महिला की जान बचाई तो पुलिस ने प्रशंसा पाई, SP ने दिया पुरस्कार

फांसी पर लटकी महिला की जान बचाने वाली पुलिस टीम पुरस्कृत

पुलिस टीम को एसपी ने दिया प्रशस्ति पत्र व 05-05 हजार रुपए का नगद पुरस्कार

बिजनौर। एक सप्ताह पूर्व फांसी के फंदे पर लटकी महिला की जान बचाने वाली पुलिस टीम को एसपी ने प्रशस्ति पत्र व 05-05 हजार रुपए के नगद पुरस्कार से पुरस्कृत किया है। पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह द्वारा टीम के इस सराहनीय एवं मानवतापूर्ण कार्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी। उन्होंने सभी को प्रशस्ति पत्र व 05-05 हजार रुपए के नगद पुरस्कार से पुरस्कृत किया। पुलिस अधीक्षक द्वारा सभी को भविष्य में भी इसी प्रकार से कर्तव्यनिष्ठा एवं समर्पण भाव से जनसेवा करने के लिये प्रेरित किया गया।

गौरतलब है कि थाना कोतवाली शहर अंतर्गत काकरान वाटिका में 27 सितंबर 2022 को गृह कलह से तंग महिला फांसी के फंदे पर झूल गई थी। इससे पहले पति पत्नी में झगड़ा हुआ था। पड़ोसियों की सूचना पर उ0नि0 गौरव चौधरी, आरक्षी अचीन चौधरी, आरक्षी शुभम सरोहा व महिला आरक्षी फिरमिल मौके पर पहुँचे। पुलिस टीम ने बिना समय गंवाए महिला को फांसी के फंदे से उतारा तथा उसे उपचार हेतु तत्काल बीना प्रकाश हॉस्पिटल में भर्ती कराया, जिससे महिला को सकुशल बचा लिया गया।

इस पूरे मामले की किसी ने वीडियो बना ली, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। सिविल लाइंस चौकी प्रभारी गौरव चौधरी के अनुसार किरतपुर थाने के गांव छितावर निवासी ईशांत उर्फ संजू की दो साल पहले कोतवाली नगर के गांव हमीदपुर निवासी रामेंद्र की पुत्री निक्की के शादी हुई थी। दोनों की दूसरी शादी थी। शादी के कुछ दिनों बाद से ही दोनों में विवाद चल रहा था। घटना वाले दिन भी निक्की के भाई ईशांत को घर के बाहर पीट रहे थे। इसी झगड़े की सूचना किसी ने पुलिस को दी थी। निक्की के पिता रामेंद्र की तहरीर पर ईशांत के खिलाफ दहेज के लिए मारपीट आदि धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कराई गई। महिला की जान बचाने पर पुलिस टीम की जनता में भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी जिससे समाज में पुलिस का सकारात्मक चेहरा सामने आया।

6 अक्टूबर को किसानों के मसीहा की 87वीं जयंती

6 अक्टूबर को गन्ना समिति के प्रांगण में मनाई जाएगी किसानों के मसीहा की 87वीं जयंती

मुजफ्फरनगर के कस्बा सिसौली में 6 अक्टूबर 1935 में एक किसान परिवार में हुआ था जन्म।

लम्बी बीमारी के कारण 15 मई 2011 को हो गया था निधन।

स्योहारा/बिजनौर। किसानों के मसीहा स्व. चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की 87वीं जयंती 6 अक्टूबर को गन्ना समिति के प्रांगण में मनाई जाएगी।

भारतीय किसान यूनियन अराजनीतिक के ब्लॉक अध्यक्ष चौधरी लोकेंद्र सिंह ने बताया कि गुरुवार को सुबह 11 बजे गन्ना समिति स्योहारा के प्रांगण में बाबा महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म दिवस मनाया जाएगा। ब्लॉक की मासिक मीटिंग भी उसी दिन ही करने का निर्णय लिया गया है। इस दौरान 9, 10 व 11 को हरिद्वार में होने जा रहे हैं चिंतन शिविर के लिए भी चर्चा की जाएगी। उन्होंने क्षेत्र के किसान भाइयों से अनुरोध करते हुए समय से पहुंचने की अपील की। इस मौके पर देवेंद्र सिंह अहलावत, अनुज कुमार बालियान, त्रिवेंद्र सिंह, यशपाल सिंह, प्रमोद कुमार, अतुल कुमार व प्रनीत कुमार मौजूद रहे।

विदित हो कि एक साधारण परिवार में जन्म लेकर विश्व पटल पर किसान नेता के रुप में पहचान स्थापित करने वाले चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत ने सदैव किसानों के हित के संघर्ष किया। मुजफ्फरनगर के कस्बा सिसौली में 6 अक्टूबर 1935 में एक किसान परिवार में उनका जन्म हुआ था और लम्बी बीमारी के बाद 15 मई 2011 को हुआ था निधन।

जयंती विशेष (24 सितंबर): जपो निरन्तर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान…

जयंती विशेष (24 सितंबर)

जपो निरन्तर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान..

भारतेंदु युग के प्रमुख स्तंभ पंडित प्रताप नारायण मिश्र की अल्प आयु में पिता की मृत्यु के चलते औपचारिक पढ़ाई तो बहुत नहीं हो पाई लेकिन स्वाध्याय के बल पर वह पत्रकारिता और साहित्य के प्रकांड पंडित बने। परवर्ती साहित्यकारों और संपादकों में तो उनके प्रति सम्मान का भाव था ही पूर्ववर्ती साहित्यकार भी उनके पांडित्य से प्रभावित रहा करते थे।
24 सितंबर 1856 को जन्मे पंडित प्रताप नारायण मिश्र के जन्म स्थान को लेकर साहित्यकारों में कुछ मतभेद हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ सुरेश चंद्र शुक्ल ने उनके जन्म स्थान के रूप में कानपुर को मान्यता दी है। इनका मत है कि पंडित प्रताप नारायण के पिता पंडित संकटा प्रसाद मिश्र को परिवार पालन के लिए 14 वर्ष की अल्पायु में कानपुर आना पड़ा। इसलिए उनका (प्रताप नारायण) जन्म कानपुर में ही हुआ होगा लेकिन अपने संपादन में ‘प्रताप नारायण मिश्र कवितावली’ प्रकाशित करने वाले नरेश चंद्र चतुर्वेदी और डॉ शांति प्रकाश वर्मा उनका जन्म उन्नाव जनपद के बैजेगांव (अब बेथर) ही मानते हैं। ‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ पुस्तक में रामचंद्र तिवारी लिखते हैं-‘मिश्रा जी का जन्म बैजेगांव में हुआ हो या ना हुआ हो उनकी रचनाओं में गांव का अंश कुछ अधिक ही है।’

मासिक पत्र ब्राह्मण का प्रकाशन :
भारतेंदु हरिश्चंद्र की परंपरा जारी रखने के लिए आर्थिक कठिनाइयों के बाद भी पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने मार्च 1883 में ब्राह्मण नाम से मासिक पत्र प्रकाशित करना शुरू किया। ब्राह्मण के प्रथम अंक में अपना उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था-‘अंतः करण से वास्तविक भलाई चाहते हुए सदा अपने यजमानों (ग्राहकों) का कल्याण करना ही हमारा मुख्य कर्म होगा’। 550 रुपए का घाटा सहकर वह 7 वर्षों तक ब्राम्हण का निरंतर प्रकाशन करते रहे। इसके बाद प्रकाशन का दायित्व खड्गविलास प्रेस बांकीपुर के मालिक बाबू रामदीन सिंह को सौंप दिया।

हिंदी के लिए पूर्णत: समर्पित:
पंडित प्रताप नारायण मिश्र हिंदी के बहुत बड़े हिमायती थे। अपने मासिक पत्र ब्राह्मण में हिंदी को लेकर वह जब का लेख लिखते रहते थे। एक बार समकालीन प्रकाशन ‘फतेहगढ़ पंच’ ने उनकी हिंदी पक्षधरता के खिलाफ लेख प्रकाशित किया। इस पर उनका गुस्सा बढ़ गया। उन्होंने फतेहगढ़ पंच के लेख के जवाब में ब्राह्मण में कई महीने तक लिखा। दोनों के बीच कई महीने विवाद चलता रहा। उसी बीच उन्होंने हिंदी पर एक कविता लिखी, जो काफी चर्चित हुई-

चहहु जो सांचे निज कल्यान, तो सब मिलि भारत संतान
जपो निरंतर एक ज़बान -हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान
तबहि सुधरिहे जन्म-निदान; तबहिं भलो करिहे भगवान

मसखरी की मिसालें :
प्रताप नारायण मिश्र स्वभाव से मस्त मौला थे। मसखरे थे। नाटकों में अभिनय भी करते थे। कानपुर की सड़कों पर वह लावनी गाते हुए कभी रिक्शे पर कभी पैदल निकलते थे। फागुन में इकतारा लेकर वह उपदेशपूर्ण, हास्य, होली, कबीर और पद आदि भी गाते थे। वह सांस बंद कर के घंटों तक मुर्दा से पड़े रहते थे। अपने कान एक या दोनों उन्हें हिलाते या फड़काते थे। तब उनके दूसरे अंग स्थिर रहते थे। उनकी मसखरी की मिसालें भी खूब चर्चित हैं।
एक बार नाटक में उनको स्त्री का रूप लेना था। मूछों का मुंड़ाना जरूरी था। भक्ति भाव से अपने पिता के सामने हाजिर हुए और बोले यदि आप आज्ञा दीजिए तो इनको (मूंछों) मुड़वा डालूं। मैं अनाज्ञाकारी नहीं बनना चाहता।’ पिता ने हंसकर आज्ञा दे दी। इसी तरह एक बार कानपुर म्युनिसिपिलटी में इस बात पर विचार हो रहा था कि भैरव घाट में मुर्दे बहाए जाएं या नहीं। चर्चा के बीच किसी ने कहा कि जले हुए मुर्दे की पिंडी यदि इतने इंच से अधिक न हो तो बहाई जाए। दर्शकों में प्रताप नारायण भी मौजूद थे। वह तत्क्षण खड़े होकर बोले- ‘अरे दैया रे दैया! मरेउ पर छाती नापी जाई!’ इस पर खूब जोर के ठहाके लगे।
ऐसा ही एक किस्सा पादरी से बातचीत का है। पादरी ने व्यंग्य पूर्ण लहजे में कहा-आप गाय को माता कहते हैं। उन्होंने कहा- हां। पादरी बोला तो बैल को आप चाचा कहेंगे। इस पर उनका जवाब था- बेशक रिश्ते से क्या इंकार है? पादरी ने तंज कसते हुए कहा-हमने तो 1 दिन अपनी आंखों से एक बार को महिला खाते देखा था। मिश्र जी ने कहा- अजी साहब, वह इसाई हो गया होगा! हिंदू समाज में ऐसे भी बैल होते हैं।’ पादरी मुंह लटका कर चला गया।

लावनी सुनकर कन्नौज के कसाइयों ने छोड़ दी थी गोहत्या:

पंडित प्रताप नारायण मिश्र गोरक्षा के बहुत बड़े हिमायती थे। कई कविताओं में उन्होंने गोरक्षा पर जोर दिया। अपने निबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं-‘सुनते हैं कानपुर में जो इस समय गौशाला है उसकी स्थापना के लिए प्रयत्न करने वालों में प्रताप नारायण भी थे। एक बार स्वामी भास्कर आनंद के साथ वह कन्नौज गए और गौ रक्षा पर व्याख्यान दिया। व्याख्यान में एक लावनी कही-

बां-बां करि तृण दाबि दांत सों, दुखित पुकारत गाई है

आचार्य द्विवेदी अपने निबंध में लिखते हैं- मिश्र जी की इस लावनी में करुण रस का इतना अतिरेक था कि मुसलमानों तक पर इसका असर हुआ और एक आध कसाइयों ने गौ हत्या से तौबा कर ली थी।

38 बरस में पूरी हो गई जीवन यात्रा:
अपने दैनंदिन जीवन में सदैव अस्त व्यस्त रहने वाले पंडित प्रताप नारायण मिश्र अक्सर बीमार रहा करते थे। इसी के चलते 38 वर्ष की कम उम्र में 1894 में उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूरी की। अपने इस छोटे से जीवन में उन्होंने साहित्य की हर विधा में लिखा। रामचंद्र तिवारी के अनुसार, प्रताप नारायण ग्रंथावली में उनके 190 निबंध और प्रताप नारायण मिश्र कवितावली में छोटी बड़ी 197 कविताएं संग्रहीत हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को समृद्ध किया। उनके गद्य में लोक प्रचलित मुहावरे और कहावतें की भरमार है। डॉ शांति प्रकाश वर्मा ने उनके गद्य से छांटकर मुहावरे और कहावतों का पूरा कोष ही तैयार कर दिया। मुहावरा कोष लगभग 110 प्रश्न का है और कहावतें कुल 16 पृष्ठों में। मिश्रा जी ने अपने लेखों में संस्कृत की जिन सूक्तियों और श्लोकों का उदाहरण दिया है, उनकी संख्या 220 है। उर्दू और फारसी की सूक्तियां कुल 66 हैं। (‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ लेखक-रामचंद्र तिवारी, पृष्ठ-68)
उनके निधन पर पूर्ववर्ती साहित्यकार बालकृष्ण भट्ट ने असमय निधन पर प्रताप नारायण मिश्र के प्रताप का उल्लेख कुछ यूं किया था-‘प्रातः स्मरणीय बाबू हरिश्चंद्र को जो हिंदी का जन्मदाता कहे तो प्रताप मिश्र को नि:संदेह उस स्तन अधन्या दूध मोहि बालिका का पालन पोषण करता कहना पड़ेगा क्योंकि हरिश्चंद्र के उपरांत उसे अनेक रोग दोष से सर्वथा नष्ट न हो जाने से बचा रखने वाले यही देख पड़े’।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1906 की सरस्वती में एक निबंध ‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र’ लिखा था। वह लिखते हैं-‘मैं कोई संदेह नहीं कि प्रताप नारायण में प्रतिभा थी और थोड़ी नहीं बहुत थी। विधता होने से कविता शक्ति में कोई विशेषता नहीं आ सकती उल्टे हानि चाहे उससे कुछ हो जाए। प्रताप नारायण की कविता में प्रतिभा का प्रमाण अनेक जगह मिलता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार प्रताप नारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट जी की एक साथ चर्चा करते हुए लिखा है-‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी गद्य साहित्य में वही काम किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडिसन और स्टील ने किया था’। (हिंदी साहित्य का इतिहास- पृष्ठ 467)

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/ उन्नाव

प्राइवेट स्कूलों को टक्कर दे रहा जटनंगला का सरकारी प्राथमिक विद्यालय

नौ वर्ष पूर्व ऐसा था विद्यालय का नजारा

प्राइवेट स्कूलों को टक्कर दे रहा जटनंगला का सरकारी प्राथमिक विद्यालय। शिक्षक ने बदल दी विद्यालय की तस्वीर। राज्य स्तरीय पत्रिका के प्रथम पृष्ठ पर विद्यालय के छाया चित्र को मिली जगह।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित पत्रिका में दिखाया गया है विद्यालय के शौचालय के छायाचित्र

आकाश तोमर, स्योहारा।

सरकारी स्कूल अब प्राइवेट स्कूलों को मात देने लगे हैं। संसाधन, ग्रीनरी, विद्यालयीय सौंदर्य, स्वच्छता, अनुशासन, स्तरीय पढ़ाई व सामान्य ज्ञान सरकारी प्राइमरी स्कूल की पहचान बनने लगा है। स्कूल में अब कक्षा में प्रोजेक्टर से पढ़ाई कराई जाती है। स्योहारा ब्लाक क्षेत्र में जटनंगला का प्राथमिक विद्यालय इसका उदाहरण बना है, जहां बच्चों की संख्या भी साल दर साल बढ़ी है।

यूं तो अनुशासनहीनता, अस्वच्छता, स्तरहीन शिक्षा के लिए सरकारी प्राइमरी स्कूल पहचाने जाते हैं, लेकिन यदि शिक्षक के मन में लगन हो तो सरकारी स्कूलों में भी बदलाव दिखाई देने लगाता है। ऐसा ही बदलाव हुआ है जटनंगला के प्राइमरी स्कूल में। यहां शिक्षा आधुनिक ज्ञान के साथ कदमताल कर रही है। स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए कोर्स के साथ साथ शिक्षक द्वारा अंग्रेजी स्पीकिंग का कोर्स भी कराया जा रहा है।

विद्यालय में प्रवेश द्वार से ही बहुत करीने से कटी घास की बाउंड्रीवाल, सौंदर्य को बढ़ाने के लिए शानदार पेड़ पौधे स्वागत करते हैं। बच्चे पूर्ण रूप से ड्रेस कोड में आते हैं। स्कूल में दीवारों, क्लास रूम में मनोरंजक ज्ञानवर्द्धक पेंटिंग लगी हैं। बच्चों में अपनी कक्षा के अनुरूप अंग्रेजी बोलने समझने का ज्ञान है। किसी भी बच्चे से अंग्रेजी में सामान्य संवाद किया जा सकता है। राष्ट्रपिता, राज्यपाल का नाम, पिता का नाम, फलों, फूलों, जानवरों, पक्षियों आदि के नाम पूछे जा सकते हैं। बच्चों को 30 तक पहाड़े याद हैं।

प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक वैभव चौधरी का कहना है कि 2014 में यह विद्यालय भी अन्य विद्यालयों जैसा ही था। गांव में ओबीसी व सामान्य जाति के बच्चे तो इस विद्यालय में प्रवेश ही नहीं लेते थे, जिसे मैंने चुनौती के रूप में लिया। चार वर्ष पूर्व अपने खर्च से एक प्रोजेक्टर खरीदकर बच्चों को कथा – कहानियों के माध्यम से पढ़ाना शुरू किया। विद्यालय में सौंदर्यीकरण हेतु हेज लगाई, उसकी कटिंग कराई और पौधे लगाए। शौचालय नहीं था। इसलिए अपने पास से 30 हजार रुपए खर्च करके शौचालय बनवाया। बाद में ग्राम प्रधान द्वारा शौचालय की धनराशि दे दी गई, साथ ही इंटरलॉकिंग करा दी।

  • आठ वर्ष पूर्व पढ़ने के लिए विद्यालय में आते थे सिर्फ 9 ही बच्चे
  • जटनंगला के प्राइमरी स्कूल में वर्ष 2014 में सिर्फ 9 बच्चे पढ़ाई करने आते थे। जैसे जैसे स्कूल की हालत में सुधार हुआ, तो बच्चों की संख्या भी बढ़ गई। वैभव चौधरी ने बताया कि गांव के पांचवी कक्षा तक के सभी बच्चे हमारे यहां प्राइमरी स्कूल में ही शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उनका लक्ष्य है कि शिक्षा अनुशासन, सामान्य ज्ञान आदि में उच्च स्तरीय मुकाम हासिल कर इस स्थिति में लाया जाए कि अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला किसी कान्वेंट स्कूल में ना कराकर गांव के प्राथमिक विद्यालयों में ही कराएं।

वैभव चौधरी ने बताया कि नीति आयोग द्वारा पंजीकृत संस्था “प्राग्रथ” द्वारा विद्यालय को झूले और एक कंप्यूटर सेट बच्चों को इसी माह दिया जाएगा। वहीं यूनिसेफ के सौजन्य से प्रकाशित राज्य स्तरीय पत्रिका के प्रथम पृष्ठ पर भी विद्यालय के छाया चित्र को जगह मिली है। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रकाशित पत्रिका में विद्यालय के शौचालय के छायाचित्र को दिखाया गया है।

बिजनौर के हीरो लवी चौधरी का भव्य स्वागत

बिजनौर पहुंचने पर लवी चौधरी का हुआ भव्य स्वागत। डीएम ने लवी को बताया बिजनौर का हीरो। युवाओं से किया प्रेरणा लेने का आह्वान।

बिजनौर। जूनियर एशियाई वालीबॉल चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम के सदस्य लवी चौधरी का बिजनौर पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया। लवी चौधरी हरियाणा से सोमवार को बिजनौर लौटे।

ईरान के शहर तेहरान में आयोजित हुई जूनियर एशियाई वॉलीबॉल चैंपियनशिप में भारतीय टीम ने कांस्य पदक प्राप्त किया है। भारतीय टीम के सदस्य रहे ग्राम रहमापुर निवासी लवी चौधरी सोमवार को हरियाणा से बिजनौर पहुंचे। गंगा बैराज पर लवी चौधरी का भव्य स्वागत किया गया। वहां से ढ़ोल नगाड़ों की थाप पर भारत माता की जय और वन्दे मातरम के उद्घोष लगाते हुए नेहरु स्टेडियम पहुंचे। स्टेडियम में वालीबाल संघ की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया गया। नेहरु स्टेडियम में डीएम उमेश मिश्रा और एसपी दिनेश सिंह और एएसपी सिटी डा. प्रवीन रंजन सिंह ने लवी चौधरी का जोरदार स्वागत किया। नेहरू स्टेडियम में युवा खिलाड़ियों ने अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी लवी चौधरी और उनके कोच अजित चौधरी को कंधों पर उठा लिया और मैदान में लेकर पहुंचे। वहां सैकड़ों की संख्या में खिलाड़ी लवी चौधरी का इंतजार कर रहे थे। डीएम उमेश मिश्रा, एसपी दिनेश सिंह, एसडीएम रीतु चौधरी ने लवी चौधरी को फूलों की माला पहनाकर स्वागत किया। डीएम उमेश मिश्रा ने खिलाड़ियों से कहा कि लवी चौधरी से प्रेरणा लेकर जिले का नाम रौशन करें। डीएम ने खिलाड़ियों से लवी चौधरी को बिजनौर का हीरो बताते हुए जिले का नाम रौशन करने का आह्वान किया। डीएम ने कहा कि शिक्षा के साथ खेल जरुरी है। जिले में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। जिले के युवा अगर ठान लें तो हर क्षेत्र में नाम रौशन कर सकते हैं। युवा अपनी प्रतिभा को पहचानें और जिले के साथ देश का नाम रौशन करें। डीएम ने जिला क्रीड़ा अधिकारी जयवीर सिंह से खेलों को बढ़ावा देने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करने को कहा।

इस अवसर पर जिला क्रीड़ा अधिकारी जयवीर सिंह, बीएसए जयकरन यादव, वॉलीबाल कोच अजित तोमर, योगेन्द्र पाल सिंह योगी, मानव सचेदवा, निपेन्द्र देशवाल, विकास अग्रवाल, विकास सेतिया, पवन कुमार कृष्णा कालेज, चित्रा चौहान, अरविंद देशवाल आदि मौजूद रहे। बाद में गांव पहुंचने पर लोगों ने अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी लवी चौधरी को फूल मालाओं से लाद दिया। उनकी उपलब्धि पर गांव में खुशी का माहौल है और उनके घर पर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है। वहीं बताया गया है कि मंगलवार को कोतवाली देहात में लवी चौधरी का भव्य स्वागत किया जाएगा।

