…अब कुतुब मीनार की खुदाई की तैयारी

नई दिल्ली (एजेंसी)। कुतुब मीनार को लेकर छिड़े विवाद के बीच ऐतिहासिक परिसर में खुदाई की जाएगी। संस्कृति मंत्रालय ने निर्देश दिए हैं कि कुतुब मीनार में मूर्तियों की Iconography कराई जाए। एक रिपोर्ट के आधार पर कुतुब मीनार परिसर में खुदाई का काम किया जाएगा। इसके बाद ASI संस्कृति मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।

संस्कृति सचिव ने अधिकारियों के साथ निरीक्षण करने के बाद यह फैसला लिया है। लिहाजा कुतुब मीनार के साउथ में और मस्जिद से 15 मीटर दूरी पर खुदाई का काम शुरू किया जा सकता है। बता दें कि कुतुब मीनार ही नहीं, अनंगताल और लालकोट किले पर भी खुदाई का काम किया जाएगा।

कुतुब मीनार परिसर में खुदाई के निर्णय से पहले संस्कृति सचिव गोविंद मोहन ने 12 लोगों की टीम के साथ निरीक्षण किया। इस टीम में 3 इतिहासकार, ASI के 4 अधिकारी और रिसर्चर मौजूद थे। इस मामले में ASI के अधिकारियों का कहना है कि कुतुबमीनार में 1991 के बाद से खुदाई का काम नहीं हुआ है।

ASI के अधिकारियों का कहना है कि कुतुब मीनार में 1991 के बाद से खुदाई का काम नहीं हुआ है। इसके अलावा कई रिसर्च भी पेंडिंग हैं, जिसकी वजह से ये फैसला लिया गया है।

विष्णु स्तम्भ नाम देने की मांग- कुतुब मीनार का नाम बदलने की मांग भी हाल ही में की गई थी। इसके बाद वहां हिंदू संगठनों के कुछ कार्यकर्ताओं ने हनुमान चालीसा का पाठ किया था। हिंदू संगठनों ने कुतुब मीनार का नाम बदलकर विष्णु स्तम्भ करने की मांग की थी। हिंदू संगठन के एक कार्यकर्ता ने कहा था कि मुगलों ने हमसे इसे छीना था। इसे लेकर हम अपनी मांगों को रख रहे हैं। हमारी मांग है कि कुतुब मीनार का नाम बदलकर विष्णु स्तम्भ किया जाए।

जारी रहेगा ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे

नई दिल्ली (एजेंसी)। वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का सर्वे जारी रहेगा। सर्वे पर तत्काल रोक लगाने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका के जरिए इस सर्वे पर रोक लगाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पेपर देखने के बाद ही कुछ बताएंगे। हालांकि इस संबंध में अर्जी पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सहमति जाहिर करते हुए कहा कि इस पर सुनवाई बाद में की जाएगी।

बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई अगले हफ्ते कर सकता है। वाराणसी के लोकल कोर्ट ने कमिश्नर को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के सर्वे का आदेश दिया है। अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी की ओर से दायर अर्जी को लेकर चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि इस मामले में हमे कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में हम तत्काल कोई आदेश कैसे जारी कर सकते हैं? हम इस मामले की लिस्टिंग कर सकते हैं। चीफ जस्टिस ने कहा कि इस मामले से जुड़ी फाइलों को हमने पढ़ा नहीं है। उनके अध्ययन के बाद ही कोई आदेश जारी किया जा सकता है।

रजत जयंती वर्ष: हम हैं राही स्मृति अभियान के

रजत जयंती वर्ष: हम हैं राही स्मृति अभियान के

यही तारीख थी नौ मई। साल 1998। अपने ही गांव-घर, जनपद, प्रदेश और देश में भुला-बिसरा दिए गए हिंदी के प्रथम आचार्य हम सबको एक भाषा, एक बोली-बानी और नवीन व्याकरण देने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृतियों को संजोने से जुड़ा अभियान शुरू हुआ। शुरुआत 42 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी के बीच रायबरेली शहर के शहीद चौक से ध्यानाकर्षण धरने के माध्यम से हुई। यह एक शुरुआत भर थी। कोई खाका नहीं। कोई आका नहीं। कुल जमा 40-50 और पवित्र संकल्प इस अभियान की नींव में थे। प्रकृति या यूं कहें खुद आचार्य जी ने शहीद चौक पर जुटे अनुयायियों की परीक्षा ली। टेंट के नीचे बैठे लोग अपने इस पूर्वज और हिंदी के पुरोधा की यादों को जीवंत बनाने का संकल्प ले ही रहे थे कि तेज अंधड़ से 18×36 का टेंट उड़ गया। लोग बाल बाल बचे लेकिन कोई डिगा न हटा। ध्यानाकर्षण धरना अपने तय समय पर ही खत्म हुआ।

पहली परीक्षा में पास होने के बाद चल पड़ा स्मृति संरक्षण अभियान आप सब के सहयोग-स्नेह और संरक्षण से कई पड़ाव पार करते हुए आज यहां तक पहुंचा है। अभियान का यह 25वां वर्ष प्रारंभ हुआ है। किसी भी परंपरा के 25 वर्ष कम नहीं होते। इस दरमियान कुछ बदला, कुछ छूटा और बहुत कुछ नया शामिल भी हुआ। इस टूटे-फूटे ही सही अभियान के भवन में न जाने कितने लोगों का पैसा, पसीना और प्यारभाव ईंट-गारे के रूप में लगा है। सबके नाम गिनाने बैठे तो कागज नामों से ही भर जाए। मन की बहुत बातें मन में ही रखनी पड़ जाएं। इसलिए बात केवल उन पड़ावों की जो यादों में अंकित-टंकित हो चुकी हैं।
    अभियान का शुरुआती मुख्य मकसद साहित्यधाम दौलतपुर को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में घोषित कराने से जुड़ा था। इसके प्रयास भी दिल्ली से लेकर लखनऊ तक हुए। खूब हुए लेकिन हिंदी के पुरोधा का जन्मस्थान राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन पाया तो नहीं बन पाया। अब इसके लिए हम खुद को गुनाहगार ठहराएं या शासन सत्ता को? राष्ट्रीय स्मारक तो छोड़िए जन्मस्थान पर एक ऐसा स्थान तक नहीं बन पाया जहां बैठकर आज  हिंदी भाषा और अपने पुरोधाओं से प्रेम करने वाली पीढ़ी प्रेम से बैठ ही सके। बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, इसलिए जरूरी है दूसरी तरफ चला जाए। अभियान से जुड़ी कुछ ऐसी तारीखें हैं, जो तवारीख बन गई।
   भला हो, कांग्रेस के सांसद रहे कैप्टन सतीश शर्मा का, जिन्होंने अभियान से प्रभावित होकर अपनी सांसद निधि से पुस्तकालय-वाचनालय का भवन जन्म स्थान के सामने आचार्य जी के सहन की भूमि पर ही निर्मित कराया। भला हिंदी के उन पुरोधा डॉ नामवर सिंह का भी हो जिन्होंने उस पुस्तकालय-वाचनालय भवन का लोकार्पण किया। यह अलग बात है कि तमाम मुश्किलों की वजह से पुस्तकालय वाचनालय संचालित नहीं हो पाया।
     साल वर्ष 2004 में एक नई शुरुआत आचार्य स्मृति दिवस के बहाने हुई। देश के शीर्षस्थ कवियों में शुमार रहे बालकवि बैरागी के एकल काव्य पाठ से शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है। वर्ष-प्रतिवर्ष यह परंपरा नई होती गई। निखरती गई। आज ‘आचार्य स्मृति दिवस’ अभियान का मुख्य केंद्र है। इस दिवस के बहाने देश भर के न जाने कितने स्नावनामधन्य साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और खिलाड़ियों को सुनने-गुनने, देखने-समझने के अवसर हम सबको मिल चुके हैं।
   

अभियान का एक असल पड़ाव तो ‘आचार्य पथ’ स्मारिका-पत्रिका भी है। प्रधान संपादक साहित्यकार -गीतकार आनंद स्वरूप श्रीवास्तव के कुशल संपादन में निरंतर 11 वर्षों से प्रकाशित हो रही इस स्मारिका ने आचार्य द्विवेदी की स्मृतियों को जीवंत बनाने में कम योगदान नहीं दिया है। देशभर के साहित्यकार आचार्य द्विवेदी पर केंद्रित लेख लिखते हैं। छपते हैं। प्रधान संपादक ने स्मारिका को ‘सरस्वती’ की तरह ही विविध ज्ञान की पत्रिका बनाने का उपक्रम भी लगातार किया है और कर रहे हैं।
    अभियान वर्ष 2015 कि वह तारीख भी नहीं भूल सकता जब ‘द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ’‌ का पुन: प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट-नई दिल्ली ने किया। इस काम में अभियान की भूमिका दुर्लभ ग्रंथों को उपलब्ध कराने भर की ही थी पर यह भूमिका भी कम नहीं थी। अभियान अपने अग्रज-बुजुर्ग रमाशंकर अग्निहोत्री को हमेशा याद करता है और रहेगा, जिन्होंने यह दुर्लभ ग्रंथ अभियान से जुड़ी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति को खुशी-खुशी सौंपा और नेशनल बुक ट्रस्ट के सहायक संपादक हिंदी पंकज चतुर्वेदी के योगदान को भी हम नहीं भूल सकते। ग्रंथ का पुनः प्रकाशन उन्हीं की बदौलत हुआ।
    हम नहीं भूल सकते राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट रायबरेली) के निदेशक डॉ. भारत साह के उस योगदान को जो एक ऐसी किताब के रूप में दर्ज है, जिसका ऐतिहासिक महत्त्व है। इस किताब का नाम है विज्ञान वार्ता। आचार्य द्विवेदी द्वारा सरस्वती के संपादन के दौरान लिखे गए तकनीक, विज्ञान और नई नई खोजों से संबंधित लेखों को मुंशी प्रेमचंद ने अपने संपादन में संग्रहित कर वर्ष1930 में विज्ञान वार्ता नाम से पुस्तक प्रकाशित की थी। इस दुर्लभ पुस्तक को भी समिति ने निफ्ट रायबरेली के निदेशक को उपलब्ध और उन्होंने पुनः प्रकाशित कराया।
    तारीख तो नहीं भूलने वाली है,10 जनवरी 2021भी। ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग प्रेरक सम्मान’ से सम्मानित प्रवासी भारतीय और कैलिफोर्निया अमेरिका में हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान देने वाली हिंदीसेवी श्रीमती मंजू मिश्रा ने आचार्य जी की स्मृतियों को सात समंदर पार जीवंत बनाने और इस बहाने प्रवासी भारतीयों की नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़े रखने का बीड़ा अपनी प्रवासी साथी श्रीमती ममता कांडपाल त्रिपाठी, श्रीमती रचना श्रीवास्तव, श्रीमती शुभ्रा ओझा और श्रीमती कुसुम नैपसिक से प्राप्त नैतिक-भौतिक-साहित्यिक-सामाजिक सहयोग के बल पर इसी दिन उठाया था। आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिकी इकाई की शुरुआत इसी दिन हुई। एक छोटे से शहर की छोटी सी शुरुआत के दुनिया के सबसे संपन्न देश अमेरिका तक पहुंचना हम जैसे अकंचिनों के लिए स्वप्न सरीखा है। समिति शुक्रगुजार है अमेरिका इकाई की सभी सदस्यों की।
     हमें याद है, 21 दिसंबर 1998 को रायबरेली शहर के राही ब्लाक परिसर में तत्कालीन खंड विकास अधिकारी श्री विनोद सिंह और (अब दिवंगत) की अगुवाई में स्थापित की गई आचार्य श्री की आवक्ष प्रतिमा के अनावरण समारोह में पधारे अनेक साहित्यकार अपने संबोधन में महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम गिना रहे थे लेकिन अनवरत 25 वर्षों के प्रयासों से अब लोगों के दिल-दिमाग में महावीर प्रसाद द्विवेदी पुनर्जीवित हो चुके हैं।
     एक साहित्यकार-संपादक की स्मृतियों को भूलने बिसराने वाले समाज के मन में पुनः स्थापित करने का काम बिना समाज के सहयोग के संभव कहां था? इस मामले में आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति समाज के सभी वर्गों-धर्मो-जातियों के लोगों की हमेशा ऋणी थी, है और रहेगी। आचार्य द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान समाज के सहयोग से आज अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर चुका है। आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति अभियान को सहयोग देने वाले ऐसे सभी गणमान्य, सामान्य और कार्यक्रमों की शोभा बढ़ाने वाले श्रोताओं-दर्शकों के प्रति हृदय से कृतज्ञता ज्ञापित करती है और आशा भी करती है कि अभियान की स्वर्ण जयंती पूर्ण कराने में भी आपका पूर्ण सहयोग-स्नेह-संरक्षण बना रहेगा।

गौरव अवस्थी
रायबरेली

9 मई ही है आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की वास्तविक जन्मतिथि

महापुरुषों की जन्मतिथि को लेकर अक्सर मत-विमत और मतभेद होते आए हैं। ऐसा ही एक मतभेद हिंदी के युग प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर भी हिंदी पट्टी में अरसे से चला आ रहा है। कुछ विद्वानों का मानना है कि आचार्य द्विवेदी की जन्म तिथि 6 मई है। कुछ विद्वान 5 मई या 15 मई को भी उनकी जन्मतिथि के रूप में मान्यता देते हैं। हालांकि अधिकतर विद्वान 9 मई को ही प्रामाणिक जन्मतिथि मानते-जानते हैं। यह अलग बात है कि आज के इंटरनेटिया ज्ञानी ‘गूगल बाबा’ और ‘विकीपीडिया’ ‘कुछ’ विद्वानों की मान्यता को बल देते हुए आचार्य द्विवेदी की जन्मतिथि 15 मई देश और दुनिया को बताते चले जा रहे हैं। वैसे भी, माना जाता है कि इन इंटरनेटिया ज्ञानियों को वास्तविक और प्रामाणिक तिथि से कोई लेना-देना नहीं होता। जिसने जो बता दिया वह हमेशा के लिए फीड कर दिया। हालांकि, बिना छानबीन और पुख्ता आधार के गलत जानकारी पाठकों तक पहुंचाना अक्षम्य अपराध है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर उठे विवाद के मूल में भारतीय पंचांग के अनुसार उनकी जन्मतिथि का हर जगह लिखा होना है। भारतीय पंचांग के अनुसार, आचार्य द्विवेदी का जन्म वैशाख शुक्ल चतुर्थी संवत 1921 को हुआ था। तिथि का उल्लेख स्वयं आचार्य द्विवेदी ने भी किया है। भारतीय पंचांग के अनुसार की तिथि को अंग्रेजी कैलेंडर से परिवर्तित करने को लेकर ही जन्मतिथि को लेकर भ्रम पैदा हुआ।
जन्मतिथि के विवाद के आधार के रूप में आचार्य द्विवेदी का 13 मई 1932 को प्रयागराज से प्रकाशित होने वाले पत्र ‘भारत’ में प्रकाशित आचार्य द्विवेदी का वह पत्र ही उपयोग किया जाता रहा है। यह पत्र आचार्य द्विवेदी ने “भारत” के संपादक पंडित ज्योति प्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ को लिखा था। दरअसल, 1932 में काशी से नए निकलने वाले पाक्षिक ‘जागरण’ के प्रस्ताव पर आचार्य द्विवेदी की 68 वीं वर्षगांठ देश के कई नगरों में धूमधाम से मनाई गई थी। इस संबंध में ‘कृतज्ञता ज्ञापन’ के लिए आचार्य द्विवेदी ने स्वयं एक पत्र भारत के संपादक पंडित ज्योति प्रकाश मिश्र ‘निर्मल’ को लिखा। कहा जाता है कि इस पत्र को प्रकाशित करते समय मुद्रण की गलती से 9 मई की जगह 6 मई प्रकाशित हो गया। या बाद के वर्षों में आचार्य द्विवेदी का वह पत्र प्रकाशित करने में दूसरे पत्र या पत्रिकाओं में मुद्रण की गलती से 9 मई की जगह 6 मई टाइप हो गया। यह गलती ही आचार्य द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर भ्रम पैदा करने में सहायक सिद्ध हुई।
कुछ विद्वान मानते हैं कि अपने समय की महत्वपूर्ण मासिक पत्रिका सरस्वती का संपादन करते हुए 10 करोड़ हिंदी भाषा-भाषियों का साहित्यिक अनुशासन करने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर हिंदी वालों में कई मतभेद और भ्रम जानबूझकर पैदा किए गए हैं। अपने समय के कुछ विद्वानों ने अपनी बात को मनवाने के लिए ही अपनी- अपनी अंग्रेजी तिथियों पर जोर देना शुरू किया। विद्वानों की इसी अखाड़ेबाजी से हिंदी भाषा भाषी समाज में आचार्य द्विवेदी की जन्मतिथि को लेकर भ्रम बढ़ता गया और इसे दूर करने की कोशिशें न के बराबर ही हुईं। आचार्य द्विवेदी के बाद सरस्वती का संपादन का भार संभालने वाले पंडित देवी दत्त शुक्ल के पौत्र और प्रयागराज निवासी पंडित वृतशील शर्मा भी 9 मई को ही मान्यता देते हैं। आचार्य द्विवेदी की जन्म तिथि को लेकर उठे विवाद से वह अपने को आज तक आहत महसूस करते हैं। उनका कहना है कि आचार्य जी की जन्म तिथि से जुड़ा यह विवाद निर्मूल और अकारण है।
वर्तमान में हिंदी समालोचना के सशक्त हस्ताक्षर एवं लखनऊ विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष आचार्य डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित 9 मई को ही आचार्य द्विवेदी की वास्तविक और प्रामाणिक जन्मतिथि मानते हैं। इस लेखक से उन्होंने स्वयं यह बात अधिकार पूर्वक कहीं की सब लोग 9 मई को जन्मतिथि मानने की बात पर सहमत हैं। वह कहते हैं कि आचार्य द्विवेदी की जन्म तिथि से जुड़े विवाद के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए उन्होंने स्वयं कई किताबों का अध्ययन किया और पाया कि 9 मई ही आचार्य द्विवेदी की प्रामाणिक जन्मतिथि है क्योंकि अपने कृतज्ञता ज्ञापन में भी उन्होंने 9 मई का ही उल्लेख किया है।
आचार्य द्विवेदी पर शोधपरक पुस्तक ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी’ लिखने वाले रायबरेली के साहित्यकार केशव प्रसाद बाजपेई की मान्यता भी 9 मई पर ही केंद्रित है। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति द्वारा पिछले 11 वर्षों से प्रकाशित की जा रही स्मारिका ‘आचार्य पथ-2021’ के अंक में प्रकाशित अपने लेख में श्री बाजपेई कहते हैं कि जन्मतिथि के विवाद के निराकरण के लिए सबसे उपयुक्त उपाय संवत 1921 के पंचांग को देखने से जुड़ा था। इस विषय में खोजबीन करने पर पता चला है कि सन 1864 में 10 मई को हिंदू पंचांग के अनुसार संवत 1921 के वैशाख मास की पंचमी तिथि थी और दिन मंगलवार था। इस दिन आदि गुरु शंकराचार्य जी की जयंती पड़ी थी। उसके अनुसार वैशाख शुक्ल चतुर्थी दिन सोमवार 9 मई 1864 को पड़ता है।
वह अपने इस लेख में लिखते हैं- ‘इस विवेचना में अंग्रेजी की तिथि 6 मई असंगत है तथा 9 मई ही संगत है। 6 मई या तो मुद्रण की भूल से पत्र में अंकित हुई है या आचार्य जी का ध्यान ही कभी इस ओर नहीं गया कि पंचांग से इसकी संगति नहीं बैठती मेरी समझ में मुद्रण की त्रुटि से ही यह भ्रम पैदा हुआ है इनसे इतर तिथियां विचारणीय ही नहीं है। अतः यह निर्णय हुआ कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की वास्तविक जन्मतिथि अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 9 मई 1864 है, जो हिंदू पंचांग के संवत 1921 बैशाख शुक्ल चतुर्थी दिन सोमवार से पूरी तरह मेल खाती है। एक दिन गणितीय विधि के अनुसार 9 मई 1864 को सोमवार का दिन आता है और आचार्य जी का जन्मदिन सोमवार ही है। अतः इस से भी उनकी जन्मतिथि 9 मई 1864 होनी ही पुष्टि होती है।’

इन प्रमाणों के आधार पर हिंदी भाषा भाषी समाज को खड़ी बोली हिंदी का उपहार देने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्म तिथि को लेकर जानबूझ कर पैदा किए गए विवाद से बचते हुए 9 मई को ही जन्मतिथि की मान्यता देकर अपने इस महापुरुष के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए।
हालांकि, महापुरुष के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन के लिए खास तिथि का कोई महत्व नहीं है। वर्ष पर्यंत हम उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते रह सकते हैं, लेकिन दिन विशेष की बात आने पर हमें अपने इस पूर्वज को 9 मई (जन्मतिथि) और 21 दिसंबर 1938 (निर्वाण तिथि) को ही याद रखना होगा।

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति निबंध प्रतियोगिता 22 को

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति निबंध प्रतियोगिता 22 को

रायबरेली। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृति में भारत और अमेरिका के बच्चों की निबंध प्रतियोगिता आयोजित की गई है। प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा 22 मई को ऑनलाइन कार्यक्रम में की जाएगी।


आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिका इकाई की अध्यक्ष श्रीमती मंजू मिश्रा ने बताया कि आचार्य द्विवेदी की जयंती 9 मई के उपलक्ष में 18 वर्ष के बच्चों की यह प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। छात्र छात्राओं के लिए निबंध के तीन विषय निर्धारित किए गए हैं।
निर्धारित किए गए तीन विषयों-
1-आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के लेखन की वर्तमान युग में प्रासंगिकता,
2-हिंदी को युवा वर्ग में लोकप्रिय कैसे बनाया जाए
3-हिन्दी की विदेशों में गूंज; पर ही निबंध स्वीकार किया जाएगा। उन्होंने बताया कि निबंध भेजने की अंतिम तारीख 15 मई है। अंतिम तिथि के बाद कोई भी निबंध स्वीकार नहीं किया जाएगा। निबंध प्रतियोगिता में भाग लेने वाले छात्र छात्राएं अपने निबंध गूगल फॉर्म भरते समय ही भेज सकेंगे।
समिति की  भारत इकाई के अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने बताया कि पुरस्कार समारोह को भारत और अमेरिका के हिंदी के विद्वान संबोधित करेंगे। विजेता बच्चों को भी अपने निबंध पढ़ने का अवसर प्रदान किया जाएगा। 

गुरु तेग बहादुर जी के त्याग व बलिदान को नमन

गुरु तेग बहादुर अपने त्याग और बलिदान के लिए वह सही अर्थों में ‘हिन्द की चादर’ कहलाए। अपने धर्म, मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए विश्व इतिहास में जिन लोगों ने प्राणों की आहुति दी, उनमें गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अग्रिम पंक्ति में हैं।  

बिजनौर। श्री गुरु गोविंद सिंह खालसा विद्यालय खासपुरा ऊमरी में हिंद की चादर गुरु तेग बहादर जी का 400वां  प्रकाश पर्व गुरबाणी पाठ उपरांत अरदास के द्वारा मनाया गया।

इस अवसर पर विद्यालय के प्रधानाचार्य सरदार अभिषेक सिंह कोमल ने गुरु जी के जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला। उन्होंने देश धर्म की रक्षा के लिए उनके बलिदान को नमन करते हुए अपना प्रेरणास्रोत बताया।

विदित हो कि देश भर में सिखों के नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। गुरु तेग बहादुर सिंह एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे और उनका जन्म वैसाख कृष्ण पंचमी को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। इस दिन को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गुरु साहिब के इतिहास और शहादत के बारे में बताया जाता है।

गुरुद्वारा शीशगंज साहिब के अंदर का दृश्य (फाइल फोटो)

श्री गुरु तेग बहादुर जी
अमृतसर में जन्मे गुरु तेग बहादुर; गुरु हरगोविन्द जी के पांचवें पुत्र थे। 8वें गुरु हरिकृष्ण राय जी के निधन के बाद इन्हें 9वां गुरु बनाया गया था। इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे। वे बचपन से ही बहादुर, निर्भीक स्वभाव के और आध्यात्मिक रुचि वाले थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया।

उन्होंने मुगल शासक औरंगजेब की तमाम कोशिशों के बावजूद इस्लाम धारण नहीं किया और तमाम जुल्मों का पूरी दृढ़ता से सामना किया। औरंगजेब ने उन्हें इस्लाम कबूल करने को कहा तो गुरु साहब ने कहा शीश कटा सकते हैं केश नहीं। औरंगजेब ने गुरुजी पर अनेक अत्याचार किए, परंतु वे अविचलित रहे। वह लगातार हिन्दुओं, सिखों, कश्मीरी पंडितों और गैर मुस्लिमों का इस्लाम में जबरन धर्मांतरण का विरोध कर रहे थे, जिससे औरंगजेब खासा नाराज था। 

आठ दिनों की यातना के बाद गुरुजी को दिल्ली के चांदनी चौक में शीश काटकर शहीद कर दिया गया। उनके शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा बनाया गया, जिसे गुरुद्वारा शीशगंज साहब नाम से जाना जाता है। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। उनकी शहादत ने मानवाधिकारों की सुरक्षा को सिख पहचान बनाने में मदद की”।”नौवें गुरु को बलपूर्वक धर्मान्तरित करने के प्रयास ने स्पष्ट रूप से शहीद के नौ वर्षीय बेटे, गोबिन्द पर एक अमिट छाप डाली, जिन्होंने धीरे-धीरे सिख समूहों को इकट्ठा करके इसका प्रतिकार किया और खालसा पहचान को जन्म दिया।”

प्रख्यात ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार के नाम से जाना जाएगा बिजनौर पुस्तकालय एवं सांस्कृतिक केंद्र

मंडलायुक्त ने किया पुस्तकालय, सांस्कृतिक केंद्र में नवनिर्मित लाइब्रेरी कक्ष, पुराने लाइब्रेरी कक्ष का जीर्णोद्धार

बिजनौर। अब बिजनौर पुस्तकालय एवं सांस्कृतिक केंद्र को देश के मशहूर कवि हिंदी के पहले गजलकार दुष्यंत कुमार के नाम से जाना जाएगा। मंडलायुक्त ने नवनिर्मित लाइब्रेरी कक्ष, पुराने लाइब्रेरी कक्ष का जीर्णोद्धार किया। काफी समय से जिले के लोग दुष्यंत कुमार के नाम पर पुस्तकालय की मांग कर रहे थे।

मुरादाबाद के मंडलायुक्त आन्जनेय कुमार सिंह ने सीतापुर नेत्र चिकित्सालय परिसर स्थित गजलकार दुष्यंत कुमार पुस्तकालय एवं सांस्कृतिक केंद्र का लोकार्पण किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इंटरनेट के दौर में भी किताबों की अहमियत बरकरार है। उन्होंने कहा, बिजनौर की धरती पौराणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, एतिहासिक रूप से बहुत मूल्यवान है। यह केंद्र इस विरासत को संवारने में उपयोगी सिद्ध होगा। डीएम को निर्देशित किया कि वह इस पुस्तकालय को साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र के रूप में विकसित करें, ताकि बिजनौर शहर और आसपास क्षेत्रों के युवा लाभान्वित हो सकें। उन्होंने डीएम उमेश मिश्रा एवं एसडीएम सदर विक्रमादित्य मलिक के प्रयासों की सराहना की। डीएम ने कहा कि इस पुस्तकालय का निर्माण अकौर विकास जनसहयोग से हुआ है। इसके निर्माण का उद्देश्य स्थानीय युवाओं की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पर्याप्त पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना है। एसडीएम सदर विक्रमादित्य मलिक ने कहा कि कई स्थानों को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रयास जारी है। जनपद की साहित्यिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, एतिहासिक और प्राचीन ध रोहरों को सहेजने, लिपिबद्ध करने और उनके लिए संग्रहालय बनाने का काम भी चल रहा है। सीडीओ केपी सिंह, तहसीलदार सदर प्रीति सिंह, सूर्यमणि रघुवंशी, अनिल चौधरी, नवीन किशोर, खान जफर सुल्तान, डा. राहुल बिश्नोई, तौसिफ अहमद, शकील बिजनौरी आदि मौजूद रहे।

गौरतलब है कि बिजनौर जिले के राजपुर नवादा गांव के रहने वाले देश के मशहूर कवि, हिंदी के पहले गजलकार दुष्यंत कुमार के नाम पर बिजनौर पुस्तकालय का नाम रखा गया है। बहुत दिनों से जिले के लोग मांग कर रहे थे कि दुष्यंत कुमार के नाम पर पुस्तकालय होना चाहिए।

खुदा के यहां इन चार लोगों की नहीं होगी बख़्शीश: मुफ्ती रियाज क़ासमी


बिजनौर। अफजलगढ़ नगर में बस स्टैंड पर स्थित अबु बकर मस्जिद में शब ए बराअत की रात में मुफ्ती रियाज क़ासमी ने नमाजियों को उन चार लोगों के बारे में बताया, जिनकी शब ए बराअत को खुदा के यहां बख़्शीश नहीं होगी।

शुक्रवार को शब ए बराअत के मौके पर इशा की नमाज पढ़ने के बाद मुफ्ती रियाज साहब क़ासमी ने बयान करते हुए लोगों से कहा कि इस रात में उन चार लोगों की खुदा के यहां बख़्शीश नहीं होगी जो शराब पीकर लोगों सहित अपने परिवार के साथ मारपीट करते हुए और शराब पीने के आदी बन चुके हैं और जो लोग एक दूसरे की बुराई करने से बाज नहीं आते है और एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हो और जो लोग अपने मां बाप की इज्जत नहीं करते है और अपने मां बाप की ना फरमानी कर उनकी बातों को नहीं सुनते हैं और आखिरी उन लोगों की जो रिश्तेदारों में लड़ाई कराकर दूरी बनाने की कोशिश करते हैं उन लोगों की खुदा के यहां शब ए बराअत की रात में बख़्शीश नहीं होगी। इस मौके पर उन्होंने मुस्लिम समाज के लोगों से कहा कि अपने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दो लेकिन दीनी तालीम पहले हासिल करानी चाहिए क्योंकि जब बच्चा अच्छा आदमी होगा तो वह अच्छा अधिकारी भी होगा अच्छा इंजीनियर भी होगा दीनी तालीम का इंतिज़ाम पहले किया जाये उसके साथ साथ दुनयावी तालीम जितना ज्यादा हो अपने बच्चों को दिलायें और अच्छे मां बाप बनकर अच्छी शिक्षा दिलाकर अपना फर्ज निभाने का काम करें। शबे बराअत ये समझें के अल्लाह की तरफ से बंदों को बख्शने का एक बहाना है और ये रमज़ान की तैयारी है ताके हम अभी से रमज़ान के लिए तैयार हो जाये। आखिर में पूरे मुल्क के अमनो अमान के लिये दुआ कराई गई। इस मौके पर पुलिस बल की तरफ़ से की गई तैयारी और इंतिज़ाम क़ाबिल ए तारीफ़ रहा और पूरे प्रदेश में दोनों त्योहारों को अमन शांति से गुज़र जाने पर पुलिस प्रशासन की सराहना करते हुए हिन्दुस्तान की गंगा जमुना तहज़ीब की जमकर सराहना की।

द कश्मीर फाइल्स के बाद दूसरा धमाका लाल बहादुर शास्त्री; देखने के लिए हो जाएं तैयार…

कश्मीर फाइल्स के बाद दूसरा धमाका देखने के लिए हो जाओ तैयार…

लालबहादुर शास्त्री https://youtu.be/yq9TOW43TYs

लालबहादुर शास्त्री (जन्म: 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय (वाराणसी) : मृत्यु: 11 जनवरी 1966 ताशकन्द, सोवियत संघ रूस), भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री थे। वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे। इस प्रमुख पद पर उनका कार्यकाल अद्वितीय रहा। शास्त्री जी ने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की भारत  की  स्वतन्त्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। गोविंद बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया। परिवहन मन्त्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी। पुलिस मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारम्भ कराया। 1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होंने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिये बहुत परिश्रम किया।

साफ सुथरी छवि- जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमंत्री का पद भार ग्रहण किया। उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी। ताशकंद में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी सादगीदेशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त भारत रत्‍न से सम्मानित किया गया।

लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिवस पर 2 अक्टूबर को शास्त्री जयन्ती व उनके देहावसान वाले दिन 11 जनवरी को लालबहादुर शास्त्री स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

श्रीवास्तव से बने शास्त्री– लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में एक कायस्थ परिवार में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटे होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने के हुए तो दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उनकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उनके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया।

1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता और शास्त्रीजी की छ: सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र – हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। उनके चार पुत्रों में से दो दिवंगत हो चुके हैं। अनिल कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं जबकि सुनील शास्त्री भाजपा के नेता हैं।

