बलिया की धरती पर शुरू हुए सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन का भी शीर्ष महत्व है। चौधरी ने कहा कि आज फिर समझने और एक होकर स्थिति का मुकाबला करने की जरूरत है, अन्यथा जैसे हम कभी अंग्रेजों के गुलाम थे आगे कुछ पूंजीपतियों के गुलाम होंगे।

उन्होंने अमर शहीद महान स्वतंत्रता सेनानी बहादुर शाह ज़फ़र को याद करते हुए कहा कि हमें बदलाव की ओर चलना पड़ेगा। चौधरी ने एक कविता की लाइनों के साथ अपनी बात पूरी की ‘गंगा की कसम, जमुना की कसम यह ताना बाना बदलेगा, कुछ तुम बदलो कुछ हम बदलें, तब सारा जमाना बदलेगा’।

इस अवसर पर वामपंथी नेता अतुल कुमार अंजान ने कहा कि 24 अक्टूबर बहुत ही पाक और मुकद्दस दिन है, इस दिन पर आयोजित यह प्रोग्राम बेहद खास है। आज जब हम आजादी की 75वीं सालगिरह मना रहे हैं तो लखनऊ वालों से मेरी यह गुजारिश है कि अब वास्तविक अर्थों में बहादुर शाह ज़फ़र को याद किया जाए। उन्होंने कहा कि जिसके विचारों के साये तले दो तिहाई दुनिया चलती है, उन कार्ल मार्क्स जैसे विचारक ने भी ढेर सारे आर्टिकल ‘फर्स्ट फ्रीडम वार ऑफ इंडिया’ पर लिखे हैं। अंजान ने कहा कि ऐसी अजीम शख्शियत को याद करते हुए हमें एक दूसरे के एहतराम का संकल्प लेना चाहिए। चुनौतियों के इस दौर में मिलजुलकर ही इस देश को आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि लखनऊ का आजादी के पहले और बाद में भी देश के लिए बड़ा योगदान रहा। भारत के संविधान निर्माण के समय की एक बात का जिक्र करते हुए बताया कि इसी लखनऊ के भगवान दीन ने कहा था कि इस संविधान में नारियों के मौलिक अधिकारों की बात को शामिल करना भी जरूरी है।

इससे पहले कांग्रेस मीडिया विभाग के डिप्टी चेयरमैन डॉ पंकज श्रीवास्तव ने बहादुर शाह ज़फ़र के भारत की आजादी के लिए किये गए संघर्ष को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि 70 साल के उस शख्श द्वारा जलायी गई आजादी की मशाल की तपिश में एक दिन ब्रिटिश हुकूमत का सूरज अस्त हो गया।

प्रोफेसर साबिरा हबीब ने बताया कि दूसरे लोग जिसे बगावत कहते हैं, बहादुर शाह ज़फ़र ने ही आजादी की उस लड़ाई को शुरू किया था। आगे चलकर यही लड़ाई हमारी जम्हूरियत का सबब बनी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए गिरि विकास अध्ययन संस्थान के डॉ एके सिंह ने कहा कि जो लोग अपने पूर्वजों को याद नहीं करते उनकी आने वाली पीढ़ियों उनको भी याद नहीं करतीं।