दलित, वंचित और शोषितों के मसीहा थे बाबू मंडल जी: चौधरी शैलेंद्र सिंह

अपना दल (एस) ने मनाई बाबू बीपी मंडल जी की जयंती।

बिजनौर। नजीबाबाद में अपना दल (एस) के क्षेत्रीय कार्यालय पर बाबू बीपी मंडल जी की जयंती मनाई गई। इस अवसर चौधरी शैलेंद्र सिंह एडवोकेट पूर्व चेयरमैन की उपस्थिति में एक सभा का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम मंडल जी के चित्र पर माल्यार्पण कर पुष्प अर्पित किये गए। शैलेंद्र चौधरी एडवोकेट ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मंडल जी ने बिहार के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में रहते हुए सामाजिक न्याय के लिए कार्य किया। बाबू जी दलित, वंचित और शोषितों के मसीहा थे। मंडल जी ने समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए जमीनी स्तर पर कार्य कर के समाज में एक चेतना को जागृत करने का काम किया। कार्यक्रम में सूर्य प्रताप सिंह जिलाध्यक्ष आईटी सेल, हिमांशु राजपूत जिला महासचिव, यशपाल एडवोकेट, नरेश चौहान, अमर सिंह कश्यप, नरेश सैनी, राजीव शर्मा, सुंदर सिंह, गोपाल पहलवान, भानु प्रताप आदि कार्यकर्ता मौजूद रहे।

नजीबाबाद में अपना दल (एस) के क्षेत्रीय कार्यालय पर बाबू बीपी मंडल जी की जयंती मनाते कार्यकर्ता

जनता को सुरक्षा का अहसास कराने खुद सड़क पर उतरे एसपी दिनेश

सड़कों पर पैदल मार्च कर एसपी ने जनता को दिलाया सुरक्षा का अहसासव्यापारियों, ठेले, रेहड़ी वालों और मुअज्जिज लोगों से किया संवाद स्थापित। एसपी के हाथ से टॉफी पाकर खिल उठे बच्चों के चेहरे।

बिजनौर। आगामी त्योहारों को सकुशल सम्पन्न कराने एवं जनपद की कानून व्यवस्था को सुदृढ करने के लिए पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह ने अभियान चला रखा है।

उन्होंने सभी थाना प्रभारियों को इस संबंध में सख्त दिशा निर्देश दे रखे हैं।एसपी खुद भी जनसामान्य से मिल कर पुलिस का इकबाल बुलंद करने में जुटे हुए हैं। यही वजह है कि उनके मिलनसार व्यवहार से आमजन भी उनका मुरीद बना  हुआ है।

इसी क्रम में पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह व क्षेत्राधिकारी चांदपुर सुनीता दहिया ने चांदपुर क्षेत्र में पुलिस फोर्स के साथ पैदल गश्त की।

इस दौरान व्यापारियों, फल व्यापारी, रेहड़ी वालों व संभ्रांत लोगों से संवाद स्थापित किया। यही नहीं रास्ते में मिले बच्चों को टॉफी चॉकलेट भी दी। बड़े ही नहीं बल्कि बच्चे भी उनके व्यवहार से अभिभूत हो गए। एसपी की इस कार्यप्रणाली से आमजन में सुरक्षा का एहसास बरकरार बना हुआ है।

साहित्य की ‘सरस्वती’ के इतिहास में 20 अगस्त

20 अगस्त : तारीख जो तवारीख बन गई

साहित्य की ‘सरस्वती’ के इतिहास में 20 अगस्त का अपना अलग ही महत्व है। साहित्य की इस ‘सरस्वती’ का उद्गम 20 अगस्त 1899 को ही हुआ था। वैसे, उद्गम का अर्थ स्थान से जोड़ा जाता है लेकिन साहित्य की ‘सरस्वती’ के उद्गम का अर्थ यहां तारीख से है। यह वही तारीख है जो आधुनिक हिंदी साहित्य की तवारीख बन गई। इसी दिन इंडियन प्रेस (प्रयागराज) के संस्थापक-स्वामी बाबू चिंतामणि घोष ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा को सचित्र मासिक पत्रिका के प्रकाशन संबंधी पत्र भेजकर संपादन का भार संभालने का प्रस्ताव दिया था। इस पत्र में पत्रिका के शीर्षक का कोई उल्लेख नहीं था। मासिक पत्रिका का नाम ‘सरस्वती’ कैसे पड़ा? यह अब तक रहस्य ही है।
1893 में स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा हिंदी के प्रचार- प्रसार में सक्रिय में सक्रिय थी। 7 वर्षों में वह हिंदी को स्थापित करने में कई सफलताएं भी अर्जित कर चुकी थी। दस्तावेज देखने से पता चलता है कि इंडियन प्रेस के सचित्र मासिक पत्रिका के प्रकाशन संबंधी प्रस्ताव को नागरी प्रचारिणी सभा ने पहले- पहल बहुत गंभीरता से नहीं लिया। श्री गोविंददास जी के सभापतित्व में 21 अगस्त 1899 को संपन्न हुए सभा के साधारण अधिवेशन के कुल 25 विचारणीय विषयों में इंडियन प्रेस के सचित्र मासिक पत्रिका के प्रकाशन का विषय 23वें नंबर पर था। 24वें नंबर पर चार पुस्तकों के प्रकाशन संबंधी सूचना और अंतिम विषय के रूप में सभापति का धन्यवाद प्रस्ताव। इसी से स्पष्ट है कि मासिक पत्रिका के प्रकाशन का प्रकरण सभा के लिए कितना महत्वपूर्ण था? नागरी प्रचारिणी सभा के साधारण अधिवेशन में इंडियन प्रेस का यह पत्र विचारार्थ प्रस्तुत तो किया गया लेकिन कार्य अधिक होने के कारण उस दिन उस पत्र पर कोई विचार नहीं किया जा सका। सभा की कार्यवाही में लिखा गया-“(23) इंडियन प्रेस का 20 अगस्त का सचित्र मासिक पत्र संबंधी पत्र सभा में उपस्थित किया गया। आज्ञा हुई कि आगामी अधिवेशन में विचारार्थ उपस्थित किया जाए।”
11 सितंबर 1899 को श्री गोविंददास जी की ही अध्यक्षता में ही संपन्न हुए अधिवेशन में इंडियन प्रेस के पत्रिका प्रकाशन संबंधी प्रस्ताव पर निर्णय लिया गया- ‘इंडियन प्रेस के 20 अगस्त के मासिक सचित्र पत्र संबंधी पत्र पर निश्चय हुआ कि सभा उस पत्र के संपादन करने का वा उसके संबंध में और किसी कार्य का भार अपने ऊपर नहीं ले सकती है परंतु इंडियन प्रेस को सम्मति देती है कि वह उस पत्र को अवश्य निकालें क्योंकि उससे भाषा के उपकार की संभावना है और यदि इंडियन प्रेस के स्वामी चाहे तो सभा उन्हें ऐसे कुछ लोगों के नाम बता सकती है जो संपादक का कार्य करने के उपयुक्त हों। वे उनसे सब बातें स्वयं निश्चय कर लें’। सभा ने मासिक पत्र के प्रकाशन पर अपनी सम्मति तो दी लेकिन संपादन संबंधी कार्यभार स्वीकार नहीं किया लेकिन इंडियन प्रेस के संस्थापक बाबू चिंतामणि घोष ने हार नहीं मानी। वह जानते थे कि प्रस्तावित पत्रिका की सफलता के लिए सभा का सहयोग नितांत आवश्यक है। उन्होंने अपना प्रयत्न जारी रखा और 14 अक्टूबर को पुनः एक मासिक पत्र प्रकाशन संबंधी प्रस्ताव नागरी प्रचारिणी सभा के समक्ष प्रस्तुत किया।
इस नए प्रस्ताव पर 13 नवंबर 1899 को पंडित सुदर्शनदास जी के सभापतित्व में संपन्न हुए नागरी प्रचारिणी सभा के साधारण अधिवेशन में प्रस्तावित मासिक पत्र के लिए संपादक समिति बनाने पर निर्णय लिया गया। सभा की साधारण सभा ने क्रमशः बाबू श्यामसुंदर दास, बाबू राधा कृष्ण दास, बाबू जगन्नाथ दास, बाबू कार्तिक प्रसाद खत्री और पंडित किशोरी लाल गोस्वामी के नाम संपादक समिति के लिए प्रस्तावित किए। अपने प्रयासों की शुरुआती सफलता से उत्साहित बाबू चिंतामणि घोष ने डेढ़ माह में ही सचित्र मासिक पत्रिका के प्रकाशन की व्यवस्था सुनिश्चित की। इस तरह 1 जनवरी 1900 को सरस्वती का जन्म हुआ। उद्गम के साथ ही ‘सरस्वती’ के मुख्य पृष्ठ पर संपादक समिति के सदस्यों के नाम इस क्रम से प्रकाशित किए गए-
बाबू कार्तिक प्रसाद खत्री
पंडित किशोरी लाल गोस्वामी
बाबू जगन्नाथदास बीए
बाबू राधा कृष्ण दास
बाबू श्यामसुंदर दास बीए
सरस्वती के मुख्य पृष्ठ पर संपादक समिति के इन सदस्यों के नाम के ठीक ऊपर ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अनुमोदन से प्रतिष्ठित’ भी बड़े- बड़े अक्षरों में छापा गया। सरस्वती के 1 वर्ष पूर्ण होने पर 12वें अंक में बाबू चिंतामणि घोष का प्रकाशकीय वक्तव्य (पृष्ठ 399) पर ‘प्रकाशक का निवेदन’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। प्रकाशक का यह निवेदन बताता है कि उस समय हिंदी की मासिक पत्रिका निकालना कितने जोखिम का काम था। वह लिखते हैं-‘इसे नष्ट करने के लिए उतारू इतने ही लोगों के कटाक्षों की वज्रवर्षा भी होती रही।’
सरस्वती के दूसरे वर्ष के प्रथम अंक से संपादन संबंधी दायित्व संपादक समिति के स्थान पर अकेले बाबू श्यामसुंदरदास जी ने संभाला। दो वर्ष तक अकेले सरस्वती का संपादन करने के बाद बाबू श्यामसुंदर दास ने व्यस्तता के चलते अपने को संपादन कार्य से अलग कर लिया। दिसंबर 1902 के अंतिम अंक के आरंभ में उन्होंने अपना वक्तव्य ‘विविध वार्ता’ शीर्षक से प्रकाशित किया। उन्होंने लिखा- ‘इस मास की संख्या के साथ सरस्वती का तीसरा वर्ष पूरा होता है। पहले वर्ष से लेकर आज तक मेरा संबंध इस पत्रिका से घनिष्ट बना रहा। पहले वर्ष में एक समिति इस पत्रिका का संपादन करती रही और मैं भी उस समिति का सभासद रहा। दूसरे और तीसरे वर्ष में इसके संपादन का भार पूरा-पूरा मेरे ऊपर रहा परंतु चौथे वर्ष के प्रारंभ से यह कार्य हिंदी के प्रसिद्ध लेखक पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के अधीन रहेगा। इस परिवर्तन का मुख्य कारण यह हुआ कि मैं समय के अभाव से सरस्वती के संपादन में इतना दत्त चित्त न रह सका जितना कि मुझे होना उचित था। इसलिए केवल नाम के लिए संपादक बना रहना मैंने उचित नहीं समझा परंतु मैं अपने पाठकों और पत्रिका के लिए को विश्वास दिलाता हूं कि यद्यपि आगामी संख्या से मैं इसका संपादक न रहूंगा पर इस पत्रिका के साथ मेरी वैसी ही सहानुभूति बनी रहेगी जैसी अब तक रही और मैं सदा इसकी उन्नति से पसंद होऊंगा। अंत में मुझे अपने उन मित्रों से प्रार्थना करनी है जो लेखों के द्वारा 3 वर्ष तक मेरी सहायता करते रहे। आशा है कि वह अगले वर्ष में भी इसी प्रकार सहायता करते रहेंगे। अब भविष्य में सरस्वती में प्रकाशनार्थ सब लेख परिवर्तन के संवाद पत्र तथा समालोचनार्थ पुस्तक आदि निम्नलिखित पते से भेजे जाने चाहिए-
पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी
संपादक सरस्वती,
झांसी।
पत्रिका का प्रबंध तथा मूल्य संबंधी पत्र व्यवहार पूर्ववत प्रयाग के इंडियन प्रेस से ही रहेगा।’
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादकत्व में निकलने वाली सरस्वती से वर्ष 1903 से लेकर 1905 तक अर्थात 3 वर्ष तक सभा का अनुमोदन संबंध यथावत रहा लेकिन कुछ अपरिहार्य कारणों से सभा को सरस्वती पत्रिका पर से अपना अनुमोदन हटाना पड़ा। वर्ष 1905 में प्रकाशित सभा के वार्षिक विवरण पत्र में इस संबंध में दर्ज है-
‘मासिक पत्रों में अब सबसे श्रेष्ठ सरस्वती है। यद्यपि कई कारणों से अब इस पत्रिका के साथ सभा का कोई संबंध नहीं है पर यह सभा इस पत्रिका की उन्नति देखकर प्रसन्न होती है। सरस्वती में सब प्रकार के लोगों की रूचि के अनुसार सरल भाषा में लेखों के रहने से इसका आदर दिनोंदिन बढ़ता जाता है। सभा को दुख है कि सरस्वती के प्रकाशक ने उसमें अपवादपूर्ण लेखों का रोकना उचित न जानकर सभा से अपना संबंध तोड़ना उचित समझा परंतु सभा को विश्वास है कि इस पत्रिका द्वारा हिंदी का हित निरंतर साधन होता रहेगा।’

काशी नागरी प्रचारिणी सभा का 5 वर्षों तक ‘सरस्वती’ के उत्थान में निरंतर सहयोग और साथ आधुनिक हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण परिघटना के रूप में देखी जाती है। माना भी जाता है कि अगर ‘सरस्वती’ प्रकट न हुई होती तो हिंदी और हिंदी साहित्य इस रूप में हम सबके सामने तो और न ही होता।

सरस्वती के पूर्व संपादक
बाबू श्यामसुंदर दास
किशोरी लाल गोस्वामी
बाबू कार्तिक प्रसाद खत्री
जगन्नाथदास रत्नाकर
बाबू राधा कृष्ण दास
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
पंडित देवी दत्त शुक्ल
पंडित उमेश चंद्र मिश्र
पंडित देवी दयाल चतुर्वेदी मस्त
पंडित देवी प्रसाद शुक्ल
पंडित श्री नारायण चतुर्वेदी ‘भैया साहब’
नितीश कुमार राय

प्रोफेसर देवेंद्र कुमार शुक्ला

पूर्व संयुक्त संपादक
ठाकुर श्री नाथ सिंह
श्रीमती शीला शर्मा

पंडित बलभद्र प्रसाद मिश्र

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

खास उपलब्धियों पर एसपी सिटी का सम्मान

बिजनौर। एसपी सिटी डॉ प्रवीण रंजन सिंह को पुलिस व्यवस्था दुरुस्त बनाए रखने तथा उनके नेतृत्व में यूपी 112 के प्रदेश में आठवां स्थान प्राप्त करने पर मानव अधिकार वेलफेयर संगठन द्वारा सम्मानित किया गया।

मानव अधिकार वेलफेयर संगठन के जिला अध्यक्ष (युवा प्रकोष्ठ) मौ. शाकिर के नेतृत्व में सभी पदाधिकारी मंगलवार को एसपी कार्यालय पहुंचे। उन्होंने एसपी सिटी डॉ प्रवीण रंजन सिंह से उनके कार्यालय में मुलाकात करते हुए कहा कि जनपद के शहरी क्षेत्र में उनके नेतृत्व में पुलिस व्यवस्था चाक-चौबंद बनी हुई है। अपराधियों के खिलाफ पुलिस कड़ी कार्रवाई कर रही है। ऐसे में जनता को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने में उनका योगदान बेहद सराहनीय है। इसके साथ ही उनके नेतृत्व में यूपी 112 ने अपने फर्ज को बेहतरीन तरह से अंजाम देते हुए पूरे प्रदेश में आठवां स्थान हासिल किया है। यूपी 112 के नोडल अधिकारी के रूप में वह भी शामिल थे। यह उनकी शानदार उपलब्धि है।

इस अवसर पर एसपी सिटी ने संगठन के सभी पदाधिकारियों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस प्रशासन लगातार सहयोग देते हैं। एसपी को सम्मानित करने वालों में उत्तर प्रदेश मानव अधिकार वेलफेयर संगठन जिला अध्यक्ष नदीम अहमद, सलीम अहमद, मौ.आसिफ, ऋषभ भाटिया, सचिव अफजाल अहमद, जिला उपाध्यक्ष मुस्तकीम अहमद आदि शामिल रहे।

कारगिल विजय दिवस के 23वें वार्षिक समारोह में सैन्य अधिकारी, वीर नारियों व आश्रितों का सम्मान

कारगिल विजय दिवस के 23वें वार्षिक समारोह में सैन्य अधिकारी, वीर नारियों व आश्रितों का सम्मान

15 अगस्त तक शहीदों के ग्रामों व मोहल्लों में आयोजित किये जाएं कार्यक्रम-जिलाधिकारी

बिजनौर। कारगिल विजय दिवस के 23वें वार्षिक समारोह का आयोजन नूरपुर रोड स्थित भारत बैंकट हॉल में किया गया। मुख्य अतिथि जिलाधिकारी उमेश मिश्रा ने कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्जवलन कर किया। जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने 15 सैन्य अधिकारियों, शहीद सैनिकों की वीर नारियों व आश्रितों को शॉल भेट कर सम्मानित किया। जिलाधिकारी ने पुष्प अर्पित कर कारगिल शहीदों को भावभीनी श्रद्वांजलि भी अर्पित की। जिलाधिकारी ने शहीदों व वीर नारियों व उनके परिवारजनों को नमन किया।

60 दिन तक चले कारगिल युद्व के विजय दिवस 26 जुलाई के 23वें वार्षिक समारोह के आयोजन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए जिलाधिकारी ने कहा कि हम सौभाग्यशाली हैं कि उस देश में निवास करते है जहां देश प्रेम व देश के लिये कुछ कर गुजरने, देश के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने की क्षमता, भावना व भाव देश के लोगों में है। उन्होंने कहा कि देश के वीरों ने देश के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर कर बलिदान दिया उनके बलिदान व उनके परिवार का योगदान को शब्दों में नहीं बताया जा सकता।

उन्होंने कहा कि हम सब को गर्व होना चाहिये कि हम ऐसे देश में निवास करते हैं जहां राष्ट्रहित व राष्ट्रप्रेम सर्वोपरि है और हम सभी लोग एकजुट होकर के इस देश की एकता व अखण्डता को बनाये रखने के लिये अपना सर्वस्व देने के लिये तैयार हैं। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम दो जगह आयोजित किया जा रहा था लेकिन उनके सुझाव व अनुरोध पर यह एक ही जगह आयोजित किया जा रहा है जिसमें सभी लोग मिलकर कारगिल विजय दिवस मना रहे हैं।

जिलाधिकारी ने कहा कि शहीदों के ग्रामों व शहीद स्थलों पर निरन्तर इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित हों।। उन्होंने कहा कि ऐसे ग्रामों में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से लोगों को लाभ पहुंचाया जाए तथा विकास के मापदण्डों पर खरा उतारा जाए तथा ऐसे ग्रामों को आदर्श ग्राम बनाया जाए। उन्होंने कहा कि आजादी के 75वें वर्ष पर आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। उन्होंने कहा कि शहीदों के ग्रामों व मोहल्लों में 15 अगस्त तक कार्यक्रम आयोजित किये जाएं ताकि भावी पीढी में यह भाव जागरूक हो कि बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता है।

पुलिस अधीक्षक दिनेश सिंह ने कहा कि वह इस कार्यक्रम में प्रतिभाग कर गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने प्रसिद्व कवि माखनलाल चतुर्वेदी की फूल की अभिलाषा की पक्तियों को उदृत कर अपने विचार व्यक्त किये।

शॉल भेंट कर किया सम्मानित
जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक ने कीर्ति चक्र प्राप्त मेजर सुशील कुमार सिंह, सिपाही मौ0 अरशद सहित 15 शहीद सैनिकों की वीर नारियों व आश्रितों को शॉल भेंट कर सम्मानित किया। इस अवसर पर आर्य जी, दिव्या त्यागी ने देश भक्ति का गीत व स्कूली बच्चों ने नाटिका प्रस्तुत की। कार्यक्रम में मुख्य विकास अधिकारी पूर्ण बोरा, 30 एनसीसी सीओ कर्नल आर0एस0 चौहान, डा0 पंकज त्यागी, डा0 अवधेश वशिष्ठ, जिला सैनिक कल्याण अधिकारी सेवानिवृत्त कैप्टन ए0के0 गुप्ता, सेना के अधिकारी, वीर नारियां व परिवारजन तथा एनसीसी कैडिट, स्कूली बच्चे आदि उपस्थित रहे।

वर्दी के पीछे धड़कता मासूम सा दिल

मानवता की बेहतरीन मिसाल कायम कर रहे आजमगढ़ के एएसपी सिटी

दीपक कुमार की विशेष रिपोर्ट 

लखनऊ। कहते हैं मानवता की सेवा करने के लिए दिल में  जज्बातों की जरूरत होती है। इसके लिए समय और धन जरूरी तो हैं लेकिन प्राथमिक नहीं माने जा सकते। आज के आपाधापी भरे दौर में जब इंसान अपने सगे संबंधियों तक से दूरी बनाए रहता है, ऐसे में एएसपी सिटी के पद पर आजमगढ़ में तैनात शैलेन्द्र लाल मानवता की बेहतरीन मिसाल कायम कर रहे हैं।


एक विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि उन्हें हमेशा से ही पशु पक्षी और प्रकृति से लगाव रहा है। मेरे यहां बगीचा है, साग सब्जी होती है। बंदर उनका कुछ भी नुकसान नहीं करते। एक फूल भी नहीं तोड़ते। जो साग सब्जी होती है, हम और बंदर के लिए काफी हो जाती है; दोनों खुश…।

जनपद लखीमपुर खीरी में तैनाती के दौरान उनके घर के बाहर कई गाय व कुत्ते आदि आते थे, इसलिए उनके लिए वे घर के बाहर चारा / खाना और पानी रखने लगे। यही नहीं चिड़ियों के लिए भी दाना और पानी की भरपूर व्यवस्था रहती।
उन्हें हमेशा से ही पशु पक्षियों के प्रति बेहद लगाव रहा है।  सहारनपुर में तैनाती के दौरान उन्होंने अलग-अलग किस्म के चार कुत्ते भी पाल रखे थे।


जब पोस्टिंग नोएडा में हुई, तब भी कई जानवर उनके घर आते थे। इस दौरान एक बंदर ने दोस्ती कर ली। वह घर आता था और जब पत्नी सब्जी लेने जाती थी तो कांधे पर आके बैठा जाता था।

यहां यह बताना भी समीचीन होगा कि इनकी गिनती एक तेज तर्रार पुलिस अधिकारी के तौर पर होती है। जनपद मुख्यालय बिजनौर के मोहल्ला जाटान में वर्ष 2014 में हुए बम विस्फोट कांड के दौरान सीओ सिटी रहे शैलेन्द्र लाल को एक तेज तर्रार पुलिस अफसर के तौर पर जाना पहचाना जाता है। सूचना मिलते ही घटनास्थल पर तत्काल वह न केवल खुद पहुंचे, बल्कि घटना के संबंध में पूरी जानकारी भी जुटाई। मामला बेहद ही खूंखार आतंकवादी संगठन सिमी से जुड़ा हुआ था।