देशसेवा का व्रत- संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् वे भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गांधीवादी, थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उल्लेखनीय हैं।

“मरो नहीं, मारो!”किया बुलंद- दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने इलाहाबाद पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक “मरो नहीं, मारो!” में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये।

गृहमन्त्री के बाद प्रधानमंत्री- शास्त्रीजी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में पुरुषोत्तमदास टंडन और पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। सबसे पहले 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने टण्डन जी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढ़ी। इसके बाद तो शास्त्रीजी का कद निरन्तर बढ़ता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढ़ते हुए वे नेहरूजी के मंत्रिमण्डल में गृहमन्त्री के प्रमुख पद तक जा पहुँचे। और इतना ही नहीं, नेहरू के निधन के पश्चात भारत वर्ष के प्रधान मन्त्री भी बने।

जय जवान-जय किसान का नारा- उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी शीर्ष प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है और वे ऐसा करने में सफल भी रहे। उनके क्रियाकलाप सैद्धान्तिक न होकर पूर्णत: व्यावहारिक और जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप थे। निष्पक्ष रूप से यदि देखा जाये तो शास्त्रीजी का शासन काल बेहद कठिन रहा। पूँजीपति देश पर हावी होना चाहते थे और दुश्मन देश हम पर आक्रमण करने की फिराक में थे। 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया। परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख व मन्त्रिमण्डल के सदस्य शामिल थे। संयोग से प्रधानमन्त्री उस बैठक में कुछ देर से पहुँचे। उनके आते ही विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ। तीनों प्रमुखों ने उनसे सारी वस्तुस्थिति समझाते हुए पूछा: “सर! क्या हुक्म है?” शास्त्रीजी ने एक वाक्य में तत्काल उत्तर दिया: “आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है?” शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

अमेरिका ने की युद्धविराम की अपील- भारत पाक युद्ध के दौरान 6 सितम्बर को भारत की 15वीं पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्तृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के बहुत बड़े हमले का डटकर मुकाबला किया। इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी। इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। भारतीय थलसेना ने दूनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने में सफलता अर्जित की। इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की।

रूस और अमरिका की मिलीभगत? आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्रीजी पर जोर डाला गया। उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकंद न जायें और वे भी मान गयीं। अपनी इस भूल का श्रीमती ललिता शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा। जब समझौता वार्ता चली तो शास्त्रीजी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं। काफी जद्दोजहेद के बाद शास्त्रीजी पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये। उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधान मन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि क्या वाकई शास्त्रीजी की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी? कई लोग उनकी मौत की वजह जहर को ही मानते हैं।

शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हें मरणोपरान्त वर्ष 1966 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

शास्त्रीजी की अंत्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्तिवन (नेहरू जी की समाधि) के आगे यमुना किनारे की गयी और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया। जब तक कांग्रेस संसदीय दल ने इंदिरा गांधी को शास्त्री का विधिवत उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया, गुलजारी लाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे।

पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया? शास्त्रीजी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मानते है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं बल्कि जहर देने से ही हुई। पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी ऐसा बताया गया। मजे की बात यह कि इण्डियन पार्लियामेण्ट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है। यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्रीजी का पोस्ट मार्टम भी नहीं हुआ। 2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जबाव दिया गया कि शास्त्रीजी के प्राइवेट डॉक्टर आर०एन०चुघ और कुछ रूस के कुछ डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जाँच तो की थी परन्तु सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। बाद में प्रधानमन्त्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी माँगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी।

आउटलुक पत्रिका ने खोली पोल- शास्त्रीजी की मौत में संभावित साजिश की पूरी पोल आउटलुक नाम की एक पत्रिका ने खोली। 2009 में, जब साउथ एशिया पर सीआईए की नज़र (अंग्रेजी CIA’s Eye on South Asia) नामक पुस्तक के लेखक अनुज धर ने सूचना के अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी पर प्रधानमन्त्री कार्यालय की ओर से यह कहना कि “शास्त्रीजी की मृत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथल-पुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस भी पहुँच सकती है। ये तमाम कारण हैं जिससे इस सवाल का जबाव नहीं दिया जा सकता।”।

ललिता के आँसू- सबसे पहले सन् 1978  में प्रकाशित एक हिन्दी पुस्तक ललिता के आँसू में शास्त्रीजी की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढँग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था। उस समय (सन् उन्निस सौ अठहत्तर में) ललिताजी जीवित थीं। यही नहीं, कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकन्द में शास्त्रीजी के साथ गये थे, इस घटना चक्र पर विस्तार से प्रकाश डाला है। जुलाई 2012 में शास्त्रीजी के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की माँग की थी। मित्रोखोन आर्काइव नामक पुस्तक में भारत से संबन्धित अध्याय को पढ़ने पर ताशकंद समझौते के बारे में एवं उस समय की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में विस्तरित जानकारी मिलती है।

कृष्ण जन्मभूमि की अद्भुत-अवर्णनीय लठामार होली

मथुरा यात्रा-२
कृष्ण जन्मभूमि की अद्भुत-अवर्णनीय लठामार होली

रंगभरनी एकादशी कृष्ण जन्मभूमि और यहां की होली देखने आने वालों दोनों के लिए एक खास अवसर है। इस बार की मथुरा यात्रा का खास मकसद ही जन्म भूमि की लठामार होली ही थी। कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट द्वारा संचालित अंतरराष्ट्रीय विश्राम गृह का कमरा नंबर- 6 ही अपना ठिकाना बना। मथुरा की होली ऐसे ही आकर्षित करती है। उस पर रंगभरनी एकादशी का दिन हो तो नींद कहां से आए?
सुबह 5 बजे ही आंख खुल गई। चाय की तलब जन्म भूमि के मुख्य द्वार के सामने “दनादन चायवाले” की तरफ खींच ले गई। कई युवा, महिलाएं रंगभरनी एकादशी की होली का मजा लेने के लिए बाहर बरामदे में, खुले में रात बिताती नजर आई। गेट पर कतार लगनी शुरू हो चुकी थी। कुछ लड़कियां फोटो खींचने में मशगूल थीं और कुछ लड़के सेल्फी लेने में। सुबह का आगाज ही यह एहसास कराने लगा था कि आज मंदिर में कुछ खास है।
घड़ी की सुई बढ़ती जा रही थी और अपनी होली वाली टोली (विनय द्विवेदी, करुणाशंकर मिश्रा, सुधीर द्विवेदी, अमर द्विवेदी, यादवेंद्र प्रताप सिंह, चंद्रमणि बाजपेई, सुनील मिश्रा “सेनानी”) की धड़कन। ट्रस्ट के ही भोजनालय में दोपहर का भोजन ग्रहण करने के बाद विश्राम गृह के सेवादार प्रेम शंकर दीक्षित उर्फ पप्पू मंदिर में प्रवेश कराने के लिए सक्रिय हो चुके थे। कृष्ण जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट के सचिव श्री कपिल शर्मा जी और भाई वात्सल्य राय जी ने विश्राम गृह के केयरटेकर रणधीर सिंह एवं पप्पू को ही लट्ठमार होली महोत्सव स्थल केशव वाटिका तक पहुंचाने की हम सबकी जिम्मेदारी इन्हीं दोनों को सौंपी थी।
दो बजते-बजते हम सब जन्मभूमि परिसर में शॉर्टकट से दाखिल हो गए। धूप तेज थी और होली महोत्सव देखने की जिज्ञासा उससे भी ज्यादा। उस समय केशव वाटिका का मैदान लगभग खाली ही था। अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए हम सब एक जगह कुर्सियों पर जम गए। थोड़ी देर बाद होली गीतों की धुन, आर्केस्ट्रा के कलाकार बजानी शुरू करते हैं। एंकरिंग के लिए एक मोटी सी महिला स्टेज पर ही कपिल‌ शर्मा के साथ कुछ होमवर्क के साथ अवतरित होती है और शुरू हो जाता है लठामार होली महोत्सव।
ब्रज और बुंदेलखंड से आए कलाकारों-गायकों से सुसज्जित होली महोत्सव के मंच पर गणेश वंदना के बाद शुरू होते हैं होली के गीत। श्री श्री 1008 स्वामी गुरुशरणानंद जी महाराज की उपस्थिति इस मंच और महोत्सव दोनों की शोभा बढ़ाती है। धीरे-धीरे-धीरे-धीरे माहौल होली मय होना शुरू होता है तो होता ही चला जाता है। कभी कृष्ण कन्हाई और राधा रानी के वेश में सजे दो बच्चों की झांकी धूम-धड़ाके के साथ पहुंचती है। घड़ी की सुई जैसे ही 5:00 बजे के आगे बढ़नी शुरू होती है वैसे-वैसे होली का मजा भी बढ़ता चला जाता है। ब्रज का प्रसिद्ध चरकुला नृत्य (जिसमें कलाकार सिर पर मटकी, जलते हुए दीपकों को रखकर नृत्य प्रस्तुत करते हैं) देखकर होली का रोमांच बढ़ गया।
फूलों की होली के बीच ही द्वारकाधीश मंदिर से उठने वाला जन्मभूमि का डोला पुराने केशव देव मंदिर होते हुए केशव वाटिका पहुंचना शुरू होता है। डोले के साथ सैकड़ों गोपियां और ग्वाल बाल लट्ठमार होली खेलते हुए चल रहे हैं। यह होरिहारे और गोपियां बरसाना वृंदावन और नंदी गांव से खास तौर पर होली खेलने के लिए आई हैं। होली के उल्लास में डूबे होरिहारों में गोपियों के लट्ठे से बचने के लिए बीच-बीच में भगदड़ मचती है और यह भगदड़ आपको मजा भी देती है और डराती भी है। होरिहारों और लट्ठ से लैस इस जत्थे केशव वाटिका पहुंचते ही शुरू होता है जन्मभूमि की लठामार होली। मंच पर होली गीतों पर थिरकते कलाकार और मैदान में और होरिहारों पर लठ बरसाती गोपियों के दृश्य अद्भुत हैं और अवर्णनीय भी।
लठामार होली देखने-सुनने के आई भक्तों की भारी भीड़ से केशव वाटिका का मैदान छोटा पड़ गया। जन्मभूमि की सारी व्यवस्थाएं छोटी पड़ गई। सुरक्षा बौनी हो गई। वाटिका में तैनात पुलिस वाले खुद होली के रंग में डूब से गए। पूरे देश से आए लोगों से खचाखच भरे मैदान में अबीर गुलाल से आसमान रंगीन हो गया। लाल-हरे-नीले-पीले-बैगनी रंगों से पटे इस आसमान के नीचे चल रही लट्ठमार होली के दौरान कभी इस हिस्से में भगदड़ कभी उस हिस्से में भगदड़। लट्ठ लगने से कुछ होरिहारे लंगड़ाते हुए भी गए। गोपियों के लट्ठ से खाकी वर्दीधारी भी बच नहीं पाते। हमेशा दूसरों पर लाठी बरसाने वाले यह खाकी वर्दीधारी आज गोपियों के लट्ठ हंसते हुए खा रहे हैं। भाग रहे हैं।
एक घंटे तक चलने वाली इस लट्ठमार होली में टैंट के स्ट्रक्चर के ऊपर लगी पिचकारियों से टेसू के फूल वाले बरसते रंग में भीगते हुए होली की मस्ती में डूबना अब सपना ही है। इस सपने को सच करता है रंगभरनी एकादशी पर कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की ओर से आयोजित लठमार होली महोत्सव। स्थानीय और विभिन्न राज्यों के हजारों-हज़ार महिलाएं-पुरुष-बच्चे भाग लेने पहुंचे हुए हैं। लट्ठ लगने का डर भी सभी को मजा लूटने से रोक नहीं पाता। जय श्री कृष्ण- जय श्री राधे

द्वारकाधीश मंदिर
कृष्ण जन्म भूमि से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर दूर चौक बाजार में स्थित दो-ढाई सौ वर्ष पुराने द्वारकाधीश मंदिर की होली का भी अपना अलग ही मजा है। रंगभरनी एकादशी पर हम सबकी होली खेलने की शुरुआत द्वारकाधीश मंदिर से ही हुई। ई-रिक्शा की सवारी का मजा लेते हुए हम सब सुबह 8:00 बजे ही द्वारकाधीश मंदिर पहुंच गए। मुगल काल में मथुरा के मंदिर तोड़े जाने के बाद लक्ष्मीचंद जैन ने द्वारिकाधीश मंदिर बनवाया। आजकल पुष्टिमार्गीय संतों की देखरेख में द्वारकाधीश मंदिर संचालित है। सुबह 8:25 मिनट पर श्रंगार आरती और 10:00 बजे द्वारिकाधीश को भोग के बाद शुरू हुआ होली गीत-फाग और अबीर-गुलाल उड़ने का सिलसिला। एक घंटे तक गीत गूंजते रहे और अबीर गुलाल उड़ता रहा। नाचते गाते एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाते कब 11:00 बज गए पता ही नहीं चला। आरती के बाद पट बंद होने पर मंदिर की होली ने विश्राम ले लिया।

यमुना जी का तट और विश्राम घाट
जगदीश मंदिर में होली के बाद हम सब यमुना जी के दरस परस के लिए हम सब विश्राम घाट की ओर बढ़े।
घाट पर पहुंचने के पहले ही भाई-बहन के पवित्र प्रेम के लिए प्रसिद्ध धर्मराज यमराज और यमुना जी के मंदिर में माथा टेकने का सुयोग भी इस बार ही बना। इस मंदिर में यम द्वितीया पर यमुना जी में स्नान में बाद भाई बहन के साथ-साथ पूजा-प्रार्थना की परंपरा है। यह मंदिर देखकर मन अपने आप भावुक इसलिए हुआ कि भैया (स्मृति शेष नीरज अवस्थी) पहले कई बार हमसे और दीदी (गरिमा मिश्रा) से यह द्वितीया पर यहां आने के लिए कहते रहे लेकिन शायद द्वारकाधीश को यह मंजूर नहीं था। यमुना जी के दरस-परस के बाद बोटिंग के दौरान यमुना जी के बदबूदार काले पानी को देखकर मन खिन्न हो गया। हालांकि, पढ़ाई के साथ-साथ गाइड काम करने वाली युवा माधव चतुर्वेदी लगातार इस बात पर ही जोर देता रहा कि यमुना मिशन अच्छे से चल रहा है और नाले का गंदा पानी साफ होकर ही यमुना में गिर रहा है।
अथ होली यात्रा समाप्तम..

गौरव अवस्थी
रायबरेली/ उन्नाव

भारतीय राजनीति को बदलकर रख देगी द कश्मीर फाइल्स!

द कश्मीर फाइल्स! विवेक की ये चिंगारी जो है न! भारतीय राजनीति को बदलकर रख देगी। खासकर युवा वर्ग को सुन्न कर जाएगी। मन और दिमाग सिहर जाना है। भले बी-टाउन के बड़े मॉन्स्टर ने इसे स्क्रीन काउंट नहीं जाने दिए । महज 500 स्क्रीन काउंट मिली है।

लेकिन…लेकिन! इसका जो वर्ड ऑफ माउथ है न! इसे कहाँ तक ले जाने वाला है ट्रेड पंडितों को भी नहीं मालूम है। दर्शक घरों से निकल रहे है और एक बार नहीं, बल्कि रिपीट वैल्यू है। पहले दिन कश्मीर फाइल्स ने साढ़े तीन करोड़ का बिज़नेस किया है। जो अब बढ़ता ही जाएगा। ग्राफ नीचे न आना। कल्ट, क्लासिक, मास्टरपीस कोई भी स्टेटस इसे न माप पाएंगे।

स्टीवन स्पीलबर्ग की ‘द शिंडलर लिस्ट’ के बाद ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने सनक के होलोकॉस्ट में इंसानियत को शर्मसार होते देखा है। स्टीवन अपनी फिल्म से यहूदियों के दर्द में डूब कर निकले थे। उसी प्रकार विवेक ने कश्मीरी पंडितों की डल में तैरकर उनतक पहुँचे है और उन्हें धैर्य से सुना है। इस फाइल्स को ज्यादा से ज्यादा दर्शक मिलने चाहिए। ताकि देखें की सत्ता की पॉवर में आने पर क्या कर जाते है। राष्ट्र को सुरक्षित रखने के किये कैसा नेतृत्व आवश्यक है। इससे पहले किसी फिल्म मेकर को कश्मीर जाने की हिम्मत न होती थी। जाते भी तो सिर्फ़ बाहर से झाँकर निकल आते। दिल तक उतरने में डर लगता था ।

विवेक की कहानी व विज़ुअल्स देखकर दिमाग डिस्टर्ब है । वे दृश्य आँखें की स्क्रीन से हटने का नाम न ले रहे है। वे कहते है मास्टर का बेटा था। भटका हुआ मासूम नौजवान था। फौज के अत्याचारों से तंग आकर भटक गया। तो भैया ऐसा है अगर यूँ रहता तो कश्मीरी पंडित क्यों न भटके। काहे जुल्म सहते रहे। उनके दर्द पर झूठ के नैरेटिव रचे गए। इस काम में ख़ूब फंड व सारा तंत्र लगा बैठा। अब सच जूते भी पहन चुका है और दुनिया की सैर को भी निकल चुका है। भले सच को जूते पहनने में देर लगी। लेकिन बाहर निकला अवश्य ।

विवेक ने कश्मीर के बारे में जो मोनोलॉग लिखा है न! उसे बेहतरी से दर्शन कुमार ने कृष्णा पंडित के साथ मिलकर दर्शकों के बीच फेंका है। कश्मीर फाइल्स फिल्मी कंटेंट नहीं है बल्कि इमोशन है। बॉलीवुडिये रहनुमाओं ने तो आतताई खलनायकों को नायक के तौर पर पेश किया है और आगे भी करेगा। विवेक की मेहनत को समर्थन देकर आगे अनछुए विषयों को उठाने का हौसला दे। इस फाइल्स को आर्थिक तौर पर बड़ी सफलता देवे। इंटरनेशनल मूवी डेटा बेस यानी आईएमडीबी पर जाकर रेट अवश्य दे। इसे वहाँ भी अव्वल बनाएं।

साभार फेसबुक

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का कारण?

देवेश प्रताप सिंह राठौर (AMJA)

रूस और यूक्रेन का विवाद इतना तूल क्यों पकड़ा, युद्ध जैसी स्थिति बनी और युद्ध शुरू हो गया। अमेरिका का इतिहास रहा है देशों को लड़ाना और राज्य करना। उसी का एक हिस्सा यूक्रेन अमेरिका के बहकावे में आ गया और आज पूरा विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के मुंह में जाने को खड़ा है। इस बार अगर तीसरा विश्व युद्ध हुआ उसकी कल्पना नहीं कर सकते कौन बचेगा, कौन नहीं!…क्योंकि अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम डाले थे। हिरोशिमा और नागासाकी शहर पर क्या स्थिति बनी? उसके बाद परमाणु बम के कार्यक्रम को रोकने के लिए प्रावधान बनाया गया। वही स्थिति फिर बन रही है।

यूक्रेन और रूस के बीच का लड़ाई का मुख्य कारण क्या है संक्षेप में जानते हैं। यूक्रेन पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिशों में जुटा है, रूस को यह बात पसंद नहीं है। वह नहीं चाहता कि यूक्रेन पश्चिमी देशों से अच्छे संबंध रखे या नाटो का सदस्य बने। अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया के 30 देश इस संगठन के सदस्य हैं। नाटो का सदस्य होने का मतलब है कि अगर सगंठन के किसी भी देश पर कोई तीसरा देश हमला करता है तो सभी सदस्य एकजुट होकर उसका मुकाबला करेंगे। रूस का कहना है कि अगर नाटो की तरफ से यूक्रेन को मदद मिली तो उसका अंजाम सबको भुगतना होगा। यूक्रेन की राजधानी पर लगातार मिसाइलें दागी गईं। इनमें से एक मिसाइल कीव के बाहरी इलाके स्थित एक आवासीय बहुमंजिला इमारत की 16वीं और 21वीं मंजिल के बीच से गुजर गई और इमारत की दो मंजिलें आग से घिर गईं। हमले में कम से कम छह नागरिक गंभीर रूप से घायल हो गए जबकि 80 को बचाकर निकाला गया। एक अन्य मिसाइल कीव को पानी की आपूर्ति करने वाले बांध को निशाना बनाकर दागी गई लेकिन यूक्रेन ने इसे हवा में ही मार गिराया। देश के इंफ्रास्ट्रक्चर मंत्री ने बताया कि अगर यह मिसाइल निशाने पर गिरती तो कीव के उपनगरों में बाढ़ आ जाती। वहीं, रूस के रक्षा प्रवक्ता इगोर कोनाशेंकोव ने फिर दावा किया रूसी मिसाइलें सिर्फ यूक्रेन के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर दागी जा रही हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर इस विवाद की जड़ क्या है

यूक्रेन की सीमा पश्चिम में यूरोप और पूर्व में रूस से जुड़ी है। 1991 तक यूक्रेन पूर्ववर्ती सोवियत संघ का हिस्सा था। रूस और यूक्रेन के बीच तनाव नवंबर 2013 में तब शुरू हुआ जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का कीव में विरोध शुरू हुआ, जबकि उन्हें रूस का समर्थन था।

यानुकोविच को अमेरिका-ब्रिटेन समर्थित प्रदर्शनकारियों के विरोध के कारण फरवरी 2014 में देश छोड़कर भागना पड़ा।इससे खफा होकर रूस ने दक्षिणी यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वहां के अलगाववादियों को समर्थन दिया। इन अलगाववादियों ने पूर्वी यूक्रेन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। वर्ष 2014 के बाद से रूस समर्थक अलगाववादियों और यूक्रेन की सेना के बीच डोनबास प्रांत में संघर्ष चल रहा था। इससे पहले जब 1991 में यूक्रेन सोवियत संघ से अलग हुआ था तब भी कई बार क्रीमिया को लेकर दोनों देशों में टकराव हुआ। 2014 के बाद रूस व यूक्रेन में लगातार तनाव व टकराव को रोकने व शांति कायम कराने के लिए पश्चिमी देशों ने पहल की। फ्रांस और जर्मनी ने 2015 में बेलारूस की राजधानी मिन्स्क में दोनों के बीच शांति व संघर्ष विराम का समझौता कराया। 

हाल ही में यूक्रेन ने नाटो से करीबी व दोस्ती गांठना शुरू किया। यूक्रेन के नाटो से अच्छे रिश्ते हैं। 1949 में तत्कालीन सोवियत संघ से निपटने के लिए नाटो यानी ‘उत्तर अटलांटिक संधि संगठन’ बनाया गया था। यूक्रेन की नाटो से करीबी रूस को  नागवार गुजरने लगी। अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया के 30 देश नाटो के सदस्य हैं। यदि कोई देश किसी तीसरे देश पर हमला करता है तो नाटो के सभी सदस्य देश एकजुट होकर उसका मुकाबला करते हैं। रूस चाहता है कि नाटो अपना विस्तार न करे। राष्ट्रपति पुतिन इसी मांग को लेकर यूक्रेन व पश्चिमी देशों पर दबाव डाल रहे थे।आखिरकार रूस ने अमेरिका व अन्य देशों की पाबंदियों की परवाह किए बगैर यूक्रेन पर हमला बोल दिया। अब तक तो नाटो, अमेरिका व किसी अन्य देश ने यूक्रेन के समर्थन में जंग में कूदने का एलान नहीं किया है। वे यूक्रेन की अपरोक्ष मदद कर रहे हैं, ऐसे में  कहना मुश्किल है कि यह जंग क्या मोड़ लेगी। यदि यूरोप के देशों या अमेरिका ने रूस के खिलाफ कोई सैन्य कार्रवाई की तो समूची दुनिया के लिए मुसीबत पैदा हो सकती है। यूक्रेन को अमेरिका से दूरी बनानी होगी, नाटो के संगठन से हटना पड़ेगा; तभी रूस बातचीत करने में रुचि रखेगा ऐसा मेरा मानना है।

चंद्रशेखर आजाद और उनका फरारी जीवन

शहादत के 91वें साल (27 फरवरी) पर विशेष

शहादत के 91वें साल (27 फरवरी) पर विशेष

चंद्रशेखर आजाद और उनका फरारी जीवन

गुलाम भारत को आजाद कराने में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले शहीद-ए-आजम चंद्रशेखर आजाद की शूरता-वीरता के किस्से आम हैं। काकोरी कांड के बाद आजाद; कभी हरिशंकर ब्रह्मचारी बने, कभी पंडित जी और कभी अंग्रेज सरकार के अफसर के ड्राइवर भी। क्रांतिकारी दल को मजबूत करने के लिए उन्होंने गाजीपुर के एक मठ के बीमार महंत से दीक्षा इसलिए ली कि उनके निधन के बाद मठ की संपत्ति क्रांति के काम आएगी। तीन-चार महीने महंत के मठ में समय बिताने के बाद जब संपत्ति प्राप्त करने के कोई आसार नजर नहीं आए तो वह पुनः क्रांति दल में सक्रिय हो गए। काकोरी कांड में फरारी के बाद आजाद के यह किस्से इतिहास में ही दफन होकर रह गए। आम लोगों के जेहन में उनके फरारी जीवन की जिंदगी घर नहीं कर पाई। आज उनकी शहादत का 91वां वर्ष है। आइए! आजाद के जीवन से जुड़े इन किस्सों से जुड़ा जाए..

सातार नदी का तट और हरिशंकर ब्रह्मचारी

काकोरी कांड में कई साथी तो अंग्रेज हुकूमत के हत्थे चढ़ गए लेकिन आजाद ‘आजाद’ ही रहे। हिंदुस्तानी विभीषण और अंग्रेजी सेना की खुफिया आजाद को पकड़ने के लिए पूरे देश में सक्रिय रही लेकिन आजाद पकड़े नहीं जा सके। फरार होने के बाद आजाद का अगला ठिकाना झांसी बना। खतरा देख आजाद ढिमरापुर में सातार नदी के तट पर कुटी बनाकर रहने लगे। यहां उन्होंने अपना नाम रखा ‘हरिशंकर ब्रह्मचारी’। इस बीच उनका झांसी आना-जाना भी बना रहा। ब्रह्मचारी के रूप में आजाद प्रवचन देते थे और बच्चों को पढ़ाते-लिखाते भी थे। एक दिन झांसी से साइकिल से लौटते समय इनाम के लालच में‌ दो सिपाहियों ने रोक कर उनसे थाने चलने को कहा।
सिपाहियों ने कहा-‘ क्यों तू आजाद है?’ आजाद ने उन्हें समझाते हुए कहा- आजाद जो है सो तो है। हम बाबा लोग होते ही आजाद हैं। हमें क्या बंधन? आजाद ने हर तरह से बचने की कोशिश की। सिपाहियों को हनुमान जी का डर भी दिखाया लेकिन वह मानने को तैयार नहीं हुए। सिपाहियों के साथ थोड़ी दूर चलकर आजाद बिगड़े और कहा कि तुम्हारे दरोगा से बड़े हमारे हनुमान जी हैं। हम तो हनुमान जी का ही हुक्म मानेंगे। हमें हनुमान जी का चोला चढ़ाना है। कहते हुए आजाद भाग खड़े हुए। बलिष्ठ शरीर देखकर सिपाही पकड़ने के लिए उनके पीछे भागने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

अचूक निशाने की अग्निपरीक्षा!

फरारी के दौरान झांसी के पास खनियाधाना के तत्कालीन नरेश खड़क सिंह जूदेव के यहां आजाद का आना-जाना हो गया। आजाद अपने साथी मास्टर रूद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर और भगवानदास माहौर के साथ जूदेव के यहां अतिथि बनकर गए। वह राजा साहब के छोटे भाई बने हुए थे और उनके दरबार के अन्य लोगों के लिए ‘पंडित जी’। राजा साहब की कोठी के बगीचे में दरबार जमा हुआ था। बात निशानेबाजी की शुरू हुई। आजाद की बातें दरबार में उपस्थित ठाकुरों को पसंद नहीं आई। राजा के दरबारियों ने निशानेबाजी की परीक्षा लेनी चाही। बातों-बातों में आजाद के हाथों में बंदूक भी थमा दी गई। उनके साथी मास्टर रूद्र नारायण को आजाद की परीक्षा लेना उचित नहीं लगा। उन्हें डर था कि कहीं भेद खुल न जाए। उन्होंने बहाने से आजाद से बंदूक ले ली। भगवानदास माहौर ने बाल हठ करते हुए निशाना साधने की जिद की। बंदूक भगवानदास के हाथ में आ गई । एक पेड़ की सूखी टहनी पर सूखा अनार खोसा हुआ था। आजाद ने उन्हें अचूक निशानेबाजी की बारीक बातें बताई। भगवानदास माहौर के एक निशाने में सूखी टहनी पर खोसा हुआ अनार उड़ गया। इसके बाद माहौल सामान्य हुआ और आजाद अपने साथियों के साथ लौट आए।

बनारसी पितांबर और रेशमी कुर्ता-साफा

आजाद और उनके साथियों का क्रांतिकारी दल शुरुआती दौर में आर्थिक संकटों से गुजर रहा था। इसी बीच बनारस में क्रांति दल के साथियों को पता चला कि गाजीपुर में एक मठ के महंत बीमारी की अवस्था के चलते ऐसे लड़के की तलाश में थे, जिसको सन्यासी बनाकर मठ जिम्मेदारी सौंप दें। क्रांतिकारी दल की आर्थिक दिक्कतों को दूर करने के लिए आजाद ने अपने साथियों का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्हें महंत का शिष्य बनना था। साथी लोग लेकर उन्हें गाजीपुर के मठ में पहुंचे। यहां आजाद का नाम चंद्रशेखर तिवारी बताया गया। ‘आजाद’ उपनाम की चर्चा ही नहीं की गई। पंडित लड़का पाकर महंत जी काफी खुश हुए और अगले ही दिन मठ में आजाद को दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया। दीक्षा के पहले सिर मुंड़ाकर उन्हें रेशमी साफा पहनाया गया। शरीर पर कीमती बनारसी पीतांबर और रेशमी कुर्ता हल्के भगवा रंग का धारण कराया गया। माथे पर शुद्ध चंदन-केसर का लेप भी। इस सबमें मठ के हजार रुपए तक खर्च हुए होने का अनुमान भी क्रांतिकारी दल के सदस्यों ने लगाया था। आजाद मठ में करीब 4 महीने रहे। इस बीच महंत पूरी तरह स्वस्थ हो गए। आजाद को जब यह महसूस हुआ कि उनका क्रांतिकारी दल का संपत्ति प्राप्ति का सपना यहां पूरा नहीं होगा तो आजाद एक दिन चुपके से वहां से खिसक लिए।

मजदूर जीवन

छात्र जीवन में आजाद का पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मन युद्ध कौशल सीखने, तलवार आदि चलाने में लगता था। इसके बाद भी उन्हें तहसील में नौकरी मिल गई थी लेकिन आजाद ‘आजाद’ थे। उन्हें अंग्रेजों की नौकरी पसंद कैसे आती? एक दिन वह एक मोती बेचने वाले के साथ मुंबई चले गए। कुछ मजदूरों की सहायता से उन्हें जहाजों को रंगने वाले रंगसाज का काम भी मिल गया। मजदूरी से मिले पैसों से वह अपना जीवन चलाते थे। मजदूरों की मदद से लेटने भर की जगह भी एक कोठरी में मिली लेकिन उस घुटन भरे माहौल में आजाद का मन नहीं लगा। कभी-कभी तो वह रात भर सिनेमा हाल में बैठे रहते। नींद लगने पर ही अपने बिस्तर पर आते। मुंबई का यंत्रवत जीवन आजाद को रास नहीं आया लेकिन मजदूर जीवन का अनुभव लेकर एक दिन बनारस जाने वाली ट्रेन में बिना टिकट बैठ गए। यहां उन्नाव के शिव विनायक मिश्र से उनकी भेंट हुई। उनकी मदद से संस्कृत पाठशाला में उन्हें प्रवेश मिल गया। 1921 के असहयोग आंदोलन में संस्कृत कॉलेज बनारस पर धरना देते हुए ही वह पहली बार गिरफ्तार हुए थे और 15 बेंतों की सजा हुई थी। यहीं से बालक चंद्रशेखर तिवारी चंद्र शेखर आजाद बना और आजीवन आजाद ही रहा।

जब अंग्रेज सिपाही को पटक-पटक कर मारा

चंद्रशेखर आजाद बनारस रेलवे स्टेशन पर रामकृष्ण खत्री और बनवारी लाल (जो काकोरी केस में इकबाली मुलजिम बने और 4 वर्ष की सजा मिली थी) के साथ प्लेटफार्म पर टहल रहे थे। कुछ अंग्रेज सिपाही भी प्लेटफार्म पर थे। एक अंग्रेज सिपाही ने प्लेटफार्म पर जा रही हिंदुस्तानी नौजवान बहन के मुंह पर सिगरेट का धुआं फेंका। आजाद को अपनी हिंदुस्तानी बहन के साथ इस तरह की अभद्रता बर्दाश्त नहीं हुई और तुरंत अंग्रेज सिपाही पर झपट पड़े। लात, घूंसा थप्पड़ मारकर अंग्रेज सिपाही को गिरा दिया। अंग्रेज सिपाही इतना डर गया कि अपने दोनों हाथ ऊपर करके मार खाता रहा और कहता रहा-‘आई एम सॉरी, रियली आई एम वेरी सॉरी’। उसके अन्य साथी तो भाग ही खड़े हुए। आजाद ने तब अपने साथियों से कहा भी था कि इस साले अंग्रेज को सबक सिखाना जरूरी था ताकि आगे किसी हिंदुस्तानी बहन-बेटी के साथ छेड़खानी न कर सके।

ब्रह्मचारी का ‘ब्रम्हचर्य’ तोड़ने की वह कोशिशें

चंद्र शेखर आजाद ने देश को आजाद कराने की खातिर शादी न करने का वृत ले रखा था। आजीवन ब्रम्हचर्य भी उनका दृढ़ संकल्प था। उनके जीवन से जुड़े यह दो किस्से बड़े महत्वपूर्ण हैं। फरारी जीवन में ढिमरापुर में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से सातार नदी के किनारे रहते समय गांव की एक बाला उनके पीछे पड़ गई। किसी भी तरह उसके प्रभाव में न आने पर उस बाला ने अश्रु सरिता से मोहित-प्रभावित करने की भी कोशिश की लेकिन आजाद तो आजाद थे। गांव की बाला उनके पीछे लगाने में गांव के ही एक चतुर नंबरदार की साजिश थी। किसी भी तरह आजाद के बाला के प्रभाव में न आने पर वह नंबरदार आजाद का भक्त हो गया। उस नंबरदार ने आजाद को अपना पांचवा भाई मान लिया। उसे अपने सगे भाइयों से ज्यादा आजाद पर विश्वास हो चुका था। यहां तक कि उसने अपनी तिजोरी की चाबी भी आजाद को सौंप दी थी। बंदूकें भी उन्हीं की देखरेख में रहने लगीं। यह किस्सा स्वयं आजाद ने झांसी में अपने साथियों को सुनाया था।
दूसरा किस्सा, आजाद की एक जमींदार मित्र के घर का है। आजाद एक बार अपने धनी जमींदार मित्र के यहां रुके थे। मित्र को अचानक एक दिन के लिए बाहर जाना पड़ा। आजाद ने अन्यत्र रुकने का प्रस्ताव किया लेकिन जमींदार मित्र नहीं माने। आजाद उनके विशाल भवन के ऊपरी खंड में ठहरे थे। रात में कमरे में सो रहे थे। आधी रात के बाद जमींदार की विधवा बहन कमरे में आ गई। उसने कामेच्छा से धीरे से आजाद को जगाया। 24:00 अपने कमरे में विधवा बहन को देखकर आजाद को काटो तो खून नहीं। उन्होंने बहन को समझाया। बताया भी कि सांसारिक बंधन में बंधने का उनके पास अवसर ही नहीं है। विधवा बहन के न समझने पर आजाद बिजली की गति से बाहर निकले और तिमंजिले भवन की दीवार से नीचे कूद गए। कड़ाके की सर्दी वाली वह रात आजाद ने जंगल में एक पेड़ के नीचे गुजारी। कूदने के कारण चोट भी लगी लेकिन अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया।

आजीवन आजाद रहे आजाद जी को बलिदान दिवस पर शत शत नमन!