समारोह में मुख्य अतिथि नेता राम गोविन्द चौधरी एवं मंचासीन अन्य अतिथियों ने शहर की कई हस्तियों को सम्मानित भी किया। सम्मान पाने वालों में प्रदीप कपूर, डॉक्टर अब्दुल कुददूस, डॉक्टर कौसर उस्मान,  शिव शरण सिंह, बीडी नक़वी, मधुकर त्रिवेदी, अमीर हैदर, सुरेंद्र सिंह चौधरी, श्रीमती शिल्पा चौधरी, बेचई यादव, डॉक्टर उदय खत्री शामिल रहे।
बहादुर शाह जफर की कुर्बानी के संदेश के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन भी रामगोविंद चौधरी ने किया। समारोह के संयोजक इंसराम अली ने सभी अतिथियों का स्वागत कर यह अपील किया कि आज की युवा पीढ़ी आजादी के पहले के सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के जीवन का अध्ययन जरूर करें, जिससे कि युवा पीढ़ी को यह पता रहे कितनी कुर्बानियों के बाद हिंदुस्तान को आजादी मिली थी।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अब्दुल कयूम रहमानी फाउंडेशन के अध्यक्ष बदरे आलम ने सभी आगंतुकों का स्वागत कर आभार व्यक्त किया। अंत में पूर्व एमएलसी सिराज मेहंदी ने सभी आगंतुकों का आभार जताया। उन्होंने कार्यक्रम के आयोजक इंसराम अली और उनकी टीम को धन्यवाद दिया। इस अवसर पर प्रमुख वरिष्ठ पत्रकार एहतेराम सिद्दीकी, चांद मियाँ सभासद, खालिद अंसारी, औसाफ़ अकबर सहित आदि उपस्थित थे।

आज है भारतीय जनसंघ का स्थापना दिवस

दीपक या दीया – अखिल भारतीय जनसंघ का चुनाव चिह्न
भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी

भारतीय जनसंघ भारत का एक पुराना राजनैतिक दल था जिससे 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। इस दल की स्थापना डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में की गयी थी। इस पार्टी का चुनाव चिह्न दीपक था। इसने 1952 के संसदीय चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थीं, जिनमें डाक्टर मुखर्जी स्वयं भी शामिल थे।दीपक या दीया – अखिल भारतीय जनसंघ का चुनावचिह्न था।भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल (1975-1976) के बाद जनसंघ सहित भारत के प्रमुख राजनैतिक दलों का विलय कर के एक नए दल जनता पार्टी का गठन किया गया। आपातकाल से पहले बिहार विधानसभा के भारतीय जनसंघ के विधायक दल के नेता लालमुनि चौबे ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में बिहार विधानसभा से अपना त्यागपत्र दे दिया। जनता पार्टी 1980 में टूट गयी और जनसंघ की विचारधारा के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। भारतीय जनता पार्टी 1998 से 2004 तक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार की सबसे बड़ी पार्टी रही थी। 2014 के आम चुनाव में इसने अकेले अपने दम पर सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की।

लोकसभा चुनावों में उत्तरोत्तर सफलता

  • 1952 में 3.1 प्रतिशत वोट 3 सीट,
  • 1957 में 5.9 प्रतिशत वोट 4 सीट,
  • 1962 में 6.4 प्रतिशत वोट और 14 सीट, तथा
  • 1967 में 9.4 प्रतिशत वोट 35 सीट हासिल की।
  • 1971 में 7.37 प्रतिशत वोट 22 सीट हासिल की।

जनसंघ के अध्यक्ष

भारतीय जनता पार्टी के गठन के पश्चात

कुंडलिनी योग: हिंदू धर्म रूपी पेड़ पर उगने वाला मीठा फल, सिर्फ तब तक, जब तक है पेड़