अब फोटोज देखकर उनके पशु एवं प्रकृति प्रेम के प्रति कुछ भी कहना, लिखना बेमानी ही होगा। किस कदर अकेले एक बंदर हो या झुंड में परिवार सहित…बड़े प्रेम से खाते पीते हैं और चले जाते हैं। किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं करते।

परिचयमूल रूप से जनपद उरई जालौन निवासी इनके पिता यूपी कैडर 1971 बैच के आईपीएस अफसर थे, लिहाजा इनकी अधिकांश पढ़ाई हॉस्टल में रहकर ही हुई। सेंट जोसेफ कॉलेज नैनीताल से कक्षा 10 तक पढ़ने के बाद उन्होंने डीपीएस आरकेपुरम नई दिल्ली से इंटरमीडिएट किया। दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। बिजनौर में तैनाती के दौरान विवेक कॉलेज में एडमिशन लेकर रुहेलखंड विश्वविद्यालय से एलएलबी कंप्लीट किया। पत्नी दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत करती हैं जबकि पुत्री जर्मनी में जॉब कर रही है। इनके बेटे का सेलेक्शन आईबी में असिस्टेंट इंटेलिजेंस ऑफिसर के तौर पर हुआ है। परिवार प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रहता है।

टॉप 10 में शामिल बिजनौर की UP 112

सराहनीय कार्य यू0पी0-112, जनपद बिजनौर
बिजनौर। जनपद की यू0पी0-112 पीआरवी को प्रदेश में आठवां स्थान मिला है। इसी के साथ जनपद शीर्ष-10 में भी शामिल हुआ है।

जनपद बिजनौर के पुलिस अधीक्षक डॉ0 धर्मवीर सिंह के दिशा-निर्देशन व डॉ0 प्रवीन रंजन सिंह, अपर पुलिस अधीक्षक नगर/नोडल अधिकारी यू0पी0-112 के निकट पर्यवेक्षण तथा रजी अहमद, प्रभारी निरीक्षक यू0पी0-112 के कुशल नेतृत्व में जनपद बिजनौर की पीआरवी द्वारा प्रचलित माह जून-2022 में इवेंट में Dispatch, Acknowledge Enroute, Arrive, ATR की समस्त कार्यवाही में न्यूनतम समय लिया गया है।

प्रचलित माह जून-2022 में औसत रिस्पोंस टाइम 10 मिनट से भी कम रहा है, इसके अतिरिक्त Wrong Arrival तथा Preempt की संख्या भी न्यूनतम पायी गयी है। पुलिस मुख्यालय, लखनऊ द्वारा प्रदेश में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले शीर्ष 10 जनपदों में जनपद बिजनौर का नाम सम्मिलित किया गया है तथा जनपद बिजनौर का प्रचलित माह जून-2022 में अष्टम स्थान (08वीं रैंक) हेतु चयनित किया गया है।

श्री अशोक कुमार सिंह, अपर पुलिस महानिदेशक यू0पी0-112 लखनऊ द्वारा जनपद बिजनौर यू0पी0-112 पीआरवी द्वारा इस प्रकार लगनशील एवं तत्परता पूर्वक कार्य करने की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी तथा इस सराहनीय कार्य के लिये डॉ0 धर्मवीर सिंह, पुलिस अधीक्षक जनपद बिजनौर को पीआरवी गाडी का मॉड्यूल व श्री रजी अहमद, प्रभारी निरीक्षक यू0पी0-112 को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया।

अग्निवीर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी

अग्निवीर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी, 8वीं पास भी कर सकेंगे अप्‍लाई

नई दिल्ली (एजेंसी)। अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीर भर्ती रैली के लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया है। भारतीय सेना ने नोटिफिकेशन में कहा है कि ट्रेनिंग पीरियड सहित चार साल की सेवा अवधि के लिए उम्मीदवारों को नामांकित किया जाएगा। इसके तहत उम्‍मीदवारों को ऑनलाइन रजिस्‍ट्रेशन करना अनिवार्य है। इसके बाद भारतीय सेना की आधिकारिक वेबसाइट joinindianarmy.nic.in पर विजिट करना होगा।

अग्निवीर सेना अधिनियम, 1950 के अधीन होंगे। ऐसे में उन्हें भूमि, समुद्र या वायु मार्ग से कहीं पर भी आने जाने के लिए उत्तरदायी माना जाएगा। नोटिफिकेशन के मुताबिक, उम्मीदवारों की भर्ती चार सालों के लिए होगी। इस दौरान हर साल उन्हें 30 दिन की छुट्टी भी मिलेगी। सेवा के पहले साल 30 हजार रुपए, दूसरे साल 33 हजार रुपए, तीसरे साल 36,500 रुपए और आखिरी साल यानी चौथे साल 40 हजार रुपए वेतन तथा भत्ते दिए जाएंगे।

नोटिफिकेशन के अनुसार, भर्तियां पूरी तरह से उपलब्ध रिक्तियों के आधार पर मेरिट आधारित होंगी। केवल भर्ती प्रक्रिया में पास होने वाले उम्मीदवारों को सेना में भर्ती का दावा करने का कोई अधिकार नहीं होगा। यह भी कहा गया है कि जिन उम्मीदवारों के पास जरूरी सर्टिफिकेट नहीं होंगे, वे खुद रिजेक्शन के लिए उत्तरदायी होंगे।

NCC सर्टिफिकेट धारकों को मिलेंगे बोनस मार्क्स
सभी पदों पर भर्ती के लिए NCC-A सर्टिफिकेट धारकों को 05 बोनस मार्क्स मिलेंगे। NCC-B सर्टिफिकेट धारकों को 10 बोनस अंक मिलेंगे जबकि NCC-C सर्टिफिकेट धारकों को 15 बोनस अंक मिलेंगे। अग्निवीर जनरल ड्यूटी और क्‍लर्क/स्‍टोरकीपर पदों के लिए NCC-C सर्टिफिकेट धारकों को CEE (कॉमन एंट्रेंस एग्‍जाम) से छूट मिलेगी।

Indian Army Agniveer Requirement Notification Out Know Eligibility Process  Application Date Here joinindianarmy.nic.in Sarkari Naukri - Agniveer  Recruitment: भारतीय सेना ने जारी की अग्निवीर भर्ती रैली की ...

पद जिनके लिए होगी भर्ती
भारतीय सेना द्वारा जारी किए गए नोटिफिकेशन के मुताबिक, ‘अग्निवीर जनरल ड्यूटी, अग्निवीर टेक्निकल, अग्निवीर टेक्निकल (एविएशन/ एम्युनिशन एग्जामनर), अग्निवीर क्लर्क/स्टोर कीपर टेक्निकल, अग्निवीर ट्रेडमैन 10 वीं पास और अग्निवीर ट्रेड्समैन 8 वीं पास के लिए संबंधित एआरओ द्वारा जुलाई 2022 से रजिस्ट्रेशन ओपन होगा।’ यानी कि इन पांच ट्रेड्स पर भर्ती होनी है।

जरूरी योग्यताएं
– जनरल ड्यूटी के लिए उम्मीदवारों के पास में 45 फीसदी अंकों के साथ में 10वीं पास की योग्यता होनी चाहिए।
– अग्निवीर तकनीकी (विमानन/गोला-बारूदपरीक्षक) के लिए फिजिक्स, केमेस्ट्री, मैथ्स और इंग्लिश सब्जेक्ट में 50 फीसदी अंकों के साथ में 12वीं पास।
– क्लर्क/ स्टोरकीपर पदों के लिए 60 फीसदी अंकों के साथ 12वीं पास की योग्यता। अंग्रेजी और गणित में 50 फीसदी अंक जरूरी।
– ट्रेड्समैन के लिए 10वीं और 8वीं पास उम्मीदवारों की अलग-अलग भर्ती होगी। आवेदक के सभी विषयों में 33 फीसदी अंक होने चाहिए।

नियम और शर्तें
-अग्निवीरों को सेना अधिनियम 1950 के तहत 4 वर्ष की सेवा अवधि के लिए नामांकित किया जाएगा।
-आवेदकों की आयुसीमा 17.5 वर्ष से 23 वर्ष के बीच होनी चाहिए।
-अग्निवीरों को आदेश के अनुसार थल, जल और वायु कहीं भी भेजा जा सकेगा।
-नामांकित अग्निवीर किसी भी तरह की पेंशन या ग्रेच्युटी के पात्र नहीं होंगे।
-सभी अग्निवीरों को चार वर्ष की सेवा पूरी होने पर सेवामुक्त कर दिया जाएगा।
– सेवा मुक्ति के समय उन्हें सेवा नीधि दी जाएगी।

सर्विस के बाद
चार साल की सर्विस पूरी होने के बाद अग्निवीरों को सेवा निध‍ि पैकेज, अग्निवीर स्किल सर्टिफिकेट और कक्षा 12वीं के समकक्ष योग्‍यता प्रमाणपत्र भी मिलेगा। जो उम्‍मीदवार 10वीं पास हैं उन्‍हें 4 साल के बाद 12वीं समकक्ष पास सर्टिफिकेट भी मिलेगा जिसकी पूरी जानकारी बाद में जारी की जाएगी।

आम जवानों जैसी सहूलियत, एक करोड़ का बीमा

अग्निपथ पर चले अग्निवीरों को आम जवानों जैसी सहूलियत, एक करोड़ का बीमा

नई दिल्ली। अग्निपथ योजना के विरोध में चल रहे प्रदर्शन से निपटने के लिए बैठकों का दौर लगातार जारी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए तीनों सेनाओं के प्रमुख दृढ़ता से डटे हुए हैं। रविवार को रक्षा मंत्रालय ने एक अहम प्रेस कांफ्रेंस में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया कि अग्निपथ स्कीम रोलबैक नहीं होगी। यह भी बताया कि अग्निवीर के जरिए भारतीय सेना में किस तरह से जोश और होश का संतुलन बनाने की योजना है।

अब सभी रिक्रूटमेंट केवल अग्निवीर से- प्रेस कांफ्रेंस के दौरान मौजूद वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया कि सेना में अब सभी रिक्रूटमेंट केवल अग्निवीर के तहत ही होंगे। उन्होंने कहा कि जिन्होंने पहले अप्लाई किया था, उनके लिए एज लिमिट बढ़ा दी गई है। सभी को नए सिरे से अप्लाई करना होगा। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि वैकल्पिक भर्ती की कोई योजना नहीं है ।

सैन्य मामलों के विभाग के अतिरिक्त सचिव लेफ्टिनेंट जनरल अरुण पुरी ने कहा कि यह योजना काफी विचार-विमर्श करके लाई गई है। इस योजना का उद्देश्य युवाओं के जोश-होश के बीच तालमेल बनाना है। उन्होंने कहा कि अग्निपथ योजना युवाओं के लिए फायदेमंद है। सभी अग्निवीरों को आम जवानों की तरह फायदे मिलेंगे। उन्होंने कहा कि आज की तुलना में अग्निवीरों को ज्यादा अलाउंस मिलेगा। उन्होंने कहा कि दो साल से इस योजना पर चर्चा चल रही थी। अरुण पुरी ने कहा कि हर साल लगभग 17,600 लोग तीनों सेवाओं से समय से पहले सेवानिवृत्ति ले रहे हैं। किसी ने कभी उनसे यह पूछने की कोशिश नहीं की कि वे सेवानिवृत्ति के बाद क्या करेंगे? उन्होंने कहा कि यह योजना युवाओं के भविष्य के लिए सोच-समझकर उठाया गया कदम है। इन सब के बीच भारतीय वायुसेना ने अग्निपथ योजना के तहत भर्ती करने के लिए विवरण जारी किया है। इस विवरण में वायुसेना ने बताया है कि अग्निपथ सशस्त्र बलों के लिए एक नई मानव संसाधन प्रबंधन योजना है। इस योजना के माध्यम से शामिल किए गए उम्मीदवारों को अग्निवीर कहा जाएगा। इनकी भर्ती वायुसेना अधिनियम 1950 के तहत चार वर्षों के लिए की जाएगा।

अभी है योजना की शुरुआत

लेफ्टिनेंट जनरल पुरी ने कहा कि अभी योजना के शुरू में 46000 अग्निवीरों की भर्ती की जा रही है, यह क्षमता अभी और बढ़ेगी। अगले 4-5 सालों में यह संख्या 50,000-60,000 होगी और फिर इसे 90 हजार से बढ़ाकर एक लाख किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सेना की योजना में 1.25 लाख तक अग्निवीरों की भर्ती की जाएगी। इस प्रकार से यदि 25 फीसदी को परमानेंट रखा जाएगा तो ऑटोमैटिकली 46,000 अग्निवीर परमानेंट रूप से भर्ती होंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई अग्निवीर देशसेवा के दौरान शहीद होता है उसे एक करोड़ रुपए की आर्थिक मदद मिलेगी।

FIR है दर्ज तो नहीं बन सकेंगे अग्निवीर

केंद्र सरकार की ओर से तीनों सेनाओं में भर्ती के लिए लाई गई अग्निपथ योजना के विरोध के बीच सेना की ओर से उम्मीदवारों को साफतौर पर चेतावनी देते हुए कहा गया है कि अगर उनके खिलाफ FIR दर्ज होती है तो वह ‘अग्निवीर’ नहीं बन सकेंगे। सेना ने कहा कि भर्ती में शामिल होने वाले हर उम्मीदवार को लिखित में यह बताना होगा कि वो अग्निपथ योजना के विरोध के दौरान हिंसा और तोड़फोड़ करने वालों में शामिल नहीं थे। सैन्य मामलों के विभाग के अतिरिक्त सचिव लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने कहा कि उम्मीदवारों को एक लिखित प्रमाण पत्र देना होगा कि वे विरोध या तोड़फोड़ का हिस्सा नहीं थे। पुरी ने कहा कि भारतीय सेना की नींव में अनुशासन है। आगजनी या तोड़फोड़ के लिए कोई जगह नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को एक प्रमाण पत्र देना होगा कि वे विरोध या तोड़फोड़ का हिस्सा नहीं थे। पुलिस सत्यापन अनिवार्य है, इसके बिना कोई भी शामिल नहीं हो सकता है।

सेना में अनुशासनहीनता के लिए कोई जगह नहीं

लेफ्टिनेंट जनरल पुरी ने आगे कहा अगर किसी उम्मीदवार के खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज की जाती है तो वे सेना में शामिल नहीं हो सकते। सशस्त्र बलों में अनुशासनहीनता के लिए कोई जगह नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से मंगलवार को योजना के ऐलान के बाद बुधवार को बिहार में अग्निपथ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था।

वायुसेना में कब से शुरू होगी Agniveer भर्ती ?

एयर मार्शल एसके झा ने बताया कि पहले बैच के अग्निवीर भर्ती के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया 24 जून 2022 से शुरू से होगी। इस बैच के लिए फेज-1 की ऑनलाइन परीक्षा 24 जुलाई से शुरू होगी। वहीं पहले बैच की ट्रेनिंग के लिए रजिस्ट्रेशन दिसंबर में शुरू होंगे और इस प्रक्रिया को 30 दिसंबर तक पूरा कर लिया जाएगा।

नौसेना में Agniveer भर्ती के आवेदन 21 नवंबर से वाइस एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने बताया कि पहले नवल अग्निवीर 21 नवंबर 2022 से ओडिशा स्थिति आईएनएस चिल्का में ट्रेनिंग के लिए पहुंचना शुरू कर देंगे। नौसेना में महिला और पुरुष दोनों अग्निवीरों की भर्ती की जाएगी। उन्होंने बताया कि नौसेना में पहले से ही विभिन्न जहाजों में 30 महिला अधिकारी तैनात हैं। ऐसे में नौसेना ने अग्निपथ योजना के तहत भी महिला अग्निवीरों की भर्ती का फैसला किया है।

भारत से पहले कई देशों में भी लागू है सेना में “टूर ऑफ ड्यूटी” सिस्टम, अग्निवीरों के लिए CAPFs और असम राइफल्स में भर्ती के लिए आरक्षण

भारत से पहले निम्नलिखित देशों में भी लागू है – सेना में “टूर ऑफ ड्यूटी” सिस्टम, लेकिन इन देशों में अनिवार्य है, भारत में इसे स्वेच्छिक रखा गया है

अग्निवीरों के लिए CAPFs और असम राइफल्स में भर्ती के लिए आरक्षण

नई दिल्ली: अग्निपथ योजना (Agnipath Scheme) के तहत भर्ती होने वाले युवाओं की अधिकतम उम्र की सीमा को 21 साल से बढ़ाकर 23 वर्ष करने के फैसले के एक दिन बाद केंद्र सरकार ने शनिवार को एक और बड़ा एलान किया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय (HMO India) ने अपने नए आदेश में अग्निवीरों के लिए CAPFs और असम राइफल्स में भर्ती के लिए 10% रिक्तियों को आरक्षित करने का निर्णय लिया है। दो बलों में भर्ती के लिए अग्निवीरों को ऊपरी आयु सीमा से 3 वर्ष की छूट दी गई। अग्निवीर के पहले बैच के लिए आयु में अधिकतम आयु सीमा से 5 वर्ष की छूट होगी। गृह मंत्रालय ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी।

इजरायल : टूर ऑफ ड्यूटी के मामले में इजरायल सबसे सख्त देश है, यहां इजरायली रक्षा बल में पुरुषों को तीन साल और महिलाओं को दो साल अनिवार्य सेवा देनी होती है. कुछ धार्मिक और स्वास्थ्य के आधार पर तथा गर्भवती महिलाओं को इससे छूट दी जाती है. इसे सेवा और सम्मान का जरिया माना जाता है.

चीन : चीन में आम नागरिकों को जबरन सेना में भर्ती किया जाता है. चीन में हर नागरिक के लिए 18 से 22 वर्ष की आयु के बीच दो साल की सैन्य सेवाएं देना अनिवार्य हैं. यानी चीन का कोई युवा चाहता हो या ना चाहता हो, उसे सेना में भर्ती होना ही पड़ता है. चीन की सेना में करीब 35 प्रतिशत ऐसे युवा हैं, जिन्हें मजबूर करके सैनिक बनाया जाता है.

नार्वे : नार्वे में सभी पुरुषों और महिलाओं के लिए टूर ऑफ ड्यूटी अनिवार्य है. यहां 19 से 44 साल की उम्र के बीच कभी भी पंजीकरण कराया जा सकता है. महिलाओं के लिए ये नियम 2016 में अनिवार्य किया गया, ताकि उन्हें भी पुरुषों के बराबर हक मिल सके.

स्विटजरलैंड : यहां पर 18 से 34 साल तक युवाओं के लिए सेना में ड्यूटी देना अनिवार्य है, इसके लिए इन्हें 21 सप्ताह की बेसिक ट्रेनिंग दी जाती है. महिलाओं के लिए ये अनिवार्य नहीं है, यह उनकी स्वेच्छा पर निर्भर करता है.

तुर्की : यहां वे युवा जो 20 साल से ज्यादा उम्र के हैं उनके लिए मिलिट्री सर्विस अनिवार्य है. यहां उन लोगों को छूट मिल सकती है जो तीन साल या उससे अधिक समय से विदेश में हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें एक निश्चित राशि अदा करनी होती है. महिलाओं के लिए ये नियम अनिवार्य नहीं है.

ब्राज़ील : ब्राजील में 18 से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए टूर ऑफ ड्यूटी अनिवार्य है. इसकी समय सीमा 10 से 12 माह के लिए होती है. यहां थोड़े समय के लिए भी सेना ज्वाइन करने वालों का मेडिकल टेस्ट होता है, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर इन्हें परमानेंट किया जा सके.

उत्तर कोरिया : विश्व के लिए सनसनी बनने वाले उत्तर कोरिया में भी टूर ऑफ ड्यूटी अनिवार्य है, खास बात ये है कि यहां पर पुरुषों को तीनों सेनाओं में ड्यूटी करनी पड़ती है, इसके लिए 23 माह नेवी में, 24 माह वायुसेना में और 21 माह थल सेना में काम करना पड़ता है.

दक्षिण कोरिया : उत्तर कोरिया की तरह ही यहां पर भी तीनों सेनाओं में टूर ऑफ ड्यूटी करना अनिवार्य है, इसमें नौसेना में 23 माह, थल सेना में 21 माह और वायुसेना में 24 माह सर्विस देनी होती है.

रूस : रूस में 18 से 27 साल की उम्र के बीच में कभी भी टूर ऑफ ड्यूटी की जा सकती है, कम से कम 12 माह सैन्य सेवा करना अनिवार्य है.

यूक्रेन: यूक्रेन में भी युवाओं के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है, हालांकि इसके लिए कोई उम्र और न्यूनतम सीमा तय नहीं है, हालिया युद्ध में टूर ऑफ ड्यूटी के तहत कई लोगों ने हथियार उठाकर युद्ध में हिस्सा लिया और रूस जैसे ताकतवर देश को टक्कर देने में सफल रहे.