∆ गौरव अवस्थी ‘आशीष’
रायबरेली/उन्नाव

आजादी का अमृत महोत्सव एवं चौरी-चौरा शताब्दी समारोह की थीम पर किया जाएगा: डीएम उमेश मिश्रा

बिजनौर। जिलाधिकारी उमेश मिश्रा ने कहा कि उत्तर प्रदेश शासन के निर्देशों के अनुपालन में 24 जनवरी, 2022 को “उत्तर प्रदेश दिवस” के रूप में मनाने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 से प्रतिवर्ष 24 जनवरी को उत्तर प्रदेश राज्य की स्थापना दिवस के रूप में उत्तर प्रदेश दिवस का आयोजन किया जा रहा है। विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी आगामी 24 जनवरी को उत्तर प्रदेश दिवस का आयोजन सभी जिलों में वर्तमान समय में लागू आदर्श आचार संहिता तथा प्रोटोकॉल का पालन करते हुए किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष उत्तर प्रदेश दिवस का आयोजन आजादी का अमृत महोत्सव एवं चौरी-चौरा शताब्दी समारोह की थीम पर किया जाएगा। इस अवसर पर जिला स्तर पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय गीत का गायन, पुलिस बैंड द्वारा रामधुन का वादन आदि भी सम्मिलित होंगे। उन्होंने बताया कि जिले की स्थानीय बोली भाषा में आजादी से जुड़े लोगों के गीतों का गायन आजादी की कथाओं पर आधारित नाटक तथा नृत्य नाटिकाओं तथा जिले की समृद्ध संस्कृति को प्रदर्शित करने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का जन सहभागिता के आधार पर आयोजन भी किया जाएगा।
उन्होंने निर्देश दिए कि कार्यक्रम स्थल पर जिले के गौरवशाली इतिहास, चौरी-चौरा गोरखपुर की घटना तथा स्वतंत्रता संग्राम में जिले के योगदान, शहीद स्मारकों एवं स्थानों पर आधारित अभिलेख एवं चित्र दृश्यों का आयोजन करना सुनिश्चित करें तथा कार्यक्रम के अंतर्गत जिले की शहीद स्मारकों, पर्यटन स्थलों पर आधारित ऑनलाइन फोटोग्राफी तथा पेंटिंग प्रतियोगिताओं का भी आयोजन कर युवा वर्ग को कार्यक्रम में भागीदार बनाएं। उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि कार्यक्रम स्थल पर “एक जनपद एक उत्पाद” के अंतर्गत पारंपरिक विशिष्ट उत्पाद के शिल्पी/ कर्मकारों की कला का प्रदर्शन स्वयं सहायता समूह के माध्यम से तथा यूपी के स्टार्टअप पर आधारित प्रदर्शनियों का आयोजन सुनिश्चित किया जाए।


जिलाधिकारी श्री मिश्रा ने उक्त संबंध में आदेशित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश दिवस के आयोजन के अवसर पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में कोविड-19 की परिस्थितियों के दृष्टिगत अनिवार्य रूप से कोविड हैल्थ डैस्क मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पर्यवेक्षण में स्थापित कराई जाए तथा सोशल डिस्टेंसिंग का भी अनुपालन सुनिश्चित कराया जाए। उन्होंने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि जिले में उत्तर प्रदेश दिवस कार्यक्रम का आयोजन उसकी मूल मंशा के अनुरूप कराना सुनिश्चित करें और कार्यक्रमों के फोटोग्राफ्स एवं विवरण ईमेल आईडी updivas1@gmail.com पर प्रेषित किया जाना सुनिश्चित करें।

सामाजिक न्याय के मामले में बेनकाब होने के बावजूद भाजपा का पलड़ा क्यों है भारी!

सामाजिक न्याय के मामले में बेनकाब होने के बावजूद क्यों भारी है भाजपा का पलड़ा


भारतीय जनता पार्टी ने हिन्दुत्व की छतरी को विराट बनाकर सामाजिक न्याय की मांग को उसके नीचे दबा दिया था लेकिन उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने के बाद भाजपा के कई मंत्रियों और विधायकों ने जिन आरोपों को लगाते हुए अपनी पार्टी छोड़ी है उसके कारण सामाजिक न्याय का मुद्दा फिर केन्द्र बिन्दु बन गया है। यहां तक कि सपा के मुखिया अखिलेश यादव तक सामाजिक न्याय के मुद्दे पर रक्षात्मक खेल खेलने को मजबूर हो गये थे और उन्होंने सवर्णों को प्रसन्न रखने की नीति पर अपना ध्यान जमा दिया था। अब वे भी पिछड़ों की राजनीति करने पर फिर से उतर आये हैं। उन्होंने ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं से मेल मिलाप किया है, जो तीखे शब्दों में खुलेआम वर्ण व्यवस्थावादी वर्चस्व के खिलाफ बोलने के आदी हैं। अब उनके साथ होने से सवर्णों के बिदकने की बहुत परवाह अखिलेश यादव नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा को भी अपनी दशा और दिशा बदलनी पड़ी है। पार्टी के उत्तर प्रदेश के प्रत्याशियों की पहली सूची में जहां सवर्णों को मात्र 43 टिकट दिये गये हैं वहीं पिछड़े और दलितों के उम्मीदवारों की संख्या 63 है।

संकेत है कि बाद की सूचियों में भी वंचितों का बाहुल्य रहेगा। लेकिन शायद यह केवल चुनावी नैया पार करने की रणनीति है। भाजपा का असली लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र का निर्माण, जिसमें न केवल अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे पर धकेलने का भाव निहित है बल्कि पिछड़ों और दलितों को भी सेवक की भूमिका तक ही सीमित करने का उद्देश्य भी निहित है। इस मामले में केवल इतनी उदारता अब बरती जा रही है कि समायोजन भर के लिए दलित और पिछड़ों को भी राजनीति व प्रशासन में प्रतिनिधित्व दिया जाये न कि समावेशी राजनैतिक प्रशासनिक गठन के लिए उन्हें मजबूत भागीदारी देना।


जब तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर नहीं मिला था तब तक आरएसएस ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने के लिए प्राथमिकता पर इस कारण मात्र प्रस्तावित किया था कि वे मुसलमानों के मामले में गुजरात में नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने कार्यकाल में किये गये प्रदर्शन का सफल संस्करण उत्तर प्रदेश में बन सकते हैं। हालांकि सामाजिक न्याय के मामले में उनसे संघ को बहुत अपेक्षायें नहीं थी क्योंकि वे गोरखपुर की उस गोरक्षा पीठ के वारिस हैं, जिसका गठन मनुवाद के खिलाफ हुआ था और यह पीठ सवर्णों के बीच ही आपस में सत्ता सघर्ष का गवाह शुरू से रही है; पर वर्ण व्यवस्था का पालन कराने की कसौटी पर योगी भाजपा के किसी भी दूसरे सत्ताधीश की तुलना में अधिक खरे साबित हुए हैं। अभी जिन पिछड़े नेताओं ने उनकी जातिगत आधार पर भेदभाव परक नीति के विरोध में आवाज उठाकर पार्टी छोड़ी है, उन्हें यह आरोप लगाकर खारिज करने की कोशिश की जा रही है कि वे लोग अपने परिवार को टिकट दिलाने या अपनी सीट बदलवाने की कोशिश में थे जो पार्टी को मंजूर नहीं था। इसलिए वे पार्टी छोड़ने के पीछे दूसरी जगह यह मंशा पूरी होने की आशा में बहानेबाजी कर रहे हैं; पर यह आरोप अचानक सामने नहीं आये हैं। इसके पहले स्व0 कल्याण सिंह जब वीपी सिंह की जयंती में मुख्य अतिथि बनकर लखनऊ आये थे तो पिछड़े वर्ग और दलितों को प्रशासन में बेहतर पोस्टिंग के मामले में उपेक्षित किये जाने का आरोप उन्होंने भी प्रकारांतर से लगाया था। अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने भी की पोस्टिंग में पिछड़ों को समुचित भागीदारी दिलाने के लिए आवाज बुलंद की थी, जिसके कारण उन्हें कुछ दिनों तक को केन्द्रीय मंत्रिमंडल से बाहर हो जाना पड़ा था। उपेक्षित जातियों के नेताओं में ही नहीं उनमें निचले स्तर तक उपेक्षित किये जाने का एहसास था, जिसकी वजह से भाजपा छोड़ने वाले मंत्री, विधायकों द्वारा यह मुद्दा उठाये जाने से उनके जख्म खुरच गये और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा की स्थिति खराब हुई। साथ-साथ में गवर्नेंस का परिचय न दे पाने की वजह से भी उत्तर प्रदेश में एन्टी कोम्बेंसी फैक्टर गाढ़ा हुआ। कहने की जरूरत नहीं कि योगी की वजह से भाजपा को उत्तर प्रदेश में सत्ता में दोबारा लौटना मुश्किल हो रहा है, जिसके चलते उन्हें चुनाव अभियान में पीछे किया गया है। फिर भी कोई यह समझे कि चुनाव नतीजों में भाजपा को अगर मामूली बहुमत मिला तो योगी फिर से मुख्यमंत्री नहीं बन पायेंगे ऐसा सोचने वाले गलतफहमी में हैं। संघ की जरूरतों के लिए तो शूद्र नेता नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में वरण करना मजबूरी की अंतरिम व्यवस्था है। संघ तो हिन्दू राष्ट्र का सामाजिक माडल साकार करना चाहता है, तभी हिन्दू राष्ट्र का सपना साकार हो सकता है। योगी इसके लिए सबसे मुफीद हैं, इसलिए संघ अब योगी का कद नहीं गिरने देगा और चाहे पर्याप्त बहुमत मिले या सीमांत बहुमत; मुख्यमंत्री की कुर्सी से योगी टस से मस नहीं किये जायेंगे।
वैसे भी मोदी ऐसे सामाजिक माडल वाले हिन्दू राष्ट्र की ओर ही कदम बढ़ाने वाले मोहरे साबित हो रहे हैं। अपने पहले प्रधानमंत्रित्व काल में अपने पिछड़ी जाति का होने का वे जिस तरह दम भरते थे, वैसी दुहाई देना उन्होंने अब बंद कर दिया है। उनके मंत्रिमंडल में भी कोई पिछड़ा महत्वपूर्ण पद पर नहीं है। आरक्षण को धता बताने के लिए उन्होंने लेटरिल इंट्री का फार्मूला तय किया है। वे पिछले कार्यकाल में बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की विचारधारा का बहुत हवाला देते रहे हैं, लेकिन अपने कृतित्व में उन्होंने अपने को वर्ण व्यवस्था का स्वामी भक्त सिपाही सिद्ध किया है। मोदी संघ की मंशा को अच्छी तरह भांपते हैं, इसलिए योगी द्वारा कई बार अपनाई जा चुकी अवज्ञाकारी मुद्राओं को भी झेलना अब उन्हें मंजूर हो गया है। सवाल यह है कि सवर्णों का मानसिक और बौद्धिक प्रभुत्व क्या अभी भी इतना मजबूत है कि बाहुल्य में होने के बावजूद हिन्दू समाज के वंचित तबके उनकी उंगलियों पर अपने को नाचने के लिए मजबूर पा रहे हैं।
बाबा साहब अम्बेडकर के साथ-साथ सवर्ण होते हुए भी डा0 राम मनोहर लोहिया ने राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता के लिए सामाजिक लोकतंत्र कायम करने को अनिवार्य माना था। इन दोनों महापुरूषों का सोचना था कि देश में सही तरीके से नागरिक तंत्र स्थापित करने के लिए वर्ण व्यवस्था का टूटना लाजिमी हो गया है, लेकिन दोनों किसी भी रूप में वर्ण व्यवस्था की वापिसी नहीं चाहते थे। यानी यह नहीं चाहते थे कि वर्ण व्यवस्था के पिरामिड में अभी जिस तरह से सवर्ण हैं, उस तरह से दलित और पिछड़े स्थापित कर दिये जायें। उनके लिए वर्ण व्यवस्था की समाप्ति का चरण साफ सुथरे और आदर्श लोकतंत्र को कायम करना था। यानी लोकतांत्रिक मूल्य सर्वोच्च थे, जिनके निर्वाह के लिए डा0 लोहिया ने केरल की पहली गैर कांग्रेसी सरकार को भंग करा दिया था और जिसकी वजह से डा0 लोहिया की पार्टी विभाजित हो गई थी। दोनों महापुरूष सोचते थे कि अगर सत्ता पिछड़ों और दलितों के पास आयेगी तो वह लोकतंत्र के लिए अधिक समर्पित होंगे, क्योंकि उन्होंने समाज व्यवस्था के औपनिवेशिक स्वरूप के दंश को झेला है। …पर उनके वैचारिक उत्तराधिकारी इस कसौटी पर अपने को खरा साबित नहीं कर पाये। उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने पर अम्बेडकरवादी मायावती ने सामंती तौर तरीके अपनाकर लोकतंत्र को सूली पर लटका दिया। डा0 अम्बेडकर तो ईमानदारी के लिए इतना प्रतिबद्ध थे कि जब उनके इकलौते पुत्र को जरिया बनाकर उन्हें इमोशनल ब्लैकमेल करके उनसे गलत काम कराने की कोशिश की गई तो उन्होंने अपने पुत्र का दिल्ली से पुणे का वापिसी का टिकट कटवा दिया; पर मायावती ने तो ट्रांसफर पोस्टिंग में रुपए लेने व मासिक वसूली तय करने का ऐसा रिवाज चलाया कि स्वच्छ प्रशासन की कल्पना ही दूभर हो गई। उत्तर प्रदेश और बिहार की पिछड़ी सरकारों ने फासिस्टशाही की ऐसी इंतहा कर डाली गई कि अगर डा0 लोहिया जिंदा होते तो ऐसी समाजवादी संतानों को नकारने में देर न लगाते। साम्प्रदायिकता के विरोध और दलितों के संदर्भ में सामाजिक न्याय को लेकर इनके विचार बहुत दूषित रहे। डा0 लोहिया ने तो चुनाव हारना मंजूर किया लेकिन तुष्टीकरण नहीं। उनका लक्ष्य बहुसंख्यक हठधर्मिता की तरह ही अल्पसंख्यक हठधर्मिता के आगे भी सिर न झुकाना था। पर उनके एकलव्य मुलायम सिंह और लालू यादव ने अल्पसंख्यक कट्टरता को हवा देने के सारे रिकार्ड तोड़ दिये और भाजपा को इसी की बदौलत अपने सर्वसत्तावादी पैर देश में जमाने में सफलता मिली।


वीपी सिंह का डा0 लोहिया और उनकी विचारधारा से प्रत्यक्ष तौर पर कोई संबंध नहीं था पर कांग्रेसी संस्कार लेकर जब वे तथाकथित समाजवादियों से जुड़े तो उन्होंने डा0 लोहिया और जयप्रकाश नारायण के विचारों व संकल्पों को आगे ले जाने का बेहतरीन प्रयास किया। डा0 लोहिया कहते थे कि समाज व्यवस्था में जो लोग सबसे नीचे रखे गये हैं, सबसे पहले उन्हें आगे किया जाये। यानी दलितों और इसके बाद पिछड़ों को सवर्ण कुछ दशकों के लिए नेतृत्व की अभिलाषा छोड़ दें। इसी के तहत वीपी सिंह ने जब रामविलास पासवान को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पहल की तो अपने को उनका लेफ्टिनेंट घोषित करने वाले लालू प्रसाद यादव ने अंतिम समय में उन्हें अपना बैरी मान लिया। ऐसा लगता है कि पिछड़ी जातियों के नेतृत्व का मकसद वर्ण व्यवस्था से लड़ने की बजाय उनकी महत्वाकांक्षा यह रही कि उन्हें जनेऊ पहनने का अधिकार मिल जाये ताकि वे भी वर्ण व्यवस्था में सम्मानजनक ढं़ग से खप सकें और दलितों पर वैसी ही अन्यायपूर्ण हुकूमत चला सकें जैसी सवर्ण चलाते रहे हैं। जब-जब वे सत्ता में आये उन्होंने दलितों के प्रति अपने द्वेष का परिचय दिया जबकि सवर्णों के कृपा पात्र बनने की कोशिश करते रहे।


वीपी सिंह ने जनता दल के समय डा0 लोहिया और जेपी की मंशा के राजनीतिक सुधारों को अमल में लाने की कोशिश की, जिसके कारण उन्हें समाजवादी थिंक टैंकों का समर्थन मिलना चाहिए था, पर डाह के कारण समाजवादी चिंतक इस रास्ते से भटक गये और मुलायम सिंह जैसों की वंशवादी, परिवारवादी व फासिस्ट नीतियों को बल देने के लिए अभिशप्त हो गये, जिससे समाजवादी आंदोलन की पूरी साख मटियामेट हो गई।
आज अगर सामाजिक भेदभाव का शिकंजा कसने के खतरे के बावजूद पिछड़ों और दलितों में भाजपा की पैठ बहुत कमजोर नहीं हो पा रही है तो उसकी वजह साफ है। भाजपा के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से पूरी तरह ईमानदार हैं। नियमों के तहत प्रशासन चलाने के हामी हैं। योजनाओं के क्रियान्वयन में पक्षपात नहीं होने दे रहे हैं। उनकी सरकारों के यह सकारात्मक गुण उनका पलड़ा भारी किये हुए हैं, इसलिए तमाम बवंडरों के बावजूद सारे सर्वे उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत का निष्कर्ष प्रतिपादित कर रहे हैं।

केपी सिंह (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

’57 की क्रांति के गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह

शौर्य दिवस (18 जनवरी) पर विशेष

57 की क्रांति के गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह

पिछले दिनों पत्रकार-इतिहासकार सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ में मुक्तिसंग्राम और आदिवासी’ पढ़ते हुए 57 की क्रांति में छत्तीसगढ़ में विद्रोह की ज्वाला भड़काने वाले वीर नारायण सिंह के साथ हनुमान सिंह की वीरगाथा सामने आई। गाथा में इस बात का जिक्र पढ़कर मन और गौरवान्वित हो गया कि अंग्रेजी सेना के शिविर में ही सार्जेंट कैप्टन सिडवेल की तलवार के वार से हत्या करने वाले 5 फीट 4 इंच लंबे बलिष्ठ वीर हनुमान सिंह बैसवारे ( उत्तर प्रदेश के रायबरेली-उन्नाव के विशेष भू-भाग को मिलाकर बना क्षेत्र) के ही रहने वाले थे। पुस्तक में संदर्भ के तौर पर इतिहासकार डॉ राम कुमार बेहार किताब ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास’ को भी उद्धृत किया गया।
इतिहास कि इन किताबों में दर्ज संक्षिप्त कथा बताती है कि बैसवारे के इस गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह ने छत्तीसगढ़ में महाविद्रोह के समय रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी) में आज से 163 साल पहले 18 जनवरी 1858 को अंग्रेजी सेना के कैंप में कैप्टन सिडवेल को तलवार के वार करके मार डाला था। कैप्टन सिडवेल के नेतृत्व में नागपुर से 100 सैनिकों की अंग्रेजी पल्टन को छत्तीसगढ़ में विद्रोह दबाने के लिए रायपुर भेजा गया था। इसी पल्टन‌ में बैसवारे के वीर हनुमान सिंह मैगजीन लश्कर के रूप में शामिल थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महानायक पहाड़ी अंचल सोनाखान के जमींदर वीर नारायण सिंह को 10 दिसंबर 1857 को खुलेआम रायपुर के प्रमुख चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया। वीर नारायण सिंह को चौराहे पर तोपों से उड़ाकर छत्तीसगढ़ अंचल में महाविद्रोह को दबाने की चेष्टा अंग्रेज हुकूमत ने की थी। अंग्रेजों ने यह मान लिया था कि अब छत्तीसगढ़ अंचल में विद्रोह नहीं होगा लेकिन उन्हें यह अंदाज नहीं था कि क्रांति की ज्वाला उनके अपने सैन्य शिविर में ही धधक रही है। वीर नारायण सिंह की शहादत पर वीर हनुमान सिंह का खून खौल उठा और बदला लेने के लिए ही उन्होंने 18 जनवरी 1858 की रात अपने दो साथियों की मदद से कैप्टन सिडवेल को तलवार से 9 वार करके मौत की नींद सुला दिया था। सिडवेल को मारने के बाद वीर हनुमान सिंह ने सैन्य शिविर में घूम घूम कर बदला लेने का ऐलान किया और भारतीय सिपाहियों को विद्रोह में शामिल होने के लिए खुले रुप में साथ देने के लिए ललकारा लेकिन कोई दूसरा सिपाही उनकी जैसी हिम्मत नहीं जुटा पाया। सिडवेल की हत्या के बाद अंग्रेजी सेना के शिविर में हड़कंप मच गया। अंग्रेजी सेना ने हनुमान सिंह का साथ देने वाले दोनों सिपाहियों को पकड़ लिया लेकिन वीर हनुमान सिंह साथियों का साथ ना मिलने पर छत्तीसगढ़ अंचल के पहाड़ी जंगलों में छिप गए। सिडवेल की हत्या के बाद भी वीर हनुमान सिंह का अंग्रेजों से बदला लेने का जज्बा कम नहीं हुआ। 2 दिन बाद 20 जनवरी 1858 की आधी रात को वीर हनुमान सिंह तलवार लेकर अकेले ही शेर की मांद में शेर के शिकार का जज्बा रखते हुए रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की हत्या के इरादे से उसके बंगले में घुसे और इलियट जिस कमरे में सो रहा था, उसका दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया लेकिन दरवाजे के मजबूत होने से प्रयास असफल रहा। इसके बाद अपनी खून की प्यासी तलवार के साथ वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ों में गुम हो गए। उसके बाद उनका कोई भी पता नहीं चला। चार्ल्स इलियट के आदेश पर ही वीर नारायण सिंह को रायपुर के चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया था। इसीलिए वीर हनुमान सिंह इलियट को भी मार डालना चाहते थे लेकिन उनके मजबूत इरादों पर एलियट के बंगले के मजबूत दरवाजों ने पानी फेर दिया। अंग्रेज हुकूमत ने उनको पकड़ने के लिए हजारों जासूसों और गुप्तचरों का जाल बिछाया। ₹500 का इनाम भी घोषित किया (यह आज के 5‌ लाख रुपए से ज्यादा ही है) लेकिन अंग्रेज सेना वीर हनुमान सिंह को पकड़ने में कभी भी कामयाब नहीं हो सकी। बैसवारे के महानायक राना बेनी माधव बक्श सिंह की तरह ही वीर हनुमान सिंह भी अंग्रेजों के हत्थे नहीं चढ़े। राना बेनी माधव की तरह बाकी का जीवन उन्होंने जंगलों-पहाड़ों में ही गुजार कर जीवन लीला पूरी की। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट के साथ उस रात बंगले में ही सोए हुए लेफ्टिनेंट स्मिथ ने उस रात के भयानक मंजर के बारे में लिखा भी-"यदि उस रात हम लोग जगाए ना गए होते तो लेफ्टिनेंट इलियट और मैं तो सोए सोए ही काट डाले गए होते और बंगले के अंदर अन्य निवासियों का भी यही हाल हुआ होता।"

सिडवेल की हत्या के तुरंत बाद अंग्रेज सेना ने वीर हनुमान सिंह के दो साथ ही सिपाहियों को कैद कर लिया था। डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की अदालत में सुनवाई चली और 2 दिन बाद ही रायपुर के चौराहे पर सरेआम वीर हनुमान सिंह के नेतृत्व में अल्पकालिक विद्रोह में साथ देने वाले उनके 17 साथियों-गाजी खान (हवलदार), अब्दुल हयात, ठाकुर सिंह, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुर सिंह, अकबर हुसैन, बुलेहू दुबे, लल्ला सिंह, बदलू, परमानंद, शोभाराम, दुर्गा प्रसाद, नजर मोहम्मद, देवीदीन और जय गोविंद (सभी गोलंदाज) को 22 जनवरी 1957 को खुलेआम फांसी पर चढ़ा कर सजा-ए-मौत दे दी गई। (रायपुर गजेटियर पेज 71)

वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ में सन’ 57 की क्रांति के अग्रणी नायकों में गिने-माने जाते हैं। हालांकि महाविद्रोह की चर्चा जब भी चलती है, तब छत्तीसगढ़ अंचल से वीर नारायण सिंह का ही नाम लिया जाता है, जबकि हनुमान सिंह का दुस्साहस और शौर्य वीर नारायण सिंह से ज्यादा बड़ा था। वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत द्वारा अपनी ज़मीदारी छीने जाने के विरोध में विद्रोह किया था लेकिन वीर हनुमान सिंह तो एक साधारण सिपाही थे। उनकी संपत्ति अंग्रेजों ने जब्त नहीं की थी। इतिहास में उन्हें वीर नारायण सिंह से ज्यादा नहीं तो कम भी आंका नहीं जाना चाहिए था लेकिन इतिहास ने वीर हनुमान सिंह के साथ न्याय नहीं किया। इतिहासकार मानते हैं कि अगर अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों ने साथ दिया होता तो वीर हनुमान सिंह की बहादुरी से छत्तीसगढ़ अंचल में एक बार फिर क्रांति की ज्वाला भड़क उठती। अंग्रेजों को छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता। रायबरेली-उन्नाव के विशेष भू-भाग को मिलाकर बना बैसवारा अपने शौर्य और वीरता के लिए जाना जाता है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में राना बेनी माधव सिंह (शंकरपुर-रायबरेली) और राजा राव राम बक्श सिंह (बक्सर-उन्नाव) की शौर्य गाथा यहां जन-जन के मन में बसी है। 1857 के विद्रोह में बेगम हजरत महल का साथ देने वाले राना बेनी माधव बख्श सिंह के किले को अंग्रेजों ने तोपों से उड़ा दिया था। राना बेनी माधव बहराइच होते हुए हिमालय की वादियों में खो गए। अंग्रेज हुकूमत उनका कोई पता नहीं लगा पाई। राजा राव राम बक्स सिंह अंग्रेजों ने बक्सर में पेड़ पर सरेआम फांसी पर लटकाकर विद्रोह को कुचलने की हिमाकत की थी। '57 की क्रांति के इस गुमनाम योद्धा ने छत्तीसगढ़ अंचल में अकेले ही क्रांति की लौ जलाकर अपना और बैसवारे का नाम इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। समय रहते समाज और सरकार की ओर से वीर हनुमान सिंह के इतिहास को ढूंढने का उद्यम किया जाता तो आज वह अपने बैसवारे में ही गुमनाम न होते। होना तो यह चाहिए था कि 18 जनवरी (अंग्रेजी सैन्य अफसर सिडवेल की हत्या की तारीख) को उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ अंचल में शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता। दुर्भाग्यवश अपने इस महान सपूत के बारे में बैसवारे के लोग भी डेढ़ सौ वर्ष से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद अपरिचित ही हैं जबकि जरूरत थी कि वीर हनुमान सिंह की गौरव गाथा का गान राना बेनी माधव सिंह एवं राजा राव राम बक्स सिंह की तरह ही इस अंचल में जन-जन के बीच गाया जाता। आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा है। इस अमृत महोत्सव में भी आजादी का यह महानायक विस्मृत ही है। न छत्तीसगढ़ की सरकार ने वीर हनुमान सिंह को वह सम्मान दिया और न उत्तर प्रदेश सरकार ही सम्मान देने के बारे में सोच पाई है। समाज तो सोया हुआ है ही।

बैसवारे के इस गुमनाम योद्धा को शौर्य दिवस (18 जनवरी 1858) पर कोटि-कोटि नमन!!