साभार

दोस्तों, यह पोस्ट शांति के लिए और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए समर्पित है। क्योंकि कुंडलिनी योग विशेषरूप से हिंदु धर्म से जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसको कतई भी अनदेखा नहीँ किया जा सकता। मैं वैसा बनावटी और नकली योगी नहीँ हूँ कि बाहर से योग-योग करता फिरूँ और योग के मूलस्थान हिंदूवाद पर हो रहे अत्याचार को अनदेखा करता रहूँ। अभी हाल ही में इस्लामिक आतंकियों ने कश्मीर में एक स्कूल में घुसकर बाकायदा पहचान पत्र देखकर कुछ हिंदुओं-सिखों को मार दिया, और मुस्लिम कर्मचारियों को घर जाकर नमाज पढ़ने को कहा। इसके साथ ही, बांग्लादेश में मुस्लिमों की भीड़ द्वारा हिंदुओं और उनके धर्मस्थलों के विरुद्ध व्यापक हिंसा हुई। उनके सैकड़ों घर जलाए गए। उन्हें बेघर कर दिया गया। कई हिंदुओं को जान से मार दिया गया। जेहादी भीड़ मौत का तांडव लेकर उनके सिर पर नाचती रही। सभी हिंदु डर के साए में जीने को मजबूर हैं। मौत से भयानक तो मौत का डर होता है। यह असली मौत से पहले ही जिंदगी को खत्म कर देता है। इन कट्टरपंथियों के दोगलेपन की भी कोई हद नहीँ है। हिंदुओं के सिर पर तलवार लेके खड़े हैं, और उन्हीं को बोल रहे हैं कि शांति बनाए रखो। भई जब मर गए तो कैसी शान्ति। हिंसा के विरुद्ध कार्यवाही करने के बजाय हिंसा को जस्टिफाई किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि कुरान का अपमान हुआ, इस्लाम का अपमान हुआ, पता नहीँ क्या-2। वह भी सब झूठ और साजिश के तहत। फेसबुक पर झूठी पोस्ट वायरल की जा रही है। पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां चुपचाप मूकदर्शक बनी हुई हैं। उनके सामने भी हिंसा हो रही है। धार्मिक हिंसा के विरुद्ध सख्त अंतरराष्ट्रीय कानून बनाए जाने की सख्त जरूरत है। दुनियादारी मानवीय नियम-कानूनों से चलनी चाहिए। किसी भी धर्म में कट्टरवाद बर्दाश्त नहीं होना चाहिये। सभी धर्म एक-दूसरे की ओर उंगली दिखाकर अपने कट्टरवाद को उचित ठहराते हुए उसे जस्टिफाई करते रहते हैं। यह रुकना चाहिए। कट्टरवाद के खिलाफ खुल कर बोलना चाहिए। मैं जो आज आध्यात्मिक अनुभवों के शिखर के करीब पहुंचा हूँ, वह कट्टरपंथ के खिलाफ बोलते हुए और जीवन जीते हुए ही पहुंचा हूँ। कई बार तो लगता है कि पश्चिमी देशों की हथियार निर्माता लॉबी के हावी होने से ही इन हिंसाओं पर इतनी अंतरराष्ट्रीय चुप्पी बनी रहती है। 