इसके अलावा ग्रीस में 19 वर्ष की उम्र वाले युवकों को कम से कम 9 माह, ईरान में 24 माह टूर ऑफ ड्यूटी करनी होती है. (एजेंसियां)

75 साहित्यकार एवं समाजसेवी कुमुद सम्मान से अलंकृत

साहित्यकार ज्ञान स्वरूप ‘कुमुद’ जी की जयंती पर कुमुद सम्मान से अलंकृत 75 साहित्यकार एवं समाजसेवी

बरेली। रोटरी क्लब भवन चौपुला में साहित्यकार ज्ञान स्वरूप ‘कुमुद’ जी की जयंती समारोह पूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर 75 साहित्यकार एवं समाजसेवी कुमुद सम्मान से अलंकृत किए गए।

हास्य कवि निर्मल सक्सेना ( कासगंज), वरिष्ठ शायर जीतेश राज नक़्श (पीलीभीत), मुख्य अतिथि आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ सत्येंद्र सिंह, विशिष्ट अतिथिगण बरेली बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अरविंद कुमार श्रीवास्तव, बरेली बार एसोसिएशन के सचिव वीपी ध्यानी, वरिष्ठ साहित्यकार एवं कार्यक्रम अध्यक्ष आचार्य देवेंद्र देव एवं कार्यक्रम संचालक कवि रोहित राकेश को संस्था के संस्थापक एवं कार्यक्रम आयोजक एडवोकेट उपमेंद्र सक्सेना एवं संस्था अध्यक्ष करुणा निधि गुप्ता ने उत्तरीय, प्रशस्ति पत्र एवं प्रतीक चिन्ह देकर कुमुद सम्मान से अलंकृत किया

इसके अलावा 75 कवियों एवं समाजसेवियों को भी समारोह में सम्मानित किया गया। आमंत्रित कवियों में निर्मल सक्सेना एवं जीतेश राज ‘नक़्श’ ने अपने काव्य पाठ से सभी का दिल जीत लिया और खूब वाहवाही लूटी।

खटीमा से पधारे सुप्रसिद्ध कवि प्रिय भाई रामरतन यादव द्वारा बहुत सुंदर सरस्वती वंदना प्रस्तुत की गई। साहित्यकार डॉ महेश मधुकर एवं साहित्यकार रणधीर प्रसाद गौड़ धीर ने ‘कुमुद’ जी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए कार्यक्रम आयोजक एडवोकेट उपमेंद्र सक्सेना एवं संस्था अध्यक्ष  करुणा निधि गुप्ता ने सभी अतिथियों को हृदय से साधुवाद एवं आभार व्यक्त किया।

सारे उत्तर भारत में वैचारिक क्रांति की मशाल जलाने वाले उरई निवासी युवा पत्रकार नीरज भाई पटेल के बहाने आज की पत्रकारिता की एक पड़ताल-


01 जून को नेशनल जनमत न्यूज चैनल और मासिक पत्रिका मिशन जनमत के प्रधान संपादक नीरज भाई पटेल का जन्म दिन था। वैसे तो इस युवा पत्रकार के प्रशंसकों की जमात समूचे उत्तर भारत में फैली हुई है जिससे उनको जगह-जगह से बधाइंया मिली लेकिन उनके गृह जनपद उरई में स्वाभाविक रूप से उत्साह कुछ अधिक ही रहा। इसके दो दिन पहले 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया गया। इस दिन पत्रकारों की दशा और दिशा को लेकर कई जगह व्यापक चर्चायें हुई। नीरज पटेल का संदर्भ जुड़ने से ये चर्चायें नये आयामों को छूने लगती हैं। चिंतन के वे आयाम जो समकालीन परिस्थितियों में बहुत जरूरी हैं।
नीरज पटेल की पत्रकारिता अतीत की पत्रकारिता की याद दिला देती है। आधुनिक पत्रकारिता के उदय काल में इस विधा का मुख्य उद्देश्य जनमत का निर्माण करना था जिसकी वजह से पत्रकारिता में सूचनाओं के व्यापार के स्थान पर विचारों को प्रसारित करने पर बल रहता था। स्वाधीनता की लड़ाई के महानायक गांधी जी की पत्रकारिता को इस संदर्भ में स्मरण किया जाना प्रासंगिक है। उन्होंने जब यंग इंडिया के संपादन का दायित्व स्वीकार किया उस समय इस द्विसाप्ताहिक समाचार पत्र की प्रसार संख्या मात्र 1200 थी लेकिन तीन वर्षो में ही इसका प्रसार 40 हजार की संख्या पर पहुंच गया था। इसलिए नहीं कि गांधी जी ने उसमें खबरों की संख्या बढ़ा दी हो या आज की पत्रकारिता की तरह प्रसार और टीआरपी बढ़ाने के बाजारू हथकंडे इस्तेमाल किये हों बल्कि लोग गांधी जी के विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते थे और गांधी जी के उस समय की हर घटना परिघटना पर विचारों को जानने की ललक लोगों को यंग इंडिया की ओर तेजी से खींचने में कामयाब हुई। जब यंग इंडिया में लिखे उनके विचारों से नाराज होकर अंग्रेजों ने उन पर देश द्रोह का अभियोग लगाकर उन्हें कारावासित करा दिया तो कुछ ही दिनों में यंग इंडिया का प्रसार घटकर मात्र 08 हजार रह गया क्योंकि उसमें लोगों को अब गांधी जी के विचार पढ़ने का अवसर उपलब्ध नहीं रह गया था।
आजादी के बाद भी अखबार मूल रूप से विचारों के लिए ही पढ़े जाते थे। मैने अपने किशोर जीवन में दैनिक वीर अर्जुन में उसके प्रधान संपादक के0 नरेन्द्र के संपादकीय पढ़ने के लिए उस समय के प्रौढ़ों और बुजुर्गो में दीवानगी का आलम देखा था। के0 नरेन्द्र का लेखन हिन्दूवादी था और कांग्रेस का जमाना होते हुए भी एक खासा वर्ग ऐसे विचारों से प्रभावित रहता था जिसकी भीड़ सार्वजनिक पुस्तकालय के खुलने पर वीर अर्जुन पर उसमें प्रकाशित अग्र लेखों को पढ़ने के लिए टूट सी पड़ती थी। बैनेट कोलमैन एंड कंपनी की राजनीतिक पत्रिका दिनमान पर सोशलिस्टों का कब्जा रहता था और वे अपने एंगल से राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर वैचारिक प्रस्तुतियां पत्रिका में सजाते थे। इस पत्रिका की भी बहुत डिमांड थी साथ-साथ में बहुत प्रतिष्ठा भी। हर कुलीन घर में चाहे उसके लोग दिनमान पढ़ें या न पढ़ें पर अपने बैठके में रखने के लिए दिनमान मंगाते जरूर थे। ड्राइंग रूम में दिनमान का होना स्टेट्स सिम्बल का पर्याय था। बाद में बैनेट कोलमैन एंड कंपनी के मालिकों की नई पीढ़ी ने दिनमान को बंद करने का फरमान यह कहते हुए जारी कर दिया था कि इसमें गरीबों और नंगे भूखों की चर्चायें छपती हैं जो बाजार में कोई अहमियत नहीं रखते इस कारण उनके बीच प्रसार के आधार पर दिनमान के लिए हमें कभी विज्ञापन नहीं मिलेगें और घाटे वाले प्रकाशन हमको मंजूर नहीं हैं। बाद में लेआउट के महारथी बनकर पत्रकारिता जगत में स्थापित हुए घनश्याम पंकज ने दिनमान को फायदे में चलाने का मोर्चा संभाला और उसके वैचारिक तत्व को समाप्त कर उसे बाजारू सांचे में ढ़ाल डाला। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद वे दिनमान में कोई करिश्मा नहीं कर पाये।
जहां तक मीडिया के वर्तमान के ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन बटोरने के प्रयोजन की बात है गांधी जी तो इसके बहुत खिलाफ थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहने के अपने समय में ही इडियन ओपिनियन नाम के अखबार का संपादन किया था और इस दौरान यह संकल्प ले लिया था कि वे अपने अखबार के एक इंच स्पेस को भी विज्ञापन के लिए जाया नहीं होने देंगे। भारत आने के बाद उन्होंने यंग इंडिया, नवजीवन और हरिजन अखबारों में भी इस व्रत का पालन किया। उनके प्रभाव के कारण आजादी के बाद भी कई दशकों तक पत्र-पत्रिकाओं को लेकर अलग तरह की स्थिति बनी रही। कुलीन सेठों का रूझान पत्र-पत्रिकायें निकालने की ओर हुआ तो उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि भले ही उनमें घाटा हो जिसकी पूर्ति उनके अन्य धंधों से की जाये पर उनके प्रकाशनों की समाज में गरिमापूर्ण वैचारिक प्रतिष्ठा रहे। टाइम्स आफ इंडिया के मालिकान साहू शांति प्रसाद जैन अपने प्रकाशनों में इसी ख्याल का निर्वाह करते थे इसलिए उनके प्रकाशनों के संपादक साहित्य, संस्कृति और राजनीतिक विज्ञान की असाधारण हस्तियों में से चयनित किये जाते थे जिनके काम में खुद साहू शांति प्रसाद जैन भी दखल नहीं कर पाते थे पर उन्हें इसमें कोई हेठी महसूस नहीं होती थी।
पर जब मीडिया उद्योग बनने की ओर अग्रसर हुई तो पत्रकारिता के सरोकार बदल गये। जिन दिग्गज लिक्खाड़ों को यह गुमान था कि अखबार या न्यूज चैनल उनकी वजह से चलते हैं और अगर उन्होंने छोड़ दिया तो गांधी जी के हट जाने की तरह वे जिस प्रतिष्ठान में काम करते हैं वह भी औंधे मुंह जा गिरेगा उन सभी को मीडिया जगत से आज आउट किया जा चुका है। पुण्य प्रसून वाजपेयी के हटने के बाद आज तक न्यूज चैनल टीआरपी में पिछड़ने की बजाय आगे बढ़ा है। प्रिंट मीडिया का भी यही आलम है। किसी अखबार को चलाने के लिए अब दिग्गज संपादक की कोई जरूरत नहीं रह गई है।
लेकिन अब बात यही आती है कि क्या पत्रकारिता का उद्देश्य वास्तव में बदला जाना संभव है। अखबार और न्यूज चैनल सिर्फ विज्ञापनों के संवाहक हैं जिसके लिए पत्रकारिता में हर तरह का समझौता जायज है। इसी दृष्टि के चलते आज यह मांग भी उठने लगी है कि न्यूज चैनलों का दर्जा बदल कर उन्हें मनोरंजन चैनल के रूप में पंजीकृत किया जाना चाहिए। आज पाठको और दर्शकों की तादात कई गुना बढ़ चुकी है लेकिन क्या मीडिया रचनात्मक जनमत के निर्माण में कोई सक्षम भूमिका निर्वाह कर पा रहा है। इसी बिन्दु से आगे के विमर्श की राह खुलती है। मीडिया को व्यापारिक उद्यम की तरह चलाने की प्रवृत्ति ने पत्रकारिता के स्वरूप को ही बदल डाला है। अखबारों में हर जिले के लिए चार पेज एलाट किये जाते तो इसलिए नहीं कि उनमें लोगों को अपने क्षेत्र की सार्थक सूचनायें ज्यादा से ज्यादा परिमाण में दी जा सकें बल्कि सूचनाओं के नाम पर पीआरशिप को बढ़ावा दिया जा रहा है। कोई कार्यक्रम होता है तो रिपोर्टर काम के लोड के कारण उसकी सही रिपोर्टिंग के लिए पूरा समय नहीं दे सकता। वह फोटो खींचता है और चल देता है। इसके बाद आयोजक एक विज्ञप्ति बनाकर उसके पास भिजवा देते हैं कि कार्यक्रम में अमुक-अमुक ने प्रतिभाग किया। रिपोर्टर मुख्य अतिथि के संबोधन की पंक्तियां अपने मन से लिखकर और प्रतिभागियों की लिस्ट टांचकर फोटो के साथ हैडिंग और क्रासर का इस्तेमाल करके चार कालम की खबर साया कर देता है। अगर कोई अकादमिक आयोजन हुआ तो उसे भी यही ट्रीटमेंट मिलेगा और राजनैतिक हुआ तो उसे भी। ऐसी खबरों की क्या सार्थकता हो सकती है। सूचनाओं की अधिकता व्यापार बढ़ाने में सहायक होती है इसलिए अंधाधुंध सूचनायें बढ़ा दी गई हैं जबकि विचार और विश्लेषण के लिए स्पेस सिकोड़ दिया गया है। न्यूज चैनलों में भी यही हाल है। न्यूज चैनलों और अखबारों के मुकाबले प्रमुख पत्रकारों, विचारकों द्वारा संचालित पोर्टलों के दर्शकों का बढ़ना यह बताता है कि संक्रमण कालीन अलबेली, अटपटी पत्रकारिता से लोग ऊबने लगे हैं।
नीरज पटेल की पत्रकारिता विचारों की पत्रकारिता के पुनर्जीवन का आभास कराने वाली है। सामाजिक उपनिवेशवाद के पुनरूत्थान के इस दौर के खतरों को समय रहते भांपने की जरूरत है वरना यह देश फिर उसी कगार पर पहुंच जायेगा जहां इसने दासता की कई सदियों को भोगा है। सामाजिक अन्याय के सोच पर उनका चैनल और पत्रिका जबरदस्त प्रहार कर रहे हैं जिससे वंचितों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने की प्रेरणा मिल रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि नीरज की पत्रकारिता में प्रतिशोध और प्रतिक्रिया का कोई पुट नहीं है जबकि सामाजिक न्याय की वैचारिकी में इस तरह के जोखिम की बहुतायत होती है। इसीलिए वे डा0 लोहिया से लेकर वीपी सिंह तक को नवाजने से नहीं चूकते जो भले ही उस वर्ग से आये हों जो सामाजिक अन्याय के लिए जिम्मेदार रहा है पर उन्होंने व्यवस्था और समाज को मानवीय बनाने में योगदान दिया। नीरज पटेल कहते हैं कि वंचितों को ऐसे महापुरूषों के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करने में संकोच नहीं करना चाहिए। वे वंचितों के बीच के विभीषणों की शिनाख्त में भी पूरी तरह निर्मम रहते हैं जो एक पत्रकार की बेबाकी के अनुरूप है। युवा होते हुए भी उनकी परिपक्वता बेमिसाल है। सामाजिक परिवर्तन के कई अभियान गिरोहबंदी की भावना की तार्किक परिणति पर पहुंचने के पहले ही बलि चढ़ा दिये गये। मधु लिमये इसका उदाहरण है जिनके त्याग पर संदेह नहीं किया जा सकता पर उन्हें मालूम था कि मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद लोहियावाद की अग्रसरता किस ओर होना चाहिए फिर भी शायद उनकी वर्ग चेतना जाग गई या अन्य कारणों से वे गिरोहबाजी निभाने के लिए अभिशप्त हो गये। उन्हांेने लोहियावाद का बाना पहन रखा फिर भी उन्हें मुलायम सिंह की वंशवादी, परिवारवादी और डाला सीमेंट फैक्ट्री के मजदूरों पर गोली चलवाने की राजनीति का समर्थन करने में कोई धर्म संकट महसूस नहीं हुआ क्योंकि उन्हें बाहर से आये वीपी सिंह को सामाजिक न्याय की राजनीति को तार्किक परिणति पर पहुंचाने का श्रेय मिलना गवारा नहीं था। पौराणिक युग के उन तपस्यियों और ऋषियों को याद किया जाना चाहिए जिन्होंने त्यागपूर्ण जीवन इसलिए जिया ताकि सामाजिक उपनिवेशवाद को नैतिक प्रतिष्ठा दिलवाने के लिए अपना उपयोग करा सकें। हर शातिर षणयंत्र में ऐसे अवयव जुड़कर महत्वपूर्ण योगदान करते रहे हैं। बहरहाल नीरज पटेल किसी ऐसी गिरोहबंदी की जकड़ में नहीं हैं इसलिए दोहरे चेहरे वाले अपने भी उनके तीरों से बेहाल रहते हैं। जन्म दिन पर मेरी ओर से भी उन्हें बधाई और उनकी पत्रकारिता के फलदायी होने की शुभकामनाएं।

-केपी सिंह (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

कायस्थ चेतना मंच द्वारा दूसरा प्याऊ संचालित

बरेली। कायस्थ चेतना मंच के तत्वावधान में 17 मई 2022 दिन मंगलवार को प्याऊ का उद्घाटन संस्था के संरक्षक डॉक्टर पवन सक्सेना एवं संस्था के वरिष्ठ सदस्य पार्षद सतीश कातिब मम्मा जी द्वारा किया गया।

डॉक्टर पवन सक्सेना ने इसे संस्था का सराहनीय कार्य बताया। सतीश मम्मा ने कहा कि समय समय पर ऐसे कार्य कराने से संस्था की छवि और उज्जवल होगी। अध्यक्ष संजय सक्सेना ने बताया संस्था द्वारा एक प्याऊ बदायूं रोड स्थित पानी की टंकी के सामने 3 मई अक्षय तृतीया से संचालित हो रहा है, जिससे बदायूं रोड पर राहगीरों के लिए बहुत आराम मिलता है। चौपला पुल से लेकर करगैना तक और कोहरापीर पुलिस चौकी के आसपास भी पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। राहगीरों के लिए बहुत परेशानी होती है। यह विचार मन में आया था। इसीलिए प्याऊ संचालित किए गए हैं। अभी दो प्याऊ और संचालित करने का विचार है।

संस्था के वरिष्ठ उपाध्याय अखिलेश सक्सेना ने सभी का स्वागत एवं आभार व्यक्त किया म। इस कार्यक्रम में महिला अध्यक्ष श्रीमती माया सक्सेना, श्रीमती प्रतिभा जौहरी, अविनाश सक्सेना, बीनू सिन्हा, महासचिव अमित सक्सेना बिंदु, निर्भय सक्सैना, पंकज सक्सेना पंछी आदि लोग उपस्थित रहे।

इससे पहले व्यंजन रेस्टोरेंट पर रेस्टोरेंट के मालिक गुप्ता के विशेष सहयोग से राहगीरों को भीषण गर्मी से राहत देने के लिए एक प्याऊ की व्यवस्था की गई। कायस्थ चेतना मंच संरक्षक डॉक्टर पवन सक्सेना वरिष्ठ पत्रकार के द्वारा नारियल फोड़कर प्याऊ का उद्घाटन किया गया।

अध्यक्ष संजय सक्सेना, महासचिव अमित सक्सेना बिंदु, वरिष्ठ उपाध्यक्ष अविनाश चंद्र सक्सेना, अखिलेश कुमार सक्सेना, सुरेंद्र बीनू सिन्हा, निर्भय सक्सैना वरिष्ठ पत्रकार, जिला महिला अध्यक्ष श्रीमती माया सक्सेना, पार्षद सतीश कातिब मम्मा, वरिष्ठ पार्षद एवं बीडीए सदस्य पंकज जौहरी पंछी, श्रीमती प्रतिमा जौहरी आदि ने कार्यक्रम में सहयोग किया अंत में अखिलेश कुमार ने सभी का आभार व्यक्त किया।

बैलगाड़ी पर निकली डॉक्टर की बारात

बैतूल (एजेंसी)। आमतौर पर शादी समारोह में लोग अपनी हैसियत और ताकत का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते, मगर मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में एक चिकित्सक ने अपने विवाह समारोह में सादगी की मिसाल पेश की। उसने अपनी बारात बैलगाड़ी पर निकाली। लगभग तीन किलो मीटर का सफर बैलगाड़़ी पर ही तय किया।

बैतूल के चिचोली विकास खंड का आदिवासी बाहुल्य गांव असाढ़ी है। यहां के डॉ. राजा धुर्वे की शादी थी, उन्होंने आदिवासी समाज की परंपरा और शादी सादगी से करने का फैसला लिया और बारात बैलगाड़ी से निकाली। इसके लिए बैलगाड़ी को आकर्षक रुप दिया। इस बैलगाड़ी की चमक के आगे लग्जरी कार और बग्घियां भी फीकी दिखाई दीं। डॉ राजा पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर, शिक्षक और मोटिवेशनल स्पीकर हैं।

इस मौके पर राजा धुर्वे का कहना था कि अपने सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने और लोगों को महंगाई के दौर में सादा जीवन-उच्च विचार सिखाने का इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता था। उनके मुताबिक महंगाई के इस दौर में बैलगाड़ी सबसे सस्ता सुलभ और प्रदूषणमुक्त साधन है। बैलगाड़ी ग्रामीण सभ्यता संस्कृति की पहचान है। इसलिए अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए उन्होंने बैलगाड़ी पर बारात ले जाने का फैसला किया।

इस अनूठी बारात में बैलगाड़ी को खास जनजातीय, लोक-कलाओं से सजाया गया था। दूल्हे की बैलगाड़ी के पीछे चार बैलगाडियां में बच्चों और महिलाओं को बैठाया गया। बारात में जनजातीय लोक नृत्य और लोक वाद्य शामिल किए गए थे, जो आमतौर पर किसी शादी में देखने को नहीं मिलते। ग्राम असाढ़ी से बैलगाड़ी में निकले दूल्हे राजा जब तीन किलोमीटर दूर दूधिया गांव में अपनी दुल्हन को लेने पहुंचे तो लोग झूम उठे।

वन अप मोटर्स इंडिया प्रा. लि. ने चलाया यातायात जागरूकता अभियान

सड़क सुरक्षा जीवन रक्षा।

लखनऊ। जैसा कि आप अवगत है कि चतुर्थ सड़क सुरक्षा सप्ताह (दिनांक 18.04.2021 से 24.04. 2022 तक) मनाया जा रहा है।

जनपद लखनऊ में सड़क सुरक्षा सप्ताह कार्यक्रम का शुभारम्भ परिवहन मंत्री के कर कमलों द्वारा दिनांक 18-04-2022 को 1090 चौराहे पर किया गया है।

इस दौरान उनके द्वारा सप्ताह भर वृहद जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने संबंधी निर्देश दिए गए।

निर्देश का पालन करते हुए वन अप मोटर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और वहां के सेल्स मैनेजर सौरभ सिंह व अन्य कर्मचारियों द्वारा यह अभियान बड़े ही जागरूकता पूर्वक मनाया गया।

मलिहाबाद तहसील, मिर्जागंज चौराहा, मोहान रोड, मॉल रोड और अन्य जगहों पर जनता को बैनर और जागरूकता पत्रक के मध्यम से अवगत कराया गया और उनको सुरक्षा नियमों के बारे में बताया गया ।

आरसी फाउंडेशन संस्था ने किया जरूरतमंद लोगों को खाद्यान्न वितरित

आर सी फाउंडेशन संस्था द्वारा जरूरतमंद लोगों को खाद्यान्न वितरण किया गया

मलिहाबाद लखनऊ। आरसी फाउंडेशन सामाजिक संस्था के द्वारा संस्थापक डॉ मानुवेंद्र प्रताप सिंह व श्रीमती पुष्पा यादव के द्वारा स्वर्गीय रमेश चंद्र यादव की तीसरी पुण्यतिथि पर मलिहाबाद के अमानीगंज स्थित प्राथमिक विद्यालय, घुसौली प्राथमिक विद्यालय व मलिहाबाद प्राथमिक उपचार केंद्र पर फल, बिस्किट व कोल्ड ड्रिंक आदि जरूरत के सामान का वितरण किया गया।

कार्यक्रम में मुख्य रुप से संस्था के संरक्षक शिव कुमार यादव, रिटायर्ड एडिशनल एसपी राहुल यादव, शशिकांत, सूर्यकांत, उज्जवल यादव, राहुल यादव प्रधान जी व संस्था से जुड़े लोग उपस्थित रहे।

मध्यप्रदेश में मीडिया से दुर्व्यवहार पर दो थाना प्रभारी सस्पेंड

भोपाल (एजेंसी)। मध्य प्रदेश के एक पुलिस थाने में खड़े अर्ध-नग्न पुरुषों के एक समूह की तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आई हैं, जिसमें एक स्थानीय यूट्यूब पत्रकार कनिष्क तिवारी को भी देखा जा सकता है। तिवारी के अनुसार, उन्हें अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया गया था, जब वे एक थिएटर कलाकार नीरज कुंदर के बारे में पूछताछ करने के लिए पुलिस स्टेशन गए थे। 

ये मामला विधायक पुत्र से शुरू हुआ था। फिर पुलिस पर गंभीर आरोप लगे। इसके बाद SHO और सब इंस्पेक्टर को सस्पेंड कर दिया गया। इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रिपोर्ट तलब की। खास बात ये है कि मामले को लेकर पुलिस और पत्रकार का अलग-अलग पक्ष सामने आया है।

वायरल फोटो मध्यप्रदेश के सीधी जिले की है। मामले को लेकर पत्रकार कनिष्क तिवारी ने एक वीडियो जारी किया है। उन्होंने कहा कि बीते 2 अप्रैल को एक बेहद निंदनीय घटना हुई। मैं एक धरना प्रदर्शन को कवर करने गया था। मेरे कैमरामैन ने घटना को रिकॉर्ड भी किया है। वहां सिटी कोतवाली थाने की पुलिस मुझे जबरन धक्का देकर थाने के अंदर ले गई। मुझे मारा-पीटा गया। मेरे कपड़े उतरवाए गए। थाने में जुलूस निकलवाया गया। कहा गया कि अगर विधायक और पुलिस के खिलाफ खबर चलाओगे तो पूरे शहर में चड्डी पहनाकर जुलूस निकलवाऊंगा।

कनिष्क ने आगे बताया- हम पर धारा 151, शांति भंग करने की कोशिश और सार्वजनिक रास्ता अवरुद्ध करने की धाराएं लगाई गईं। हमारे साथ मारपीट की गई, गाली गलौच किया गया। जब पुलिस को पता चला कि मैं पत्रकार हूं तो पुलिस मुझसे कहने लगी कि तुम विधायक के खिलाफ खबर क्यों चलाते हो? विधायक किसी के घर में बर्तन मांजने जाएगा क्या?