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

लखनऊ में मनाई गई गुरु गोविंद सिंह जी महाराज जयंती

ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब यहीआ गंज लखनऊ में गुरु गोविंद सिंह जी महाराज मनाई गई जयंती

लखनऊ। गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब यहीआ गंज एक पावन पवित्र स्थान है। यहां पर महान बलिदानी सतगुरु श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी आकर 3 दिन रुके थे एवं नगर के आसपास की साध संगत को एक प्रभु परमात्मा के साथ जुड़कर मानव सेवा में अच्छे कार्य करने का उपदेश दिया। इसके पश्चात सन 1672 ईस्वी में बाल अवस्था में सतगुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज अपनी माता, माता गुजरी जी एवं मामा कृपाल चंद जी के साथ इस पवित्र स्थान पर 2 महीने रुके थे।

इस पवित्र स्थान से श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज का सदैव भावनात्मक संबंध रहा है। श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने वर्ष 1686 में पोटा साहिब से हस्तलिखित गुरु ग्रंथ साहिब अपने हस्ताक्षर करके इस स्थान पर भेजे थे। प्राप्त जानकारी के आधार पर इस प्रकार के हस्तलिखित श्री गुरु ग्रंथ साहिब के दर्शन भारत में बहुत दुर्लभ हैं और इसी स्थान पर मौजूद हैं ।

इसके पश्चात वर्ष 1693 ईस्वी में एवम् वर्ष 1701 ईसवी में गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के दो हुक्मनामे (हस्तलिखित चिट्ठी) यहां की संगत को भेजे गए थे, जो भाग्यवश इस पवित्र स्थान पर मौजूद एवं सुरक्षित हैं, जिनके दर्शन करके संगत अपने आप को सौभाग्यशाली महसूस करती है ।

ऐसे महान तेजस्वी युगपुरुष 700 वर्ष से बना मुगलों का साम्राज्य समाप्त करने वाले श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज का प्रकाश पर्व मनाने के लिए 9 जनवरी दिन रविवार सुबह 4:00 बजे से ही संगत आने लगी थी। गुरुद्वारा याहिया गंज साहिब में जो कि शीश महल की तरह बहुत शोभनीय दिखाई दे रहा था, उस अति शोभनीय पावन दरबार हाल में सुबह 4:00 बजे से दीवान की आरंभ था। नितनेम की 5 बाणीयों को पढ़कर की गई। उसके उपरांत श्री सुखमणि साहिब का पाठ एवं संगत मुख्य ग्रंथी ज्ञानी परमजीत सिंह जी द्वारा किया गया। उसके उपरांत श्री अखंड पाठ साहिब की संपूर्णता की गई; फिर बंगला साहिब दिल्ली से आए भाई अमनदीप सिंह जी ने आसा की वार का कीर्तन किया, फिर ज्ञानी जगजीत सिंह जाचक जी ने गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के बाल्यावस्था एवं उनके सामाजिक संघर्षों के बारे में कथा करके संगत को गुरु महाराज के सिद्धांतों से अवगत कराया। उसके उपरांत याहिया गंज के हजूरी रागी भाई वीर सिंह जी ने कीर्तन किया। लखनऊ की रहने वाली बीवी सिमरन कौर जी ने संगत को कीर्तन द्वारा निहाल किया उसके उपरांत गुरुद्वारा शीश गंज साहिब दिल्ली से आए ज्ञानी अंग्रेज सिंह जी ने संगत को गुरु महाराज के इतिहास से अवगत कराया। अमृतसर से आए भाई गुरकीरत सिंह जी ने संगत को कीर्तन श्रवण कराकर भावविभोर किया। इसके साथ ही जो गुरसिक्खी बड़ा मुकाबला रखा गया था, उसके तहत छोटे-छोटे बच्चे एवं नवयुवक सभी सिख धर्म की परंपरागत वेशभूषा में सज धज कर आए हुए थे, जिन्होंने अपने परंपरागत पोशाक का बहुत अच्छे से प्रदर्शन किया। उनको देखकर पुरातन समय की सीखी की याद आने लगी। सभी संगत के लोग उन बच्चों की परंपरागत पोशाक की सराहना कर रहे थे। गुरुद्वारा अध्यक्ष डॉ गुरमीत सिंह जी ने विजेताओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इसके साथ साथ 8 जनवरी शाम को जो प्रश्नोत्तरी जारी की गई थी, उसमें भी सैकड़ों पत्र जवाब लिखकर आए विजेताओं को गुरुद्वारा अध्यक्ष डॉक्टर गुरमीत सिंह, महासचिव सरदार परमजीत सिंह, कोषाध्यक्ष गुलशन जोहर, मनजीत सिंह तलवार, सतनाम सिंह सेठी, एस.पी.सेठी, हरमिंदर सिंह मिंदी सहित सभी सम्मानित महानुभाव ने बच्चों को पुरस्कृत कर उनका उत्साह बढ़ाया।

तत्पश्चात रात्रि के समय गुरु महाराज के प्रकाश के समय ज्ञानी अंग्रेज सिंह जी ने प्रकाश कथा की और भाई वीर सिंह जी ने नाम सिमरन वह जयकारों की गूंज से फूलों की वर्षा करते हुए गुरु महाराज का प्रकाश पर्व मनाया फूलों की वर्षा होते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कि फूल गुरुद्वारा साहिब की बालकनी से नहीं मानो सीधे स्वर्ग से देवताओं द्वारा बरसाई जा रहे हो क्यों ना हो क्योंकि संगत में ही देवताओं का निवास रहता है बड़ी ही श्रद्धा भावना प्यार सम्मान सत्कार के साथ गुरुद्वारा यहीआ गंज में गुरु गोविंद सिंह जी का प्रकाश पर्व मनाया गया साथ ही जितने भी मीडिया कर्मी गुरुद्वारा साहिब में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया जो कवरेज करने के लिए पहुंचे हुए थे एवम् प्रशासनिक अधिकारियों सहित सभी श्रद्धालु जनों सभी को डॉक्टर अमरजोत सिंह देवेंद्र सिंह गगनदीप सिंह सेठी गगन बग्गा ,जसप्रीत सिंह गुरजीत छाबड़ा सन्नी आनंद द्वारा सभी का स्वागत करते हुए उनको सम्मान भेंट किया सारा दिन गुरु का लंगर अटूट वितरित किया गया।

दुनिया का सबसे पहला प्रेम पत्र!

कृष्ण कुमार यादव; पोस्ट मास्टर जनरल वाराणसी परिक्षेत्र

हम में से हर किसी ने अपने जीवन में किसी न किसी रूप में प्रेम-पत्र लिखा होगा। प्रेम-पत्रों का अपना एक भरापूरा संसार है। प्रेम जैसी अनुपम भावना को व्यक्त करने के लिए शब्द सचमुच नाकाफी होते हैं। दुनिया की तमाम मशहूर शख्सियतों ने प्रेम-पत्र लिखे हैं- फिर चाहे वह नेपोलियन हों, अब्राहम लिंकन, क्रामवेल, बिस्मार्क या बर्नार्ड शॉ हों। आज ये पत्र एक धरोहर बन चुके हैं। ऐसे में यह जानना अचरज भरा लगेगा कि दुनिया का सबसे पुराना प्रेम पत्र बेबीलोन के खंडहरों से मिला था। बेबिलोन की किसी युवती का प्रेमी अपनी भावनाओं को समेटकर उससे जब अपने दिल की बात कहने वहां तक पहुंचा, तो वह युवती तब तक वहां से जा चुकी थी। वह प्रेमी युवक अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और उसने वहीं मिटटी के फर्श पर खोदते हुए लिखा- ‘मैं तुमसे मिलने आया था, तुम नहीं मिली।’ यह छोटा-सा संदेश विरह की जिस भावना से लिखा गया था, उसमें कितनी तड़प शामिल थी। इसका अंदाजा सिर्फ वह युवती ही लगा सकती थी, जिसके लिए इसे लिखा गया। भावनाओं से ओत-प्रोत यह पत्र ईसा से बहुत पहले का है और इसे ही दुनिया का प्रथम प्रेम पत्र माना जाता है।

यशस्वी व्यक्तित्व के धनी उत्तमचंद इसराणी

5 दिसम्बर/पुण्य-तिथि
यशस्वी व्यक्तित्व के धनी उत्तमचंद इसराणी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक का काम ऐसे समर्पित लोगों के बल पर खड़ा है, जिन्होंने गृहस्थ होते हुए भी अपने जीवन में संघ कार्य को सदा प्राथमिकता दी। ऐसे ही एक यशस्वी अधिवक्ता थे श्री उत्तमचन्द इसराणी। श्री इसराणी का जन्म 10 नवम्बर, 1923 को सिन्ध प्रान्त में सक्खर जिले की लाड़काणा तहसील में स्थित गाँव ‘मियाँ जो गोठ’ (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। बालपन में ही वे संघ के स्वयंसेवक बन गये थे।

उन दिनों सिन्ध में मुस्लिम गतिविधियाँ जोरों पर थीं। पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए मजहबी गुंडे रात भर हिन्दू बस्तियों में घूमते थे। ऐसे में हिन्दू समाज का विश्वास केवल संघ पर ही था। शाखा पर सैकड़ों स्वयंसेवक आते थे। शायद ही कोई हिन्दू युवक ऐसा हो, जो उन दिनों शाखा न गया हो। …पर इसके बाद भी देश का विभाजन हो गया। कांग्रेसी नेताओं की सत्ता लिप्सा ने सिन्ध, पंजाब और बंगाल के करोड़ों हिन्दुओं को अपना घर, खेत, कारोबार और वह मिट्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जिसमें वे खेल कर बड़े हुए थे। लाखों हिन्दुओं को अपनी प्राणाहुति भी देनी पड़ी।

श्री इसराणी अपने परिवार सहित मध्य प्रदेश के भोपाल में आकर बस गये। भोपाल में उन्होंने अपना परिवार चलाने के लिए वकालत प्रारम्भ कर दी। इसी के साथ वे संघ कार्य में भी सक्रिय हो गये। बहुत वर्षों तक सिन्धी कालोनी वाला उनका मकान ही संघ का प्रान्तीय कार्यालय बना रहा। इस प्रकार उत्तमचन्द जी और भोपाल का संघ कार्य परस्पर एकरूप हो गयेे। प्रारम्भ में उन्हें संघ के भोपाल विभाग कार्यवाह का दायित्व दिया गया। इसके बाद प्रान्त कार्यवाह और फिर प्रान्त संघचालक की जिम्मेदारी उन्हें दी गयी। जब मध्य भारत, महाकौशल और छत्तीसगढ़ प्रान्तों को मिलाकर एक क्षेत्र की रचना की गयी, तो उन्हें क्षेत्र संघचालक का काम दिया गया।

1975 में जब देश में आपातकाल लगा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, तो इसराणी जी पूरे समय जेल में रहे। वह अत्यन्त कठिन समय था। वकालत बन्द होने से घर की आय रुक गयी, फिर भी एक स्थितप्रज्ञ सन्त की भाँति उन्होंने धैर्य रखा और जेल में बन्द सभी साथियों को भी साहसपूर्वक इस परिस्थिति का सामना करने का सम्बल प्रदान किया। इसराणी जी को पूर्ण विश्वास था कि सत्य की जय होगी और यह स्थिति बदलेगी, चूँकि संघ ने कभी कोई गलत काम नहीं किया। 1977 में आपातकाल की समाप्ति और प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद वे फिर संघ कार्य में सक्रिय हो गये। जब उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा, तो उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से आग्रह कर दायित्व से मुक्ति ले ली। इसके बाद भी ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते जो सम्भव हुआ, काम करते रहे।

एक बार जबलपुर प्रवास में उन्हें भीषण हृदयाघात हुआ। उसके बाद उन्हें भोपाल लाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया; पर इसके बाद उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका और 5 दिसम्बर, 2007 को उनका शरीरान्त हुआ। माननीय सुदर्शन जी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ‘‘उत्तमचन्द जी ने राष्ट्र के हित में सर्वांग यशस्वी जीवन कैसे बिताया जा सकता है, इसका अनुकरणीय उदाहरण हमारे सम्मुख रखा है। यशस्वी गृहस्थ, यशस्वी अधिवक्ता, यशस्वी सामाजिक कार्यकर्ता, यशस्वी स्वयंसेवक, यशस्वी कार्यवाह और यशस्वी संघचालक जैसी भूमिकाओं को विभिन्न स्तरों पर निभाते हुए दैनन्दिन शाखा जाने के अपने आग्रह में उन्होंने कभी कमी नहीं आने दी।’’

रीवा: रोचक भी-ऐतिहासिक भी…

यात्रा संस्मरण-2
रीवा: रोचक भी-ऐतिहासिक भी…


रीवा राज्य की स्थापना गुजरात के महाराजा व्याघ्रराव (बाघ राव) ने करीब 12 सौ वर्ष पहले की थी। इन्हें बघेलवंशी राजा माना जाता है। इन्हीं की वजह से रीवा राज्य बघेलखंड कहलाया। रीवा राज्य छत्तीसगढ़ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला था। आज महाराजा बाघराव की 36 वीं पीढ़ी यहां मौजूद है। राजवंश के मौजूदा प्रतिनिधि पुष्पराज सिंह हैं।


रायबरेली-रीवा के मिलन का माध्यम रीवा की सामाजिक कार्यकर्ता अंजू दिवेदी बनीं। सोशल मीडिया पर संपर्क के बाद वह आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी अनुयाई परिवार का सदस्य खुद तो बनी ही अपनी सामाजिक कार्यकर्ता मित्र वंदना गुप्ता को भी स्पाई वालों से मिला दिया। आचार्य स्मृति दिवस पर 2 वर्ष से लगातार वह पधार रही हैं। पिछले साल आयोजित कार्यक्रम में वह अपनी सामाजिक कार्यकर्ता मित्र वंदना गुप्ता के साथ पधारीं थीं। ठीक एक साल बाद 21 नवंबर 2021 को हम प्रज्ञा (धर्मपत्नी) के साथ रीवा में थे। उनकी आत्मीयता और वंदना जी का केक के साथ पधारना, संबंधों के दिन पर दिन प्रगाढ़ होने का सबूत है।


महान भजन गायक प्रदीप का यह भजन.. “अपना सोचा कभी नहीं होता..”आपने सुना ही होगा। यही आज घटित हुआ। घर से सोचकर चले थे कि रीवा में आचार्य द्विवेदी अनुयाई परिवार से मिला-भेंटी के बाद अगला पड़ाव रामवन होगा। सतना के पर्यटन स्थल रामवन के बारे में प्रसिद्ध है कि भगवान राम सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के समय इधर से गुजरे थे। यहां हनुमान जी की विशाल मूर्ति और मंदिर के साथ ही तुलसी संग्रहालय काफी ख्यात है। यह संग्रहालय 1936 में सतना के एक सेठ ने स्थापित किया था। अब यह पुरातत्व विभाग के पास है। यहां एक से एक पांडुलिपियां होने का पता चला था। यहां आने के बाद रामवन जाना स्थगित हो गया। हम दोनों अंजू जी के परिवार के साथ पहुंच गए रीवा से 20 किलोमीटर दूर गोविंदगढ़। यहां पहाड़ों के ऊपर स्थित खन्धो माई के मंदिर में माथा टेकना भाग्य में बदा था।
मंदिर में काली माई की मूर्ति विराजित है। गोविंदगढ़ के कांग्रेस नेता अभय पांडे “पंकज” बता रहे थे कि रीवा रियासत के महाराजा रघुराज सिंह ने करीब 350 वर्ष पहले माई का मंदिर बनवाया था। वह रीवा रियासत के तीसवें वंश के शासक थे। इस समय रीवा रियासत में 36वें वंश के शासक मौजूद हैं। स्थानीय लोग यहां स्थापित काली माई की मूर्ति को मैहर की काली माई के रूप में मानते हैं। मैहर में शारदा माता विराजित हैं। अंजू जी की नवविवाहित ननद के आशीर्वाद समारोह में शामिल होने का अवसर अपने आप मिला।

व्हाइट लायन सफारी
रीवा से करीब 15 किलोमीटर दूर मुकुंदपुर गांव में व्हाइट लायन सफारी भी छोटे-बड़े सबके देखने के लिए अच्छी जगह है। यहां जू के साथ-साथ सफारी है। इसमें सफेद शेरों के अलावा अन्य शेर और जंगली जीव भी हैं। 365 एकड़ में बने इस सफारी को अस्तित्व में लाने का श्रेय स्थानीय विधायक और मंत्री रहे राजेंद्र शुक्ला जी को है। वर्ष 2011 में उन्होंने व्हाइट लायन सफारी सरकार से मंजूर किया था। वर्ष 1916 में यह लोगों के लिए खोल दिया गया। व्हाइट लायन का इतिहास भी बहुत पुराना है। दुर्लभ सफेद बाघों की कहानी यहां आप देख भी सकते हैं और पढ़ भी सकते हैं। सफेद बाघ को संरक्षित करने की कोशिश 27 मई 1951 को शुरू हुई थी। तभी से मोहन नाम दिया गया था गोविंदगढ़ के बाद महल में आज 1976 को आखरी सफेद बाघ विराट में अंतिम सांस ली। दुनिया में विंध्य का नाम रोशन करने वाले सफेद बाघ इतिहास बन गए। इतिहास को वर्तमान बनाने में राजेंद्र शुक्ल की कोशिश कामयाब हुई और आज लोग व्हाइट लायन सफारी बड़ी संख्या में देखने, सुनने और घूमने आते हैं।

रीवा के प्रसिद्ध चिरहुला और पपरा हनुमान मंदिर

रीवा में हनुमान जी के इंदौर प्रसिद्ध हनुमान मंदिरों में दर्शन किए बिना लौटना अपने साथ ही इंसाफ नहीं होगा। शहर से 5 किलोमीटर दूर चिरहुला हनुमान मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। यहां हनुमान जी का विग्रह मनमोहक है। मंदिर की तीनों दीवारों पर हनुमान जी के नौ ग्रहों की मूर्तियों की स्थापना इस मंदिर को सबसे अलग पहचान देती है। अभी तक हमने किसी भी हनुमान मंदिर की दीवारों पर विभिन्न मुद्रा के विग्रह के दर्शन का सौभाग्य नहीं प्राप्त किया था। यह केवल यहीं मिला। पपरा का हनुमान मंदिर रीवा से करीब 30 किलोमीटर दूर गोविंदगढ़-शहडोल-मैहर मार्ग पर स्थित है। मान्यता है कि हनुमान जी का विग्रह स्वयंभू है। पहाड़ के पत्थर काटते समय हनुमान जी का यह विग्रह प्रकट हुआ था। हनुमान जी की मूर्ति आधी पत्थर में धंसी हुई है और आधी बाहर निकली हुई है। यहां भव्य पक्का मंदिर निर्माण के कई प्रयास हुए, लेकिन सफलता नहीं मिली। टीन शेड और लोहे के पाइप पर ही अस्थाई मंदिर बना हुआ है।

जीवन लेने-देने से जुड़ा गोविंदगढ़ तालाब

कस्बे के गोमती चौराहे से बेला रोड पर भारी भरकम गोविंदगढ़ तालाब के उस छोर पर अस्ताचलगामी सूर्यदेव की छटा शब्दों के बयान करना मुश्किल है। गोविंदगढ़ तालाब की कहानी सुख और दु:ख दोनों से पटी है। दो दशक पहले लगातार चार-पांच साल बारिश ना होने पर तालाब के पानी ने रीवा की प्यास बुझाई थी। तालाब के पानी को रीवा ले जाया गया था। रीवा के महाराजा ने गोविंदगढ़ में अपने किले की सुरक्षा के लिए चारों तरफ तालाब खुदवाए थे। दशकों पहले सूखा पड़ने पर लोगों का जीवन बचाने के लिए महाराजा ने गोविंदगढ़ तालाब खुदवाकर लोगों को रोजगार दिया था। सैकड़ों एकड़ भूमि पर तालाब से जुड़ा एक दु:खद कथानक 15 साल पहले का है। जब एन धनतेरस के दिन सवारियों से भरी एक बस तालाब में गिर गई थी। 99 लोग इस हादसे में मारे गए थे। हादसे वाली जगह पर स्मृति स्तंभ का निर्माण भी कराया गया है। स्तंभ में हादसे में मारे गए लोगों के नाम दर्ज हैं। ऐसे ही एक नाव के डूबने का दु:खद हादसा भी तालाब में हो चुका है। जितेंद्र अंजू द्ववेदी के फार्म हाउस पर आ मॉल अमरूद की बगिया का आनंद भी इस यात्रा में हमको और प्रज्ञा दोनों को मिला। ताजे अमरूद मिलते कहां हैं? जितेंद्र द्विवेदी के साथ ही स्कूल में पढ़ाने वाले महेंद्र मिश्रा जी ने विस्तार से गोविंदगढ़ के इतिहास से भी परिचित कराया। रीवा की यात्रा जाते और आते दोनों वक्त आनंददाई रही। इस यात्रा को भविष्य में भी भूल पाना संभव नहीं होगा।

∆ गौरव अवस्थी आशीष
रायबरेली/उन्नाव (लेखक दैनिक हिंदुस्तान के प्रभारी हैं)

शमी के पौधे का हमारे जीवन में महत्व

शमी के पौधे का हमारे धर्म ग्रंथों रामायण, महाभारत और पुराणों में भी जिक्र आता है। धार्मिक रूप से भी शमी का बहुत महत्व है। इसका संबंध भगवान राम और पाण्डवों से भी रहा है। शमी की लकड़ी का कुछ विशेष यज्ञों में भी प्रयोग किया जाता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, शमी के पौधे का पूजन करने से शनि ग्रह को शांत किया जा सकता है। जिस व्यक्ति पर शनि का दुष्प्रभाव चल रहा हो, उसे अपने घर में शमी का पौधा लगाना चाहिए।

शनि के प्रभाव को शांत करता है शमी- ज्योतिष आचार्यों के अनुसार, शमी और पीपल ये दो पेड़ ऐसे हैं, जिनका प्रयोग शनि देव के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है। शनि देव या शनि ग्रह का प्रभाव हर व्यक्ति के जीवन में एक बार जरूर पड़ता है। शनि के दुष्प्रभाव से बचने के लिए घर में या घर के आस-पास शमी का वृक्ष लगाएं तथा शनिवार को इसके नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इसके अलावा शमी के फूल तथा पत्तों का भी प्रयोग शनि ग्रह के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है। मान्यता है कि घर में शमी का पेड़ लगा रहने से टोने, टोटके और नकारात्मक ऊर्जा का घर पर प्रभाव नहीं पड़ता।

शमी का धार्मिक महत्व

शमी के वृक्ष का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है, इसका वर्णन रामायण और महाभारत दोनों जगह किया गया है। रामायण में उल्लेख है कि जब लंका पर युद्ध से पहले भगवान राम ने विजय मुहूर्त में हवन किया था , तो शमी का वृक्ष उसका साक्षी बना था। इसी प्रकार महाभारत में जब अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने बृह्न्नलला का रूप लिया था, तो अपना गाण्डीव धनुष शमी के वृक्ष पर ही छिपाया था। विराट नगर के युद्घ में यहां पर से ही गाण्डीव निकाल कर कौरवों को अकेले ही भागने पर मजबूर कर दिया था। शमी के पत्तों का प्रयोग भगवान गणेश और दुर्गा मां की पूजा में भी किया जाता है।

खेजड़ी या शमी एक वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। यह वहां के लोगों के लिए बहुत उपयोगी है। इसके अन्य नामों में घफ़, खेजड़ी, जांट/जांटी, सांगरी, छोंकरा, जंड, कांडी, वण्णि, शमी, सुमरी आते हैं। इसका व्यापारिक नाम कांडी है। यह वृक्ष विभिन्न देशों में पाया जाता है जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। वैज्ञानिक नाम: Prosopis cineraria कुल: फ़ाबाकेऐवर्ग: माग्नोल्योफ़ीता

ज्योतिष और औषधि महत्व को देखते हुए आप छत पर पौधे शमी के पौधे को लगा सकते हैं। इसे दक्षिण दिशा में रखने की कोशिश करें। दक्षिण दिशा में अगर रोशनी नहीं आ पा रही है तब आप इसे पूर्व दिशा या ईशान कोण में भी लगा सकते हैं।

डिसक्लेमर

‘इस लेख में निहित किसी भी जानकारी/सामग्री/गणना की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है, इसके उपयोगकर्ता इसे महज सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त, इसके किसी भी उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता की ही रहेगी।’

52 राजाओं को साथ लेकर रिहा हुए थे छठे पातशाही हरगोबिंद सिंह

गुणवंत सिंह राठौर

सिक्ख धर्म में महत्त्वपूर्ण है बंदी छोड़ दिवस।
52 राजाओं को साथ लेकर रिहा हुए थे छठे पातशाही हरगोबिंद सिंह। दीवाली की तरह मनाया जाता है यह दिन।


नूरपुर (बिजनौर)। सिक्ख धर्म में बंदी छोड़ दिवस का विशेष महत्त्व है। इस दिन को सिक्ख धर्म में दीवाली की तरह मनाया जाता है। इतिहासकारों के मुताबिक मध्यप्रदेश के ग्वालियर का किला जब मुगलों के कब्जे में आया तो उन्होंने इसे जेल बना दिया। यहां राजनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण और बादशाहत के लिए खतरा माने जाने वाले लोगों को कैद रखा जाता था। मुगल बादशाह जहांगीर ने भी इसमें 52 अन्य राजाओं के साथ 6 वें सिख गुरू हरगोविंद साहब को कैद रखा था। कहा जाता है कि किसी रूहानी हुक्म से बादशाह ने आज के दिन ही गुरू हरगोविंद साहब को उनकी इच्छा के मुताबिक 52 राजाओं के साथ रिहा किया था। इसकी याद में किले पर गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ का निर्माण कराया गया।  

हरगोविंद साहिब के साथ रिहा हुए 52 कैदी

इतिहास के मुताबिक जहाँगीर ने गुरु हर गोबिंद साहिब को ग्वालियर के किले में बंदी बनाया था। उन्हें लगभग दो साल तक कैद में रखा।किंवदंतियों के मुताबिक गुरू हरगोविंद को कैद किए जाने के बाद से जहांगीर को स्वप्न में किसी फकीर से गुरू जी को आजाद करने का हुक्म मिलने लगा। जहांगीर मानसिक रूप से परेशान रहने लगा। इसी दौरान मुगल शहंशाहों के किसी करीबी फकीर ने उसे मशविरा दिया कि वह गुरू हरगोविंद साहब को तत्काल रिहा कर दे। …लेकिन गुरू अड़ गए कि उनके साथ 52 राजाओं को भी रिहा किया जाए। लिहाजा उनके साथ 52 कैदियों को भी छोड़ दिया गया।

 
52 कलियों के अंगरखे को पकड़ बाहर आए राजा

जहांगीर के मुताबिक उन 52 राजाओं को रिहा करना मुगल साम्राज्य के लिए खतरनाक था, लिहाजा उसने कूटनीतिक आदेश दिया। जहांगीर का हुक्म था कि जितने राजा गुरू हरगोविंद साहब का दामन थाम कर बाहर आ सकेंगे, वो रिहा कर दिए जाएंगे। सिख गुरू चाहते थे कि उनके साथ कैद सभी राजा रिहा हों, लिहाजा गुरू जी के भाई जेठा ने युक्ति सोची। जेल से रिहा होने पर नया कपड़ा पहनने के नाम पर 52 कलियों का अंगरखा सिलवाया गया। गुरू जी ने उस अंगरखे को पहना, और हर कली के छोर को 52 राजाओं ने थाम लिया। इस तरह सब राजा रिहा हो गए।
गुरू जी के इस कारनामे की वजह से उन्हें दाता बंदी छोड़ कहा गया। बाद में उनकी इस दयानतदारी की याद बनाए रखने के लिए ग्वालियर किले पर उस स्थान पर एक गुरुद्वारा स्थापित कराया गया, जहां गुरू हरगोविंद साहब 52 राजाओं के साथ कैद रहे थे। गुरू जी के नाम पर इसका नाम भी गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब रखा गया।

‘जटाकुंड’ में मनाया गया भव्य दीपोत्सव

2 दिसंबर को स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पुण्यतिथि। इस अवसर पर सुंदरकांड पाठ व विशाल भंडारे का आयोजन।

लखनऊ। अयोध्या जिला अंतर्गत सोहावल तहसील की नंदीग्राम ग्राम सभा में स्थित जटाकुंड पर स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव स्मृति ट्रस्ट द्वारा भव्य दीपोत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

ज्ञात हो कि जटा कुंड वही पौराणिक स्थल है, जहां वनवास से अयोध्या आगमन पर प्रभु श्रीराम व लक्ष्मण जी ने जटाएं बनवाने के लिए उपरांत स्नान किया था। इस अवसर पर जटा कुंड की साफ सफाई करके ट्रस्ट के सदस्यों एवं स्थानीय लोगों ने कुंड के चारों तरफ दिए जलाए। जटाकुंड पर स्थित हनुमान मंदिर पर पूजा अर्चना कर दीपावली मनाई गई। ट्रस्ट के सूत्रों द्वारा जानकारी दी गई कि आगामी 2 दिसंबर को स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की पुण्यतिथि के अवसर पर सुंदरकांड पाठ व विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाएगा

कायस्थ 24 घंटे के लिए क्यों नहीं करते कलम का उपयोग?

जब भगवान राम के राजतिलक में निमंत्रण छूट जाने से नाराज भगवान् चित्रगुप्त ने रख दी थी कलम !! उस समय शुरू हो चुका था परेवा काल।

लखनऊ (शैली सक्सेना)। परेवा के दिन कायस्थ समाज के लोग कलम का प्रयोग नहीं करते हैं। यानी किसी भी तरह का का हिसाब – किताब नहीं करते हैं। आखिर ऐसा क्यूँ है कि पूरी दुनिया में कायस्थ समाज के लोग दीपावली के दिन पूजन के बाद कलम रख देते हैं और फिर यम द्वितीया के दिन कलम-दवात के पूजन के बाद ही उसे उठाते हैं?

इसको लेकर सर्व समाज में कई सवाल अक्सर लोग कायस्थों से करते हैं। ऐसे में अपने ही इतिहास से अनभिग्य कायस्थ युवा पीढ़ी इसका कोई समुचित उत्तर नहीं दे पाती है। जब इसकी खोज की गई तो इससे सम्बंधित एक बहुत रोचक घटना का संदर्भ किवदंतियों में मिला….