इस्कॉन मंदिर को गम्भीर रूप से क्षतिग्रस्त किया गया, भगवान की मूर्तियां तोड़ी गईं, और कुछ इस्कॉन अनुयायियों की बेरहमी से हत्या की गई। सबको पता है कि यह सब पाकिस्तान ही करवा रहा है। इधर दक्षिण एशिया में बहुत बड़ी साजिश के तहत हिंदुओं का सफाया हो रहा है, उधर पूरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप, संयुक्त राष्ट्र संघ चुप, मानवाधिकार संस्थाएँ चुप। क्या हिंदुओं का मानवाधिकार नहीँ होता? क्या हिंदु जानवर हैँ? फिर यूएनओ की पीस कीपिंग फोर्स कब के लिए है। हिंदुओं के विरुद्ध यह साजिश कई सदियों से है, इसीलिए तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की जनसँख्या कई गुणा कम हो गई है, और आज विलुप्ति की कगार पर है, पर मुसलमानों की जनसंख्या कई गुना बढ़ी है। अफगानिस्तान और म्यांमार में भी हिंदुओं के खिलाफ ऐसे साम्प्रदायिक हमले होते ही रहते हैं। यहाँ तक कि भारत जैसे हिन्दु बहुल राष्ट्र में भी अनेक स्थानों पर हिंदु सुरक्षित नहीं हैं, विशेषकर जिन क्षेत्रों में हिन्दु अल्पसंख्यक हैं। आप खुद ही कल्पना कर सकते हैं कि जब भारत जैसे हिन्दु बहुल देश के अंदर और उसके पड़ोसी देशों में भी हिंदु सुरक्षित नहीं हैं, तो 50 से ज्यादा इस्लामिक देशों में हिंदुओं की कितनी ज्यादा दुर्दशा होती होगी। पहले मीडिया इतना मजबूत नहीं था, इसलिए दूरपार की दुनिया ऐसी साम्प्रदायिक घटनाओँ से अनभिज्ञ रहती थी, पर आज तो अगर कोई छींकता भी है, तो भी ऑनलाइन सोशल मीडिया में आ जाता है। इसलिए आज तो जानबूझकर दुनिया चुप है। पहले संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाएँ नहीं होती थीं, पर आज भी ये संस्थाएँ न होने की तरह ही हैं, क्योंकि ये अल्पसंख्यकों को कोई सुरक्षा नहीँ दे पा रही हैं। वैसा बॉस भी क्या, जो अपने मातहतों को काबू में न रख सके। मुझे तो यह दिखावे का यूएनओ लगता है। उसके पास शक्ति तो कुछ भी नहीँ दिखती। क्योँ वह नियम नहीं बनाता कि कोई देश धर्म के आधार पर नहीँ बन सकता। आज के उदारवादी युग में इस्लामिक राष्ट्र का क्या औचित्य है। इसकी बात करना ही अल्पसंख्यक के ऊपर अत्याचार है, लागू करना तो दूर की बात है। जब इस्लामिक राष्ट्र का मतलब ही अन्य धर्मों पर अत्याचार है, तो यूएनओ इसकी इजाजत कैसे दे देता है। यूएनओ को चाशनी में डूबा हुआ खंजर क्यों नहीं दिखाई देता। प्राचीन भारत के बंटवारे के समय आधा हिस्सा हिंदुओं को दिया गया, और आधा मुसलमानों को। पर हिंदुओं को तो कोई हिस्सा भी नहीं मिला। दोनों हिस्से मुसलमानों के हो गए। आज जिसे भारत कहते हैं, वह भी दरअसल हिंदुओं का नहीं है। दुनिया को हिन्दुओं का दिखता है, पर है नहीँ। यह एक बहुत बड़ा छलावा है, जिसे दुनिया को समझना चाहिए। भारत में मुसलमानों को अल्पसंख्यक के नाम से बहुत से विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिसका ये खुल कर दुरुपयोग करते हैं, जिसकी वजह से आज भारत की अखंडता और संप्रभुता को खतरा पैदा हो गया लगता है। पूरी दुनिया में योग का गुणगान गाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है, पर जिस धर्म से योग निकला है, उसे खत्म होने के लिए छोड़ दिया गया है। बाहर-बाहर से योग का दिखावा करते हैं। उन्हें यह नहीं मालूम कि यदि हिंदु धर्म नष्ट हो गया, तो योग भी नहीं बच पाएगा, क्योंकि मूलरूप में असली योग हिंदु धर्म में ही है। पतंजलि योगसूत्रों पर जगदप्रसिद्ध और गहराई से भरी हुई पुस्तक लिखने वाले एडविन एफ. ब्रयांट लिखते हैं कि हिंदू धर्म और इसके ग्रँथ ही योग का असली आधारभूत