वायरल फोटो के बारे में बताते हुए कनिष्क ने कहा- हम लोगों को 2 अप्रैल की रात 8 बजे गिरफ्तार किया गया और 3 अप्रैल की शाम 6 बजे छोड़ा गया। लगभग 18 घंटे हम लोग हवालात में रहे। अंडरवियर में हमें थाना प्रभारी के पास ले जाया गया। इसी दौरान अमिलिया थाना प्रभारी अभिषेक सिंह परिहार ने हमारी फोटो खींची। ये लगभग रात 2:30 की बात है।

कनिष्क ने कहा- मैं डरा हुआ हूं। पूरा परिवार डरा हुआ है। सोशल मीडिया पर पुलिस ने फोटो वायरल किया है, जिससे मेरी मानहानि हुई है। मानवाधिकार का उल्लंघन हुआ है। मैं आप लोगों से अपील करता हूं कि आप मेरा साथ दें। मुझे लगातार जान से मारने की धमकी दी जा रही है। मुझे जानकारी मिली है कि पुलिस मुझे दूसरे केस में फंसा कर जेल में डालना चाहती है।

मामले को लेकर एडिशनल एसपी अंजुलता पटेल का भी बयान सामने आया है। उन्होंने कहा- एक फेक आईडी के जरिए विधायक के पुत्र (बीजेपी विधायक केदारनाथ शुक्ला के बेटे गुरुदत्त शुक्ला) को परेशान किया जा रहा था। जांच के दौरान एक रंगकर्मी नीरज कुंदेर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इसके बाद कई रंगकर्मी और पत्रकार कनिष्क तिवारी थाना के समक्ष धरना प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान सभी को 151 के तहत गिरफ्तार किया गया।  वायरल फोटो पर अंजुलता पटेल ने कहा- पुलिस हिरासत की एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई है। मामला संज्ञान में लेते हुए एसपी सीधी के निर्देशन में डीएसपी हेड क्वार्टर गायत्री तिवारी को जांच का आदेश दे दिया गया है।

बाद में, दुर्व्यवहार के लिए जिम्मेदार थाना प्रभारी कोतवाली मनोज सोनी और अमिलिया थाना प्रभारी अभिषेक सिंह को सस्पेंड कर दिया गया।

वहीं मध्यप्रदेश के सीधी में पत्रकारों के खिलाफ पुलिस के द्वारा की गई मारपीट और अमानवीय व्यवहार करने के मामले में पन्ना जिले के पत्रकारों ने उक्त घटना का विरोध जताते हुए कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा है। उसमें पत्रकारों के साथ की गई अमानवीयता के मामले शामिल पुलिस अधिकारी एवं कर्मचारियों पर कार्रवाई की मांग की है।

ज्ञात हो कि सीधी के पत्रकार कनिष्क तिवारी को पुलिस के द्वारा पकड़ कर ले जाया गया एवं उनके कपड़े उतारकर उन्हें अर्धनग्न कर लॉकअप में बंद कर दिया गया और पुलिस ने अभद्रता करते हुए मारपीट की अर्धनग्न अवस्था में फोटो वायरल कराकर सरेआम पत्रकारों को बेइज्जत किया। यह  बेहद निंदनीय घटना है। इस कारण थाना प्रभारी सहित दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए। ऐसे कानून तोड़ने वाले व्यक्तियों को दंडित किए जाने की मांग की गई। पत्रकार कल्याण परिषद, प्रेष क्लब पन्ना के अलावा पन्ना जिले के सभी पत्रकार संगठनों ने एकजुट होकर कलेक्टर संजय कुमार मिश्रा को ज्ञापन दिया। कलेक्टर ने कहा कि पन्ना जिले के पत्रकारों की सुरक्षा मेरी प्राथमिक जिम्मेदारी है, कभी किसी के साथ गलत नहीं होगा। आप निर्भीक होकर पत्रकारिता करें। ज्ञापन में वरिष्ठ पत्रकार जगदीश नामदेव, मनीष मिश्रा, शिवकुमार त्रिपाठी, मुकेश विश्वकर्मा, गणेश विश्वकर्मा, सुशांत चौरसिया, कादिर खान,अमित खरे, बीएन जोशी, राकेश शर्मा, महबूब अली, संजय राजपूत, लक्ष्मीनारायण चिरोलिया, शिव किशोर पांडे, बलराम व्यास, टाइगर खान, फूल सिंह त्यागी, ऋषि मिश्रा, राजेश रावत, सादिक खान, राम बिहारी गोस्वामी, हिम्मत खान, रविंद्र अर्जरिया, पवन पाठक, हीरालाल विश्वकर्मा, बृजेश त्रिपाठी, आसिफ खान, सौरव साहू, डीके साहू, संदीप विश्वकर्मा, रामअवतार विश्वकर्मा, अजय द्विवेदी, सहित बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद रहे।

दूसरी ओर सीधी पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार बघेली भाषा में यूट्यूब पर चैनल चला रहे कनिष्क तिवारी समेत कुछ अन्य पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। उन पर फेक आईडी बनाने और फेसबुक पर केदारनाथ शुक्ला और उनके बेटे को बदनाम करने की पोस्ट करने के आरोप हैं। यह एफआईआर भी विधायक के बेटे की शिकायत पर दर्ज की गई है। वरिष्ठ पत्रकार राकेश पाठक का कहना है कि कनिष्क के यूट्यूब पर एक लाख से अधिक फॉलोअर हैं। न्यूजनेशन चैनल का भी एक पत्र सामने आया है, जिसमें कनिष्क तिवारी को फ्रीलांस पत्रकार होने की पुष्टि होती है।

शिकायत के बाद पुलिस ने की गिरफ्तारी
सीधी पुलिस के मुताबिक एक फेक आईडी से फेसबुक पर अभद्र टिप्पणियां की गई थी। पुलिस ने इस मामले में नीरज कुंदेर को गिरफ्तार किया था। इस पर कनिष्क समेत रंगमंच और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कोतवाली थाने में विरोध दर्ज कराया। पुलिस ने सबको गिरफ्तार कर लिया। कनिष्क तिवारी यूट्यूबर है और उसके खिलाफ पहले भी कुछ शिकायतें दर्ज थी। कोतवाली थाने में आरोपियों की बिना कपड़ों की तस्वीरें खींचकर किसी ने सोशल मीडिया पर वायरल कर दी। कोतवाली थाने में अपराध क्रमांक 262/22 धारा 419, 420, और आईटी एक्ट के 66सी, 66डी के तहत प्रकरण कायम कर जांच की जा रही है। फोटो वायरल होने के मामले में डीएसपी को जांच सौंपी गई है। 

कांग्रेस ने बनाया मुद्दा
कांग्रेस के तमाम नेताओं ने इस मसले पर सोशल मीडिया पर सरकार को घेरा है। पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह ने फोटो ट्वीट करते हुए कहा कि यह मप्र के सीधी जिले के पुलिस थाने की तस्वीर है। यह अर्धनग्न युवा कोई चोर उचक्के नहीं है, ये लोकतंत्र के चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के साथी है। इन्हें अर्धनग्न कर जेल में इसलिए डाला गया क्योंकि इन्होंने भाजपा विधायक के खिलाफ खबर चलाई थी। वहीं, पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि प्रदेश की निकम्मी और उनके बड़बोले मुखिया से सवाल करना सीधी बघेली न्यूज चैनल के वरिष्ठ पत्रकार कनिष्क तिवारी और उनके साथियों को भारी पड़ा। नग्न कर उन्हें थाने में खड़ा किया गया है। यह घोर निंदनीय कृत्य है…  शिवराज सिंह सरकार अब अंग्रेजों की भांति दमनकारी रवैया अपना रही है। 

खबरों के मुताबिक पूरा मामला डिजिटल पत्रकार कनिष्क तिवारी से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि पत्रकार ने भाजपा विधायक केदारनाथ शुक्ला के खिलाफ यूट्यूब चैनल पर खबर चलायी थी। इससे नाराज होकर बीजेपी विधायक ने कनिष्क तिवारी व उनके साथियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। दूसरी तरफ वायरल तस्वीर को पुलिस द्वारा रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता नीरज कुंदेर की गिरफ्तारी के विरोध प्रदर्शन से भी जोड़ा रहा है।

नीरज कूंदेर पर कथित फर्जी FB अकाउंट चलाने का आरोप है। इस अकाउंट की शिकायत भी सीधी विधायक और उनके पुत्र ने पुलिस से की थी। पुलिस ने इन्हीं के चलते बीते 2 अप्रैल को नीरज को गिरफ्तार किया था। कहा ये जा रहा है कि वायरल तस्वीर नीरज कुंदेर की गिरफ्तारी के विरोध किए जाने पर डिजिटल पत्रकार और रंगकर्मियों के साथ पुलिस के द्वारा की गई अभद्रता की है। हालांकि वायरल तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया पर लोग अपनी नाराजगी भी जता रहे हैं। कई वरिष्ठ पत्रकार भी इस घटना की आलोचना कर रहे हैं। 

इन नेताओं दी अपनी प्रतिक्रिया

कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा-  ये पुलिसिया और राजनीतिक आतंकवाद है। पत्रकार को फर्जी बताने वाला प्रशासन कौन होता है। किसी को यातना देने का अधिकार पुलिस को नहीं है। अगर नेताओं को खुश करने के लिए किया गया है तो ये गंभीर अपराध है। ये लोकतंत्र के धब्बा है।

बीजेपी प्रवक्ता दुर्गेश केसवानी-  सभी को कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए, चाहे वह पत्रकार हो या नेता हो, विधायक हो या फिर मंत्री हो। अगर कोई पत्रकारिता की आड़ में ब्लेक मार्केंटिंक कर रहा तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। पुलिस ने जो किया वो भी गलत है इसलिए उन पर भी कार्रवाई हुई है।

द कश्मीर फाइल्स के बाद दूसरा धमाका लाल बहादुर शास्त्री; देखने के लिए हो जाएं तैयार…

कश्मीर फाइल्स के बाद दूसरा धमाका देखने के लिए हो जाओ तैयार…

लालबहादुर शास्त्री https://youtu.be/yq9TOW43TYs

लालबहादुर शास्त्री (जन्म: 2 अक्टूबर 1904 मुगलसराय (वाराणसी) : मृत्यु: 11 जनवरी 1966 ताशकन्द, सोवियत संघ रूस), भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री थे। वह 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 को अपनी मृत्यु तक लगभग अठारह महीने भारत के प्रधानमन्त्री रहे। इस प्रमुख पद पर उनका कार्यकाल अद्वितीय रहा। शास्त्री जी ने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की भारत  की  स्वतन्त्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था। गोविंद बल्लभ पंत के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस एवं परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया। परिवहन मन्त्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी। पुलिस मंत्री होने के बाद उन्होंने भीड़ को नियन्त्रण में रखने के लिये लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग प्रारम्भ कराया। 1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किये गये। उन्होंने 1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने के लिये बहुत परिश्रम किया।

साफ सुथरी छवि- जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के दौरान 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के बाद साफ सुथरी छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधानमंत्री का पद भार ग्रहण किया। उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध शुरू हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी। ताशकंद में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। उनकी सादगीदेशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त भारत रत्‍न से सम्मानित किया गया।

लाल बहादुर शास्त्री जी के जन्मदिवस पर 2 अक्टूबर को शास्त्री जयन्ती व उनके देहावसान वाले दिन 11 जनवरी को लालबहादुर शास्त्री स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।

श्रीवास्तव से बने शास्त्री– लालबहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में एक कायस्थ परिवार में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटे होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हें अठारह महीने के हुए तो दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उनकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गयीं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उनके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उन्होंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा हमेशा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया।

1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता और शास्त्रीजी की छ: सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र – हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक। उनके चार पुत्रों में से दो दिवंगत हो चुके हैं। अनिल कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं जबकि सुनील शास्त्री भाजपा के नेता हैं।

देशसेवा का व्रत- संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् वे भारत सेवक संघ से जुड़ गये और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गांधीवादी, थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उल्लेखनीय हैं।

“मरो नहीं, मारो!”किया बुलंद- दूसरे विश्व युद्ध में इंग्लैण्ड को बुरी तरह उलझता देख जैसे ही नेताजी ने आजाद हिन्द फौज को “दिल्ली चलो” का नारा दिया, गान्धी जी ने मौके की नजाकत को भाँपते हुए 8 अगस्त 1942 की रात में ही बम्बई से अँग्रेजों को “भारत छोड़ो” व भारतीयों को “करो या मरो” का आदेश जारी किया और सरकारी सुरक्षा में यरवदा पुणे स्थित आगा खान पैलेस में चले गये। 9 अगस्त 1942 के दिन शास्त्रीजी ने इलाहाबाद पहुँचकर इस आन्दोलन के गान्धीवादी नारे को चतुराई पूर्वक “मरो नहीं, मारो!” में बदल दिया और अप्रत्याशित रूप से क्रान्ति की दावानल को पूरे देश में प्रचण्ड रूप दे दिया। पूरे ग्यारह दिन तक भूमिगत रहते हुए यह आन्दोलन चलाने के बाद 19 अगस्त 1942 को शास्त्रीजी गिरफ्तार हो गये।

गृहमन्त्री के बाद प्रधानमंत्री- शास्त्रीजी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में पुरुषोत्तमदास टंडन और पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। सबसे पहले 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने टण्डन जी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढ़ी। इसके बाद तो शास्त्रीजी का कद निरन्तर बढ़ता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियाँ चढ़ते हुए वे नेहरूजी के मंत्रिमण्डल में गृहमन्त्री के प्रमुख पद तक जा पहुँचे। और इतना ही नहीं, नेहरू के निधन के पश्चात भारत वर्ष के प्रधान मन्त्री भी बने।

जय जवान-जय किसान का नारा- उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी शीर्ष प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है और वे ऐसा करने में सफल भी रहे। उनके क्रियाकलाप सैद्धान्तिक न होकर पूर्णत: व्यावहारिक और जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप थे। निष्पक्ष रूप से यदि देखा जाये तो शास्त्रीजी का शासन काल बेहद कठिन रहा। पूँजीपति देश पर हावी होना चाहते थे और दुश्मन देश हम पर आक्रमण करने की फिराक में थे। 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर सायं 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया। परम्परानुसार राष्ट्रपति ने आपात बैठक बुला ली जिसमें तीनों रक्षा अंगों के प्रमुख व मन्त्रिमण्डल के सदस्य शामिल थे। संयोग से प्रधानमन्त्री उस बैठक में कुछ देर से पहुँचे। उनके आते ही विचार-विमर्श प्रारम्भ हुआ। तीनों प्रमुखों ने उनसे सारी वस्तुस्थिति समझाते हुए पूछा: “सर! क्या हुक्म है?” शास्त्रीजी ने एक वाक्य में तत्काल उत्तर दिया: “आप देश की रक्षा कीजिये और मुझे बताइये कि हमें क्या करना है?” शास्त्रीजी ने इस युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और जय जवान-जय किसान का नारा दिया। इससे भारत की जनता का मनोबल बढ़ा और सारा देश एकजुट हो गया। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी।

अमेरिका ने की युद्धविराम की अपील- भारत पाक युद्ध के दौरान 6 सितम्बर को भारत की 15वीं पैदल सैन्य इकाई ने द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी मेजर जनरल प्रसाद के नेत्तृत्व में इच्छोगिल नहर के पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान के बहुत बड़े हमले का डटकर मुकाबला किया। इच्छोगिल नहर भारत और पाकिस्तान की वास्तविक सीमा थी। इस हमले में खुद मेजर जनरल प्रसाद के काफिले पर भी भीषण हमला हुआ और उन्हें अपना वाहन छोड़ कर पीछे हटना पड़ा। भारतीय थलसेना ने दूनी शक्ति से प्रत्याक्रमण करके बरकी गाँव के समीप नहर को पार करने में सफलता अर्जित की। इससे भारतीय सेना लाहौर के हवाई अड्डे पर हमला करने की सीमा के भीतर पहुँच गयी। इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबराकर अमेरिका ने अपने नागरिकों को लाहौर से निकालने के लिये कुछ समय के लिये युद्धविराम की अपील की।

रूस और अमरिका की मिलीभगत? आखिरकार रूस और अमरिका की मिलीभगत से शास्त्रीजी पर जोर डाला गया। उन्हें एक सोची समझी साजिश के तहत रूस बुलवाया गया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। हमेशा उनके साथ जाने वाली उनकी पत्नी ललिता शास्त्री को बहला फुसलाकर इस बात के लिये मनाया गया कि वे शास्त्रीजी के साथ रूस की राजधानी ताशकंद न जायें और वे भी मान गयीं। अपनी इस भूल का श्रीमती ललिता शास्त्री को मृत्युपर्यन्त पछतावा रहा। जब समझौता वार्ता चली तो शास्त्रीजी की एक ही जिद थी कि उन्हें बाकी सब शर्तें मंजूर हैं परन्तु जीती हुई जमीन पाकिस्तान को लौटाना हरगिज़ मंजूर नहीं। काफी जद्दोजहेद के बाद शास्त्रीजी पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाकर ताशकन्द समझौते के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करा लिये गये। उन्होंने यह कहते हुए हस्ताक्षर किये थे कि वे हस्ताक्षर जरूर कर रहे हैं पर यह जमीन कोई दूसरा प्रधान मन्त्री ही लौटायेगा, वे नहीं। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्धविराम के समझौते पर हस्ताक्षर करने के कुछ घण्टे बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही उनकी मृत्यु हो गयी। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि क्या वाकई शास्त्रीजी की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी? कई लोग उनकी मौत की वजह जहर को ही मानते हैं।

शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिये आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हें मरणोपरान्त वर्ष 1966 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

शास्त्रीजी की अंत्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्तिवन (नेहरू जी की समाधि) के आगे यमुना किनारे की गयी और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया। जब तक कांग्रेस संसदीय दल ने इंदिरा गांधी को शास्त्री का विधिवत उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया, गुलजारी लाल नंदा कार्यवाहक प्रधानमन्त्री रहे।

पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया? शास्त्रीजी की मृत्यु को लेकर तरह-तरह के कयास लगाये जाते रहे। बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मानते है कि शास्त्रीजी की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं बल्कि जहर देने से ही हुई। पहली इन्क्वायरी राज नारायण ने करवायी थी, जो बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गयी ऐसा बताया गया। मजे की बात यह कि इण्डियन पार्लियामेण्ट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है। यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्रीजी का पोस्ट मार्टम भी नहीं हुआ। 2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जबाव दिया गया कि शास्त्रीजी के प्राइवेट डॉक्टर आर०एन०चुघ और कुछ रूस के कुछ डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जाँच तो की थी परन्तु सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। बाद में प्रधानमन्त्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी माँगी गयी तो उसने भी अपनी मजबूरी जतायी।

आउटलुक पत्रिका ने खोली पोल- शास्त्रीजी की मौत में संभावित साजिश की पूरी पोल आउटलुक नाम की एक पत्रिका ने खोली। 2009 में, जब साउथ एशिया पर सीआईए की नज़र (अंग्रेजी CIA’s Eye on South Asia) नामक पुस्तक के लेखक अनुज धर ने सूचना के अधिकार के तहत माँगी गयी जानकारी पर प्रधानमन्त्री कार्यालय की ओर से यह कहना कि “शास्त्रीजी की मृत्यु के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से हमारे देश के अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध खराब हो सकते हैं तथा इस रहस्य पर से पर्दा उठते ही देश में उथल-पुथल मचने के अलावा संसदीय विशेषधिकारों को ठेस भी पहुँच सकती है। ये तमाम कारण हैं जिससे इस सवाल का जबाव नहीं दिया जा सकता।”।

ललिता के आँसू- सबसे पहले सन् 1978  में प्रकाशित एक हिन्दी पुस्तक ललिता के आँसू में शास्त्रीजी की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढँग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था। उस समय (सन् उन्निस सौ अठहत्तर में) ललिताजी जीवित थीं। यही नहीं, कुछ समय पूर्व प्रकाशित एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकन्द में शास्त्रीजी के साथ गये थे, इस घटना चक्र पर विस्तार से प्रकाश डाला है। जुलाई 2012 में शास्त्रीजी के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य पर से पर्दा हटाने की माँग की थी। मित्रोखोन आर्काइव नामक पुस्तक में भारत से संबन्धित अध्याय को पढ़ने पर ताशकंद समझौते के बारे में एवं उस समय की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में विस्तरित जानकारी मिलती है।

भारतीय राजनीति को बदलकर रख देगी द कश्मीर फाइल्स!