…कहते हैं कि जब भगवान राम दशानन रावण का वध कर अयोध्या लौट रहे थे, तब उनके खडाऊं को राज सिंहासन पर रख कर राज्य चला रहे राजा भरत ने गुरु वशिष्ठ को भगवान राम के राजतिलक के लिए सभी देवी देवताओं को सन्देश भेजने की व्यवस्था करने को कहा। गुरु वशिष्ठ ने ये काम अपने शिष्यों को सौंप कर राज्यतिलक की तैयारी शुरू कर दीं।

भगवान राम ने पूछा- ऐसे में जब राज्यतिलक में सभी देवी देवता आ गए तब भगवान राम ने अपने अनुज भरत से पूछा भगवान चित्रगुप्त नहीं दिखाई दे रहे हैं। इस पर जब खोजबीन हुई तो पता चला कि गुरु वशिष्ठ के शिष्यों ने भगवान चित्रगुप्त को निमंत्रण पहुंचाया ही नहीं था। इसके चलते भगवान चित्रगुप्त नहीं आये। इधर भगवान चित्रगुप्त सब जान चुके थे और इसे प्रभु राम की महिमा समझ रहे थे। फलस्वरूप उन्होंने गुरु वशिष्ठ की इस भूल को अक्षम्य मानते हुए यमलोक में सभी प्राणियों का लेखा जोखा लिखने वाली कलम को उठा कर एक किनारे रख दिया।

रुके स्वर्ग और नरक के सारे काम- सभी देवी देवता जैसे ही राजतिलक से लौटे तो पाया कि स्वर्ग और नरक के सारे काम रुक गये थे, प्राणियों का लेखा-जोखा न लिखे जाने के चलते ये तय कर पाना मुश्किल हो रहा था कि किसको कहां भेजें?
तब गुरु वशिष्ठ की इस गलती को समझते हुए भगवान राम ने अयोध्या में भगवान विष्णु द्वारा स्थापित भगवान चित्रगुप्त के मंदिर (श्री अयोध्या महात्मय में भी इसे श्री धर्म हरि मंदिर कहा गया है। धार्मिक मान्यता है कि अयोध्या आने वाले सभी तीर्थयात्रियों को अनिवार्यत: श्री धर्म-हरि जी के दर्शन करना चाहिये, अन्यथा उसे इस तीर्थ यात्रा का पुण्यफल प्राप्त नहीं होता।) में गुरु वशिष्ठ के साथ जाकर भगवान चित्रगुप्त की स्तुति की और गुरु वशिष्ठ की गलती के लिए क्षमा याचना की। इसके बाद भगवान राम का आग्रह मानकर भगवान चित्रगुप्त ने लगभग ४ पहर (२४ घंटे बाद ) पुन: कलम दवात की पूजा करने के पश्चात उसको उठाया और प्राणियों का लेखा-जोखा लिखने का कार्य आरम्भ किया।

कायस्थ, ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय- कहते हैं कि तभी से कायस्थ दीपावली की पूजा के पश्चात कलम को रख देते हैं और यम द्वितीया के दिन भगवान चित्रगुप्त का विधिवत कलम दवात पूजन करके ही कलम को धारण करते हैं। तभी से कायस्थ, ब्राह्मणों के लिए भी पूजनीय हुए और इस घटना के पश्चात मिले वरदान के फलस्वरूप सबसे दान लेने वाले ब्राह्मणों से दान लेने का हक़ सिर्फ कायस्थों को ही है।
श्री चित्रगुप्त भगवान की जय

गोवर्धन पूजा पर मांगी खुशहाली और समृद्धि की मनौती

लखनऊ (शैली सक्सेना)। पांच दिवसीय दीपावली पर्व श्रृंखला में शुक्रवार को गोवर्धन पर्व मनाया गया। लोगों ने अपने घर में गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर उसे फूलों से सजाया। गोवर्धन पर्वत के पास ग्वाल-बाल और पेड़ पौधों की आकृति भी बनाई। इसके बीच में भगवान कृष्ण की मूर्ति रख कर षोडशोपचार विधि से पूजन किया। लोगों ने गोवर्धन पूजा सुबह और शाम के समय मुहूर्त के अनुसार की। इस अवसर पर भगवान को तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाने के साथ ही गोवर्धन पूजा की व्रत कथा सुन कर प्रसाद वितरित किया गया।

गोवर्धन पूजा का महत्व: मान्यता के अनुसार  गोवर्धन पूजा करने से धन, संतान और गौ रस की वृद्धि होती है। प्रकृति और भगवान श्री कृष्ण को समर्पित इस पर्व के दिन कई मंदिरों में धार्मिक आयोजन और अन्नकूट यानी भंडारे होते हैं। पूजन के बाद लोगों में प्रसाद बांटा जाता है। इस दिन आर्थिक संपन्नता के लिए गाय को स्नान कराकर उसका तिलक किया जाता है। गाय को हरा चारा और मिठाई खिलाने के बाद गाय की 7 बार परिक्रमा की जाती है। इसके बाद गाय के खुर की पास की मिट्टी एक कांच की शीशी में लेकर उसे अपने पास रख लिया जाता है।मान्यता है ऐसा करने से धन-धान्य की कभी कमी नहीं होगी। 

गोवर्धन पूजा की शुरुआत- गोवर्धन पूजा को लोग अन्नकूट पूजा के नाम से भी जानते हैं। दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा का विधान है। इस दिन गोवर्धन पर्वत, गोधन यानि गाय और भगवान श्री कृष्ण की पूजा का विशेष महत्व है। इसके साथ ही वरुण देव, इंद्र देव और अग्नि देव आदि देवताओं की पूजा का भी विधान है। गोवर्धन पूजा में विभिन्न प्रकार के अन्न को समर्पित और वितरित किया जाता है, इसी वजह से इस उत्सव या पर्व का नाम अन्नकूट पड़ा है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं अनुसार द्वापर युग में जब इंद्र ने अपना मान जताने के लिए ब्रज में तेज बारीश की थी तब भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाकर ब्रज वासियों की मूसलाधार बारिश से रक्षा की थी। जब इंद्रदेव को इस बात का ज्ञात हुआ कि भगवान श्री कृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं तो उनका अहंकार टूट गया। इंद्र ने भगवान श्री कृष्ण से क्षमा मांगी। गोवर्धन पर्वत के नीचे सभी गोप-गोपियाँ, ग्वाल-बाल, पशु-पक्षी सुख पूर्वक और बारिश से बचकर रहे। कहा जाता है तभी से गोवर्धन पूजा मनाने की शुरुआत हुई।

बहादुर शाह ज़फ़र ने रखी थी बरतानिया हुकूमत के खिलाफ आज़ादी की लड़ाई की नींव

लखनऊ। बहादुर शाह ज़फ़र ने बरतानिया हुकूमत के खिलाफ जो किया उसे चाहे बगावत कहा जाए, चाहे आजादी की लड़ाई, पर आजादी की नींव वहीं से रखी गई थी। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी ने राजधानी लखनऊ में ‘बहादुर शाह ज़फ़र जयन्ती समारोह’ में बोलते हुए कही।

राजधानी लखनऊ में आयोजित ‘बहादुर शाह ज़फ़र जयन्ती समारोह’ में बोलते हुए विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी ने कहा कि बहादुर शाह ज़फ़र ने बरतानिया हुकूमत के खिलाफ जो किया उसे चाहे बगावत कहा जाए, चाहे आजादी की लड़ाई पर आजादी की नींव वहीं से रखी गई थी। ऐसे ही बलिया की धरती पर शुरू हुए सम्पूर्ण क्रांति के आंदोलन का भी शीर्ष महत्व है। चौधरी ने कहा कि आज फिर समझने और एक होकर स्थिति का मुकाबला करने की जरूरत है, अन्यथा जैसे हम कभी अंग्रेजों के गुलाम थे आगे कुछ पूंजीपतियों के गुलाम होंगे।

उन्होंने अमर शहीद महान स्वतंत्रता सेनानी बहादुर शाह ज़फ़र को याद करते हुए कहा कि हमें बदलाव की ओर चलना पड़ेगा। चौधरी ने एक कविता की लाइनों के साथ अपनी बात पूरी की ‘गंगा की कसम, जमुना की कसम यह ताना बाना बदलेगा, कुछ तुम बदलो कुछ हम बदलें, तब सारा जमाना बदलेगा’।

इस अवसर पर वामपंथी नेता अतुल कुमार अंजान ने कहा कि 24 अक्टूबर बहुत ही पाक और मुकद्दस दिन है, इस दिन पर आयोजित यह प्रोग्राम बेहद खास है। आज जब हम आजादी की 75वीं सालगिरह मना रहे हैं तो लखनऊ वालों से मेरी यह गुजारिश है कि अब वास्तविक अर्थों में बहादुर शाह ज़फ़र को याद किया जाए। उन्होंने कहा कि जिसके विचारों के साये तले दो तिहाई दुनिया चलती है, उन कार्ल मार्क्स जैसे विचारक ने भी ढेर सारे आर्टिकल ‘फर्स्ट फ्रीडम वार ऑफ इंडिया’ पर लिखे हैं। अंजान ने कहा कि ऐसी अजीम शख्शियत को याद करते हुए हमें एक दूसरे के एहतराम का संकल्प लेना चाहिए। चुनौतियों के इस दौर में मिलजुलकर ही इस देश को आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि लखनऊ का आजादी के पहले और बाद में भी देश के लिए बड़ा योगदान रहा। भारत के संविधान निर्माण के समय की एक बात का जिक्र करते हुए बताया कि इसी लखनऊ के भगवान दीन ने कहा था कि इस संविधान में नारियों के मौलिक अधिकारों की बात को शामिल करना भी जरूरी है।

इससे पहले कांग्रेस मीडिया विभाग के डिप्टी चेयरमैन डॉ पंकज श्रीवास्तव ने बहादुर शाह ज़फ़र के भारत की आजादी के लिए किये गए संघर्ष को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि 70 साल के उस शख्श द्वारा जलायी गई आजादी की मशाल की तपिश में एक दिन ब्रिटिश हुकूमत का सूरज अस्त हो गया।

प्रोफेसर साबिरा हबीब ने बताया कि दूसरे लोग जिसे बगावत कहते हैं, बहादुर शाह ज़फ़र ने ही आजादी की उस लड़ाई को शुरू किया था। आगे चलकर यही लड़ाई हमारी जम्हूरियत का सबब बनी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए गिरि विकास अध्ययन संस्थान के डॉ एके सिंह ने कहा कि जो लोग अपने पूर्वजों को याद नहीं करते उनकी आने वाली पीढ़ियों उनको भी याद नहीं करतीं।

समारोह में मुख्य अतिथि नेता राम गोविन्द चौधरी एवं मंचासीन अन्य अतिथियों ने शहर की कई हस्तियों को सम्मानित भी किया। सम्मान पाने वालों में प्रदीप कपूर, डॉक्टर अब्दुल कुददूस, डॉक्टर कौसर उस्मान,  शिव शरण सिंह, बीडी नक़वी, मधुकर त्रिवेदी, अमीर हैदर, सुरेंद्र सिंह चौधरी, श्रीमती शिल्पा चौधरी, बेचई यादव, डॉक्टर उदय खत्री शामिल रहे।
बहादुर शाह जफर की कुर्बानी के संदेश के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन भी रामगोविंद चौधरी ने किया। समारोह के संयोजक इंसराम अली ने सभी अतिथियों का स्वागत कर यह अपील किया कि आज की युवा पीढ़ी आजादी के पहले के सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के जीवन का अध्ययन जरूर करें, जिससे कि युवा पीढ़ी को यह पता रहे कितनी कुर्बानियों के बाद हिंदुस्तान को आजादी मिली थी।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अब्दुल कयूम रहमानी फाउंडेशन के अध्यक्ष बदरे आलम ने सभी आगंतुकों का स्वागत कर आभार व्यक्त किया। अंत में पूर्व एमएलसी सिराज मेहंदी ने सभी आगंतुकों का आभार जताया। उन्होंने कार्यक्रम के आयोजक इंसराम अली और उनकी टीम को धन्यवाद दिया। इस अवसर पर प्रमुख वरिष्ठ पत्रकार एहतेराम सिद्दीकी, चांद मियाँ सभासद, खालिद अंसारी, औसाफ़ अकबर सहित आदि उपस्थित थे।

आज है भारतीय जनसंघ का स्थापना दिवस

दीपक या दीया – अखिल भारतीय जनसंघ का चुनाव चिह्न
भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी

भारतीय जनसंघ भारत का एक पुराना राजनैतिक दल था जिससे 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी। इस दल की स्थापना डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में की गयी थी। इस पार्टी का चुनाव चिह्न दीपक था। इसने 1952 के संसदीय चुनाव में 3 सीटें प्राप्त की थीं, जिनमें डाक्टर मुखर्जी स्वयं भी शामिल थे।दीपक या दीया – अखिल भारतीय जनसंघ का चुनावचिह्न था।भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लागू आपातकाल (1975-1976) के बाद जनसंघ सहित भारत के प्रमुख राजनैतिक दलों का विलय कर के एक नए दल जनता पार्टी का गठन किया गया। आपातकाल से पहले बिहार विधानसभा के भारतीय जनसंघ के विधायक दल के नेता लालमुनि चौबे ने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में बिहार विधानसभा से अपना त्यागपत्र दे दिया। जनता पार्टी 1980 में टूट गयी और जनसंघ की विचारधारा के नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। भारतीय जनता पार्टी 1998 से 2004 तक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार की सबसे बड़ी पार्टी रही थी। 2014 के आम चुनाव में इसने अकेले अपने दम पर सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की।

लोकसभा चुनावों में उत्तरोत्तर सफलता

  • 1952 में 3.1 प्रतिशत वोट 3 सीट,
  • 1957 में 5.9 प्रतिशत वोट 4 सीट,
  • 1962 में 6.4 प्रतिशत वोट और 14 सीट, तथा
  • 1967 में 9.4 प्रतिशत वोट 35 सीट हासिल की।
  • 1971 में 7.37 प्रतिशत वोट 22 सीट हासिल की।

जनसंघ के अध्यक्ष

भारतीय जनता पार्टी के गठन के पश्चात

कुंडलिनी योग: हिंदू धर्म रूपी पेड़ पर उगने वाला मीठा फल, सिर्फ तब तक, जब तक है पेड़

साभार

दोस्तों, यह पोस्ट शांति के लिए और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए समर्पित है। क्योंकि कुंडलिनी योग विशेषरूप से हिंदु धर्म से जुड़ा हुआ है, इसीलिए इसको कतई भी अनदेखा नहीँ किया जा सकता। मैं वैसा बनावटी और नकली योगी नहीँ हूँ कि बाहर से योग-योग करता फिरूँ और योग के मूलस्थान हिंदूवाद पर हो रहे अत्याचार को अनदेखा करता रहूँ। अभी हाल ही में इस्लामिक आतंकियों ने कश्मीर में एक स्कूल में घुसकर बाकायदा पहचान पत्र देखकर कुछ हिंदुओं-सिखों को मार दिया, और मुस्लिम कर्मचारियों को घर जाकर नमाज पढ़ने को कहा। इसके साथ ही, बांग्लादेश में मुस्लिमों की भीड़ द्वारा हिंदुओं और उनके धर्मस्थलों के विरुद्ध व्यापक हिंसा हुई। उनके सैकड़ों घर जलाए गए। उन्हें बेघर कर दिया गया। कई हिंदुओं को जान से मार दिया गया। जेहादी भीड़ मौत का तांडव लेकर उनके सिर पर नाचती रही। सभी हिंदु डर के साए में जीने को मजबूर हैं। मौत से भयानक तो मौत का डर होता है। यह असली मौत से पहले ही जिंदगी को खत्म कर देता है। इन कट्टरपंथियों के दोगलेपन की भी कोई हद नहीँ है। हिंदुओं के सिर पर तलवार लेके खड़े हैं, और उन्हीं को बोल रहे हैं कि शांति बनाए रखो। भई जब मर गए तो कैसी शान्ति। हिंसा के विरुद्ध कार्यवाही करने के बजाय हिंसा को जस्टिफाई किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि कुरान का अपमान हुआ, इस्लाम का अपमान हुआ, पता नहीँ क्या-2। वह भी सब झूठ और साजिश के तहत। फेसबुक पर झूठी पोस्ट वायरल की जा रही है। पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां चुपचाप मूकदर्शक बनी हुई हैं। उनके सामने भी हिंसा हो रही है। धार्मिक हिंसा के विरुद्ध सख्त अंतरराष्ट्रीय कानून बनाए जाने की सख्त जरूरत है। दुनियादारी मानवीय नियम-कानूनों से चलनी चाहिए। किसी भी धर्म में कट्टरवाद बर्दाश्त नहीं होना चाहिये। सभी धर्म एक-दूसरे की ओर उंगली दिखाकर अपने कट्टरवाद को उचित ठहराते हुए उसे जस्टिफाई करते रहते हैं। यह रुकना चाहिए। कट्टरवाद के खिलाफ खुल कर बोलना चाहिए। मैं जो आज आध्यात्मिक अनुभवों के शिखर के करीब पहुंचा हूँ, वह कट्टरपंथ के खिलाफ बोलते हुए और जीवन जीते हुए ही पहुंचा हूँ। कई बार तो लगता है कि पश्चिमी देशों की हथियार निर्माता लॉबी के हावी होने से ही इन हिंसाओं पर इतनी अंतरराष्ट्रीय चुप्पी बनी रहती है। 

इस्कॉन मंदिर को गम्भीर रूप से क्षतिग्रस्त किया गया, भगवान की मूर्तियां तोड़ी गईं, और कुछ इस्कॉन अनुयायियों की बेरहमी से हत्या की गई। सबको पता है कि यह सब पाकिस्तान ही करवा रहा है। इधर दक्षिण एशिया में बहुत बड़ी साजिश के तहत हिंदुओं का सफाया हो रहा है, उधर पूरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप, संयुक्त राष्ट्र संघ चुप, मानवाधिकार संस्थाएँ चुप। क्या हिंदुओं का मानवाधिकार नहीँ होता? क्या हिंदु जानवर हैँ? फिर यूएनओ की पीस कीपिंग फोर्स कब के लिए है। हिंदुओं के विरुद्ध यह साजिश कई सदियों से है, इसीलिए तो पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की जनसँख्या कई गुणा कम हो गई है, और आज विलुप्ति की कगार पर है, पर मुसलमानों की जनसंख्या कई गुना बढ़ी है। अफगानिस्तान और म्यांमार में भी हिंदुओं के खिलाफ ऐसे साम्प्रदायिक हमले होते ही रहते हैं। यहाँ तक कि भारत जैसे हिन्दु बहुल राष्ट्र में भी अनेक स्थानों पर हिंदु सुरक्षित नहीं हैं, विशेषकर जिन क्षेत्रों में हिन्दु अल्पसंख्यक हैं। आप खुद ही कल्पना कर सकते हैं कि जब भारत जैसे हिन्दु बहुल देश के अंदर और उसके पड़ोसी देशों में भी हिंदु सुरक्षित नहीं हैं, तो 50 से ज्यादा इस्लामिक देशों में हिंदुओं की कितनी ज्यादा दुर्दशा होती होगी। पहले मीडिया इतना मजबूत नहीं था, इसलिए दूरपार की दुनिया ऐसी साम्प्रदायिक घटनाओँ से अनभिज्ञ रहती थी, पर आज तो अगर कोई छींकता भी है, तो भी ऑनलाइन सोशल मीडिया में आ जाता है। इसलिए आज तो जानबूझकर दुनिया चुप है। पहले संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाएँ नहीं होती थीं, पर आज भी ये संस्थाएँ न होने की तरह ही हैं, क्योंकि ये अल्पसंख्यकों को कोई सुरक्षा नहीँ दे पा रही हैं। वैसा बॉस भी क्या, जो अपने मातहतों को काबू में न रख सके। मुझे तो यह दिखावे का यूएनओ लगता है। उसके पास शक्ति तो कुछ भी नहीँ दिखती। क्योँ वह नियम नहीं बनाता कि कोई देश धर्म के आधार पर नहीँ बन सकता। आज के उदारवादी युग में इस्लामिक राष्ट्र का क्या औचित्य है। इसकी बात करना ही अल्पसंख्यक के ऊपर अत्याचार है, लागू करना तो दूर की बात है। जब इस्लामिक राष्ट्र का मतलब ही अन्य धर्मों पर अत्याचार है, तो यूएनओ इसकी इजाजत कैसे दे देता है। यूएनओ को चाशनी में डूबा हुआ खंजर क्यों नहीं दिखाई देता। प्राचीन भारत के बंटवारे के समय आधा हिस्सा हिंदुओं को दिया गया, और आधा मुसलमानों को। पर हिंदुओं को तो कोई हिस्सा भी नहीं मिला। दोनों हिस्से मुसलमानों के हो गए। आज जिसे भारत कहते हैं, वह भी दरअसल हिंदुओं का नहीं है। दुनिया को हिन्दुओं का दिखता है, पर है नहीँ। यह एक बहुत बड़ा छलावा है, जिसे दुनिया को समझना चाहिए। भारत में मुसलमानों को अल्पसंख्यक के नाम से बहुत से विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिसका ये खुल कर दुरुपयोग करते हैं, जिसकी वजह से आज भारत की अखंडता और संप्रभुता को खतरा पैदा हो गया लगता है। पूरी दुनिया में योग का गुणगान गाया जाता है, अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है, पर जिस धर्म से योग निकला है, उसे खत्म होने के लिए छोड़ दिया गया है। बाहर-बाहर से योग का दिखावा करते हैं। उन्हें यह नहीं मालूम कि यदि हिंदु धर्म नष्ट हो गया, तो योग भी नहीं बच पाएगा, क्योंकि मूलरूप में असली योग हिंदु धर्म में ही है। पतंजलि योगसूत्रों पर जगदप्रसिद्ध और गहराई से भरी हुई पुस्तक लिखने वाले एडविन एफ. ब्रयांट लिखते हैं कि हिंदू धर्म और इसके ग्रँथ ही योग का असली आधारभूत ढांचा है, जैसे अस्थिपंजर मानव शरीर का आधारभूत ढांचा होता है। योग तो उसमें ऐसे ही सतही है, जैसे मानवशरीर में चमड़ी। जैसे मानव को चमड़ी सुंदर और आकर्षक लगती है, वैसे ही योग भी। पर अस्थिपंजर के बिना चमड़ी का अस्तित्व ही नहीँ है। इसलिए योग को गहराई से समझने के लिए हिन्दु धर्म को गहराई से समझना पड़ेगा। इसीलिए योग को बचाने के लिए हिन्दु धर्म और उसके ग्रन्थों का अध्ययन और उन्हें संरक्षित करने की जरूरत है। उन्होंने कई वर्षों तक कड़ी मेहनत करके हिन्दु धर्म को गहराई से समझा है, उसे अपने जीवन में उतारा है। मैंने भी हिंदु धर्म का भी गहराई से अध्ययन किया है, और योग का भी, इसलिए मुझे पता है। अन्य धर्मों का भी पता है मुझे कि वे कितने पानी में हैं। अधिकांशतः वे सिर्फ हिंदु धर्म का विरोध करने के लिए ही बने हुए लगते हैं। तो आप खुद ही सोच सकते हैं कि जब हिंदु धर्म पूरी तरह से वैज्ञानिक है, तो दूसरे धर्म कैसे होंगे। बताने की जरूरत नहीं है। समझदारों को इशारा ही काफी होता है। जिन धर्मों को अपने बढ़ावे के लिए हिंसा, छल और जबरदस्ती की जरूरत पड़े, वे धर्म कैसे हैं, आप खुद ही सोच सकते हैं। मैंने इस वेबसाइट में हिंदु धर्म की वैज्ञानिकता को सिद्ध किया है। अगर किसी को विश्वास न हो तो वह इस वेबसाइट का अध्ययन कर ले। मैं यहाँ किसी धर्म का पक्ष नहीं ले रहा हूं, और न ही किसी धर्म की बुराई कर रहा हूँ, केवल वैज्ञानिक सत्य का बखान कर रहा हूं, अपनी आत्मा की आवाज बयाँ कर रहा हूँ, अपने कुंडलिनी जागरण के अनुभव की आवाज को बयाँ कर रहा हूँ, अपने आत्मज्ञान के अनुभव की आवाज को बयाँ कर रहा हूँ, अपने पूरे जीवन के आध्यात्मिक अनुभवों की आवाज को बयां कर रहा हूँ, अपने दिल की आवाज को बयां कर रहा हूँ। मैं तो कुछ भी नहीँ हूँ। एक आदमी क्या होता है, उसका तर्क क्या होता है, पर अनुभव को कोई झुठला नहीं सकता। प्रत्यक्ष अनुभव सबसे बड़ा प्रमाण होता है। आज इस्कॉन जैसे अंतरराष्ट्रीय हिन्दु संगठन की पीड़ा भी किसी को नहीं दिखाई दे रही है, जबकि वह पूरी दुनिया में फैला हुआ है। मैंने उनकी पीड़ा को दिल से अनुभव किया है, जिसे मैं लेखन के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहा हूँ। यदि हिंदु धर्म को हानि पहुंचती है, तो प्रकृति को भी हानि पहुंचती है, धरती को भी हानि पहुंचती है। प्रकृति-पूजा और प्रकृति-सेवा का व्यापक अभियान हिंदु धर्म में ही निहित है। देख नहीँ रहे हो आप, दुनिया के देशों के बीच किस तरह से घातक हथियारों की होड़ लगी है, और प्रदूषण से किस तरह धरती को नष्ट किया जा रहा है। धरती को और उसके पर्यावरण को यदि कोई बचा सकता है, तो वह हिंदु धर्म ही है।भगवान करे कि विश्व समुदाय को सद्बुद्धि मिले।

टोक्यो पैरालिंपिक: डीएम सुहास के रैकेट का बेस प्राइज ₹50 लाख

जब भारत ने कहा ‘शुक्रिया सुहास’ “नमामि गंगे परियोजना” में किया जाएगा ई-ऑक्शन में मिली राशि का उपयोग। पदक जीतने वाले देश के पहले आईएएस।

नई दिल्ली (PIB) जो पिछले 56 साल के इतिहास में कभी नहीं हुआ वह कर दिखाया सुहास एल यथिराज ने। तभी पूरे देश के दिल से आवाज आयी शुक्रिया सुहास। टोक्यो पैरालिंपिक में नोएडा के डीएम  सुहास एल यथिराज ने बेडमिंटन की मेंस सिंगल्स प्रतियोगिता में ना केवल सिल्वर मेडल जीता बल्की इतिहास भी रच दिया। अभी तक के पैरालिंपिक खेलों में एक प्रशासनिक अधिकारी का यह सबसे बेहतरीन प्रदर्शन था। वो पदक जीतने वाले देश के पहले आईएएस बन गए ।

टोक्यो पैरालिंपिक में मेंस सिंगल्स एसएल-4 कैटिगिरी में सुहास एल यथिराज का सामना फ्रांस के लुकास मजूर से हुआ। फाइनल मुकाबले में सुहास ने पहला राउंड जीत लिया था, लेकिन अगले दो राउंड में उनको हार मिली और वे गोल्ड मेडल से चूक गए लेकिन उन्होंने गर्व के साथ पोडियम पर रजत पदक पहन कर भारत को गौरवान्वित किया।  

सेवा और खेल का एक शानदार संगम! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुहास एल यथिराज को ट्वीट संदेश के जरिये बधाई देते हुए करते हुए कहा, “सेवा और खेल का एक शानदार संगम! डीएम गौतमबुद्ध नगर सुहास यतिराज ने अपने असाधारण खेल प्रदर्शन से हमारे पूरे देश की कल्पना पर कब्जा कर लिया है। बैडमिंटन में रजत पदक जीतने पर उन्हें बधाई। उन्हें उनके भविष्य के प्रयासों के लिए शुभकामनाएं।”

बचपन से ही रही खेल के प्रति बेहद दिलचस्पी- सुहास एलवाई का जन्म कर्नाटक के शिमोगा में हुआ। जन्म से ही दिव्यांग सुहास शुरुआत में IAS नहीं बनना चाहते थे। वो बचपन से ही खेल के प्रति बेहद दिलचस्पी रखते थे। इसके लिए उन्हें पिता और परिवार का भरपूर साथ मिला। 2007 में उत्तर प्रदेश कैडर से आइएएस बनने के बाद जहां उन्होंने कई विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं में देश के लिये मैडल जीते वहीं प्रयागराज और नोएडा के जिलाधिकारी की भी जिम्मेदारियां निभायीं।

ऐतिहासिक बेडमिंटन रैकेट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट- जिस बेडमिंटन रैकेट से सुहास ने इतिहास रचा उसे उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट कर दिया है। अब जबकी प्रधानमंत्री को मिले उपहारों का ई-ऑक्शन शुरू हो चुका है। सुहास का बैडमिंटन भी उन वस्तुओं की सूची में शामिल है जिनका ऑक्शन किया जा रहा है। 17 सितम्बर से शुरू यह ई-आक्शन  7 अक्टूबर तक चलेगा। सुहास की उपलब्धि की निशानी को आप हासिल कर गौरवान्वित हो सकते हैं। इससे मिली राशि का उपयोग “नममि गंगे परियोजना” में किया जाएगा। ई-ऑक्शन में डीएम सुहास के रैकेट का बेस प्राइज 50 लाख रखा गया हैI

नोएडा के डीएम सुहास के बैडमिंटन रैकेट को बनाएं अपना, अभी www.pmmementos.gov.in पर करें लॉग ऑन।

सिर्फ ताले नहीं, हथियार के लिए भी जाना जायेगा अलीगढ़

अलीगढ़ (ANI)। प्रधानमंत्री मोदी ने राजा महेन्‍द्र प्रताप सिंह विश्‍वविद्यालय और डिफेंस कॉरिडोर का शिलान्‍यास किया। पीएम मोदी ने अपने बचपन की एक कहानी सुनाई, जिसका संबंध अलीगढ़ से था। उन्होंने बताया कि कैसे एक मुस्लिम कारोबारी की उनके पिता से दोस्ती थी और वह कारोबारी अलीगढ़ का ही था।

हथियारों से होगी देश की सीमाओं की रक्षा: पीएम मोदी ने कहा, ‘एक मुस्लिम शख्स थे, जो हर साल तीन महीने के लिए हमारे गांव में आते थे। वे हमारे क्षेत्र में ताले बेचने आते थे। मेरे पिता से उनकी अच्छी दोस्ती थी। वह दिन भर जो पैसे वसूल कर लाते थे, उसे पिता को सौंप देते थे। इसके बाद वह पिता जी से सारे पैसे लेकर वापस लौट जाते थे। हम बचपन से ही यूपी के दो शहरों से बहुत परिचित रहे हैं। आंख में कोई बीमारी होती थी तो सीतापुर जाने की बात होती थी। इसके अलावा मुस्लिम शख्स के जरिए अलीगढ़ का नाम सुनते थे। पर अब तालों के अलावा अब हम हथियारों के लिए भी इस शहर को जानेंगे। अब तालों से घर की रक्षा होती थी और हथियारों से देश की सीमाओं की रक्षा होगी।’

कल्याण सिंह होते तो खुश होते’
पीएम मोदी ने उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम दिवंगत कल्याण सिंह को भी याद किया। उन्होंने शिलान्यास के दौरान कहा, ‘आज मैं कल्याण सिंह जी की अनुपस्थिति महसूस कर रहा हूं। आज यदि वह हमारे साथ होते तो राजा महेंद्र प्रताप सिंह यूनिवर्सिटी के शिलान्यास और अलीगढ़ की डिफेंस सेक्टर में बन रही नई पहचान को देखकर खुश होते। …लेकिन उनकी आत्मा जहां भी होगी, वहां हमें आशीर्वाद दे रही होगी। ब्रज भूमि के तो कण-कण में राधा-राधा लिखा है।’

योगी जी और उनकी टीम को बधाई: पीएम ने कहा कि आज मुझे एक और स्वतंत्रता सेनानी और भारत के सपूत श्याजी कृष्ण वर्मा का स्मरण होता है। पहले विश्व युद्ध के समय राजा महेंद्र प्रताप सिंह उनसे और लाला हरदयाल से मिलने यूरोप गए थे। उन्होंने एएमयू के सपने को साकार करने के लिए अपनी जमीन दान दे दी थी। इस सपने को साकार करने के लिए योगी जी और उनकी टीम को बधाई। यह यूनिवर्सिटी आधुनिक शिक्षा का एक केंद्र तो बनेगा ही। इसके अलावा देश में डिफेंस से जुड़ी पढ़ाई और टेक्नोलॉजी तैयार करने के लिए मैनपावर बनाने वाला सेंटर भी बनेगा।

आचार्य द्विवेदी स्मृति अंतरराष्ट्रीय हिंदी कविता प्रतियोगिता 11 सितंबर को

लखनऊ। युग निर्माता साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृति एवं हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में बच्चों की अंतरराष्ट्रीय हिंदी कविता एवं कहूत प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता 11 सितंबर को ऑनलाइन संपन्न होगी इन दोनों प्रतियोगिताओं में भारत और अमेरिका के करीब 5 दर्जन बच्चे प्रतिभाग कर रहे हैं।
आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की भारत और अमेरिका इकाई के संयुक्त सौजन्य से आयोजित हो रही इस प्रतियोगिता का मुख्य मकसद बच्चों में हिंदी के प्रति लगाव पैदा करना और हिंदी को आगे बढ़ाना है। समिति की अमेरिकी इकाई की अध्यक्ष श्रीमती मंजु मिश्रा ने बताया कि 8 से 12 और 12 से 18 वर्ष के बच्चों के लिए 2 आयु वर्ग में प्रतियोगिताएं संपन्न होंगी। उन्होंने बताया कि भारत में यह प्रतियोगिता 11 सितंबर को शाम 8:30 बजे और अमेरिका में सुबह 8:00 बजे ऑनलाइन होगी। कविता पाठ प्रतियोगिता के लिए सरस्वती पत्रिका के प्रधान संपादक प्रोफ़ेसर देवेंद्र शुक्ला और अमेरिका में रह रहे प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती शशि पाधा निर्णायक नियुक्त की गई है।
समित की भारत इकाई के अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने बताया कि पहली बार संपन्न होने जा रही अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता को लेकर बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिला है। कविता पाठ उपयोगिता में प्रतिभाग कर रहे बच्चों ने अपनी स्वरचित कविताएं वीडियो बनाकर भेजी हैं। उन्हें निर्णायको के पास भेज दिया गया है। कहूत प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता में कौन बनेगा करोड़पति के तर्ज पर आचार्य द्विवेदी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित प्रश्न पूछे जाएंगे। प्रथम तीन स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागी बच्चों को सम्मानित भी किया जाएगा। सहभाग कर रहे सभी बच्चों को सांत्वना प्रमाण पत्र भी दिया जाएगा।

धूमधाम से मनाया गया विश्व हिंदू परिषद का स्थापना दिवस

विहिप मना रहा 57वां स्थापना दिवस, हिंदू जीवन मूल्यों व परंपराओं के प्रति लोगों को कर रहा जागरूक

धूमधाम से मनाया गया विश्व हिंदू परिषद का स्थापना दिवस

लखनऊ। विश्व हिंदू परिषद 57वां स्थापना दिवस मना रही है। परिषद की ओर से पूरे देश में जगह-जगह कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस बार देश के सभी जिला,प्रखंड से लेकर बस्तियां स्तर पर स्थापना दिवस मनाने की तैयारी की गई है। विहिप लखनऊ पूरब के कार्यकर्ताओं ने स्थापना दिवस धूमधाम से मनाया।

गोमती नगर स्थित शिक्षण संस्थान एसकेडी एकेडमी के सभागार में विश्व हिंदू परिषद के स्थापना दिवस का कार्यक्रम विहिप के लखनऊ पूरब के कार्यकर्ताओं ने आयोजित किया। विहिप एवं बजरंग दल के जिला, प्रखंड, खंड एवं बस्तियों से सैकड़ों कार्यकर्ता जोश खरोश के साथ कार्यक्रम में शामिल हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान श्री राम, श्री कृष्ण एवं भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्वलित किया गया। कार्यक्रम का संचालन अलोपी शंकर मौर्य, अध्यक्षता पूर्व डीजीपी न्यायाधीश रेरा भानु प्रताप सिंह ने की। मुख्य रूप से मुख्य वक्ता विहिप के प्रांत संगठन मंत्री श्रीराजेश रहे। मुख्य अतिथि के रूप में स्वामी चैतन्य जी महाराज ने अपने आशीर्वचनों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।

विहिप के अवध प्रांत संगठन मंत्री श्री राजेश के वक्तव्य:-
जन्माष्टमी के दिन ही 1964 में मुंबई स्थित चिन्मय मिशन के संस्थापक चिन्मयानंद महाराज के संदीपनी साधनालय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के द्वितीय सरसंघचालक माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर उर्फ श्रीगुरुजी की प्रेरणा तथा संघ के वरिष्ठ प्रचारक परिषद के प्रथम महामंत्री शिवराम शंकर आप्टे के कुशल संयोजन से इसकी स्थापना हुई थी। स्थापना के मौके पर अकाली दल के मास्टर तारासिंह, राष्ट्रसंत तूकड़ो जी महाराज, जैन संत सुशील मुनि, कन्हैैयालाल माणिकाल मुंशी, गीताप्रेस के संस्थापक हनुमान दास पोद्दार जैसे देश के अनेक संत उपस्थित थे। उसके बाद से अब तक विहिप हिंदू जीवन मूल्यों, परंपराओं व मानबिंदुओं की रक्षा, संवर्द्धन प्रचार तथा विश्व के कल्याणार्थ कार्य कर रही है। हिंदुओं को जागरूक करने का काम लगातार जारी है। इसके लिए समय-समय पर समाज के सहयोग से आंदोलन भी चलाए जाते हैं। 57 वर्षों में विश्व हिंदू परिषद श्रीराम जन्मभूमि निधि समर्पण अभियान के माध्यम से देश के 5.25 लाख गांवों तक पहुंचने का काम किया है।

सात अक्टूबर 1984 को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का संतों ने लिया था संकल्प
सात अक्टूबर,1984 अयोध्या में सरयू नदीं के तट पर रामभक्तों ने महंत अवैद्यनाथ, रामचंद्र दास, नृत्यगोपाल दास व अशोक सिंघल आदि प्रमुख लोगों की उपस्थिति में संकल्प लिया कि जहां राम का जन्म हुआ है वहां भव्य मंदिर बनाएंगे। उसके बाद सबसे बड़ा अहिंसक जनआंदोलन प्रारंभ किया गया। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के अंतर्गत देश के साढ़े तीन लाख गांवों में श्रीरामशिला पूजन हुआ। 9 नवंबर 1989 को कामेश्वर चौपाल के हाथों राम मंदिर का शिलान्यास हुआ। अंतत: पांच अगस्त, 2020 को भव्य मंदिर का भूमिपूजन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों किया गया। आज हम सभी भव्य मंदिर बनते हुए देख रहे हैं।अपने स्थापना काल से ही विहिप मतांतरण के खिलाफ लोगों को जागरूक कर रही है। जो लोग मतांतरित हो चुके हैं उनकी वापसी के लिए भी प्रयासरत है। एक लाख से अधिक एकल विद्यालय के माध्यम से भी विहिप ग्रामीण इलाकों में बच्चों को शिक्षित करने का काम कर रही है। इसके साथ ही मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। विहिप ने दलित समाज के लोगों को पूजारी का प्रशिक्षण दिलाकर मंदिरों में रखवाने का काम किया है। आज तेजी से अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए काम किया जा रहा है। समाज को तोडऩे वाली शक्तियों के प्रति लोगों को जागरूक करने का काम जारी है। अगले दो वर्षों में पूरे देश में पहुंचने की योजना है।

इस अवसर पर विहिप के विभाग मंत्री विजय प्रकाश शुक्ला, संगठन मंत्री लव कुश, प्रचार प्रमुख नृपेंद्र विक्रम सिंह, वरिष्ठ पत्रकार जिला मंत्री धर्मेंद्र सिंह गौर, कार्याध्यक्ष वीरेंद्र प्रताप, सह मंत्री दिग्विजय नाथ तिवारी एवं अन्य प्रमुख लोग मौजूद रहे।

आज़म साहब का यह बयान क्या तालिबानी मानसिकता का परिचायक नहीं था!