ढांचा है, जैसे अस्थिपंजर मानव शरीर का आधारभूत ढांचा होता है। योग तो उसमें ऐसे ही सतही है, जैसे मानवशरीर में चमड़ी। जैसे मानव को चमड़ी सुंदर और आकर्षक लगती है, वैसे ही योग भी। पर अस्थिपंजर के बिना चमड़ी का अस्तित्व ही नहीँ है। इसलिए योग को गहराई से समझने के लिए हिन्दु धर्म को गहराई से समझना पड़ेगा। इसीलिए योग को बचाने के लिए हिन्दु धर्म और उसके ग्रन्थों का अध्ययन और उन्हें संरक्षित करने की जरूरत है। उन्होंने कई वर्षों तक कड़ी मेहनत करके हिन्दु धर्म को गहराई से समझा है, उसे अपने जीवन में उतारा है। मैंने भी हिंदु धर्म का भी गहराई से अध्ययन किया है, और योग का भी, इसलिए मुझे पता है। अन्य धर्मों का भी पता है मुझे कि वे कितने पानी में हैं। अधिकांशतः वे सिर्फ हिंदु धर्म का विरोध करने के लिए ही बने हुए लगते हैं। तो आप खुद ही सोच सकते हैं कि जब हिंदु धर्म पूरी तरह से वैज्ञानिक है, तो दूसरे धर्म कैसे होंगे। बताने की जरूरत नहीं है। समझदारों को इशारा ही काफी होता है। जिन धर्मों को अपने बढ़ावे के लिए हिंसा, छल और जबरदस्ती की जरूरत पड़े, वे धर्म कैसे हैं, आप खुद ही सोच सकते हैं। मैंने इस वेबसाइट में हिंदु धर्म की वैज्ञानिकता को सिद्ध किया है। अगर किसी को विश्वास न हो तो वह इस वेबसाइट का अध्ययन कर ले। मैं यहाँ किसी धर्म का पक्ष नहीं ले रहा हूं, और न ही किसी धर्म की बुराई कर रहा हूँ, केवल वैज्ञानिक सत्य का बखान कर रहा हूं, अपनी आत्मा की आवाज बयाँ कर रहा हूँ, अपने कुंडलिनी जागरण के अनुभव की आवाज को बयाँ कर रहा हूँ, अपने आत्मज्ञान के अनुभव की आवाज को बयाँ कर रहा हूँ, अपने पूरे जीवन के आध्यात्मिक अनुभवों की आवाज को बयां कर रहा हूँ, अपने दिल की आवाज को बयां कर रहा हूँ। मैं तो कुछ भी नहीँ हूँ। एक आदमी क्या होता है, उसका तर्क क्या होता है, पर अनुभव को कोई झुठला नहीं सकता। प्रत्यक्ष अनुभव सबसे बड़ा प्रमाण होता है। आज इस्कॉन जैसे अंतरराष्ट्रीय हिन्दु संगठन की पीड़ा भी किसी को नहीं दिखाई दे रही है, जबकि वह पूरी दुनिया में फैला हुआ है। मैंने उनकी पीड़ा को दिल से अनुभव किया है, जिसे मैं लेखन के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहा हूँ। यदि हिंदु धर्म को हानि पहुंचती है, तो प्रकृति को भी हानि पहुंचती है, धरती को भी हानि पहुंचती है। प्रकृति-पूजा और प्रकृति-सेवा का व्यापक अभियान हिंदु धर्म में ही निहित है। देख नहीँ रहे हो आप, दुनिया के देशों के बीच किस तरह से घातक हथियारों की होड़ लगी है, और प्रदूषण से किस तरह धरती को नष्ट किया जा रहा है। धरती को और उसके पर्यावरण को यदि कोई बचा सकता है, तो वह हिंदु धर्म ही है।भगवान करे कि विश्व समुदाय को सद्बुद्धि मिले।

टोक्यो पैरालिंपिक: डीएम सुहास के रैकेट का बेस प्राइज ₹50 लाख

जब भारत ने कहा ‘शुक्रिया सुहास’ “नमामि गंगे परियोजना” में किया जाएगा ई-ऑक्शन में मिली राशि का उपयोग। पदक जीतने वाले देश के पहले आईएएस।

नई दिल्ली (PIB) जो पिछले 56 साल के इतिहास में कभी नहीं हुआ वह कर दिखाया सुहास एल यथिराज ने। तभी पूरे देश के दिल से आवाज आयी शुक्रिया सुहास। टोक्यो पैरालिंपिक में नोएडा के डीएम  सुहास एल यथिराज ने बेडमिंटन की मेंस सिंगल्स प्रतियोगिता में ना केवल सिल्वर मेडल जीता बल्की इतिहास भी रच दिया। अभी तक के पैरालिंपिक खेलों में एक प्रशासनिक अधिकारी का यह सबसे बेहतरीन प्रदर्शन था। वो पदक जीतने वाले देश के पहले आईएएस बन गए ।

टोक्यो पैरालिंपिक में मेंस सिंगल्स एसएल-4 कैटिगिरी में सुहास एल यथिराज क