द कश्मीर फाइल्स! विवेक की ये चिंगारी जो है न! भारतीय राजनीति को बदलकर रख देगी। खासकर युवा वर्ग को सुन्न कर जाएगी। मन और दिमाग सिहर जाना है। भले बी-टाउन के बड़े मॉन्स्टर ने इसे स्क्रीन काउंट नहीं जाने दिए । महज 500 स्क्रीन काउंट मिली है।

लेकिन…लेकिन! इसका जो वर्ड ऑफ माउथ है न! इसे कहाँ तक ले जाने वाला है ट्रेड पंडितों को भी नहीं मालूम है। दर्शक घरों से निकल रहे है और एक बार नहीं, बल्कि रिपीट वैल्यू है। पहले दिन कश्मीर फाइल्स ने साढ़े तीन करोड़ का बिज़नेस किया है। जो अब बढ़ता ही जाएगा। ग्राफ नीचे न आना। कल्ट, क्लासिक, मास्टरपीस कोई भी स्टेटस इसे न माप पाएंगे।

स्टीवन स्पीलबर्ग की ‘द शिंडलर लिस्ट’ के बाद ‘द कश्मीर फाइल्स’ ने सनक के होलोकॉस्ट में इंसानियत को शर्मसार होते देखा है। स्टीवन अपनी फिल्म से यहूदियों के दर्द में डूब कर निकले थे। उसी प्रकार विवेक ने कश्मीरी पंडितों की डल में तैरकर उनतक पहुँचे है और उन्हें धैर्य से सुना है। इस फाइल्स को ज्यादा से ज्यादा दर्शक मिलने चाहिए। ताकि देखें की सत्ता की पॉवर में आने पर क्या कर जाते है। राष्ट्र को सुरक्षित रखने के किये कैसा नेतृत्व आवश्यक है। इससे पहले किसी फिल्म मेकर को कश्मीर जाने की हिम्मत न होती थी। जाते भी तो सिर्फ़ बाहर से झाँकर निकल आते। दिल तक उतरने में डर लगता था ।

विवेक की कहानी व विज़ुअल्स देखकर दिमाग डिस्टर्ब है । वे दृश्य आँखें की स्क्रीन से हटने का नाम न ले रहे है। वे कहते है मास्टर का बेटा था। भटका हुआ मासूम नौजवान था। फौज के अत्याचारों से तंग आकर भटक गया। तो भैया ऐसा है अगर यूँ रहता तो कश्मीरी पंडित क्यों न भटके। काहे जुल्म सहते रहे। उनके दर्द पर झूठ के नैरेटिव रचे गए। इस काम में ख़ूब फंड व सारा तंत्र लगा बैठा। अब सच जूते भी पहन चुका है और दुनिया की सैर को भी निकल चुका है। भले सच को जूते पहनने में देर लगी। लेकिन बाहर निकला अवश्य ।

विवेक ने कश्मीर के बारे में जो मोनोलॉग लिखा है न! उसे बेहतरी से दर्शन कुमार ने कृष्णा पंडित के साथ मिलकर दर्शकों के बीच फेंका है। कश्मीर फाइल्स फिल्मी कंटेंट नहीं है बल्कि इमोशन है। बॉलीवुडिये रहनुमाओं ने तो आतताई खलनायकों को नायक के तौर पर पेश किया है और आगे भी करेगा। विवेक की मेहनत को समर्थन देकर आगे अनछुए विषयों को उठाने का हौसला दे। इस फाइल्स को आर्थिक तौर पर बड़ी सफलता देवे। इंटरनेशनल मूवी डेटा बेस यानी आईएमडीबी पर जाकर रेट अवश्य दे। इसे वहाँ भी अव्वल बनाएं।

साभार फेसबुक

सेवा के संकल्प संग जुटे हुए हैं समाजसेवी विवेक सेन

बिजनौर। संकल्प सेवा समिति की स्थापना वर्ष 2018 में धामपुर के फूलबाग कॉलोनी निवासी समाजसेवी विवेक सेन ने की थी। उनके साथ इस संस्था में जावेद अंसारी, शिवम कुमार, विपुल चौधरी, वैभव चौहान, अर्जुन सिंह, सुखवीर सिंह सहित कुछ अन्य युवा हैं। इन सभी के माध्यम से करीब 70 अन्य युवा अप्रत्यक्ष रूप से इस संस्था से जुड़े हैं। विवेक बताते हैं कि वैसे तो उनकी संस्था का प्रमुख कार्य समाजसेवा करना है लेकिन उन्होंने फेसबुक पर एक पेज बनाया हुआ है। इस पेज से करीब 24 हजार लोग जुड़े हैं। जब किसी को खून की आवश्यकता होती है वे फेसबुक पर मैसेज लिख देते हैं और संस्था से जुड़ा कोई भी युवा खून देने पहुंच जाता है। विवेक बताते हैं कि उनकी संस्था से बिजनौर के अलावा मुरादाबाद में भी कई युवा जड़े हैं।

उनके साथ जुड़े युवा खाद्य सामग्री एकत्रित करने के लिए खुद ही पैसा एकत्रित करते हैं, लेकिन इस सब नेक कार्य में विवेक की मां उर्मिला देवी इस  बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं। विवेक बताते हैं कि मां ने लॉक डाउन में जगह-जगह फंसे गरीबों और अन्य लोगों के लिए सुबह-शाम खाना तैयार करना शुरू कर दिया। करीब ढाई सौ लोगों का खाना हर रोज तैयार करने के बाद पैकेटों में भर कर बांटा गया। उर्मिला देवी ने बताया कि गरीबों की भूख के सामने उनकी ये मेहनत कुछ नहीं है। उनका हाथ बंटाने के लिए पड़ोस की ही महिला धर्मवती देवी के अलावा दीपक चौबे, सरिता आदि भी मदद करते हैं।

घुमंतू परिवारों के बने सहारा- कोरोना कॉल में सभी को भारी परेशानियों से जूझना पड़ा, लेकिन गरीबों को इसकी मार अधिक झेलनी पड़ी। धामपुर और आसपास के क्षेत्रों में बगदाद अंसार रोड और स्योहारा रोड पर कई ऐसे घुमंतू परिवारों को खाने तक के लाले पड़ गए थे। एक घुमंतू ने बताया कि जब वह एक-एक दाने के लिए तरस रहे थे, तब समाजसेवी विवेक सेन ने परिवार के बच्चों और अन्य लोगों को खाने के लिए भोजन के पैकेट बांटे।

धर्म नहीं जरूरी- संस्था में हिंदू और मुसलमान युवा जुड़े हैं। इनके लिए धर्म कभी आड़े नहीं आता। राम को खून की जरूरत पड़ती है तो रहीम तैयार रहता है और रहीम को खून की जरूरत होती है तो राम खून देने के लिए तैयार रहता है। संस्था सदस्यों का ये सांप्रदायिक सौहार्द भी क्षेत्र में चर्चा का विषय है।

आएदिन फेसबुक पर मदद के मैसेज आने और उनकी जरूरतों को पूरा करने का ये काम संकल्प सेवा समिति के सदस्य और पदाधिकारी कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय बेटी दिवस पर भी इस एनजीओ के सदस्य ने नहटौर की बिटिया अदीबा को खून दान किया।

किसी कार्य से बिजनौर गए भीम आर्मी जिला उपाध्यक्ष विवेक सेन ने लौटते समय रास्ते में देखा कि एक युवक पीछे बैठी वृद्धा को हाथ से पकड़ कर दूसरे हाथ से बाइक चला रहा है। ऐसा दृश्य देखकर विवेक सेन ने सहानुभूतिपूर्वक उनकी बाइक रुकवा कर पूरे मामले की जानकारी की, तो पता चला बाइक चला रहा युवक महिला का पुत्र है तथा वृद्ध महिला मुरादाबाद से दवाई लेकर लौट रही थी। रास्ते में तबीयत बिगड़ने पर कमजोरी की अवस्था में वह बाइक पर बैठने में भी लाचार थी। यह वाकया सुनकर विवेक सेन का दिल पसीज गया तथा उन्होंने अपनी आन-बान और शान नीला गमछा सड़क पर बिछा दिया तथा उस पर वृद्ध महिला को लेटा दिया। कुछ देर आराम करने के बाद जब महिला की स्थिति में सुधार हुआ, तो महिला को उन्होंने अपनी गाड़ी से अपने दोस्त सनी सिंह जाटव के द्वारा घर तक पहुंचा दिया। विवेक सेन की इस दरियादिली व कुशल व्यवहार पर वृद्ध महिला के परिजनों ने उनकी जमकर सराहना की।

वहीं स्योहारा थाना क्षेत्र के ग्राम महमूदपुर सानी में दामाद ने पत्नी के ससुराल न जाने पर सास-ससुर को चाकू गोद कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। बीच-बचाव में आए अपने साढू फहीमुद्दीन पर भी चाकू से कई वार कर उसे भी गंभीर रूप से घायल कर दिया था। परिजनों ने फहीमुद्दीन को घायल हालत में नहटौर तिराहा स्थित प्रयास हास्पिटल में भर्ती कराया था। फहीमुद्दीन को भर्ती कराने के बाद लगभग सभी परिजन सास, ससुर को सुपुर्देखाक के दौरान अपने घर लौट गए थे। अस्पताल में तीमारदारी में अस्पताल स्टाफ के अलावा चंद लोग ही मौजूद थे। देर रात करीब आठ बजे फहीमुद्दीन को उपचार के दौरान खून की जरूरत पड़ी, तो चिकित्सक ने मौजूद लोगों से तत्काल एबी प्लस ब्लड का इंतजाम करने को कहा। रात में जब कहीं से भी खून नहीं मिला, तो किसी परिचित ने विवेक सेन को फोन कर हास्पिटल में तत्काल खून की जरूरत की जानकारी दी। विवेक  सेन का ब्लड ग्रुप भी एबी प्लस है। विवेक गांव में आयोजित उस समय एक बैठक में व्यस्त थे। जैसे ही विवेक को इस बात की जानकारी हुई, तो वह बैठक को बीच में ही छोड़कर तत्काल प्रयास हास्पिटल पहुंचे तथा फहीमुद्दीन को खून देकर उसकी जान बचाई। देर रात फहीमुद्दीन के परिजनों के वापस लौटने पर जब उन्हें हिंदु युवक द्वारा खून देने की जानकारी हुई, तो उन्होंने विवेक सेन की मुक्त कंठ से सराहना की। विवेक सेन के इस दरियादिली की जानकारी मिलने पर देर रात तक घायल फहीमुद्दीन की मदद करने को विवेक सेन के समर्थक अस्पताल में ही मौजूद रहे।

इसी तरह एक बार स्योहारा मार्ग स्थित ग्राम हसनपुर पालकी में चिंगारी से कूड़ी में लगी आग तेज हवा के चलते कुछ ही समय में आसपास स्थित खेतों तक पहुंच गई। ग्रामीण जब तक कुछ समझ आग बुझाने का कोशिश करते आग ने कई घरों को भी अपनी चपेट में ले लिया। सूचना मिलने पर जिला पंचायत सदस्य पद के प्रत्याशी विवेक सेन अपने समर्थकों सहित मौके पर पहुंच गए। विवेक के साथ आए युवा अपने हाथों में बाल्टी व अन्य उपकरण लेकर आग बुझाने में जुट गए। काफी देर बाद फायर बिग्रेड की गाड़ी भी मौके पर पहुंच गई। बाद में कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका।

चंद्रशेखर आजाद और उनका फरारी जीवन

शहादत के 91वें साल (27 फरवरी) पर विशेष

शहादत के 91वें साल (27 फरवरी) पर विशेष

चंद्रशेखर आजाद और उनका फरारी जीवन

गुलाम भारत को आजाद कराने में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले शहीद-ए-आजम चंद्रशेखर आजाद की शूरता-वीरता के किस्से आम हैं। काकोरी कांड के बाद आजाद; कभी हरिशंकर ब्रह्मचारी बने, कभी पंडित जी और कभी अंग्रेज सरकार के अफसर के ड्राइवर भी। क्रांतिकारी दल को मजबूत करने के लिए उन्होंने गाजीपुर के एक मठ के बीमार महंत से दीक्षा इसलिए ली कि उनके निधन के बाद मठ की संपत्ति क्रांति के काम आएगी। तीन-चार महीने महंत के मठ में समय बिताने के बाद जब संपत्ति प्राप्त करने के कोई आसार नजर नहीं आए तो वह पुनः क्रांति दल में सक्रिय हो गए। काकोरी कांड में फरारी के बाद आजाद के यह किस्से इतिहास में ही दफन होकर रह गए। आम लोगों के जेहन में उनके फरारी जीवन की जिंदगी घर नहीं कर पाई। आज उनकी शहादत का 91वां वर्ष है। आइए! आजाद के जीवन से जुड़े इन किस्सों से जुड़ा जाए..

सातार नदी का तट और हरिशंकर ब्रह्मचारी

काकोरी कांड में कई साथी तो अंग्रेज हुकूमत के हत्थे चढ़ गए लेकिन आजाद ‘आजाद’ ही रहे। हिंदुस्तानी विभीषण और अंग्रेजी सेना की खुफिया आजाद को पकड़ने के लिए पूरे देश में सक्रिय रही लेकिन आजाद पकड़े नहीं जा सके। फरार होने के बाद आजाद का अगला ठिकाना झांसी बना। खतरा देख आजाद ढिमरापुर में सातार नदी के तट पर कुटी बनाकर रहने लगे। यहां उन्होंने अपना नाम रखा ‘हरिशंकर ब्रह्मचारी’। इस बीच उनका झांसी आना-जाना भी बना रहा। ब्रह्मचारी के रूप में आजाद प्रवचन देते थे और बच्चों को पढ़ाते-लिखाते भी थे। एक दिन झांसी से साइकिल से लौटते समय इनाम के लालच में‌ दो सिपाहियों ने रोक कर उनसे थाने चलने को कहा।
सिपाहियों ने कहा-‘ क्यों तू आजाद है?’ आजाद ने उन्हें समझाते हुए कहा- आजाद जो है सो तो है। हम बाबा लोग होते ही आजाद हैं। हमें क्या बंधन? आजाद ने हर तरह से बचने की कोशिश की। सिपाहियों को हनुमान जी का डर भी दिखाया लेकिन वह मानने को तैयार नहीं हुए। सिपाहियों के साथ थोड़ी दूर चलकर आजाद बिगड़े और कहा कि तुम्हारे दरोगा से बड़े हमारे हनुमान जी हैं। हम तो हनुमान जी का ही हुक्म मानेंगे। हमें हनुमान जी का चोला चढ़ाना है। कहते हुए आजाद भाग खड़े हुए। बलिष्ठ शरीर देखकर सिपाही पकड़ने के लिए उनके पीछे भागने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

अचूक निशाने की अग्निपरीक्षा!

फरारी के दौरान झांसी के पास खनियाधाना के तत्कालीन नरेश खड़क सिंह जूदेव के यहां आजाद का आना-जाना हो गया। आजाद अपने साथी मास्टर रूद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर और भगवानदास माहौर के साथ जूदेव के यहां अतिथि बनकर गए। वह राजा साहब के छोटे भाई बने हुए थे और उनके दरबार के अन्य लोगों के लिए ‘पंडित जी’। राजा साहब की कोठी के बगीचे में दरबार जमा हुआ था। बात निशानेबाजी की शुरू हुई। आजाद की बातें दरबार में उपस्थित ठाकुरों को पसंद नहीं आई। राजा के दरबारियों ने निशानेबाजी की परीक्षा लेनी चाही। बातों-बातों में आजाद के हाथों में बंदूक भी थमा दी गई। उनके साथी मास्टर रूद्र नारायण को आजाद की परीक्षा लेना उचित नहीं लगा। उन्हें डर था कि कहीं भेद खुल न जाए। उन्होंने बहाने से आजाद से बंदूक ले ली। भगवानदास माहौर ने बाल हठ करते हुए निशाना साधने की जिद की। बंदूक भगवानदास के हाथ में आ गई । एक पेड़ की सूखी टहनी पर सूखा अनार खोसा हुआ था। आजाद ने उन्हें अचूक निशानेबाजी की बारीक बातें बताई। भगवानदास माहौर के एक निशाने में सूखी टहनी पर खोसा हुआ अनार उड़ गया। इसके बाद माहौल सामान्य हुआ और आजाद अपने साथियों के साथ लौट आए।

बनारसी पितांबर और रेशमी कुर्ता-साफा

आजाद और उनके साथियों का क्रांतिकारी दल शुरुआती दौर में आर्थिक संकटों से गुजर रहा था। इसी बीच बनारस में क्रांति दल के साथियों को पता चला कि गाजीपुर में एक मठ के महंत बीमारी की अवस्था के चलते ऐसे लड़के की तलाश में थे, जिसको सन्यासी बनाकर मठ जिम्मेदारी सौंप दें। क्रांतिकारी दल की आर्थिक दिक्कतों को दूर करने के लिए आजाद ने अपने साथियों का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्हें महंत का शिष्य बनना था। साथी लोग लेकर उन्हें गाजीपुर के मठ में पहुंचे। यहां आजाद का नाम चंद्रशेखर तिवारी बताया गया। ‘आजाद’ उपनाम की चर्चा ही नहीं की गई। पंडित लड़का पाकर महंत जी काफी खुश हुए और अगले ही दिन मठ में आजाद को दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया। दीक्षा के पहले सिर मुंड़ाकर उन्हें रेशमी साफा पहनाया गया। शरीर पर कीमती बनारसी पीतांबर और रेशमी कुर्ता हल्के भगवा रंग का धारण कराया गया। माथे पर शुद्ध चंदन-केसर का लेप भी। इस सबमें मठ के हजार रुपए तक खर्च हुए होने का अनुमान भी क्रांतिकारी दल के सदस्यों ने लगाया था। आजाद मठ में करीब 4 महीने रहे। इस बीच महंत पूरी तरह स्वस्थ हो गए। आजाद को जब यह महसूस हुआ कि उनका क्रांतिकारी दल का संपत्ति प्राप्ति का सपना यहां पूरा नहीं होगा तो आजाद एक दिन चुपके से वहां से खिसक लिए।

मजदूर जीवन

छात्र जीवन में आजाद का पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मन युद्ध कौशल सीखने, तलवार आदि चलाने में लगता था। इसके बाद भी उन्हें तहसील में नौकरी मिल गई थी लेकिन आजाद ‘आजाद’ थे। उन्हें अंग्रेजों की नौकरी पसंद कैसे आती? एक दिन वह एक मोती बेचने वाले के साथ मुंबई चले गए। कुछ मजदूरों की सहायता से उन्हें जहाजों को रंगने वाले रंगसाज का काम भी मिल गया। मजदूरी से मिले पैसों से वह अपना जीवन चलाते थे। मजदूरों की मदद से लेटने भर की जगह भी एक कोठरी में मिली लेकिन उस घुटन भरे माहौल में आजाद का मन नहीं लगा। कभी-कभी तो वह रात भर सिनेमा हाल में बैठे रहते। नींद लगने पर ही अपने बिस्तर पर आते। मुंबई का यंत्रवत जीवन आजाद को रास नहीं आया लेकिन मजदूर जीवन का अनुभव लेकर एक दिन बनारस जाने वाली ट्रेन में बिना टिकट बैठ गए। यहां उन्नाव के शिव विनायक मिश्र से उनकी भेंट हुई। उनकी मदद से संस्कृत पाठशाला में उन्हें प्रवेश मिल गया। 1921 के असहयोग आंदोलन में संस्कृत कॉलेज बनारस पर धरना देते हुए ही वह पहली बार गिरफ्तार हुए थे और 15 बेंतों की सजा हुई थी। यहीं से बालक चंद्रशेखर तिवारी चंद्र शेखर आजाद बना और आजीवन आजाद ही रहा।

जब अंग्रेज सिपाही को पटक-पटक कर मारा

चंद्रशेखर आजाद बनारस रेलवे स्टेशन पर रामकृष्ण खत्री और बनवारी लाल (जो काकोरी केस में इकबाली मुलजिम बने और 4 वर्ष की सजा मिली थी) के साथ प्लेटफार्म पर टहल रहे थे। कुछ अंग्रेज सिपाही भी प्लेटफार्म पर थे। एक अंग्रेज सिपाही ने प्लेटफार्म पर जा रही हिंदुस्तानी नौजवान बहन के मुंह पर सिगरेट का धुआं फेंका। आजाद को अपनी हिंदुस्तानी बहन के साथ इस तरह की अभद्रता बर्दाश्त नहीं हुई और तुरंत अंग्रेज सिपाही पर झपट पड़े। लात, घूंसा थप्पड़ मारकर अंग्रेज सिपाही को गिरा दिया। अंग्रेज सिपाही इतना डर गया कि अपने दोनों हाथ ऊपर करके मार खाता रहा और कहता रहा-‘आई एम सॉरी, रियली आई एम वेरी सॉरी’। उसके अन्य साथी तो भाग ही खड़े हुए। आजाद ने तब अपने साथियों से कहा भी था कि इस साले अंग्रेज को सबक सिखाना जरूरी था ताकि आगे किसी हिंदुस्तानी बहन-बेटी के साथ छेड़खानी न कर सके।

ब्रह्मचारी का ‘ब्रम्हचर्य’ तोड़ने की वह कोशिशें

चंद्र शेखर आजाद ने देश को आजाद कराने की खातिर शादी न करने का वृत ले रखा था। आजीवन ब्रम्हचर्य भी उनका दृढ़ संकल्प था। उनके जीवन से जुड़े यह दो किस्से बड़े महत्वपूर्ण हैं। फरारी जीवन में ढिमरापुर में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से सातार नदी के किनारे रहते समय गांव की एक बाला उनके पीछे पड़ गई। किसी भी तरह उसके प्रभाव में न आने पर उस बाला ने अश्रु सरिता से मोहित-प्रभावित करने की भी कोशिश की लेकिन आजाद तो आजाद थे। गांव की बाला उनके पीछे लगाने में गांव के ही एक चतुर नंबरदार की साजिश थी। किसी भी तरह आजाद के बाला के प्रभाव में न आने पर वह नंबरदार आजाद का भक्त हो गया। उस नंबरदार ने आजाद को अपना पांचवा भाई मान लिया। उसे अपने सगे भाइयों से ज्यादा आजाद पर विश्वास हो चुका था। यहां तक कि उसने अपनी तिजोरी की चाबी भी आजाद को सौंप दी थी। बंदूकें भी उन्हीं की देखरेख में रहने लगीं। यह किस्सा स्वयं आजाद ने झांसी में अपने साथियों को सुनाया था।
दूसरा किस्सा, आजाद की एक जमींदार मित्र के घर का है। आजाद एक बार अपने धनी जमींदार मित्र के यहां रुके थे। मित्र को अचानक एक दिन के लिए बाहर जाना पड़ा। आजाद ने अन्यत्र रुकने का प्रस्ताव किया लेकिन जमींदार मित्र नहीं माने। आजाद उनके विशाल भवन के ऊपरी खंड में ठहरे थे। रात में कमरे में सो रहे थे। आधी रात के बाद जमींदार की विधवा बहन कमरे में आ गई। उसने कामेच्छा से धीरे से आजाद को जगाया। 24:00 अपने कमरे में विधवा बहन को देखकर आजाद को काटो तो खून नहीं। उन्होंने बहन को समझाया। बताया भी कि सांसारिक बंधन में बंधने का उनके पास अवसर ही नहीं है। विधवा बहन के न समझने पर आजाद बिजली की गति से बाहर निकले और तिमंजिले भवन की दीवार से नीचे कूद गए। कड़ाके की सर्दी वाली वह रात आजाद ने जंगल में एक पेड़ के नीचे गुजारी। कूदने के कारण चोट भी लगी लेकिन अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया।

आजीवन आजाद रहे आजाद जी को बलिदान दिवस पर शत शत नमन!

∆ गौरव अवस्थी ‘आशीष’
रायबरेली/उन्नाव

कोरोनाकाल की त्रासदी पर मरहम लगाती 51 सच्चाई- हेमंत पाल 

तीसरी समीक्षा- किताब : ताकि सनद रहे  (51 कोरोना योद्धाओं की सच्ची कहानियों का संग्रहणीय दस्तावेज़) संकलन-संपादन : गौरव अवस्थी समीक्षक: श्री हेमंत पाल, स्थानीय संपादक, सुबह सवेरे, इंदौर (म.प्र.)     