🙏बुरा मानो या भला 🙏

आज़म साहब का यह बयान क्या तालिबानी मानसिकता का परिचायक नहीं था! -मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”

28 दिसम्बर 2018 को “आज तक” समाचार चैनल की एक ख़बर के अनुसार यूपी के पूर्व कैबिनेट मंत्री और सपा नेता आजम खान ने संसद में तीन तलाक पर बहस के दौरान कहा था कि- “जो मुसलमान हैं, जो कुरान को मानते हैं, वे जानते हैं कि तलाक का पूरा प्रोसीजर कुरान में दिया गया है। हमारे लिए उस प्रोसीजर के अलावा कोई कानून मान्य नहीं है। सिर्फ कुरान का कानून ही मुसलमानों के लिए मान्य है।”

अब ज़रा तालिबानी विचारधारा को समझिये। तालिबान कहता है कि अफगानिस्तान को इस्लामिक कानूनों (शरिया) के अनुसार ही चलाया जाएगा, अर्थात केवल कुरान का कानून ही तालिबान का संविधान है।
अब ज़रा इन दोनों बातों पर गम्भीरता से विचार कीजिये तो आपको मालूम होगा कि समाजवादी पार्टी के कद्दावर और संस्थापक नेताओं में से एक जनाब आज़म खान साहब ने जो कुछ 2018 में कहा था, बिल्कुल वही आज अफगानिस्तान में तालिबानियों ने दोहराया है। आज़म साहब के उपरोक्त बयान से स्पष्ट है कि भारत के मुसलमानों के लिए कुरान के कानून से ज़्यादा कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। मतलब भारत का संविधान मज़हबी कानूनों से ऊपर नहीं है।
आज़म खान साहब की तरह ही शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब, एसटी हसन साहब जैसे समाजवादी नेताओं के बयान भी आपने पढ़े ही होंगे, उनसे भी यही समझ आता है कि समाजवादी नेताओं की नज़रों में उनका मज़हब और मज़हबी कानून सर्वोपरि है। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसे तमाम नेताओं के लिए राष्ट्र धर्म से अधिक महत्वपूर्ण मज़हब है और भारतीय संविधान से बड़ा मज़हबी कानून है।

बस यही तालिबानी विचारधारा है, जिसे हमारे देश में पुष्पित-पल्लवित किया जा रहा है। भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि तालिबानी और अफगानी भी एक समय भाई-भाई ही थे। तालिबान कोई आसमान से नहीं उतरा और न ही ज़मीन से पैदा हुआ है, बल्कि वहीं उसी अफ़ग़ानी ज़मीन पर बढ़ता-पनपता रहा और शनैः-शनैः बढ़ते हुए आज एक अजगर बन गया है, जिसने आज पूरे अफगानिस्तान को निगल लिया है। जो लोग कल तक इन तालिबानियों के साथ भाईचारा निभा रहे थे, वही आज “चारा” बन रहे हैं।
अफगानिस्तान और अफ़ग़ान के हालातों को देखने और समझने के बाद भी जो लोग यह समझते हैं कि-

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।।

उनके लिए अल्लामा इक़बाल साहब का एक शेर अर्ज है-

न समझोगे तो मिट जाओगे ए हिंदोस्ताँ वालों।

तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में।।

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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शायर नहीं शातिर हैं मुनव्वर राना!

🙏बुरा मानो या भला 🙏

महृषि वाल्मीकि का अपमान केवल दलित समाज का नहीं, अपितु सम्पूर्ण भारत का अपमान है

—मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”

एक खास गिरोह के दरबारी शायर मुनव्वर राना ने एक चैनल से बात करते हुए कहा कि, ‘वाल्मीकि, रामायण लिखने के बाद भगवान बन गए, इससे पहले वह एक डकैत थे, व्यक्ति का चरित्र बदल सकता है. इसी तरह तालिबान अभी आतंकवादी हैं, लेकिन लोग और चरित्र बदलते हैं.’

राना ने कहा, ‘जब आप वाल्मीकि के बारे में बात करते हैं, तो आपको उनके अतीत के बारे में भी बात करनी होगी. अपने धर्म में आप किसी को भी भगवान बना सकते हैं, लेकिन वह एक लेखक थे और उन्होंने रामायण लिखी. लेकिन हम यहां प्रतिस्पर्धा में नहीं हैं.’

इस बयान के बाद राना के खिलाफ धारा 153 ए (धर्म, जाति, जन्म स्थान आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना), 295ए (किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से जान-बूझकर किया गया दुर्भावनापूर्ण कृत्य), 505 (1) (बी) (सामान्य जन या जनता के किसी वर्ग के बीच भय पैदा करना) और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया।

मुनव्वर राना से ज्यादा दोषी कौन? मुनव्वर राना के विरुद्ध देशद्रोह की धाराओं में मुकदमा पंजीकृत होना चाहिए, लेकिन यहाँ मुनव्वर राना से भी ज़्यादा बड़े अपराधी वह तमाम मीडिया बन्धु और नेतागण इत्यादि हैं जिन्होंने मुनव्वर राना द्वारा महृषि वाल्मीकि जी के अपमान को केवल दलित समाज के अपमान तक ही सीमित कर दिया। यह ठीक ऐसा ही है जैसे कहा जाता है कि कश्मीर में कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया गया और उन्हें कश्मीर छोड़ने पर विवश किया गया। जबकि सच यह है कि कश्मीर से हिंदुओं का पलायन हुआ था न कि किसी जाति विशेष का।
ठीक इसी प्रकार पवित्र रामायण लिखने वाले महृषि वाल्मीकि केवल दलित समाज के ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत के पूर्वज थे, उनका अपमान पूरे भारत का अपमान है।

ऐसे तमाम लोग “बौद्धिक आतंकी”-
पवित्र रामायण हिंदुओं का ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत के लिए पवित्र और पावन धर्मग्रन्थ है, और श्रीराम सभी के हृदय में बसे हैं। वह सभी लोग जिनके हृदय में श्रीराम बसे हैं, उनको महृषि वाल्मीकि अपने गुरु समान ही प्रतीत होते हैं, जिन्होंने श्रीराम के जीवन चरित्र से हम सबको भलीभांति अवगत कराया था।
मुनव्वर राना द्वारा महृषि वाल्मीकि के अपमान को केवल दलित समाज का अपमान मानना बेहद संकुचित और संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। ऐसे में उन तमाम लोगों पर भी कार्यवाही होनी ही चाहिए जो महृषि वाल्मीकि को केवल एक जाति विशेष से जोड़कर देख रहे हैं। क्योंकि ऐसा करके वह हिन्दू समाज को तोड़ने का षडयंत्र रच रहे हैं।
मुनव्वर राना जैसे लोग “शायर” नहीं बल्कि “शातिर” हैं। ये किसी समाज या वर्ग विशेष के शत्रु नहीं हैं बल्कि यह पूरे मानव समाज के दुश्मन हैं। मुनव्वर राना जैसे तमाम लोग “बौद्धिक आतंकी” की श्रेणी में आते हैं, जो अपने विचार और वाणी के माध्यम से भारत की एकता, अखंडता और सौहार्द को पलीता लगाने का हरसम्भव प्रयास करते रहते हैं। ऐसे लोगों को उनके असल मकसद में कामयाब होने देना भी स्वयं में एक गम्भीर श्रेणी का अपराध ही है।

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
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जहर पिया कल्याण ने बीजेपी ने अमृत

लखनऊ। जब ढांचा टूट रहा था तब कल्याण सिंह 5 कालिदास मार्ग… मुख्यमंत्री आवास की छत पर आराम से जाड़े की धूप सेंक रहे थे… अगर तब कल्याण सिंह नहीं होते तो आज भूमिपूजन भी नहीं होता।

  • एक छोटे कद का आदमी… जो दिखने में बहुत सुंदर नहीं था… काला रंग…चेहरे पर दाग… लेकिन संघर्षों में तपा हुआ व्यक्तित्व… ऐसी पर्सनेलिटी की जहां वो पहुंच जाए वहां बड़े से बड़े नेता का कद छोटा हो जाए । व्यक्तित्व की धमक ऐसी बड़े बड़े किरदार बौने दिखने लगें… ऐसे थे कल्याण सिंह
  • कल्याण सिंह ऐसे इसलिए थे क्योंकि उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं था… उनके दिल और दिमाग में कोई अंतर नहीं था… उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा उसूल था… भगवान राम की भक्ति… भगवान राम के प्रति के समर्पण को लेकर उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया
  • 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन इकट्ठा करने का लक्ष्य लेकर राम रथयात्रा निकाली । बिहार में तब लालू यादव मुख्यमंत्री थे और उन्होंने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया । जिसके बाद राम राथ यात्रा को भारी मात्रा में जनसमर्थन मिल गया और उत्तर प्रदेश में पहली बार बीजेपी की सरकार चुन ली गई जिसके मुख्यमंत्री कल्याण सिंह चुने गए
  • जून 1991 में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने और इसके बाद राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे विश्व हिंदू परिषद में उत्साह की लहर दौड़ गई और उसने ये घोषणा कर दी कि 6 दिसंबर 1992 को राम मंदिर का निर्माण आरंभ किया जाएगा
  • वीएचपी की घोषणा के वक्त मुख्यमंत्री के पद पर कल्याण सिंह थे और प्रदेश की कानून व्यवस्था को संभालने का पूरा जिम्मा कल्याण सिंह पर था । वीएचपी की घोषणा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के कान खड़े हो गए और उन्होंने बातचीत के लिए कल्याण सिंह को दिल्ली बुलाया
  • कल्याण सिंह से पी वी नरसिम्हा राव ने कहा कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दीजिए लेकिन कल्याण सिंह ने साफ जवाब दिया कि विवाद का एक ही हल है और वो ये कि बाबरी मस्जिद की जमीन हिंदुओं को सौंप दी जाए । इस तरह बात नहीं बनी और केंद्र – राज्य के बीच टकराव तय हो गया

-नरसिम्हा राव ने ऐहतियात बरतते हुए पहले ही केंद्रीय सुरक्षा बल अयोध्या रवाना कर दिए… केंद्रीय सुरक्षा बल अयोध्या के चारों तरफ फैला दिए गए

  • 6 दिसंबर तक अयोध्या में राम जन्मभूमि के आस पास 3 लाख कारसेवक इकट्ठे हो गए थे… ऐसे में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन के पास पूरी ताकत थी कि वो कारसेवकों पर गोली चला सकती थी… इससे पहले भी जब मुलायम सिंह यादव की सरकार थी तब मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलवाई थी
  • कल्याण सिंह को इस बात का अंदेशा लग गया था कि 6 दिसंबर को कारसेवकों को कंट्रोल करने के लिए उनपर फायरिंग का आदेश कोई भी अधिकारी दे सकता है । इसलिए कल्याण सिंह ने 5 दिसंबर की शाम को ही समस्त अधिकारियों को एक लिखित आदेश जारी किया था और वो ये था कि कोई भी कारसेवकों पर गोली नहीं चलाएगा ।
  • ये फैसला लेना… संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी व्यक्ति के लिए आसान नहीं था । कल्याण सिंह इस बात को जानते थे कि जब वो ये फैसला ले रहे हैं तो अगर अयोध्या में कुछ हो जाता है तो इससे उनकी कुर्सी चली जाएगी… सारी दुनिया उन पर आरोप लगाएगी… ये कहा जाएगा कि कल्याण सिंह एक अराजक मुख्यमंत्री हैं… ये आरोप ही मंदिर आंदोलन का वो विष था… जिसे कल्याण सिंह ने अमृत मानकर पी लिया ।

-आखिर वही हुआ 6 दिसंबर 1992 को दोपहर साढ़े 11 बजे कारसेवक ढांचे को तोड़ने लगे… कल्याण सिंह को पल पल की खबर मिल रही थी…. लेकिन वो आराम से अपने मुख्यमंत्री आवास पर जाड़े की धूप सेंक रहे थे… दिल्ली से फोन घनघना रहे थे लेकिन कल्याण सिंह ने राम भक्ति को प्राथमिकता दी और किसी की कोई बात नहीं सुनी

  • केंद्र से गृहमंत्री चव्हाण का फोन आया और उन्होंने कहा कि कल्याण जी मैंने ये सुना है कि कारसेवक ढांचे पर चढ गए हैं तब कल्याण सिंह ने जवाब दिया कि मेरे पास आगे की खबर है और वो ये है कि कारसेवकों ने ढांचा तोड़ना शुरू भी कर दिया है लेकिन ये जान लो कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा गोली नहीं चलाऊंगा गोली नहीं चलाऊंगा
  • कल्याण सिंह के पूरे व्यक्तित्व और महानता का दर्शन सिर्फ इसी एक लाइन से हो जाता है… कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा… मैं गोली नहीं चलाऊँगा… मैं गोली नहीं चलाऊंगा । ढांचा टूट रहा था और केंद्रीय सुरक्षा बल विवादित स्थल पर आने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कल्याण सिंह ने ऐसी व्यवस्था करवा दी कि केंद्रीय सुरक्षा बल भी ढांचे तक नहीं पहुंच सके और आखिरकार ढांचा टूट गया… वो कलंक… वो छाती का शूल… वो बलात्कार अनाचार का दुर्दम्य प्रतीक भारत मां की छाती से हटा दिया गया… चारों तरफ हर्ष फैल गया… जन्मभूमि मुक्त हो गई
  • नरसिम्हा राव अब कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त करने का फैसला लेने जा रहे थे लेकिन उससे पहले ही शाम साढे 5 बजे कल्याण सिंह राजभवन गए राज्यपाल से मिले और अपना इस्तीफा सौंप दिया… यानी कुर्सी छोड़ दी लेकिन गोली नहीं चलाई… सिंहासन को लात मार दिया और श्री राम की गोद में बैठ गए… श्रीराम के प्यारे भक्त बन गए । ऐसे थे हमारे कल्याण सिंह
  • अगर कल्याण सिंह नहीं होते तो शायद किसी और मुख्यमंत्री में ये फैसला लेने की ताकत नहीं होती । कल्याण सिंह ने इसलिए भी गोली ना चलाने का लिखित आदेश दिया ताकि कल को कोई अफसरों को जिम्मेदार नहीं ठहराए । कल्याण सिंह ने कहा कि सारी जिम्मेदारी मेरी है जो करना है वो मेरे साथ करो । सजा मुझे दो ।
  • अगर कल्याण सिंह नहीं होते तो बाबरी नहीं गिरती… अगर बाबरी की दीवारें नहीं गिरतीं तो पुरातत्विक सर्वेक्षण नहीं होता… बाबरी की दीवार के नीचे मौजूद मंदिर की दीवार नहीं मिलती… कोर्ट में ये साबित नहीं हो पाता कि यही रामजन्मभूमि है ।
  • उस कलंक के मिटने का जो शुभ कार्य हुआ…. उसका श्रेय स्वर्गीय कल्याण सिंह जी को है… 6 दिसंबर कल्याण सिंह के पॉलिटिकल करियर को कालसर्प की तरह डस गया लेकिन कल्याण सिंह का यश दिग दिगंत में फैल गया ।
  • सबसे जरूरी बात अगर कल्याण सिंह ने गोली चलवा दी होती तो बीजेपी और एसपी में कोई फर्क नहीं रह जाता और आज मोदी प्रधानमंत्री भी नहीं होते इसीलिए ये सत्य है कि जहर पिया कल्याण ने अमृत पिया बीजेपी ने ।

मैं उस पुण्य आत्मा को अपने हृदय और आत्मा में मौजूद समस्त ऊर्जा के साथ नमन करता हूं… प्रणाम करता हूं… ईश्वर आपको मोक्ष दे

ये लेख अपने बच्चों को पढ़ाना… हर ग्रुप में शेयर कर देना, जय श्री राम

(नोट- मेरे कई मित्र ऐसे हैं जिन्होंने मेरा नंबर 7011795136 को दिलीप नाम से सेव तो कर लिया है लेकिन मिस्ड कॉल नहीं की है… जो मित्र मुझे मिस्ड कॉल भी करेंगे और मेरा नंबर भी सेव करेंगे… यानी ये दोनों काम करेंगे सिर्फ उनको ही मेरे लेख सीधे व्हाट्सएप पर मिल पाएंगे… व्हाट्सएप स्टेटस पर भी आर्टिकल के लिंक होते हैं) साभार

ताजमहल की असलियत सामने लाने वाले: सैनिक, पत्रकार, इतिहासकार पुरुषोत्तम नागेश ओक

पुरुषोत्तम नागेश ओक की एक पुस्तक में दिये उनके परिचय के अनुसार, श्री ओक का जन्म इंदौरमध्य प्रदेश में हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी में प्रविष्टि ली, जिसके द्वारा इन्होंने जापानियों के संग अंग्रेज़ों से लड़ाई की थी। इन्होंने कला में स्नातकोत्तर (एम०ए०) एवं विधि स्नातक (एलएल०बी०) की डिग्रियाँ मुंबई विश्वविद्यालय से ली थीं। सन 1947 से 1953 तक वे हिंदुस्तान टाइम्स एवं द स्टेट्समैन जैसे समाचार पत्रों के रिपोर्टर रहे। 1953 से 1957 तक इन्होंने भारतीय केन्द्रीय रेडियो एवं जन मंत्रालय में कार्य किया। 1957 से 1959 तक उन्होंने भारत के अमरीकी दूतावास में कार्य किया।[1]

जिसे वे “भारतीय इतिहास का हमलावरों एवं उपनिवेशकों द्वारा पक्षपाती एवं तोड़ा मरोड़ा गया वृत्तांत” मानते थे, उसे सही करने में उन्मत्त, ओक ने कई पुस्तकें और भारतीय इतिहास से सम्बन्धित लेख लिखे हैं। इसके साथ ही उन्होंने भारतीय इतिहास पुनरावलोकन संस्थान की स्थापना 14 जून1964 को की। ओक के अनुसार, आधुनिक और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के “आदर्शीकृत वृत्तांत” को कल्पित करके उसमें से सारे वैदिक सन्दर्भ और सामग्री हटा दिये हैं। ओक के योगदान, हिन्दू धर्म की अन्य धर्मों पर वर्चस्व एवं अपार श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश करते हैं।

जहाँ ओक के सिद्धान्तों का कई हिन्दू वादी गुटों ने भरपूर प्रसार एवं समर्थन किया है[2][3], वहीं, किसी भी मुख्यधारा के धार्मिक एवं स्थापत्य इतिहासविदों द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है। एडविन ब्राइट के अनुसार, अधिकांश पाठक उन्हें केवल एक अफवाह ही मानते हैं।[4]

ताजमहल एवं अन्य मध्यकालीन इस्लामिक स्मारक

अपनी पुस्तक ताजमहल: सत्य कथा में, ओक ने यह दावा किया है, कि ताजमहल, मूलतः एक शिव मन्दिर या एक राजपूताना महल था, जिसे शाहजहाँ ने कब्ज़ा करके एक मकबरे में बदल दिया।

ओक कहते हैं, कि कैसे सभी (अधिकांश) हिन्दू मूल की कश्मीर से कन्याकुमारी पर्यन्त इमारतों को किसी ना किसी मुस्लिम शासक या उसके दरबारियों के साथ, फेर-बदल करके या बिना फेरबदल के, जोड़ दिया गया है।[5] उन्होंने हुमायुं का मकबराअकबर का मकबरा एवं एतमादुद्दौला के मकबरे, तथा अधिकांश भारतीय हिन्दू ऐतिहासिक इमारतों, यहाँ तक कि काबा, स्टोनहेन्ज व वैटिकन शहर[6] तक हिन्दू मूल के बताये हैं। ओक का भारत में मुस्लिम स्थापत्य को नकारना, मराठी जग-प्रसिद्ध संस्कृति का अत्यन्त मुस्लिम विरोधी अंगों में से एक बताया गया है।[7] के०एन०पणिक्कर ने ओक के भारतीय राष्ट्रवाद में कार्य को भारतीय इतिहास की साम्प्रदायिक समझ बताया है।[8] तपन रायचौधरी के अनुसार, उन्हें संघ परिवार द्वारा आदरणीय इतिहासविद कहा गया है।[9]

ओक ने दावा किया है, कि ताज से हिन्दू अलंकरण एवं चिह्न हटा दिये गये हैं और जिन कक्षों में उन वस्तुओं एवं मूल मन्दिर के शिव लिंग को छुपाया गया है, उन्हें सील कर दिया गया है। साथ ही यह भी कि मुमताज महल को उसकी कब्र में दफनाया ही नहीं गया था।

इन दावों के समर्थन में, ओक ने ताज की यमुना नदी की ओर के दरवाजों की काष्ठ की कार्बन डेटिंग के परिणाम दिये हैं, यूरोपियाई यात्रियों के विवरणों में ताज के हिन्दू स्थापत्य/वास्तु लक्षण भी उद्धृत हैं। उन्होंने यहाँ तक कहा है, कि ताज के निर्माण के आँखों देखे निर्माण विवरण, वित्तीय आँकड़े, एवं शाहजहाँ के निर्माण आदेश, आदि सभी केवल एक जाल मात्र हैं, जिनका उद्देश्य इसका हिन्दू उद्गम मिटाना मात्र है।

पी०एस० भट्ट एवं ए०एल० अठावले ने “इतिहास पत्रिका ” (एक भारतीय इतिहास पुनरावलोकन संस्थान के प्रकाशन) में लिखा है, कि ओक के लेख और सामग्री इस विषय पर, कई सम्बन्धित प्रश्न उठाते हैं।[10]

ताजमहल के हिन्दू शिव मन्दिर होने के पक्ष में ओक के तर्क

पी०एन० ओक अपनी पुस्तक “ताजमहल ए हिन्दू टेम्पल” में सौ से भी अधिक प्रमाण एवं तर्क देकर दावा करते हैं कि ताजमहल वास्तव में शिव मन्दिर था जिसका असली नाम ‘तेजोमहालय’ हुआ करता था। ओक साहब यह भी मानते हैं कि इस मन्दिर को जयपुर के राजा मानसिंह (प्रथम) ने बनवाया था जिसे तोड़ कर ताजमहल बनवाया गया। इस सम्बन्ध में उनके निम्न तर्क विचारणीय हैं:

  • किसी भी मुस्लिम इमारत के नाम के साथ कभी महल शब्‍द प्रयोग नहीं हुआ है।
  • ‘ताज’ और ‘महल’ दोनों ही संस्कृत मूल के शब्द हैं।
  • संगमरमर की सीढ़ियाँ चढ़ने के पहले जूते उतारने की परम्परा चली आ रही है जैसी मन्दिरों में प्रवेश पर होती है जब कि सामान्यतः किसी मक़बरे में जाने के लिये जूता उतारना अनिवार्य नहीं होता।
  • संगमरमर की जाली में 108 कलश चित्रित हैं तथा उसके ऊपर 108 कलश आरूढ़ हैं, हिंदू मन्दिर परम्परा में (भी) 108 की संख्या को पवित्र माना जाता है।
  • ताजमहल शिव मन्दिर को इंगित करने वाले शब्द ‘तेजोमहालय’ शब्द का अपभ्रंश है। तेजोमहालय मन्दिर में अग्रेश्वर महादेव प्रतिष्ठित थे।
  • ताज के दक्षिण में एक पुरानी पशुशाला है। वहाँ तेजोमहालय के पालतू गायों को बाँधा जाता था। मुस्लिम कब्र में गौशाला होना एक असंगत बात है।
  • ताज के पश्चिमी छोर में लाल पत्थरों के अनेक उपभवन हैं जो कब्र की तामीर के सन्दर्भ में अनावश्यक हैं।
  • संपूर्ण ताज परिसर में 400 से 500 कमरे तथा दीवारें हैं। कब्र जैसे स्थान में इतने सारे रिहाइशी कमरों का होना समझ से बाहर की बात है। (साभार-विकिपीडिया)

कर्जन वायली का वध करने वाले क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा की जयंती पर विशेष

बलिदान दिवस (17 अगस्त 1909) पर विशेष

कर्जन वायली का वध करने वाले क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा

राजस्थान के अजमेर में रेलवे स्टेशन के बाहर क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा का स्मारक

बचपन में कुत्तों की भाषा बता कर अंग्रेजी पर प्रहार, किशोरवय में पिता की अंग्रेज परस्त बनाने की कोशिश को असफल, छात्र जीवन में आजादी के बीज का अंकुरण, युवावस्था में अंग्रेज अफसर कर्जन वायली का वध और हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लेना किसी सामान्य व्यक्ति के लक्षण नहीं थे. ऐसे क्रांतिवीर का नाम था मदन लाल धींगरा. सिर्फ 25 साल की उम्र में धींगरा ने भारत को आजाद कराने के लिए मृत्यु का वरण किया था.
1 जुलाई 1909 की रात लंदन के इंडियन नेशनल एसोसिएशन के जलसे में कंपनी सरकार में भारतीयों पर तरह-तरह के जुल्म ढहाने वाले कर्जन वायली के सीने में अपनी पिस्टल से तड़ातड़ 2 गोलियां भरी सभा में उतार दी. धींगरा यह मौका किसी भी सूरत में हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे. वही हुआ और कर्जन वायली मारा गया. उसे बचाने आया एक फ्रांसीसी नागरिक भी धींगरा की गोलियों का शिकार बना था. कुछ विद्वानों का मत है कि वायली के वध के बाद वीर धींगरा ने खुद को गोली मारने का जतन किया लेकिन पकड़े जाने पर वह इरादा पूरा नहीं हुआ. दूसरी ओर कुछ इतिहासकारों का मत है कि सभा से भागने के बजाय साहसी धींगरा वही खड़े रहे और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. धींगरा के इस साहस भरे कारनामे की अखबारों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा भी हुई. वायली के वध की खबर लंदन और पेरिस समेत कई देशों के समाचार पत्रों की सुर्खियां बना था. अंग्रेजों की मंशा ना होने के बावजूद भारत में भी यह समाचार तेज गति से फैल गया था.

वायली के वध को दुनिया के सामने गलत तरीके से पेश न किए जाने और अपनी अंतिम इच्छा एक पत्र के रूप में लिखकर उन्होंने जेब में रख लिया था लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में कंपनी राज कमजोर न पड़ने देने के लिए उस पत्र को गायब कर दिया. हालांकि ब्रिटिश सरकार को यह नहीं पता था कि धींगरा उस पत्र की एक प्रति पहले ही वीर सावरकर को सौंप चुके थे. वीर सावरकर ने धींगरा का वह पत्र चोरी-छिपे पेरिस पहुंचा कर फ्रांस के एक समाचार पत्र में छपवाने का प्रबंध कर दिया. उसके बाद ब्रिटिश सरकार वायली के वध के कारणों को लेकर को दुनिया को गुमराह नहीं कर सकने में कामयाब हुई. धींगरा से ब्रिटिश हुकूमत इतनी डरी हुई थी कि उसने भारत में राज करने वाली कंपनी सरकार को पत्र लिखकर कहा-” हम यह नहीं चाहते हैं कि इस शहीद के अवशेष पार्सल से भारत भेजे जाएं”

एक दिन जरूर आजाद होगा भारत:
साहस की प्रतिमूर्ति मदन लाल धींगरा भारत के एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने अंग्रेजों की धरती पर भारत विरोधी और अपने पिता भाइयों के करीबी अंग्रेज अफसर का वध करके दुनिया को एक संदेश दिया था कि वह दिन दूर नहीं जब भारत आजाद होगा. भारतीयों को वायली के वध के जुर्म में ब्रिटिश अदालत में दिया गया। धींगरा का वह बयान जरूर पढ़ना चाहिए जिसका एक-एक शब्द साहस को व्यक्त करने वाला है. वह मानते थे कि भारत पर राज करने वाले अंग्रेज अफसर 33 करोड़ भारतीयों के अपराधी हैं. अपने “चुनौती” नामक एक वक्तव्य में उन्होंने साफ-साफ कहा था- “मेरे को विश्वास है कि संगीनों के साए में पनप रहे भारत में एक युद्ध की तैयारी अवश्य चल रही होगी. क्योंकि यह लड़ाई असंभव मालूम पड़ती है और तमाम बंदूकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. ऐसे स्थिति में मैं यही कर सकता था कि अपनी पिस्तौल से गोली मार दूं. मेरे जैसा गरीब और सामाजिक रुप से अप्रतिष्ठित व्यक्ति यही कर सकता था कि अपनी मातृभूमि के लिए अपना रक्त बहाऊं और मैंने यही किया. आज की स्थिति में हर भारतीय के लिए एक ही सबक है कि वह यह सीखे कि मृत्यु का वरण कैसे किया जाए? यह शिक्षा तभी फलीभूत होगी जब हम अपने प्राणों को मातृभूमि पर बलि चढ़ा दें. इसलिए मैं मर रहा हूं और मेरे शहीद होने से मातृभूमि का मस्तक ऊंचा ही होगा”

38 साल बाद अस्थियों को नसीब हुई देश की माटी:
17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटोनविले जेल में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया. अपनी अंतिम इच्छा में मदनलाल धींगरा ने कहा था कि उनके शव को कोई भी गैर हिंदू हाथ न लगाए और शव वीर सावरकर को सौंप दिया जाए. हिंदू रीति रवाज से ही मेरा अंतिम संस्कार हो लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने उनकी आखिरी इच्छा डर के मारे पूरी नहीं की. सनातन हिंदू धर्म की परंपरा के विरुद्ध एक कोड नंबर एलाट कर शव को दफना दिया गया. शहादत के 38 वर्ष बाद भारत के आजाद होने पर भी इस क्रांतिवीर को सरकार की उपेक्षा सहन करनी पड़ी. वर्ष 1976 में मदनलाल धींगरा के अवशेष भारत लाए जा पाए थे. वह भी तब जब शहीद उधम सिंह के अवशेष को खोजते हुए धींगरा के अवशेषों पर खोजकर्ताओ की नजर पड़ी. इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उनके अवशेष भारत को सौंपा. वीर धगरा के अवशेष पंजाब भेजे गए लेकिन आज तक पंजाब में उनका कोई स्मारक का पता नहीं चलता. राजस्थान के अजमेर में जरूर रेलवे स्टेशन के बाहर एक छोटा सा स्मारक बना हुआ है.

विदेश में भारत की आजादी के लिए बलिदान देने वाले वह पहले क्रांतिवीर माने जाते हैं. उनकी शहादत को दुनियाभर ने सलाम किया था. फांसी दिए जाने के बाद एक आयरिश समाचार पत्र ने धींगरा को बहादुर व्यक्ति की संज्ञा दी थी. काहिरा से प्रकाशित होने वाले मिश्र के समाचार पत्र “लल्ल पेटी इजिप्शियन” ने धीगरा को अमर शहीद की उपाधि देते हुए आगामी 40 वर्षों में ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की भविष्यवाणी की थी. यह भविष्यवाणी सच भी साबित हुई. धींगरा की शहादत के 38 साल बाद ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का पतन हो गया. कांगेस की संस्थापक मानी जाने वाली श्रीमती एनी बेसेंट ने कहा था कि देश को इस समय बहुत से मदनलाल की जरूरत है. वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय ने धींगरा की स्मृति में एक मासिक पत्रिका प्रारंभ की थी, जिसका नाम था “मदन तलवार” यानी (मदनलाल की तलवार). कुछ समय बाद ही यह पत्रिका विदेश के भारतीय क्रांतिकारियों के लिए मुखपत्र बन गई थी. यह पत्रिका बर्लिन में मैडम कामा द्वारा प्रिंट कराई जाती थी. शहादत के 10 वर्ष बाद 1919 में डब्लू डब्लू ब्लंट की प्रकाशित पुस्तक में भी धींगरा की बहादुरी की प्रशंसा करते हुए लिखा गया- “धींगरा ने जिस बहादुरी के साथ एक न्यायाधीश के सामने अपना ओजस्वी बयान दिया वैसा किसी भी ईसाई शहीद ने नहीं दिया होगा”
1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम के असफल होने और भारत पर ब्रिटिश हुकूमत के एकाधिकार के बीच 18 सितंबर 1886 ( अनुमान के आधार पर क्योंकि लंदन में अंग्रेज अफसर कर्जन वायली के वध के बाद संभवत अंग्रेजों के पिट्ठू पिता और भाई में सबूत मिटा दिए) को वीरों की धरती पंजाब के अमृतसर में जन्मे क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के चमकते सितारे थे. हालांकि अंग्रेज परस उनके पिता और भाइयों ने वायली के वध के बाद उनसे अपने सारे संबंध समाप्त कर लिए थे लेकिन देश के लोगों ने उन्हें शहीद का दर्जा दिया.
देश की आजादी और मातृभूमि के लिए प्राणों का उत्सर्ग करने वाले मदनलाल धींगरा को शहादत दिवस पर हर भारतीय की तरफ से शत-शत नमन..

◇ गौरव अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार
रायबरेली (उप्र)

बसपा कार्यालय पर मनाया स्वतंत्रता दिवस

बिजनौर। बहुजन समाज पार्टी कार्यालय में 15 अगस्त 2021 को देश के शहीदों को याद किया गया। इस अवसर पर धनीराम सिंह पूर्व मंत्री, अखिलेश कुमार हितेषी, धनीराम सैनी मुख्य सेक्टर प्रभारी मुरादाबाद मंडल, जितेंद्र सागर जिला अध्यक्ष बिजनौर द्वारा सामूहिक रूप से ध्वजारोहण तथा राष्ट्रगान कराया गया।

75वें स्वतंत्रता दिवस पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन बसपा कार्यालय में हुआ। अध्यक्षता जितेंद्र सागर जिला अध्यक्ष बिजनौर एवं संचालन ब्रह्मपाल सिंह जिला सचिव विधानसभा प्रभारी बिजनौर द्वारा की गई। इस अवसर पर भूरे भाई ने मिष्ठान वितरित किया। कविराज सिंह, मुन्ना सिंह, जगराम सिंह, दीपक राज, काम इंदर सिंह, तिलक राज बौद्ध, सद्दाम राणा, डॉक्टर बेग राज सिंह, मुंशी सदीक, हरदयाल सिंह, जीतसिंह कश्यप, गुलाब सिंह प्रजापति, प्रमोद कुमार, देशराज सिंह भूइयार एडवोकेट आदि ने विचार व्यक्त करते हुए उन वीर सपूतों को याद किया, जिन्होंने आजादी के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु हंसते-हंसते फांसी पर लटक गए। रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हुई। सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन किया, उन्होंने कहा था तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वक्ताओं ने कहा की शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले, वतन पर मरने वालों का यही आखिरी निशा होगा।

इस अवसर पर वक्ताओं ने वर्ष 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में विजय हासिल कर पांचवीं बार बहन कुमारी मायावती को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प लिया और कहा कि अगले वर्ष विधानसभा लखनऊ के प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बहन कुमारी मायावती ही मुख्यमंत्री के रूप में ध्वजारोहण करेंगी। अंत में जितेंद्र सागर जिलाध्यक्ष बिजनौर ने सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा की।

Golden Boy: कभी जैवलिन खरीदने को भी नहीं थे पैसे!

जैवलिन खरीदने और कोच रखने के पैसे नहीं थे नीरज चोपड़ा के पास।

नई दिल्ली। नीरज ऐसे ही गोल्डन ब्वॉय नहीं बने, इसके पीछे संघर्ष की एक लंबी कहानी है। नीरज के पास एक समय जैवलिन खरीदने का भी पैसा नहीं था, ना ही कोच रखने का। वह एक एथलीट होने के साथ-साथ भारतीय सेना में सूबेदार पद पर भी तैनात हैं और सेना में रहते हुए अपने बेहतरीन प्रदर्शन के बदौलत इन्हे सेना में विशिस्ट सेवा मैडल से भी सम्मानित किया जा चुका है।

टोक्यो ओलंपिक 2020 का जिक्र जब भी होगा, भारत के ‘गोल्डन ब्वॉय’ नीरज चोपड़ा का नाम सबसे पहले लिया जाएगा। टोक्यो ओलंपिक में भारत का आखिरी इवेंट जैवलिन थ्रो ही था और नीरज पर सभी की निगाहें टिकी हुई थीं। नीरज के गोल्ड मेडल से पहले भारत के खाते में छह मेडल आ चुके थे, जिसमें दो सिल्वर और चार ब्रॉन्ज मेडल शामिल थे। नीरज ने भारत की झोली में गोल्ड मेडल डालकर देशवासियों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।

नीरज चोपड़ा ट्रैक और फील्ड एथलीट प्रतिस्पर्धा में भाला फेंकने वाले खिलाड़ी हैं। नीरज ने 87.58 मीटर भाला फेंककर टोक्यो ओलंपिक 2020 में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा है |अंजू बॉबी जॉर्ज के बाद किसी विश्व चैम्पियनशिप स्तर पर एथलेटिक्स में स्वर्ण पदक को जीतने वाले वह दूसरे भारतीय हैं। [1]

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गोल्ड मेडल जीत करोड़ों रुपए का ईनाम पाने वाले नीरज के पास एक समय 1.5 लाख रुपए का जैवलिन खरीदने का भी पैसा नहीं था, ना ही कोच रखने का। उन्होंने इन कमियों को अपनी मेहनत से पूरा किया और ओलंपिक खेलों में भारत को एथलेटिक्स पहला गोल्ड मेडल दिलाया। इतना ही नहीं इंडिविजुअल गोल्ड मेडल जीतने वाले नीरज दूसरे भारतीय हैं। इससे पहले 2008 में शूटिंग में अभिनव बिंद्रा ने इंडिविजुअल गोल्ड मेडल अपने नाम किया था।

व्यक्तिगत जीवन

नीरज चोपड़ा का जन्म 24 दिसंबर 1997 को हरियाणा राज्य के पानीपत नामक शहर के एक छोटे से गाँव खांद्रा में एक किसान रोड़ समुदाय में हुआ था। नीरज के परिवार में इनके पिता सतीश कुमार पेशे से एक छोटे किसान हैं और इनकी माता सरोज देवी एक गृहणी है। जैवलिन थ्रो में नीरज की रुचि तब ही आ चुकी थी जब ये केवल 11 वर्ष के थे और पानीपत स्टेडियम में जय चौधरी को प्रैक्टिस करते देखा करते थे।

सेना से विशिष्ट सेवा मेडल- वह एक भारतीय एथलिट हैं जो ट्रैक एंड फील्ड के जेवलिन थ्रो नामक गेम से जुड़े हुए हैं तथा राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। नीरज एक एथलीट होने के साथ-साथ भारतीय सेना में सूबेदार पद पर भी तैनात हैं और सेना में रहते हुए अपने बेहतरीन प्रदर्शन के बदौलत इन्हे सेना में विशिष्ट सेवा मैडल से भी सम्मानित किया जा चुका है। [2]

शिक्षा-नीरज चोपड़ा ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई हरियाणा से ही की है। अपनी प्रारंभिक पढ़ाई को पूरा करने के बाद नीरज चोपड़ा ने बीबीए कॉलेज ज्वाइन किया था और वहीं से उन्होंने ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की थी। नीरज चोपड़ा के कोच का नाम उवे हैं जो कि जर्मनी देश के पेशेवर जैवलिन एथलीट रह चुके हैं। (साभार)

सावन शिवरात्रि पर करें भोले बाबा को प्रसन्न

हिंदू पंचांग अनुसार हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन लोग व्रत रख भगवान शिव की विधि विधान से पूजा करते हैं। जब ये शिवरात्रि श्रावण माह में आती है तो इसे सावन शिवरात्रि कहते हैं। कहते हैं कि जो भी व्यक्ति सावन शिवरात्रि का व्रत रखता है, उसके जीवन की सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं। इस दिन रुद्राभिषेक कराने का भी विशेष महत्व माना जाता है।

पूजा विधि, महत्व, मुहूर्त और व्रत कथा

पूजन सामग्री: पुष्प, पंच फल, दक्षिणा, पूजा के बर्तन, पंच मेवा, रत्न, सोना, चांदी, शहद, गंगा जल, पवित्र जल, कुशासन, दही, शुद्ध देशी घी, पंच रस, पंच मिष्ठान्न, बिल्वपत्र, इत्र, गंध रोली, मौली जनेऊ, धतूरा, भांग, बेर, गाय का कच्चा दूध, धूप, दीप, रुई, ईख का रस, कपूर, शिव व मां पार्वती की श्रृंगार की सामग्री, मलयागिरी, चंदन आदि।

सावन शिवरात्रि व्रत विधि:
-इस दिन सुबह सूर्य उदय से पहले उठकर स्नान कर लें।
-फिर घर पर या पास के किसी शिव मंदिर में जाकर शिव परिवार की पूजा करें।
-शिवलिंग का रुद्राभिषेक जल, घी, दूध, चीनी, शहद, दही आदि से करें।
-शिवलिंग पर बेलपत्र, इत्र, गंध, भांग, बेर और धतूरा चढ़ाएं। माता पार्वती को श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
-भगवान शिव की धुप, दीप से पूजा अर्चना करें और उन्हें फल और फूल अर्पित करें।
-शिवरात्रि के दिन शिव पुराण, शिव स्तुति, शिव अष्टक, शिव चालीसा और शिव श्लोक का पाठ करना चाहिए।
-इस व्रत में शाम के समय फलहार कर सकते हैं। व्रत रखने वालों को इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।
-अगले दिन भगवान शिव की विधि विधान से पूजा करके और दान आदि करके उपवास खोलें। 

शिवरात्रि पूजन मुहूर्त: शिवरात्रि पूजन का सबसे उत्तम समय रात का माना गया है। इस बार शिवरात्रि 6 अगस्त को मनाई जाएगी। चतुर्दशी तिथि का प्रारम्भ 06 अगस्त 2021 को 06:28 PM बजे से होगा और इसकी समाप्ति 07 अगस्त 2021 को 07:11 PM बजे पर होगी। शिवरात्रि पर पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा।

शिवरात्रि पूजन का शुभ मुहूर्त…
पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त – 12:06 AM से 1:48 AM, अगस्त 07
रात्रि प्रथम प्रहर पूजा समय – 07:08 PM से 09:48 PM
रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा समय – 09:48 PM से 12:27 AM, अगस्त 07
रात्रि तृतीय प्रहर पूजा समय – 12:27 AM से 03:06 AM, अगस्त 07
रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा समय – 03:06 AM से 05:46 AM, अगस्त 07
7 अगस्त को व्रत पारण समय – 05:46 AM से 03:47 PM

नहीं मिलेगी सरकारी नौकरी, ना लड़ पाएंगे चुनाव

UP में जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का ड्राफ्ट तैयार, 2 से अधिक बच्चे होने पर नहीं मिलेगी सरकारी नौकरी, ना लड़ पाएंगे चुनाव!

Uttar Pradesh CM Yogi Adityanath tests COVID-19 positive, goes into  self-isolation | India News | Zee News

नई दिल्ली (एकलव्य बाण समाचार): उत्तर प्रदेश के राज्य विधि आयोग ने यूपी जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण व कल्याण) विधेयक-2021 का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है। इसमें दो से अधिक बच्चे होने पर सरकारी नौकरियों में आवेदन से लेकर स्थानीय निकायों में चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का प्रस्ताव है! सरकारी योजनाओं का भी लाभ न दिए जाने का जिक्र है। आयोग ने ड्राफ्ट अपनी वेबसाइट http://upslc.upsdc.gov.in/ पर अपलोड कर दिया है। 19 जुलाई तक जनता से राय मांगी गई है।

विधि आयोग जनसंख्या नियंत्रण कानून पर लगातार काम कर रहा है। नई नीति के हिसाब से 2 से ज्यादा बच्चों वाले परिवारों की सुविधाओं में कटौती करने की तैयारी की जा रही है। वहीं कुछ दिन पहले विधि आयोग के अध्यक्ष आदित्यनाथ मित्तल ने कहा था कि हमारे यहां जनसंख्या बढ़ रही है। इसी वजह से समस्याएं पैदा हो रही हैं। उन्होंने आगे कहा कि जो लोग जनसंख्या नियंत्रण करने में अपना सहयोग दे रहे हैं, उन्हें ही सरकारी सुविधाएं और सरकारी संसाधन मिलने चाहिए। उन्हें राज्य सरकार की सभी सुविधाओं का लाभ मिलता रहना चाहिए। विधि आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि सरकार यूपी में किसी धर्म विशेष या मानवाधिकारों के खिलाफ नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वह बस यह देखना चाहते हैं कि सरकारी संसाधन और सुविधाएं उन लोगों को उपलब्ध हों जो जनसंख्या नियंत्रण में मदद कर रहे हैं और योगदान दे रहे हैं।

2 से अधिक बच्चे होने पर क्या?
सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं
राशन कॉर्ड में चार से अधिक सदस्य नहीं
स्थानीय निकाय, पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकेंगे
सरकारी नौकरियों में मौका नहीं

क्या मिलेगा लाभ- अगर परिवार के अभिभावक सरकारी नौकरी में हैं और नसबंदी करवाते हैं तो उन्हें अतिरिक्त इंक्रीमेंट, प्रमोशन, सरकारी आवासीय योजनाओं में छूट, पीएफ में एम्प्लॉयर कंट्रीब्यूशन बढ़ाने जैसी कई सुविधाएं देने की सिफारिश की गई है। दो बच्चों वाले दंपत्ति अगर सरकारी नौकरी में नहीं हैं तो उन्हें पानी, बिजली, हाउस टैक्स, होम लोन में छूट व अन्य सुविधाएं देने का प्रस्ताव है। वहीं एक संतान पर खुद से नसबंदी कराने वाले अभिभावकों को संतान के 20 साल तक मुफ्त इलाज, शिक्षा, बीमा शिक्षण संस्था व सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता देने की सिफारिश है। 

उल्लंघन करने पर जाएगी नौकरी
कानून लागू हुआ तो एक साल के भीतर सभी सरकारी अधिकारियों-कर्मचारियों, स्थानीय निकाय में चुने जनप्रतिनिधियों को शपथपत्र देना होगा कि वे इसका उल्लंघन नहीं करेंगे। कानून लागू होते समय उनके दो ही बच्चे हैं और शपथपत्र देने के बाद वे तीसरी संतान पैदा करते हैं तो प्रतिनिधि का निर्वाचन रद करने व चुनाव न लड़ने देने का प्रस्ताव है।

सरकारी कर्मचारियों का प्रमोशन रोकने व बर्खास्त करने तक की सिफारिश है। हालांकि, ऐक्ट लागू होते समय प्रेगेनेंसी हैं या दूसरी प्रेगनेंसी के समय जुड़वा बच्चे होते हैं तो ऐसे केस कानून के दायरे में नहीं आएंगे। अगर किसी का पहला, दूसरा या दोनों बच्चे नि:शक्त हैं तो उसे भी तीसरी संतान पर सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाएगा। तीसरे बच्चे को गोद लेने पर भी रोक नहीं रहेगी।

बहुविवाह पर खास प्रावधान
आयोग ने ड्राफ्ट में धार्मिक या पर्सनल लॉ के तहत एक से अधिक शादियां करने वाले दंपतियों के लिए खास प्रावधान किए हैं। अगर कोई व्यक्ति एक से अधिक शादियां करता है और सभी पत्नियों से मिलाकर उसके दो से अधिक बच्चे हैं तो वह भी सुविधाओं से वंचित होगा। हालांकि, हर पत्नी सुविधाओं का लाभ ले सकेगी। वहीं, अगर महिला एक से अधिक विवाह करती है और अलग-अलग पतियों से मिलाकर दो से अधिक बच्चे होने पर उसे भी सुविधाएं नहीं मिलेंगी।

कण्व आश्रम: पैराग्लाइडिंग नौकायन की योजना

कण्व आश्रम के सौंदर्यीकरण में तेजी। डीएम ने लिया जायजा। पैराग्लाइडिंग की संभावनाओं की तलाश। जलीय क्षेत्र में नौकायन के लिए भी कार्य योजना।

कण्व आश्रम के विकास एवं सौंदर्यकरण के लिए जिलाधिकारी उमेश मिश्रा द्वारा आश्रम का किया गया स्थलीय निरीक्षण, आश्रम स्थल पर कण्व आश्रम से संबंधित अभिलेखों, सामग्री तथा अन्य जानकारियों के संलकन के लिए स्मारिका बनाने के दिए निर्देश।

बिजनौर (एकलव्य बाण समाचार)। जिलाधिकरी उमेश मिश्रा ने ग्राम रावली क्षेत्र स्थित कण्व आश्रम का निरीक्षण करते हुए वहां के विकास और उसके सौंदर्यीकरण करने का जायजा लिया। जिलाधिकारी श्री मिश्रा ने उप जिलाधिकारी सदर को निर्देश दिए कि कण्व आश्रम की भूमि पर स्मारिका भवन, तालाब और वृक्षारोपण का कार्य कराएं तथा आश्रम को प्रभावित करने वाली नदियों का पानी रोकने के लिए मालन एवं गंगा के तट पर बांध का निर्माण कराएं ताकि आश्रम में पानी का भराव न होने पाए।

उन्होंने खण्ड विकास अधिकारी को निर्देश दिए कि कण्व आश्रम स्थल पर होने वाले निर्माण कार्य मनरेगा से कराएं ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार भी प्राप्त हो सके। अधिशासी अभियन्ता लोनिवि को निर्देश दिए कि दूर तक फैले रेतीले मैदान में पैराग्लाइडिंग की संभावनाओं को तलाश करें और जलीय क्षेत्र में नौका क्रीड़ा के लिए भी कार्य योजना बनाएं ताकि स्थानीय एवं बाहर से आने वाले पर्यटकों को मनोरंजन एवं आनन्द की सभी सुविधाएं उपलब्ध हो सकें।

उप जिलाधिकारी सदर को निर्देशित किया कि कण्व आश्रम के नजदीक जमीन का भराव कराते हुए उस पर स्मारिका का निर्माण कराएं और भवन में पौराणिक धरोहरों को संकलित करने की कार्यवाही करें तथा उसके आसपास जानकारी पर आधारित पट्टिकाएं भी लगाई जाएं ताकि आगंतुकों को इस स्थान की प्राचीनता और उसके इतिहास का ज्ञान हो सके।

इस अवसर पर उप जिलाधिकारी सदर विक्रमादित्य सिंह मलिक, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट/खण्ड विकास अधिकारी मुहम्मदपुर देवमल मोहित कुमार, अधिशासी अभियन्ता लोक निर्माण विभाग सुनील कुमार, तहसीलदार सदर प्रीति सिंह के अलावा अन्य अधिकारी तथा ग्रामीण क्षेत्र के गणमान्य लोग मौजूद थे।

शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब, आप अपनी जिम्मेदारियों को भी तो समझिए

🙏बुरा मानो या भला🙏

शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब, आप अपनी जिम्मेदारियों को भी तो समझिए

—मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”

उत्तरप्रदेश के सम्भल से समाजवादी पार्टी के उम्रदराज़ सांसद जनाब शफीकुर्रहमान बर्क साहब ने जनसंख्या नियंत्रण कानून पर प्रतिक्रिया देते हुए फरमाया कि- “कितने बच्चे पैदा होंगे, यह तो निजामे कुदरत है. अल्लाहताला ने सबको पैदा किया है और उनकी जिंदगी और मौत उसके हाथ में है. किसी को दखल देने का कोई हक नहीं है. उन्होंने कहा कि सरकार से बोझ संभाला नहीं जा रहा है.”

बेशक़, बर्क़ साहब की इस बात से कोई इंकार नहीं किया जा सकता कि ज़िन्दगी और मौत कुदरत के हाथ में है। और अल्लाहताला/ईश्वर ने सबको पैदा किया है। यह सही है कि कितने बच्चे पैदा होंगे, यह भी निजामे कुदरत है। लेकिन जनाब बर्क़ साहब यह भी तो बताएं कि बच्चों को पालना किसकी जिम्मेदारी है? यह जिम्मेदारी भी तो अल्लाहताला की ही है।
इसपर एक वाकया याद आता है जब मिर्ज़ा ग़ालिब को कहीं से ढेर सारा ईनाम मिला, तो ग़ालिब साहब उस पैसे से अपने लिए शराब की बोतलें खरीदकर ले आये। जब वह घर पहुंचे तो उनकी शरीके हयात ने पूछा कि- “मियां, ये शराब की बोतलें क्यों खरीद लाये, रोटी-पानी का इंतज़ाम कर लिया होता।”. तब मिर्ज़ा ग़ालिब साहब ने कहा- बेग़म, रोटी का वादा तो उसने किया है, लेकिन शराब का वादा तो उसने नहीं किया था।

कहने का अर्थ यह है कि रोटी देने की जिम्मेदारी भी तो उस परवरदिगार की ही है। उसमें सरकार से क्या शिक़वा करना। जब बच्चे पैदा करना अल्लाह के हाथ में है, तो उन बच्चों को रोटी देना भी तो उसका ही काम है। फिर समाजवादी पार्टी सहित तमाम विपक्षी नेता बेरोजगारी, भुखमरी और महंगाई पर सरकार को क्यों घेरते हैं? अल्लाह पर छोड़ देना चाहिए। क्योंकि वह सबका निगेहबान है।

बर्क़ साहब शायद भूल गए कि आज हम 21वीं सदी में हैं, और अब बहुत कुछ बदल चुका है। यह सही है कि अल्लाहताला/ईश्वर का दख़ल हमेशा ही रहेगा। लेकिन उसने इंसान को सोचने और समझने की जो ताक़त अता की है, उसका सही इस्तेमाल करना भी जरूरी है। आप पूरी तरह लकीर के फ़क़ीर नहीं बन सकते। फिलहाल इस देश में बाबर या औरंगजेब की हुकूमत नहीं है, जो चंद कट्टरपंथियों के ईशारों पर हुक़ूमत चलाते थे। यह योगी-मोदी सरकार है जिसका हर निर्णय राष्ट्र और समाज हित में होता है। बर्क़ साहब को चाहिए कि वह पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर अपनी बात रखें, अपनी विचारधारा को दुसरों पर थोपने की कोशिशें न करें। यही उनके, उनकी पार्टी और समाज हित में है। शफीकुर्रहमान बर्क़ साहब अल्लाहताला ने जो जिम्मेदारियां आपको दी हैं, उनको समझिए और ग़ैर-जिम्मेदाराना बयान देने से बचिए। आप हम सबके बुज़ुर्ग भी हैं हमें आपके मार्गदर्शन की सदैव आवश्यकता रहेगी।

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

*विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र व newsdaily24 के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है। हमारा उद्देश्य जानबूझकर किसी की धार्मिक-जातिगत अथवा व्यक्तिगत आस्था एवं विश्वास को ठेस पहुंचाने नहीं है। यदि जाने-अनजाने ऐसा होता है तो उसके लिए हम करबद्ध होकर क्षमा प्रार्थी हैं।

प्रज्ञा जी पहले यह समझिए कि “दलित हिन्दू” जैसा कोई शब्द ही नहीं है

🙏बुरा मानो या भला🙏

प्रज्ञा जी पहले यह समझिए कि “दलित हिन्दू” जैसा कोई शब्द ही नहीं है—–मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”

एक यूट्यूब चैनल है, “प्रज्ञा का पन्ना” जिसे कोई प्रज्ञा मिश्रा नामक सभ्य महिला चलाती हैं। इस चैनल पर “हिंदुस्तान में मुस्लिम धर्मांतरण पर बवाल। दलित हिंदुओं के बौद्ध होने पर चुप्पी” नामक शीर्षक से एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया जिसमें प्रज्ञा जी कहती हैं कि – “हिंदुओं के मुस्लिम बनने पर सरकार एक्शन लेती है लेकिन दलितों के बौद्ध बनने पर चुप्पी साध लेती हैं। प्रज्ञा जी कहती हैं कि हिंदूवादी सरकारों को हिन्दू-मुस्लिम वाले मुद्दे सूट करते हैं, क्योंकि इससे हिंदुत्व को खतरे में बताने में आसानी होती है और हिंदुत्व को खतरे में रखने से हिंदूवादी सरकारें ख़तरे से बाहर हो जाती हैं”. यहां प्रज्ञा मिश्रा जी का यह मानना है कि देश में जो हिन्दू-मुस्लिम धर्मांतरण का मुद्दा है वह भाजपा का चुनावी प्रोपेगैंडा है।

अब प्रज्ञा मिश्रा के सवाल पर आते हैं, जिसमें वह कहती हैं कि मुस्लिम धर्मांतरण पर बवाल। दलित हिंदुओं के बौद्ध होने पर चुप्पी क्यों?

प्रज्ञा जी को शायद यह नहीं मालूम कि “दलित हिन्दू” जैसा कोई जाति/सम्प्रदाय/धर्म पूरे भारत में कहीं नहीं है। यह शब्द “बौद्धिक जिहादियों”, अरबन नक्सलियों और हिन्दू विरोधियों के शब्दकोष की देन है।
दूसरी बात यह है कि बौद्ध, सिख, जैन कोई धर्म नहीं हैं बल्कि पंथ हैं, मत हैं। यह सभी सनातन धर्म के अंग हैं। यह विशुद्ध भारतीय हैं, इनके तीर्थ स्थल, महापुरुष, प्रवर्तक आदि सभी इस भारत भूमि पर जन्मे हैं। जबकि इस्लाम, ईसाई, पारसी और यहूदी विदेशी धर्म/मत हैं। इस्लाम का जन्म अरब से हुआ और इस्लामिक पीर-पैगम्बर, तीर्थस्थल, रीति-रिवाज़ और परम्पराएं सभी विदेशी आक्रांताओं और व्यापारियों के द्वारा भारत लाई गईं।

मुस्लिम समाज का पहनावा, तीज-त्यौहार, परम्पराएं, संस्कृति, सभ्यता, खानपान, भाषा, रहन-सहन, मान्यताएं, महापुरुष और यहां तक कि उनका इतिहास भी हिंदुओं से बिल्कुल अलग है। मुस्लिम समुदाय जिस बाबर, औरंगजेब, तैमूर लंग, अकबर और टीपू को अपना नायक मानता है, वहीं हिन्दू समाज उन्हें खलनायक मानता है। पाकिस्तान का बंटवारा मज़हब के आधार पर ही हुआ था।
जबकि महात्मा बुद्ध को हिन्दू समाज में एक अवतार पुरुष माना गया है। प्रज्ञा जी को शायद इस पर भी अध्ययन करना चाहिए कि आख़िर दलितों के महानायक डॉ. भीमराव अंबेडकर ने इस्लाम या किसी अन्य विदेशी धर्म को क्यों नहीं अपनाया था? इस प्रश्न का सही जवाब डॉ. आंबेडकर के लेख ‘बुद्ध और उनके धर्म का भविष्य’ में मिलता है. मूलरूप में यह लेख अंग्रेजी में बुद्धा एंड दि फ्यूचर ऑफ हिज रिलिजन (Buddha and the Future of his Religion) नाम से यह कलकत्ता की महाबोधि सोसाइटी की मासिक पत्रिका में 1950 में प्रकाशित हुआ था. यह लेख डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर राटिंग्स एंड स्पीचेज के खंड 17 के भाग- 2 में संकलित है. प्रज्ञा जी को यह भी रिसर्च करनी चाहिए कि इस्लाम को लेकर बाबा भीमराव अंबेडकर ने क्या विचार रखे हैं। बाबा साहेब ने सनातन संस्कृति का परित्याग नहीं किया था बल्कि हिन्दू समाज में फैले पाखंड, आडम्बर और भेदभावपूर्ण व्यवहार का विरोध किया था। इसीलिए उन्होंने बौद्ध मत को अपनाया ताकि सनातन संस्कृति से उनके सम्बन्ध कभी समाप्त न हों। ऐसा कहा जाता है कि बाबा साहेब का मानना था कि “दलितों को धर्मांतरण करके मुस्लिम मजहब नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि इससे मुस्लिम प्रभुत्व का ख़तरा वास्तविक हो जाएगा।”

प्रज्ञा मिश्रा जैसे लोग अपने अधकचरे ज्ञान और कुतर्कों द्वारा भले ही आम जनता को भ्रमित करने का कुप्रयास करते हों परन्तु ऐतिहासिक तथ्यों और अनुभवों को वह कभी नहीं झुठला पाएंगे। सत्य सदा सनातन है, और रहेगा।

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

मोबाईल- 9058118317

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ऋषि बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय की जयंती पर प्रधानमंत्री ने की श्रद्धांजलि अर्पित

नई दिल्ली (एकलव्य बाण समाचार) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऋषि बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की है।

प्रधानमंत्री ने एक ट्वीट में कहा, “ऋषि बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। अपनी समग्र रचनाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीय लोकाचार की महानता प्रदर्शित की। उनके द्वारा रचित #वंदेमातरम हमें विनम्रता के साथ भारत की सेवा करने तथा हमारे साथी भारतीयों को सशक्त बनाने की दिशा में प्रेरित करता है।”

Paying homage to Rishi Bankim Chandra Chattopadhyay on his Jayanti. Through his extensive body of work, he showcased the greatness of India’s ethos. #VandeMataram, penned by him, inspires us to serve India with humility and devote ourselves towards empowering our fellow Indians.— Narendra Modi (@narendramodi) June 27, 2021

विशेष- बंकिम चंद्र चटर्जी या बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, CIE एक भारतीय उपन्यासकार, कवि और पत्रकार थे। वे वंदे मातरम के रचनाकार थे, मूल रूप से संस्कृत में, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारत को एक मातृ देवी और प्रेरक कार्यकर्ताओं के रूप में प्रस्तुत करते थे।

जन्म: 27 जून 1838, नैहाटी, कोलकाता। मृत्यु: ८ अप्रैल १८९४, कोलकाता। जीवनसाथी: मोहिनी देवी (एम। १८४९-१८५९)। माता-पिता: यादव चंद्र चट्टोपाध्याय, दुर्गादेबी चट्टोपाध्याय। फिल्में: आनंद मठ, सुबर्ण गोलक, इंदिरा, रोहिणी।साभार-विकिपीडिया

हिन्दू साम्राज्य स्थापना दिवस मनाया

हिन्दू जागरण मंच नांगल शाखा ने किया कार्यक्रम
छत्रपति शिवाजी महाराज को पुष्प अर्पित कर किया नमन

बिजनौर। हिंदू जागरण मंच की नांगल शाखा ने छत्रपति शिवाजी महाराज के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्जवलित कर तथा पुष्प अर्पित कर नमन करते हुए हिन्दू साम्राज्य स्थापना दिवस मनाया। इस अवसर पर कोरोना नियमों का पालन करते हुए कोरोना से सुरक्षित रहने को सावधिानियां बरते जाने का भी आह्वान किया गया।
हिन्दू साम्राज्य स्थापना दिवस मनाए जाने के दौरान बिजनौर जिला महामंत्री गौरव चिकारा ने कहा कि विजयी हिन्दू सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज ने ज्येष्ठ शुक्ल, त्रयोदशी के दिन हिन्दुपद पादशाही की स्थापना कर सारे संसार में रणभेरी बजा दी थी। आज ही के दिन वीर छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्य अभिषेक हुआ था और महाराज का राज्याभिषेक होने की वजह से ही आज का दिन हिन्दू साम्राज्य स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के समय में देश के धर्म, संस्कृति व समाज का संरक्षण कर हिन्दूराष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के प्रयास किए गए थे। राजा लड़ रहे थे, विभिन्न प्रकार की राजनीति का प्रयोग कर रहे थे। जिसके चलते बार बार प्रयोग विफल होने पर भी संत लोग समाज में एकता लाने, उनको एकत्रित रखने, उनकी श्रद्धाओं को बनाए रखने के लिए अनेक प्रकार के प्रयोग चला रहे थे। कुछ तात्कालिक संत अपने प्रयासों में सफल हुए और कुछ पूर्ण विफल भी हुए। संतों के इन सभी प्रयासों को अंतिम सफल परिणति छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक था। हिन्दू जागरण मंच इस दिवस को अपने प्रति वर्ष के छह उत्सवों में से एक हिंदू साम्राज्य स्थापना दिवस के रूप में मनाता आ रहा है। उन्होंने युवाओं को नशे आदि से दूर रहने का आह्वान किया।  साथ ही युवाओं से हिन्दूओ को जागरूक करने के लगातार प्रयास करने और अपने महापुरुषों के विषय मे समय-समय पर पढ़ कर उनके विषय मे जानने का प्रयास करने का आह्वान किया। 

इस अवसर पर नजीबाबाद खण्ड सह संयोजक दीपक देशवाल, नांगल थाना संयोजक हिमांशु राजपूत, नांगल थाना सह संयोजक कुणाल सिंह, कुणाल राजपूत, अमित, अतुल राजपूत, गौरव कुमार, प्रिंस, हनी राणा, शुभम, पुलकित तथा अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को शत शत नमन

साभार- 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी का जन्म हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे एवं शिक्षाविद् के रूप में विख्यात थे। डॉ॰ मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक किया तथा 1921 में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की। 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करने के पश्चात् वे विदेश चले गये और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कर ली थीं। 33 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम आयु के कुलपति थे। एक विचारक तथा प्रखर शिक्षाविद् के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरन्तर आगे बढ़ती गयी।

राजनीति में प्रवेश- डॉ॰ श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने स्वेच्छा से अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया। डॉ॰ मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी थे। उन्होने बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किया। इस सरकार में वे वित्तमन्त्री बने। इसी समय वे सावरकर के राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए।

मुस्लिम लीग के प्रयासों को किया नाकाम- मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था। वहाँ साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ रही थी। साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो। अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया। 1942 में ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न राजनैतिक दलों के छोटे-बड़े सभी नेताओं को जेलों में डाल दिया।

विभाजन के कट्टर विरोधी- डॉ॰ मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं। इसलिए धर्म के आधार पर वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे। वे मानते थे कि विभाजन सम्बन्धी उत्पन्न हुई परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी। वे मानते थे कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं। हममें कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक ही रक्त के हैं। एक ही भाषा, एक ही संस्कृति और एक ही हमारी विरासत है। परन्तु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के तत्कालीन नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित-प्रसारित किया। बावजूद इसके लोगों के दिलों में उनके प्रति अथाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया। अगस्त, 1946 में मुस्लिम लीग ने जंग की राह पकड़ ली और कलकत्ता में भयंकर बर्बरतापूर्वक अमानवीय मारकाट हुई। उस समय कांग्रेस का नेतृत्व सामूहिक रूप से आतंकित था।

ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षड्यन्त्र को एक कांग्रेस के नेताओं ने अखण्ड भारत सम्बन्धी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। उस समय डॉ. मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की माँग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खण्डित भारत के लिए बचा लिया। गान्धी जी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे भारत के पहले मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए। उन्हें उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गयी। संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य और केन्द्रीय मन्त्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया, किन्तु उनके राष्ट्रवादी चिन्तन के चलते अन्य नेताओं से मतभेद बराबर बने रहे। फलत: राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने एक नई पार्टी बनायी जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था। अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ का उद्भव हुआ।

डॉ. मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आज़म) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था। संसद में अपने भाषण में डॉ॰ मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। उन्होंने तात्कालिन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।

बिजनौर: गौरवशाली इतिहास समेटे एक गुमनाम सा शहर

एकलव्य बाण समाचार

पर्वतराज हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में दक्षिण भाग पर वनसंपदा और इतिहास से समृद्घशाली बिजनौर जनपद अपने भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व के कारण प्राचीन काल से ही एक विशेष पहचान रखता है। इसकी उत्तरी सीमा से, हिमालय की तराई शुरू होती है, तो गंगा मैया इसका पश्चिमी सीमांकन करती है। बिजनौर के उत्तर पूर्व में गढ़वाल और कुमाऊं की पर्वत श्रृंखलाएं इसका सौंदर्य बढ़ाती हैं, तो इसकी पश्चिमी एवं दक्षिण सीमा पर गंगा के उस पार है, विश्व प्रसिद्ध तीर्थ हरिद्वार। कुल 4338 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले बिजनौर जनपद की आबादी इस समय करीब 30 लाख है!