कोरोना त्रासदी की पीड़ा अंतहीन है। जीवन का ये वो दौर था, जो अनसोचा और अनसमझा था। इस महामारी के सामने सारी सरकारी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो गई, जो स्वाभाविक भी था। किसी भी शहर, गांव या कस्बे में आबादी के अनुमान से ही स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाई जाती  है, पर कोरोना ने उन सारे अनुमानों को गलत साबित कर दिया। प्रशासन भी समझ नहीं पा रहा था कि वो कैसे व्यवस्थाएं जुटाए, दवाइयों का इंतजाम करें, मरीजों और उनके परिजनों के लिए खाने-पीने की जिम्मेदारी पूरी करे और सबसे बड़ा काम ये था कि महामारी से संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार करना।     लेकिन, ये सब हुआ, जिससे जितना हो सकता था, उसने वो सब किया। जो करने वाले थे, वे दुनिया के अलग ही लोग थे। कहते हैं कि इस धरती पर कहीं तो कोई है, जो सबकुछ संचालित कर रहा है। ईश्वर तो हर जगह प्रकट नहीं हो सकता, तो वह अपने ऐसे प्रतिरूपों को भेज देता है, जो ऐसी जिम्मेदारियां वहन कर लेते हैं, जो मनुष्य के बस से बाहर निकल जाती है। कोरोना काल में हर शहर, हर कस्बे और हर गांव में ऐसे कोरोना योद्धा अवतार की तरह सामने आए, जिन्होंने मानव धर्म का पालन किया। 

इस किताब की 51 सच्चाइयां ऐसे ही ईश्वर अवतारों का संकलन है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए संक्रमित और परेशान लोगों के लिए दवाइयां भी जुटाई, स्वास्थ्य सुविधाएं भी और उनके परिजनों के लिए खाने-पीने के इंतजाम में भी कमी नहीं आने दी। उनका ये कर्म पूरी तरह नि:स्वार्थ और सेवा का चरमोत्कर्ष था। ऐसे लोगों को उनकी सेवा भावनाओं के लिए सिर्फ धन्यवाद नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कोरोना काल में जो किया, वो बरसों नहीं, सदियों तक याद किया जाएगा। 

गौरव अवस्थी का ये किताब निकालने का प्रयास अतुलनीय है। ये अपनी तरह का अनोखा प्रयास है, जो वंदनीय है। किताब की 51 कथाओं में कोरोना योद्धाओं के योगदान को जिस तरह शब्दों में बांधा है, वो बेजोड़ है। नि:स्वार्थ भाव से किया गया उनका ये योगदान भी किसी कोरोना योद्धा से कम नहीं है। जाने-अनजाने इन कोरोना योद्धाओं के साथ गौरव अवस्थी का प्रयास तारीफ के शब्दों से कहीं बहुत विशाल है।

दुनियाभर में जब महामारी चरम पर थी, तब हम और आप घरों में बैठे थे! ऐसे में कई ऐसे लोग भी थे, जो जान की परवाह न करके दूसरों की जान बचाने, उनके लिए दवाइयों का इंतजाम करने, ऑक्सीजन का इंतजाम करने और जो सारी कोशिशों के बाद भी बच नहीं सके उनके अंतिम क्रिया कर्म में लगे थे। इन्हें किसी ने कहा नहीं था और इसके पीछे उनका कोई स्वार्थ था! जो कुछ था, वो इंसानियत और मानवीयता थी। ऐसे भी लोग थे, जिन्होंने अपने वाहनों को एम्बुलेंस बना दिया था। सिर्फ युवा ही नहीं, महिलाएं और बुजुर्ग भी जान की परवाह न करते हुए महीनों लगे रहे।      किसी ने अपनी शादी को आगे बढ़ा दिया और वो सारा पैसा मरीजों की मदद में खर्च कर दिया। कहीं सरकारी अफसरों ने अपनी सीमा से आगे जाकर जनसेवा की ताकि टूटती सांसों में जान फूंकी जा सके। उन्हें टूटते बोल्ट के कारण खत्म होती ऑक्सीजन के पीछे लोगों की जान दिखाई दे रही थी। ये सिर्फ 51 सच्चे अनुभव ही नहीं, परोपकार के 51 शिखर हैं। जब एक-एक सांस की आस टूट रही थी, तब यही लोग थे, जिन्होंने उम्मीद जगाई कि हम हैं न! ये दुनिया उतनी बुरी नहीं है, जितना समझा जाता है, वास्तव में ऐसे ही लोगों से इस दुनिया में जीवन के रंग भी हैं।

’57 की क्रांति के गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह

शौर्य दिवस (18 जनवरी) पर विशेष

57 की क्रांति के गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह

पिछले दिनों पत्रकार-इतिहासकार सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ में मुक्तिसंग्राम और आदिवासी’ पढ़ते हुए 57 की क्रांति में छत्तीसगढ़ में विद्रोह की ज्वाला भड़काने वाले वीर नारायण सिंह के साथ हनुमान सिंह की वीरगाथा सामने आई। गाथा में इस बात का जिक्र पढ़कर मन और गौरवान्वित हो गया कि अंग्रेजी सेना के शिविर में ही सार्जेंट कैप्टन सिडवेल की तलवार के वार से हत्या करने वाले 5 फीट 4 इंच लंबे बलिष्ठ वीर हनुमान सिंह बैसवारे ( उत्तर प्रदेश के रायबरेली-उन्नाव के विशेष भू-भाग को मिलाकर बना क्षेत्र) के ही रहने वाले थे। पुस्तक में संदर्भ के तौर पर इतिहासकार डॉ राम कुमार बेहार किताब ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास’ को भी उद्धृत किया गया।
इतिहास कि इन किताबों में दर्ज संक्षिप्त कथा बताती है कि बैसवारे के इस गुमनाम योद्धा वीर हनुमान सिंह ने छत्तीसगढ़ में महाविद्रोह के समय रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी) में आज से 163 साल पहले 18 जनवरी 1858 को अंग्रेजी सेना के कैंप में कैप्टन सिडवेल को तलवार के वार करके मार डाला था। कैप्टन सिडवेल के नेतृत्व में नागपुर से 100 सैनिकों की अंग्रेजी पल्टन को छत्तीसगढ़ में विद्रोह दबाने के लिए रायपुर भेजा गया था। इसी पल्टन‌ में बैसवारे के वीर हनुमान सिंह मैगजीन लश्कर के रूप में शामिल थे। छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के महानायक पहाड़ी अंचल सोनाखान के जमींदर वीर नारायण सिंह को 10 दिसंबर 1857 को खुलेआम रायपुर के प्रमुख चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया। वीर नारायण सिंह को चौराहे पर तोपों से उड़ाकर छत्तीसगढ़ अंचल में महाविद्रोह को दबाने की चेष्टा अंग्रेज हुकूमत ने की थी। अंग्रेजों ने यह मान लिया था कि अब छत्तीसगढ़ अंचल में विद्रोह नहीं होगा लेकिन उन्हें यह अंदाज नहीं था कि क्रांति की ज्वाला उनके अपने सैन्य शिविर में ही धधक रही है। वीर नारायण सिंह की शहादत पर वीर हनुमान सिंह का खून खौल उठा और बदला लेने के लिए ही उन्होंने 18 जनवरी 1858 की रात अपने दो साथियों की मदद से कैप्टन सिडवेल को तलवार से 9 वार करके मौत की नींद सुला दिया था। सिडवेल को मारने के बाद वीर हनुमान सिंह ने सैन्य शिविर में घूम घूम कर बदला लेने का ऐलान किया और भारतीय सिपाहियों को विद्रोह में शामिल होने के लिए खुले रुप में साथ देने के लिए ललकारा लेकिन कोई दूसरा सिपाही उनकी जैसी हिम्मत नहीं जुटा पाया। सिडवेल की हत्या के बाद अंग्रेजी सेना के शिविर में हड़कंप मच गया। अंग्रेजी सेना ने हनुमान सिंह का साथ देने वाले दोनों सिपाहियों को पकड़ लिया लेकिन वीर हनुमान सिंह साथियों का साथ ना मिलने पर छत्तीसगढ़ अंचल के पहाड़ी जंगलों में छिप गए। सिडवेल की हत्या के बाद भी वीर हनुमान सिंह का अंग्रेजों से बदला लेने का जज्बा कम नहीं हुआ। 2 दिन बाद 20 जनवरी 1858 की आधी रात को वीर हनुमान सिंह तलवार लेकर अकेले ही शेर की मांद में शेर के शिकार का जज्बा रखते हुए रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की हत्या के इरादे से उसके बंगले में घुसे और इलियट जिस कमरे में सो रहा था, उसका दरवाजा तोड़ने का प्रयास किया लेकिन दरवाजे के मजबूत होने से प्रयास असफल रहा। इसके बाद अपनी खून की प्यासी तलवार के साथ वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ के जंगलों और पहाड़ों में गुम हो गए। उसके बाद उनका कोई भी पता नहीं चला। चार्ल्स इलियट के आदेश पर ही वीर नारायण सिंह को रायपुर के चौराहे पर तोपों से उड़ा दिया गया था। इसीलिए वीर हनुमान सिंह इलियट को भी मार डालना चाहते थे लेकिन उनके मजबूत इरादों पर एलियट के बंगले के मजबूत दरवाजों ने पानी फेर दिया। अंग्रेज हुकूमत ने उनको पकड़ने के लिए हजारों जासूसों और गुप्तचरों का जाल बिछाया। ₹500 का इनाम भी घोषित किया (यह आज के 5‌ लाख रुपए से ज्यादा ही है) लेकिन अंग्रेज सेना वीर हनुमान सिंह को पकड़ने में कभी भी कामयाब नहीं हो सकी। बैसवारे के महानायक राना बेनी माधव बक्श सिंह की तरह ही वीर हनुमान सिंह भी अंग्रेजों के हत्थे नहीं चढ़े। राना बेनी माधव की तरह बाकी का जीवन उन्होंने जंगलों-पहाड़ों में ही गुजार कर जीवन लीला पूरी की। रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट के साथ उस रात बंगले में ही सोए हुए लेफ्टिनेंट स्मिथ ने उस रात के भयानक मंजर के बारे में लिखा भी-"यदि उस रात हम लोग जगाए ना गए होते तो लेफ्टिनेंट इलियट और मैं तो सोए सोए ही काट डाले गए होते और बंगले के अंदर अन्य निवासियों का भी यही हाल हुआ होता।"

सिडवेल की हत्या के तुरंत बाद अंग्रेज सेना ने वीर हनुमान सिंह के दो साथ ही सिपाहियों को कैद कर लिया था। डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट चार्ल्स इलियट की अदालत में सुनवाई चली और 2 दिन बाद ही रायपुर के चौराहे पर सरेआम वीर हनुमान सिंह के नेतृत्व में अल्पकालिक विद्रोह में साथ देने वाले उनके 17 साथियों-गाजी खान (हवलदार), अब्दुल हयात, ठाकुर सिंह, पन्नालाल, मातादीन, ठाकुर सिंह, अकबर हुसैन, बुलेहू दुबे, लल्ला सिंह, बदलू, परमानंद, शोभाराम, दुर्गा प्रसाद, नजर मोहम्मद, देवीदीन और जय गोविंद (सभी गोलंदाज) को 22 जनवरी 1957 को खुलेआम फांसी पर चढ़ा कर सजा-ए-मौत दे दी गई। (रायपुर गजेटियर पेज 71)

वीर हनुमान सिंह छत्तीसगढ़ में सन’ 57 की क्रांति के अग्रणी नायकों में गिने-माने जाते हैं। हालांकि महाविद्रोह की चर्चा जब भी चलती है, तब छत्तीसगढ़ अंचल से वीर नारायण सिंह का ही नाम लिया जाता है, जबकि हनुमान सिंह का दुस्साहस और शौर्य वीर नारायण सिंह से ज्यादा बड़ा था। वीर नारायण सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत द्वारा अपनी ज़मीदारी छीने जाने के विरोध में विद्रोह किया था लेकिन वीर हनुमान सिंह तो एक साधारण सिपाही थे। उनकी संपत्ति अंग्रेजों ने जब्त नहीं की थी। इतिहास में उन्हें वीर नारायण सिंह से ज्यादा नहीं तो कम भी आंका नहीं जाना चाहिए था लेकिन इतिहास ने वीर हनुमान सिंह के साथ न्याय नहीं किया। इतिहासकार मानते हैं कि अगर अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाहियों ने साथ दिया होता तो वीर हनुमान सिंह की बहादुरी से छत्तीसगढ़ अंचल में एक बार फिर क्रांति की ज्वाला भड़क उठती। अंग्रेजों को छत्तीसगढ़ छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता। रायबरेली-उन्नाव के विशेष भू-भाग को मिलाकर बना बैसवारा अपने शौर्य और वीरता के लिए जाना जाता है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में राना बेनी माधव सिंह (शंकरपुर-रायबरेली) और राजा राव राम बक्श सिंह (बक्सर-उन्नाव) की शौर्य गाथा यहां जन-जन के मन में बसी है। 1857 के विद्रोह में बेगम हजरत महल का साथ देने वाले राना बेनी माधव बख्श सिंह के किले को अंग्रेजों ने तोपों से उड़ा दिया था। राना बेनी माधव बहराइच होते हुए हिमालय की वादियों में खो गए। अंग्रेज हुकूमत उनका कोई पता नहीं लगा पाई। राजा राव राम बक्स सिंह अंग्रेजों ने बक्सर में पेड़ पर सरेआम फांसी पर लटकाकर विद्रोह को कुचलने की हिमाकत की थी। '57 की क्रांति के इस गुमनाम योद्धा ने छत्तीसगढ़ अंचल में अकेले ही क्रांति की लौ जलाकर अपना और बैसवारे का नाम इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए अमर कर दिया। समय रहते समाज और सरकार की ओर से वीर हनुमान सिंह के इतिहास को ढूंढने का उद्यम किया जाता तो आज वह अपने बैसवारे में ही गुमनाम न होते। होना तो यह चाहिए था कि 18 जनवरी (अंग्रेजी सैन्य अफसर सिडवेल की हत्या की तारीख) को उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ अंचल में शौर्य दिवस के रूप में मनाया जाता। दुर्भाग्यवश अपने इस महान सपूत के बारे में बैसवारे के लोग भी डेढ़ सौ वर्ष से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद अपरिचित ही हैं जबकि जरूरत थी कि वीर हनुमान सिंह की गौरव गाथा का गान राना बेनी माधव सिंह एवं राजा राव राम बक्स सिंह की तरह ही इस अंचल में जन-जन के बीच गाया जाता। आजादी का अमृत महोत्सव चल रहा है। इस अमृत महोत्सव में भी आजादी का यह महानायक विस्मृत ही है। न छत्तीसगढ़ की सरकार ने वीर हनुमान सिंह को वह सम्मान दिया और न उत्तर प्रदेश सरकार ही सम्मान देने के बारे में सोच पाई है। समाज तो सोया हुआ है ही।

बैसवारे के इस गुमनाम योद्धा को शौर्य दिवस (18 जनवरी 1858) पर कोटि-कोटि नमन!!

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

कमाल को श्रद्धांजलि उनकी सौम्यता, विनम्रता सीखने से होगी – के. विक्रम राव

कमाल को श्रद्धांजलि उनकी सौम्यता, विनम्रता सीखने से होगी – के. विक्रम राव

यूपी प्रेस क्लब में दी गई श्रद्धांजलि

लखनऊ। वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान को श्रद्धांजलि देते हुए इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के अध्यक्ष के. विक्रम राव ने कहा कि कमाल हम सब पत्रकारों से जुदा था। उससे हमें सीखना चाहिये, जैसे उसकी विनम्रता। उसे जो कहना होता था वो अपनी बात बड़े सहज़ ठंग से कहता है। उसका आखरी विश्लेषण देखियेगा, जिसमें उसने सभी पार्टियों में हो रही दलबदल पर बताया था। उसका विश्लेषण निष्पक्ष, सौम्य और सटीक था। हम कमाल को असली श्रद्धांजलि, उसकी सौम्यता और विनम्रता को अपने अंदर सम्मलित कर ही दे सकते हैं। श्री राव ने कहा कि एक संदेश दे गया कमाल। जिस पर हमें विचार करना होगा। कमाल ने अपने आँखें दान कर दीं, जिससे दो दृष्टिहीन को दुनिया देखने को मिल रहीं है।

नेशनल फेडरेशन ऑफ न्यूज़पेपर एम्पलाइज के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवगोपाल मिश्रा ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि कमाल खान जब भी रेलवे की कोई स्टोरी करते थे तो मुझसे पूछा करते थे। मुझे याद है एक बार रायबरेली कोच फैक्ट्री के विषय में स्टोरी पर उन्होंने मुझ से चर्चा की थी और मेरे कहने पर उन्होंने उस स्टोरी में दोनों पक्षों का मत रखा।


यूपी वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन द्वारा यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी, प्रदेश महामंत्री प्रेम कांत तिवारी, लखनऊ मंडल वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सचिव शिवशरण सिंह, लखनऊ मंडल के महामंत्री के विश्वदेव राव, यूपी प्रेस क्लब के संयुक्त सचिव इफ्तिदा भट्टी, शिव विजय सिंह, प्रदीप उपाध्याय, महिमा तिवारी, अशोक नवरत्न, इश्तियाक अहमद, अब्दुल वहीद, जुबेर खान, आरिफ मुकीम, अभिषेक मिश्र, विजय मिश्र, शाश्वत तिवारी, राजीव बाजपेई आदि पत्रकार गण ने पुष्प अर्पित किए।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी हेतु सम्मानित हैं पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव व उनका परिवार

विश्व हिंदी दिवस (10 जनवरी) : तीन पीढ़ियों संग हिंदी के विकास में जुटा है पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव का परिवार

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हिंदी हेतु कई सम्मानों से विभूषित हैं पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव व उनका परिवार

लखनऊ। ‘विश्व हिन्दी दिवस’ प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना व हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। हिंदी को लेकर तमाम संस्थाएँ, सरकारी विभाग व विद्वान अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं। इन सबके बीच उत्तर प्रदेश में वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव का अनूठा परिवार ऐसा भी है, जिसकी तीन पीढ़ियाँ हिंदी की अभिवृद्धि के लिए न सिर्फ प्रयासरत हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी कई देशों में सम्मानित हैं।

वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव के परिवार में उनके पिता श्री राम शिव मूर्ति यादव के साथ-साथ पत्नी आकांक्षा यादव और दोनों बेटियाँ अक्षिता व अपूर्वा भी हिंदी को अपने लेखन से लगातार नए आयाम दे रही हैं। देश-दुनिया की तमाम पत्रिकाओं में प्रकाशन के साथ श्री कृष्ण कुमार यादव की 7 और पत्नी आकांक्षा की 3 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हिंदी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में इस परिवार का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अग्रणी है।

‘दशक के श्रेष्ठ ब्लॉगर दम्पति’ सम्मान से विभूषित यादव दम्पति को नेपाल, भूटान और श्रीलंका में आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मेलन’ में ‘परिकल्पना ब्लॉगिंग सार्क शिखर सम्मान’ सहित अन्य सम्मानों से नवाजा जा चुका है। जर्मनी के बॉन शहर में ग्लोबल मीडिया फोरम (2015) के दौरान ‘पीपुल्स चॉइस अवॉर्ड’ श्रेणी में सुश्री आकांक्षा यादव के ब्लॉग ‘शब्द-शिखर’ को हिंदी के सबसे लोकप्रिय ब्लॉग के रूप में भी सम्मानित किया जा चुका है।

सनबीम स्कूल, वरुणा, वाराणसी में अध्ययनरत इनकी दोनों बेटियाँ अक्षिता (पाखी) और अपूर्वा भी इसी राह पर चलते हुए अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई के बावजूद हिंदी में सृजनरत हैं। अपने ब्लॉग ‘पाखी की दुनिया’ हेतु अक्षिता को भारत सरकार द्वारा सबसे कम उम्र में ‘राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है, वहीं अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लॉगर सम्मेलन, श्रीलंका (2015) में भी अक्षिता को “परिकल्पना कनिष्ठ सार्क ब्लॉगर सम्मान” से सम्मानित किया गया। अपूर्वा ने भी कोरोना महामारी के दौर में अपनी कविताओं से लोगों को सचेत किया।

पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव का कहना है कि, सृजन एवं अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिंदी दुनिया की अग्रणी भाषाओं में से एक है। डिजिटल क्रान्ति के इस युग में हिन्दी में विश्व भाषा बनने की क्षमता है। वहीं, उनकी पत्नी आकांक्षा यादव का मानना है कि हिन्दी भाषा भारतीय संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम होने के साथ-साथ भारत की भावनात्मक एकता को मजबूत करने का सशक्त माध्यम है। आप विश्व में कहीं भी हिन्दी बोलेगें तो आप एक भारतीय के रूप में ही पहचाने जायेंगे।

डाकघर में आधार कार्ड बनाने की सुविधा शुरू


नजीबाबाद (बिजनौर)। डाकघरों में स्वीकृत आधार केंद्रों पर कई माह से अधिक समय से आधार कार्ड नहीं बनने और उनमें विभिन्न परिवर्तन की सुविधा ना मिलने की शिकायत के बाद अब यह सुविधा शुरू हो गई है।

आरटीआई का हथियार आया काम
आरटीआई कार्यकर्ता आदर्श नगर निवासी मनोज शर्मा ने केंद्रीय संचार मंत्री भारत सरकार से शिकायत में कहा था कि जनपद के नजीबाबाद, साहनपुर, मंडावर, नगीना में स्वीकृत आधार केंद्रों पर कई माह से कार्य बंद होने से आमजन को परेशानी का सामना उठाना पड़ रहा है। उक्त डाकघरों में आधार कार्ड बनाने का पूरा साजो-सामान होने के बाद भी आधार कार्ड नहीं बनने तथा आधार कार्ड में होने वाले परिवर्तनों के सही ना होने से विद्यार्थियों, महिलाओं, बुजर्गों, विकलांगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कई लोग पेंशन के लिए आवेदन नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा कई लोगों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। आमजन आएदिन उक्त डाकघरों के चक्कर काट रहे हैं।

हुई जांच और काम शुरू
इस पर जांच शुरू हुई और डाक विभाग के बिजनौर कार्यालय से इन आधार केंद्रों पर जनमानस को सुविधा का लाभ नहीं मिलने के संबंध में स्पष्टीकरण भी मांगा गया। अब नजीबाबाद में थाने के पास मौजूद उपडाकघर पर आधार कार्ड बनाने और उसमें विभिन्न परिवर्तनों का काम शुरू हो गया है।

संडिगो सेवा समिति के शिविर में हुआ रक्तदान

लखनऊ। गोमती नगर के विराज खण्ड स्थित संडिगो सेवा समिति के कार्यालय पर रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। शिविर, बलरामपुर अस्पताल के ब्लड ट्रांसफ्यूज़न मेडिसीन विभाग की टीम के देख रेख में किया गया। शिविर में लगभग 25 लोगों ने रजिस्ट्रेशन किया, जिसमें से 15 लोगों ने रक्त दान किया।

इस अवसर पर संडीगो के डायरेक्टर बृजेश यादव, श्रीमती अर्चना यादव और अनन्त श्रीवास्तव सहित 15 कर्मचारियों ने रक्त दान किया। समारोह का समापन राजकीय नर्सेज संघ उत्तर प्रदेश के महामंत्री अशोक कुमार ने किया। उन्होंने बताया कि हर साल रक्त दान करना चाहिए इससे कोशिकाएं पुनर्जिवित होती हैं। रक्तदान करने से कोई कमजोरी भी नहीं होती है। रक्त दान से बड़ा कोई दान नहीं है। आप लोगों के इस रक्त दान से जाने अंजाने पता नहीं कितने लोगों की मदद समय समय पर होती रहती है; चाहे वो अमीर हो या गरीब हो। इसलिए जब भी मौक़ा मिले रक्त दान अवश्य करें। बलरामपुर चिकित्सालय, लखनऊ से आई ब्लडबैंक टीम को भी धन्यवाद ज्ञापित किया गया।