बिजनौर अनेक विश्वप्रसिद्ध ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी है। इसने देश को नाम दिया है, अनेक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभाएं दी हैं। यहां की धरती उर्वरक ही उर्वरक है। बिजनौर का उत्तरी, उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी भाग महाभारत काल तक सघन वनों से आच्छादित था। इस वन प्रांत में, अनेक ज्ञात और अज्ञात ऋषि-मुनियों के निवास एवं आश्रम हुआ करते थे। सघन वन और गंगा तट होने के कारण, यहां ऋषि-मुनियों ने घोर तप किये, इसीलिए बिजनौर की धरती देवभूमि और तपोभूमि भी कहलाती है। सघन वन तो यहां तीन दशक पूर्व तक देखने को मिले हैं, लेकिन वन माफियाओं से यह देवभूमि-तपोभूमि भी नहीं बच सकी है।

वेन से विजनगर , अब बिजनौर– प्रारंभ में इस जनपद का नाम वेन नगर था। राजा वेन के नाम पर इसका नाम वेन नगर पड़ा। बोलचाल की भाषा में आते गए परिवर्तन के कारण कुछ काल के बाद यह नाम विजनगर हुआ, और अब बिजनौर है। वेन नगर के साक्ष्य आज भी बिजनौर से दो किलोमीटर दूर, दक्षिण-पश्चिम में खेतों में और खंडहरों के रूप में मिलते हैं। तत्कालीन वेन नगर की दीवारें, मूर्तियां एवं खिलौने आज भी यहां मिलते हैं। लगता है, यह नगर थोड़ी ही दूर से गुजरती गंगा की बाढ़ में काल कल्वित हो गया।

देश को नाम मिला भारत- अगर यह कहा जाए कि भारतवर्ष को नाम देने वाला भी बिजनौर का ही था। जी हां! हम भरत के बारे में बोल रहे है। भरत बिजनौर के ही थे शकुंतला और राजा दुष्यंत के पुत्र। जो बचपन में शेर के शावकों को पकड़कर उनके दांत गिनने के लिए विख्यात हुए। संस्कृत के महान कवि कालीदास के प्रसिद्ध नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम की नायिका शकुंतला बिजनौर की धरती पर ही पैदा हुई थीं। जिनका लालन-पोषण कण्व ऋषि ने किया था। हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत एक बार इस वन प्रांत में आखेट करते हुए पहुंचे और मालिन नदी के किनारे कण्वऋषि के आश्रम के बाहर पुष्प वाटिका में सौंदर्य की प्रतीक शकुंतला से उनका प्रथम प्रणय दर्शन हुआ। इससे उनके विश्वप्रसिद्ध पुत्र भरत पैदा हुए, जिनके नाम पर आज भारत का नाम भारत वर्ष है। 

 साग विदुर घर खायो! बिजनौर से करीब दस किलोमीटर दूर गंगा के तट पर आध्यात्म और वानप्रस्थ का रमणीक स्थान है, जिसे विदुर कुटी के नाम से जाना जाता है। दुनिया के सर्वाधिक बुद्घिमानों में से एक महात्मा विदुर की यह पावन आश्रम स्थली है। श्रीकृष्ण ने महात्मा विदुर जी के यहां बथुए का साग खाया था। इसलिए इस संबंध में कहा करते हैं कि दुर्योधन घर मेवा त्यागी, साग विदुर घर खायो। विदुर कुटी पर बारह महीने आज भी बथुवा पैदा होता है।

दारा नगर- महाभारत में वीरगति को प्राप्त बहुत सारे सैनिकों की विधवाओं को विदुरजी ने अपने आश्रम के पास बसाया था। वह जगह आज दारा नगर के नाम से जानी जाती है। दारा का शाब्दिक अर्थ तो आप जानते ही होंगे-औरत-औरतें। इस संपूर्ण स्थान को लोग दारानगर गंज (मेरा पैतृक गांव) कहकर पुकारते हैं। यहां पर और भी कई आश्रम हैं, जिनका वानप्रस्थियों और तपस्वियों से गहरा संबंध है। कार्तिक पूर्णिमा पर विदुर कुटी को स्पर्श करती हुई गंगा के तट पर मेला भी लगता है। गंगा में स्नान करने के लिए विदुर कुटी पर बड़े-बड़े घाट भी निर्मित हैं।

आचार्य द्रोण का आश्रम एवं उनका सैन्य प्रशिक्षण केंद्र- बिजनौर जनपद में चांदपुर के पास एक गांव है सैंद्वार। महाभारत काल में सैन्यद्वार इसका नाम था। यहां पर भारद्वाज ऋषि के पुत्र द्रोण का आश्रम एवं उनका सैन्य प्रशिक्षण केंद्र हुआ करता था। इस केंद्र के प्रांगण में द्रोण सागर नामक एक सरोवर भी है। यहां महाभारतकाल के अनेक स्थल एवं नगरों के भूमिगत खण्डहर मौजूद हैं। सन् 1995-96 में चांदपुर के पास राजपुर नामक गांव से गंगेरियन टाइप के नौ चपटे तांबे के कुल्हाड़े और नुकीले शस्त्र पाए गये जिससे स्पष्ट होता है कि यहां ताम्र युग की बस्तियां रही हैं। महाभारत का युद्ध, गंगा के पश्चिम में, कुरुक्षेत्र में हुआ था। हस्तिनापुर, गंगा के पश्चिम तट पर है, और इसके पूर्वी तट पर बिजनौर है। उस समय यह पूरा एक ही क्षेत्र हुआ करता था।

राजा मोरध्वज का नगर- महाभारत काल के राजा मोरध्वज का नगर, मोरध्वज, बिजनौर से करीब 40 किलोमीटर दूर है। गढ़वाल विश्वविद्यालय ने जब खुदाई करायी तो यहां के भवनों में ईटें ईसा से 5 शताब्दी पूर्व की प्राप्त हुईं। यहां पर बहुमूल्य मूर्तियां और धातु का मिलना आज भी जारी है। यहां के खेतों में बड़े-बड़े शिलालेख और किले के अवशेष अभी भी किसानों के हल के फलक से टकराते हैं। आसपास के लोगों ने अपने घरों में अथवा नींव में इसी किले के अवशेषों के पत्थर लगा रखे हैं। गढ़वाल विश्वविद्यालय को खुदाई में जो बहुमूल्य वस्तुएं प्राप्त हुईं वह उसी के पास हैं। यहां पर कुछ माफिया जैसे लोग बहुमूल्य वस्तुओं की तलाश में खुदाई करते रहते हैं और उन्हें धातुएं प्राप्त भी होती हैं। यहां ईसा से दूसरी एवं तीसरी शताब्दी पहले की केसीवधा और बोधिसत्व की मूर्तियां भी मिलीं हैं और ईशा से ही पूर्व, प्रथम एवं दूसरी शताब्दी काल के एक विशाल मंदिर के अवशेष भी मिले हैं। यहां बौद्ध धर्म का एक स्तूप भी कनिंघम को मिल चुका है। कहते हैं कि इस्लामिक साम्राज्यवादियों के निरंतर हमलों की श्रृंखला में यहां भारी तोड़फोड़ हुई।

नजीबुद्दौला का किला, पहचान डाकू सुल्ताना से- इस्लामिक साम्राज्यवादियों में से एक हमलावर नजीबुद्दौला ने मोरध्वज के विशाल किले को बलपूर्वक तोड़कर अपने बसाए नगर नजीबाबाद के पास, किले की ईटों से अपना एक विशाल किला बनाया। बिजनौर जिला गजेटियर कहता है कि इसमें लगे पत्थर मोरध्वज स्थान से लाकर लगाए गए हैं। मोरध्वज के किले की खुदाई में आज भी मिल रहे बड़े पत्थरों और नजीबुद्दौला के किले में लगे पत्थरों की गुणवत्ता एकरूपता और आकार बिल्कुल एक हैं। पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए जो हुक इस्तेमाल किए गए थे, वह भी एक समान हैं। इसलिए किसी को भी यह समझने में देर नहीं लगती है कि नजीबुद्दौला ने मोरध्वज के किले को नष्ट करके उसके पत्थरों से अपने नाम पर यह किला बनवाया। सन् 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने इसके अधिकांश भाग को ढहा दिया। इसकी दीवारें बहुत चौड़ी हैं, जो इसके विशाल अस्तित्व की गवाह हैं। नजीबुद्दौला का जो महल था उसमें आज पुलिस थाना नजीबाबाद है। यहां पर नजीबुद्दौला के वंशजों की समाधियां भी हैं। मगर संयोग देखिएगा कि जो किला नजीबुद्दौला ने बनवाया था, आज उसे पूरी दुनिया सुल्ताना डाकू के किले के नाम से जानती है। 

प्रलंभनगर से मंडावर- बिजनौर जनपद में एक ऐतिहासिक कस्बा मंडावर है। इतिहासकार कहते हैं कि पहले इस स्थान का नाम प्रलंभनगर था, जो आगे चलकर मदारवन, मार्देयपुर, मतिपुर, गढ़मांडो, मंदावर और अब मंडावर हो गया। बौद्ध काल में यह एक प्रसिद्ध बौद्ध स्थल था। इतिहासकार कनिंघम का मानना है कि चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां पर करीब 6 सन् 1130 AD में अरब यात्री इब्नेबतूता मंडावर आया था। अपने सफरनामें में उसने दिल्ली से मंडावर होते हुए अमरोहा जाना लिखा है।

महारानी विक्टोरिया ने पढ़ी उर्दू- ब्रिटिशकाल में महारानी विक्टोरिया को मंडावर के ही मुंशी शहामत अली ने उर्दू का ट्यूशन पढ़ाया था, जिन्हें वो अपने साथ लन्दन ले गई थी। मुंशी शहामत अली अंग्रेज सरकार के रेजीडेंट थे। महारानी विक्टोरिया ने उन्हें उर्दू पढ़ाने के एवज में मंडावर में इनके लिए जो महल बनवाया था। यह महल पूरी तरह से यूरोपीएन शैली में है। अब सब कुछ ध्वस्त होता जा रहा है। बिजनौर से कुछ दूर जहानाबाद में यहां एक ऐसी मस्जिद थी, जिस पर कभी गंगा का पानी आने से इलाहाबाद और बनारस में बाढ़ आने का पता चल जाया करता था। मुगल बादशाह शाहजहां ने यहां की बारह कुंडली खाप के सैयद शुजाद अली को बंगाल की फतह पर प्रसन्न होकर यह जागीर दी थी। शुजातअली ने गोर्धनपुर का नाम बदलकर ही जहानाबाद रखा। इन्होंने गंगा तट पर पक्का घाट बनवाया और एक ऐसी विशाल मस्जिद तामीर कराई कि जिस पर अंकित किए गये निशानों तक गंगा का पानी चढ़ जाने से इलाहाबाद और बनारस में बाढ़ आने का पता चलता था। लगभग सन् 1920 में दुर्भाग्य से आई भयंकर बाढ़ से यह मस्जिद ध्वस्त हो गई जबकि उसकी मीनारों के अवशेष अभी भी यहां पड़े दिखाई देते हैं। 

अकबर के नौ रत्न- अकबर के नौ रत्नों में से एक अबुल फजल और फैजी चांदपुर के पास बाष्टा कस्बे के पास एक गांव के रहने वाले थे।  इतिहासकार कहते हैं कि पृथ्वी को समतल कर भूमि से अन्न उत्पादन करने की शुरूआत करने वाले रामायण काल के शासक प्रथु के अधीन यह पूरा क्षेत्र था।

बिजनौर में कई छोटी बड़ी रियासतें थीं। इनमें साहनपुर, हल्दौर, सेवहरा, रतनगढ़, और ताजपुर बड़ी और प्रसिद्घ रियासतें हैं।  साहनुपर स्टेट जाट रियासत है और सबसे प्राचीन है। 

बिजनौर जनपद ने देश को कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभाएं भी दी हैं, जैसे-प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा आत्माराम बिजनौर के थे।

कवि दुष्यंत- कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।

निराश मनुष्यों को आशावादी बनाने वाली इन पंक्तियों के रचनाकार एवं गज़लकार कवि दुष्यंत बिजनौर के थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान साहित्य एवं पत्रकारिता की मशाल लेकर चलने वाले संपादकाचार्य पं. रुद्रदत्त शर्मा, पंडित पदमसिंह शर्मा, फतेहचंद शर्मा, आराधक, राम अवतार त्यागी, मशहूर उर्दू लेखिका कुर्तुल एन हैदर, कन्या गुरुकुल के संस्थापक एवं जाट इतिहास के लेख़क ठाकुर संसार सिंह, शक्ति आश्रम कनखल के संस्थापक, जिनके नाम पर ज्वालापुर कनखल मार्ग है, योगेंद्रपाल शास्त्री, पत्रकार स्वर्गीय राजेंद्रपाल सिंह कश्यप, प्रसिद्घ संपादक चिंतक बाबू सिंह चौहान, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवचरण सिंह त्यागी बिजनौर के ही थे। उर्दू के प्रख्यात विद्वान मौलवी नजीर अहमद रेहड़ के रहने वाले थे। इन्होंने उर्दू साहित्य पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। इंडियन पैनलकोड का इन्होंने इंगलिश से उर्दू में अनुवाद भी किया है। सरकार ने उन्हें उनके उर्दू साहित्य की सेवाओं के लिए शमशुल उलेमा की उपाधि दी तथा एडिनवर्ग विश्वविद्यालय ने उन्हें डा. ऑफ लॉ की उपाधि दी। वे अंग्रेजों के जमाने के डिप्टी कलेक्टर थे।

देश के प्रसिद्ध समाचार पत्र समूह टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वामी एवं भारतीय ज्ञानपीठ पुरुस्कार के मालिक साहू शांति प्रसाद जैन, साहू श्रेयांश प्रसाद जैन, पत्रकार लेखक डा महावीर अधिकारी, भारतीय हाकी टीम के प्रमुख खिलाड़ी और पूर्व ओलंपियन पद्मश्री जमनलाल शर्मा, भारतीय महिला हाकी टीम की पूर्व कप्तान रजिया जैदी, भूतपूर्व गर्वनर धर्मवीरा जिन्हें PMO में नेहरू के समय प्रथम प्रिंसिपल सेक्रेट्री होने का गौरव प्राप्त है। गौतम बुध्द विश्व विधालय के संस्थापक एवं कुलपति जो AITCE के चेयरमैन भी रहे रामसिंह निर्जर इसी जिले से हैं।इनके अतिरिक्त प्रमुख न्यायविद शांतिभुसन ,फिल्म निर्माता प्रकाश मेहरा बिजनौर की देन हैं।

समाचार पत्र मदीना- स्वतंत्रता आंदोलन के समय का उर्दू का प्रसिद्ध तीन दिवसीय समाचार पत्र मदीना बिजनौर से प्रकाशित होता था। उस समय यह समाचार पत्र सर्वाधिक बिक्री वाला एवं लोकप्रिय था। काकोरी कांड के अमर शहीदों का प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय शिवचरण सिंह त्यागी के गांव पैजनियां से गहरा रिश्ता रहा है। अशफाक उल्ला एवं चंद्रशेखर जैसे अमर शहीदों ने यहां अज्ञात वास किया था। स्वर्गीय त्यागी एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने कभी सरकार से न पेंशन ली और न ही कोई अन्य लाभ। पैजनियां गांव को स्वतंत्रता आंदोलनकारियों का तीर्थ भी कहा जाता है। नूरपुर थाने पर 16 अगस्त को स्वतंत्रता आंदोलन का झंडा फहराने वाले दो युवकों वीर एवं ऋषि को अंग्रेजों ने गोली से उड़ा दिया था। तभी से हर वर्ष उनकी याद में नूरपुर में विशाल शहीद मेला लगता है।

राजनैतिक विरासत- राजनैतिक रूप से भी बिजनौर जनपद देश के मानचित्र पर चमकता रहा है। भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री हाफिज मोहम्मद इब्राहिम, महावीर त्यागी, बाबू गोविंद सहाय और चौधरी गिरधारी लाल ने काफी समय तक बिजनौर का प्रभावशाली राजनीतिक नेतृत्व किया है। गिरधारीलाल के प्रयासों के कारण आज बिजनौर जिला रोड नेटवर्क में यूपी में नंबर one है। बिजनौर के विकास में इन राजनेताओं का अभूतपूर्व योगदान रहा है। देश की संसद को रामदयाल के रूप में निर्विरोध सांसद देने का श्रेय भी बिजनौर को है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के राजनीतिक कैरियर की शुरूआत भी बिजनौर लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर हुई। वर्तमान मे बसपा के मलूक नागर यहाँ से सांसद है और भूतपूर्व  बीजेपी के सांसद राजा भारतेंदु सिंह हैं, जो बिजनौर की साहनपुर रियासत के राजवंश से ताल्लुक रखते हैं।

बिजनौर खेती की पैदावार में भी सबसे आगे है। यहां गेहूं गन्ना-धान देसी उड़द प्रमुख उपज है। क्रेशर उद्योग का यहां काफी विस्तार हुआ है, लेकिन अब इसमें मुनाफा नहीं होने से उद्यमियों ने इससे हाथ खींच लिये हैं। फिर भी बिजनौर शुगर उत्पादन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है।

मुझे गर्व है मेरा भी इस महान जनपद बिजनौर मे जन्म हुआ।
इस धरती को मेरा शत-शत नमन
आपका अपना
मोहित अग्रवाल
पत्रकार एवं ग्राम पंचायत सदस्य
ग्राम निजामत पुरा गंज

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी

लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी में 19 नवम्बर 1828 को हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथी बाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। माता भागीरथी बाई एक सुसंस्कृत, बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ स्वभाव की थी। उनकी माँ की मृत्यु हो गयी। घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नहीं था, इसलिए पिता मनु को अपने साथ पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में ले जाने लगे। जहाँ चंचल और सुन्दर मनु को सब लोग उसे प्यार से “छबीली” कहकर बुलाने लगे। मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्र की शिक्षा भी ली।[3] सन् 1842 में उनका विवाह झाँसी के मराठा शासित राजा गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ और वे झाँसी की रानी बनीं। विवाह के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। सितंबर 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया, परन्तु चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी। सन् 1853 में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद 21 नवम्बर 1853 को राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गयी। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया।[2]

ब्रितानी राज ने अपनी राज्य हड़प नीति के तहत बालक दामोदर राव के ख़िलाफ़ अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया। हालांकि मुक़दमे में बहुत बहस हुई, परन्तु इसे ख़ारिज कर दिया गया। ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का ख़ज़ाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना ख़र्च में से काटने का फ़रमान जारी कर दिया। इसके परिणाम स्वरूप रानी को झाँसी का क़िला छोड़कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा, पर रानी लक्ष्मीबाई ने हिम्मत नहीं हारी और उन्होनें हर हाल में झाँसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय किया।[4] (साभार wikipedia)

…अभी इसमें झांसी किले से उरई जालौन तक ब्रितानी सेना द्वारा रानी झांसी का पीछा किये जाने की कहानी बाकी है। शत शत नमन

पौराणिक भूगोल और जम्बूद्वीप

Wednesday, June 9, 2021 by Dr Pradeep Dwivedi Lucknow

लखनऊ। (एकलव्य बाण समाचार) पौराणिक भूगोल के अनुसार भूलोक के सप्त महाद्वीपों में एक द्वीप है, जिसका नाम है जम्बू द्वीप। यह जम्बू द्वीप धरती के केंद्र में स्थित है और इसमें 9 देश सम्मिलित हैं:- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। पुराणों में जम्बू द्वीप के 6 पर्वत बताए गए हैं – हिमवान, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत और श्रृंगवान। इलावृत जम्बू द्वीप के बीचों बीच स्थित है।

‘जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:,

भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंक पुरुषं स्मृतम्,

हरिवर्षं तथैवान्यन्मेरोर्दक्षिणतो द्विज।

रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्,

उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा।

नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्,

इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:।

भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे।

एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव: जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।- (विष्णु पुराण)

मनुस्मृति में वर्णित दरद, खस आदि पर्वतीय जातियां हैं, जो चीन, कोरिया और मंगोलिया तक फैली हुई हैं। बौद्ध धर्म का प्रचार इन देशों में खूब हुआ। चंगेज खां आकाश की पूजा करता था। मंगोलियाई मध्य एशिया में बसने के बाद इस्लाम के प्रभाव के चलते मुसलमान बन गए। मंगोल, मुघन हुआ और मुघल ही मुगल हो गया। कभी मंगोलिया मौद्गलिक था। वहां बौद्ध संगति हुई थी। मध्य एशिया के लोगों का मूल धर्म बौद्ध ही है।

इस इलावृत के मध्य में स्थित है सुमेरू पर्वत। इलावृत के दक्षिण में कैलाश पर्वत के पास भारतवर्ष, पश्चिम में केतुमाल (ईरान के तेहरान से रूस के मॉस्को तक), पूर्व में हरिवर्ष (जावा से चीन तक का क्षेत्र) और भद्राश्चवर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र), उत्तर में रम्यक वर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र), हिरण्यमय वर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र) और उत्तर कुरुवर्ष (रूस के कुछ क्षेत्र) नामक देश हैं।

पुराणों के अनुसार इलावृत चतुरस्र है। वर्तमान भूगोल के अनुसार पामीर प्रदेश का मान 150X150 मील है अतः चतुरस्र होने के कारण यह ‘पामीर’ ही इलावृत है। इलावृत से ही ऐरल सागर, ईरान आदि क्षेत्र प्रभावित हैं।

आज के किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, मंगोलिया, तिब्बत, रशिया और चीन के कुछ हिस्से को मिलाकर इलावृत बनता है। मूलत: यह प्राचीन मंगोलिया और तिब्बत का क्षेत्र है। एक समय किर्गिस्तान और तजाकिस्तान रशिया के ही क्षेत्र हुआ करते थे। सोवियत संघ के विघटन के बाद ये क्षेत्र स्वतंत्र देश बन गए।

आज यह देश मंगोलिया में ‘अतलाई’ नाम से जाना जाता है। ‘अतलाई’ शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है। सम्राट ययाति के वंशज क्षत्रियों का संघ भारतवर्ष से जाकर उस इलावृत देश में बस गया था। उस इलावृत देश में बसने के कारण क्षत्रिय ऐलावत (अहलावत) कहलाने लगे।

इस देश का नाम महाभारतकाल में ‘इलावृत’ ही था। जैसा कि महाभारत में लिखा है कि श्रीकृष्णजी उत्तर की ओर कई देशों पर विजय प्राप्त करके ‘इलावृत’ देश में पहुंचे। इस स्थान को देवताओं का निवास-स्थान माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने देवताओं से ‘इलावृत’ को जीतकर वहां से भेंट ग्रहण की।

इलावृत देश के मध्य में स्थित सुमेरू पर्वत के पूर्व में भद्राश्ववर्ष है और पश्चिम में केतुमालवर्ष है। इन दोनों के बीच में इलावृतवर्ष है। इस प्रकार उसके पूर्व की ओर चैत्ररथ, दक्षिण की ओर गंधमादन, पश्चिम की ओर वैभ्राज और उत्तर की ओर नंदन कानन नामक वन हैं, जहां अरुणोद, महाभद्र, असितोद और मानस (मानसरोवर)- ये चार सरोवर हैं। माना जाता है कि नंदन कानन का क्षेत्र ही इंद्र का लोक था जिसे देवलोक भी कहा जाता है। महाभारत में इंद्र के नंदन कानन में रहने का उल्लेख मिलता है।

सुमेरू के दक्षिण में हिमवान, हेमकूट तथा निषध नामक पर्वत हैं, जो अलग-अलग देश की भूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुमेरू के उत्तर में नील, श्वेत और श्रृंगी पर्वत हैं, वे भी भिन्न-भिन्न देशों में स्थित हैं।

पहले इल: ब्रह्मा के पुत्र अत्रि से चंद्रमा का जन्म हुआ। चंद्रमा से बुध का जन्म हुआ। बुध का विवाह स्वायंभुव मनु की पुत्री इल से हुआ। इल-बुध सहवास से पुरुरवा हुए। पुरुरवा के कुल में ही भरत और कुरु हुए। कुरु से कुरुवंश चला। भारत के समस्त चन्द्रवंशी क्षत्रिय पुरुरवा की ही संतति माने जाते हैं।

इतिहाकारों के अनुसार आर्यों की पहली टोली मान्व-आर्य नाम से भारत में आई। दूसरी टोली इलावृत देश से भारत में आई। इस तरह पहली टोली के मान्व-आर्य और दूसरी टोली के ऐल-आर्य एक ही महादेश के निवासी सिद्व होते हैं, किंतु ऐल लोगों के साथ उत्तर कुरु लोगों का भी एक बड़ा भाग था। ऐल ही कुरु देश (पेशावर के आसपास का इलाका) में बसने के कारण कुरु कहलाते थे। इतिहासकारों के अनुसार ये ऐल ही पुरुरवा (पुरु) था। यूनान और यहूदियों के पुराने ग्रंथों में ऐल के पुत्रों का जिक्र मिलता है। इस ऐल के नाम पर ही इलावृत देश रखा गया।

दूसरे इल: इस देश (इलावृत) का नाम दक्ष प्रजापति की पुत्री इला के क्षत्रिय पुत्रों से आवृत होने के कारण इलावृत रखा गया। आज यह देश मंगोलिया में ‘अतलाई’ नाम से जाना जाता है। ‘अतलाई’ शब्द ‘इलावृत’ का ही अपभ्रंश है। सम्राट ययाति के वंशज क्षत्रियों का संघ भारतवर्ष से जाकर उस इलावृत देश में आबाद हो गया। उस इलावृत देश में बसने के कारण क्षत्रिय ऐलावत (अहलावत) कहलाने लगे।

तीसरे इल: वायु पुराण के अनुसार त्रेतायुग के प्रारंभ में ब्रह्मा के पुत्र स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियवृत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था। प्रियवृत के पुत्र जम्बू द्वीप के राजा अग्नीन्ध्र के 9 पुत्र हुए- नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत, रम्य, हिरण्यमय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल। राजा आग्नीध ने उन सब पुत्रों को उनके नाम से प्रसिद्ध भूखंड दिया। इलावृत को मिला हिमालय के उत्तर का भाग। नाभि को मिला दक्षिण का भाग।

चौथे इल: वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। पुराणों में वैवस्वत मनु का भी स्थान सुमेर पर्वत बताया जाता है, जो कि इलावृत के मध्य में कहा गया है। पहले पुत्र इल के नाम पर ही इलावृत रखा गया।

यूराल-पर्वत से ’यूराल’ नाम की एक नदी भी निकलती है। ‘इरा’ का अर्थ जल होने से इरालय का अर्थ नदी हो जाता है। आर्यों की योरपीय शाखा सम्भवतः यूराल-पर्वत-श्रेणी के आसपास के प्रदेशों से ही अलग हुई और उनमें से एक ने इलावर्त की स्थापना की।

इसके अनन्तर वायुपुराण में हिरण्मयवर्ष का होना बतलाया गया है। हिरण्मय के बाद श्वेत-पर्वत और उसके बाद रम्यक-वर्ष है। रम्यकवर्ष के बाद नीलपर्वत और तत्पश्चात् इलावृत है। हम एशिया के मानचित्र में इन पाञ्च स्थानों का क्रमिक निर्देश करते हुए इलावृत का निर्देशElburz (एलबर्ज़)-पर्वत से कर सकते हैं। यह एलबर्ज़ कास्पियन-सागर के उत्तर पश्चिम तक फैला हुआ है। इन पहाड़ी प्रदेशों के उत्तर काकेसस पर्वत है। काकेसस पर्वत के निकटवर्ती प्रदेश की भूमि, लोकमान्य तिलक के पूर्व आर्यों की आदि-भूमि मानी जाती थी। यदि एलबर्ज़ के आसपास (कास्पियन-सागर के पश्चिमी किनारे से लेकर दक्षिण-पूर्व तक) आर्यों के इलावृत-देश को मान लें तो काकेसस, जो नील-सागर के उत्तर-पूर्व है, नील-पर्वत का स्थान ग्रहण कर सकता है। (साभार)