स्वच्छता अभियान के जनक व कर्मयोगी थे राष्ट्र संत गाडगे महाराज

लखनऊ। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कनौजिया समाज की तरफ से स्वच्छता अभियान के जनक व कर्मयोगी राष्ट्रसंत गाडगे महाराज का परिनिर्वाण दिवस मनाया गया। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता व समाजवादी व्यापार सभा के प्रदेश सचिव सोनू कनौजिया व मोनू कनौजिया द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में कांशीराम बहुजन मूल निवासी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद सावित्री बाई फुले बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुईं। वहीं, विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों की ओर से संत गाडगे की प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित किए गए।

इस मौके पर सावित्री बाई फुले ने संत गाडगे की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्र हित में किए गए उनके कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संविधान निर्माता बाबासाहेब अंबेडकर और संत गाडगे बाबा ने कंधे से कंधा मिलाकर समाज के उत्थान के लिए लगातार काम किया। बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर व संत गाडगे की विचारधारा को अगर साथ लेकर नहीं चला गया तो संविधान पर बड़ा खतरा होगा।

आपको बता दें कि संत गाडगे ने महाराष्ट्र राज्य में अनेक धर्मशालाएं, चिकित्सालाएं, गौशालाएं और छात्रावासों का निर्माण कराया। यह सब कुछ उन्होंने भीख मांग-मांग कर बनवाया लेकिन अपने लिए एक कुटिया तक नहीं बनवाई। उन्होंने धर्मशालाओं के बरामदे या आसपास के वृक्ष के नीचे ही अपनी सारी जिंदगी बिता दी। उन्होंने अपनी सारी जिंदगी परिधान व पोशाक से ज्यादा शिक्षा को तवज्जो दी। उनका कथन था कि चाहे एक रोटी कम खाओ लेकिन अपने बच्चों को जरूर पढ़ाओ। स्वच्छता एवं शिक्षा के प्रतीक संत शिरोमणी संत गाडगे बाबा जी के परिनिर्वाण दिवस पर नमन।

कार्यक्रम में चाचा किशन कनौजिया, विक्रम कनौजिया, शंकर कनौजिया, सुमित कनौजिया, संजीव कनौजिया, कैलाश मौर्य, औसान कनौजिया, बबलू, अखिलेश रावत, पप्पू कनौजिया, संत लाल बौध, कैलाश नाथ मौर्य, रवि गौतम, किशन रावत, महेश पासी, सुनील बंगाली व महेश साजन मौजूद रहे।

भारत रक्षा मंच ने की श्रद्धांजलि अर्पित

लखनऊ। भारत रक्षा मंच के पूर्णकालिक विस्तारक आशीष बाजपेई के द्वारा मंगलम ग्रांड महर्षि विद्या मंदिर आईआईएम रोड पर विनम्र श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस दौरान सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत, उनकी धर्मपत्नी मधुलिका रावत एवं अन्य वीरगति को प्राप्त करने वाले वीर सैनिकों के चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्प अर्पित किया गया।

श्रद्धांजलि सभा में समाज के विभिन्न वर्गों में कार्य करने वाले, हिंदुत्व राष्ट्र, सनातन धर्म के प्रति आस्था रखने वाले  राष्ट्र भक्तों ने वीरगति को प्राप्त समस्त आत्माओं को ईश्वर से अपने चरणों में जगह देने के साथ ही शोक संतृप्त परिजनों को दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की। कार्यक्रम में वरिष्ठ समाजसेवी उत्तमा सिंह ठाकुर, हिंदुत्व पुरोधा भोपाल सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, भारत रक्षा मंच के वरिष्ठ कार्यकर्ता सहयोगी पहलाद शुक्ला, विनोद कुमार अवस्थी, नीरज उपाध्याय, कौशल कुमार सिंह, अनिल सिंह, संजय सिंह, अनिल मिश्रा, अनिल शुक्ला, आदित्य साहू, अरुण त्रिपाठी, दीपक सिंह व अन्य कार्यकर्ता,  पदाधिकारी बंधु एवं सहयोगी बंधु रहे मौजूद रहे।

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर पर विशेष चित्रात्मक मुहर जारी

श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी पर पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव ने जारी किया विशेष चित्रात्मक मुहर

अब देश-विदेश के पत्रों पर लगेगी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के चित्र वाली मुहर

देश-दुनिया में सांस्कृतिक दूत का कार्य करेगी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर अंकित विशेष मुहर -पोस्टमास्टर जनरल कृष्ण कुमार यादव

बनारस। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी नगरी की प्राचीनता, ऐतिहासिकता, आध्यामिकता और सांस्कृतिक गौरव को अपने में सहेजे हुए है। इसके दर्शन के लिए देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। दुनिया भर के करोड़ों शिव भक्तों के सपने साकार करने वाला यह प्राचीन दिव्य मंदिर काशी की संस्कृति को जीवंतता प्रदान करता है। उक्त उद्गार वाराणसी परिक्षेत्र के पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी पर एक स्पेशल पिक्टोरियल कैंसिलेशन (Special Pictorial Cancellation) जारी करते हुए व्यक्त किये। इस मुहर के मध्य में मंदिर के शिखर और उस पर अंकित धर्म ध्वजा को उकेरा गया है एवं किनारे गोलाई में हिंदी व अंग्रेजी में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी अंकित किया गया है। मुहर के निचले भाग में दिनांक के साथ वाराणसी प्रधान डाकघर व इसका पिनकोड-221001 लिखा गया है। अब विश्वेश्वरगंज स्थित वाराणसी प्रधान डाकघर से देश-दुनिया को आने-जाने वाले पत्रों पर सामान्य मुहर की बजाय श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के चित्र वाली विशेष मुहर लगेगी।

क्षेत्रीय कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में पोस्टमास्टर जनरल श्री कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि यह एक अद्भुत संयोग है कि आज ही के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का अपने नव्य, भव्य व दिव्य रूप में लोकार्पण किया जा रहा है। ऐसे में डाक विभाग की यह पहल इस दिन को और भी विशिष्टता प्रदान करेगी। डाक विभाग सदैव से सांस्कृतिक राजदूत की भूमिका निभाता रहा है। ऐसे में यह विशिष्ट चित्रमय मुहर देश-विदेश के सभी आने-जाने वाले पत्रों पर अंकित होने से न सिर्फ देश के भीतर बल्कि वैश्विक स्तर पर भी वाराणसी के सांस्कृतिक दूत का कार्य करेगा। मुहर पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर का चित्र होने से लोगों की आस्था का विस्तार होगा तथा युवा पीढ़ी में भी इसके बारे में जानने के लिए उत्सुकता बढ़ेगी। श्री यादव ने आगे कहा कि इस विशेष मुहर से पूरे विश्व में वाराणसी और भगवान शिव से जुड़े सांस्कृतिक संबंधों का प्रसार होगा। दुनिया भर के शिव भक्तों के लिए यह एक अमूल्य निधि की तरह साबित होगा। इसका उद्देश्य श्री काशी विश्वनाथ की महिमा, उसकी संस्कृति, उसकी पवित्रता सहित काशी के इतिहास को देश-दुनिया तक पहुँचाना है। दिव्य-काशी, भव्य-काशी के साथ यह काशी के सांस्कृतिक गौरव और अस्मिता को नई पहचान देगा।

वाराणसी (पूर्वी) मंडल के प्रवर अधीक्षक डाकघर श्री राजन राव ने कहा कि अब वाराणसी प्रधान डाकघर में देश-दुनिया से आने-जाने वाली सभी चिट्ठियों-पत्रों पर प्रतिदिन श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के स्पेशल पिक्टोरियल कैंसिलेशन की मुहर अंकित कर इसे धरोहर के रूप में संजोया जा सकेगा। वाराणसी प्रधान डाकघर से प्रति माह देश-विदेश में 3 लाख से ज्यादा डाक की बुकिंग होती है, वहीं लगभग 1 लाख डाक का वितरण होता है। ऐसे में डाक टिकट संग्राहकों के लिए यह एक अनमोल उपहार साबित होगा। इससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।

इस दौरान अधीक्षक डाकघर संजय कुमार वर्मा, सहायक निदेशक राम मिलन, लेखा अधिकारी एमपी वर्मा, सहायक डाक अधीक्षक अजय कुमार, सहायक लेखा अधिकारी संतोषी राय, डाक निरीक्षक श्रीकांत पाल, वीएन द्विवेदी और रामचंद्र यादव, श्रीप्रकाश गुप्ता, राजेन्द्र यादव, राहुल कुमार सहित तमाम अधिकारी – कर्मचारी, फ़िलेटलिस्ट इत्यादि उपस्थित रहे।

“पैसों से खबरें छपवाकर क्रांति करने का जज्बा”

केपी सिंह ‘वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लॉगर’

दैनिक जागरण के लखनऊ कार्यालय में जो हंगामा हुआ था उसके बाद अखबार ने यह फैसला लेना चाहा था कि उसमें बसपा की खबरें नहीं छपेंगी लेकिन जागरण अपने इस संकल्प पर टिका नहीं रह सका। प्रतिद्वंद्वी अखबार कहीं दलित चेतना के विस्फोट की वजह से उभरे नये पाठक संसार को न हथिया लें इस कारण जागरण ने बिना शर्त बसपा के सामने समर्पण करते हुए उसके समाचार प्रकाशित करने शुरू कर दिये।

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“पैसों से खबरें छपवाकर क्रांति करने का जज्बा” मीडिया के सहयोग के बिना क्या आज किसी राजनैतिक पार्टी और आन्दोलन का अस्तित्व सचमुच संभव नहीं रह गया? इस बारे में याद आता है 90 का दशक, जब अखबारों के ज्यादातर पाठक सवर्ण बिरादरी के थे। मुसलमानों में भी अखबारों की पहुंच बहुत कम थी। जाहिर है कि इसकी वजह से अखबारों का रुझान भी एक पक्षीय था। दैनिक जागरण और दैनिक आज जैसे अखबारों ने अयोध्या में 30 नवम्बर 1990 को पुलिस द्वारा गोली चलाने से सैकड़ों कारसेवकों के मारे जाने की जो अनर्गल खबरें छापी थीं वह इसी एक पक्षीय आवेग का परिणाम था । इसी दौर में मण्डल आयोग की रिपोर्ट के क्रियान्वयन को लेकर सवर्ण युवकों द्वारा आत्मदाह और आत्महत्या करने की गढ़ी हुई खबरें भी छापी जा रही थीं लेकिन जल्द ही अखबारों को समझ में आ गया कि वे राजनीति के भाग्य विधाता नहीं हैं। अम्बेडकरवादी आन्दोलन, मण्डल आन्दोलन और अयोध्या विवाद की पृष्ठभूमि में अस्तित्व रक्षा के लिये चिंतित मुसलमानों की राजनैतिक जागरूकता का अचानक बढ़ा ग्राफ अखबारों के लिये एक नया स्पेस तैयार कर रहा था। उधर अखबारों के बीच प्रसार संख्या बढ़ाने की जीवन मरण की लड़ाई छिड़ी हुई थी। नतीजा यह हुआ कि नये स्पेस को हथियाने के लिये अखबारों ने एकदम शीर्षासन कर दिया। मायावती के बारे में आपत्तिजनक समाचार प्रकाशन के बाद दैनिक जागरण के लखनऊ कार्यालय में जो हंगामा हुआ था उसके बाद अखबार ने यह फैसला लेना चाहा था कि उसमें बसपा की खबरें नहीं छपेंगी लेकिन जागरण अपने इस संकल्प पर टिका नहीं रह सका। प्रतिद्वंद्वी अखबार कहीं दलित चेतना के विस्फोट की वजह से उभरे नये पाठक संसार को न हथिया लें इस कारण जागरण ने बिना शर्त बसपा के सामने समर्पण करते हुए उसके समाचार प्रकाशित करने शुरू कर दिये। तमाम अखबार मण्डल समर्थक खबरों और आलेखों को जगह देने लगे। नवभारत टाइम्स जैसे दक्षिणपंथी अखबार ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में दो महत्वपूर्ण रविवारीय परिशिष्ट प्रकाशित किये। मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू होने की पृष्ठभूमि में प्रकाशित किये गये एक परिशिष्ट में पिछड़ा आन्दोलन के व्यापक आयामों पर आधारित अन्य लेखों के अलावा एक एक्सक्लूसिव स्टोरी इस बात पर थी कि किस तरह से अखबारों ने जिन युवकों की आत्महत्या को मण्डल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के चलते उनके अवसाद से जोड़ा था वे वास्तव में प्रेम प्रसंग में निराशा या अन्य वजह से आत्महत्या के लिये प्रेरित हुए थे। नवभारत टाइम्स के इस रहस्योद्घाटन से अफवाह को खबर बनाने वाले अखबारों की बुरी भद्द पिटी थी। दूसरा परिशिष्ट अयोध्या विवाद के बारे में था, जिसमें डा. रामविलास शर्मा जैसे महान विद्वानों ने बताया था कि राम पूजा की परंपरा कितनी नई है। इस कारण सदियों पुराना राम मन्दिर अयोध्या में होने के हिन्दू संगठनों के दावों की धज्जियां उड़ गयी थीं। उन दिनों इन पंक्तियों का लेखक उरई से एक दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित कर रहा था और उक्त ज्वलंत मुद्दों पर उस समाचार पत्र “दैनिक लोकसारथी” ने भी धारा के खिलाफ रुख अख्तियार कर रखा था, जिसकी वजह से उसे स्थानीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली थी। यहां कहने का तात्पर्य यह है कि कोई राजनैतिक सामाजिक आन्दोलन अखबार या मीडिया का मोहताज नहीं है बल्कि सच यह है कि अगर कोई आन्दोलन लोगों के बीच में पैठ रखता है तो वह मीडिया को मजबूर कर सकता है कि उसके कर्ताधर्ताओं की उपेक्षा के बावजूद वह उसे कवर करे। …पर आज इसके उलट हो रहा है। तथाकथित जनवादी आन्दोलन और पार्टियां भी आज कारपोरेट अखबारों में खबर छप जाये इसके लिये मीडिया कर्मियों पर पैसा खर्च करती हैं। सवाल यह है कि उनकी यह दयनीय दशा क्यों हुई है। साथ ही यह भी कि इस तरह की स्थितियों के रहते क्या कोई वैकल्पिक राजनैतिक मंच राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर तैयार हो सकता है। इन स्थितियों में वैकल्पिक राजनीति के लिये जनता की छटपटाहट केजरीवाल जैसे स्वर्ण मृगों पर विश्वास करके छले जाने के लिये अभिशप्त हो गयी है। कांशीराम मीडिया के लोगों को अपनी सभाओं से भाग जाने तक की कहने से नहीं चूकते थे लेकिन जितना ही उन्होंने मीडिया को जलील किया उतना ही मीडिया के लिये उनका आकर्षण बढ़ता गया। मूल बात यह है कि पैसे देकर खबरें छपवाकर कोई राजनैतिक दल क्रांति करेगा यह भरोसा जनता को किसी कीमत पर नहीं करना चाहिये। अगर किसी राजनैतिक आन्दोलन को जनता का समर्थन हासिल करना है तो लोगों के साथ संवाद की अन्य विधियां और प्रक्रियाएं उसे अपनानी होंगी। आज भी अगर किसी आन्दोलन और पार्टी की लोगों में पैठ है तो उसे खबरों के लिये पैसा देने की जरूरत पड़े यह बात तो अलग है अगर वह दुत्कारे भी, तब भी मीडिया उसके दर पर मत्था टेकने को मजबूर होगी। हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर इन पंक्तियों के लेखक ने 24 घंटे के सूचना आघात और किसी मुद्दे पर सम्पूर्णता की बजाय उसके खास पहलुओं पर चर्चा कराने की मीडिया में प्रचलित हो रही परिपाटी को जनता के सहज विवेक को नष्ट करने वाली निहित स्वार्थी ताकतों की षड्यन्त्रकारी योजना का हिस्सा बताया था और कहा था कि इसके चलते प्राकृतिक न्याय की सोच दूर होती चली जा रही है, जिससे समाज की समग्र भलाई की संभावनाएं बंद होती जा रही हैं। चिंतन के इस बिन्दु पर व्यापक विचार विमर्श शुरू करने की जरूरत है। केपी सिंह ‘वरिष्ठ पत्रकार एवं ब्लॉगर’

यशस्वी व्यक्तित्व के धनी उत्तमचंद इसराणी

5 दिसम्बर/पुण्य-तिथि
यशस्वी व्यक्तित्व के धनी उत्तमचंद इसराणी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक का काम ऐसे समर्पित लोगों के बल पर खड़ा है, जिन्होंने गृहस्थ होते हुए भी अपने जीवन में संघ कार्य को सदा प्राथमिकता दी। ऐसे ही एक यशस्वी अधिवक्ता थे श्री उत्तमचन्द इसराणी। श्री इसराणी का जन्म 10 नवम्बर, 1923 को सिन्ध प्रान्त में सक्खर जिले की लाड़काणा तहसील में स्थित गाँव ‘मियाँ जो गोठ’ (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। बालपन में ही वे संघ के स्वयंसेवक बन गये थे।

उन दिनों सिन्ध में मुस्लिम गतिविधियाँ जोरों पर थीं। पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए मजहबी गुंडे रात भर हिन्दू बस्तियों में घूमते थे। ऐसे में हिन्दू समाज का विश्वास केवल संघ पर ही था। शाखा पर सैकड़ों स्वयंसेवक आते थे। शायद ही कोई हिन्दू युवक ऐसा हो, जो उन दिनों शाखा न गया हो। …पर इसके बाद भी देश का विभाजन हो गया। कांग्रेसी नेताओं की सत्ता लिप्सा ने सिन्ध, पंजाब और बंगाल के करोड़ों हिन्दुओं को अपना घर, खेत, कारोबार और वह मिट्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, जिसमें वे खेल कर बड़े हुए थे। लाखों हिन्दुओं को अपनी प्राणाहुति भी देनी पड़ी।

श्री इसराणी अपने परिवार सहित मध्य प्रदेश के भोपाल में आकर बस गये। भोपाल में उन्होंने अपना परिवार चलाने के लिए वकालत प्रारम्भ कर दी। इसी के साथ वे संघ कार्य में भी सक्रिय हो गये। बहुत वर्षों तक सिन्धी कालोनी वाला उनका मकान ही संघ का प्रान्तीय कार्यालय बना रहा। इस प्रकार उत्तमचन्द जी और भोपाल का संघ कार्य परस्पर एकरूप हो गयेे। प्रारम्भ में उन्हें संघ के भोपाल विभाग कार्यवाह का दायित्व दिया गया। इसके बाद प्रान्त कार्यवाह और फिर प्रान्त संघचालक की जिम्मेदारी उन्हें दी गयी। जब मध्य भारत, महाकौशल और छत्तीसगढ़ प्रान्तों को मिलाकर एक क्षेत्र की रचना की गयी, तो उन्हें क्षेत्र संघचालक का काम दिया गया।

1975 में जब देश में आपातकाल लगा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, तो इसराणी जी पूरे समय जेल में रहे। वह अत्यन्त कठिन समय था। वकालत बन्द होने से घर की आय रुक गयी, फिर भी एक स्थितप्रज्ञ सन्त की भाँति उन्होंने धैर्य रखा और जेल में बन्द सभी साथियों को भी साहसपूर्वक इस परिस्थिति का सामना करने का सम्बल प्रदान किया। इसराणी जी को पूर्ण विश्वास था कि सत्य की जय होगी और यह स्थिति बदलेगी, चूँकि संघ ने कभी कोई गलत काम नहीं किया। 1977 में आपातकाल की समाप्ति और प्रतिबन्ध समाप्ति के बाद वे फिर संघ कार्य में सक्रिय हो गये। जब उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा, तो उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों से आग्रह कर दायित्व से मुक्ति ले ली। इसके बाद भी ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते जो सम्भव हुआ, काम करते रहे।

एक बार जबलपुर प्रवास में उन्हें भीषण हृदयाघात हुआ। उसके बाद उन्हें भोपाल लाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया; पर इसके बाद उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो सका और 5 दिसम्बर, 2007 को उनका शरीरान्त हुआ। माननीय सुदर्शन जी ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा, ‘‘उत्तमचन्द जी ने राष्ट्र के हित में सर्वांग यशस्वी जीवन कैसे बिताया जा सकता है, इसका अनुकरणीय उदाहरण हमारे सम्मुख रखा है। यशस्वी गृहस्थ, यशस्वी अधिवक्ता, यशस्वी सामाजिक कार्यकर्ता, यशस्वी स्वयंसेवक, यशस्वी कार्यवाह और यशस्वी संघचालक जैसी भूमिकाओं को विभिन्न स्तरों पर निभाते हुए दैनन्दिन शाखा जाने के अपने आग्रह में उन्होंने कभी कमी नहीं आने दी।’’

20 हजार के बदले बैंक कैशियर ने दे दिये 2 लाख, व्यापारी ने लौटाए


नहटौर/बिजनौर। एक किराना व्यापारी ने बैंक कैशियर द्वारा धोखे से दिये गए एक लाख अस्सी हजार रुपए वापस कर ईमानदारी का परिचय दिया। इस पर बैंक कर्मी व तथा स्थानीय लोग व्यापारी की ईमानदारी प्रशंसा कर रहे हैं।
ग्राम कमालपुर निवासी धर्मेंद्र पुत्र हरपाल सिंह की किराना की दुकान पंजाब नेशनल बैंक शाखा के बराबर में ही है। व्यस्तता के कारण धर्मेंद्र सिंह ने अपने एक परिचित व्यक्ति को 20 हजार रुपए का चैक भरकर शाखा से रकम निकालने के लिए दिया। बैंक के कैशियर ने भूलवश 20 हजार के स्थान पर दो लाख की रकम उस व्यक्ति को दे दी। उक्त रकम को लेकर वह व्यक्ति व्यापारी धर्मेंद्र सिंह के पास पहुंचा तो व्यापारी ने ऑनलाइन अपने खाते का बैलेंस चेक किया, जिसमें मात्र बीस हजार रुपए ही निकले हुए दिखाये गये। धर्मेन्द्र को यह समझने में देर नहीं लगी कि कैशियर ने गलती से अधिक रकम दे दी है। व्यापारी ने कैशियर के पास पहुंचकर एक लाख अस्सी हजार की रकम वापस कर दी। इस पर शाखा के सभी कर्मचारियों ने व्यापारी धर्मेंद्र का आभार जताया। धर्मेंद्र सिंह ने बताया कि वह ईश्वरवादी व्यक्ति है। धोखा किसी को भी लग सकता है। भूल में कैशियर द्वारा 20 हजार के स्थान पर दो लाख की रकम दे दी थी, जिसे वापस कर दिया है। व्यापारी की ईमानदारी की हर जगह प्रशंसा हो रही है।

रायबरेली में सम्मानित हुए कोरोना योद्धा, आंसू भी छलके

सम्मान समारोह
आचार्य स्मृति दिवस पर फिरोज गांधी कालेज सभागार में हुआ भव्य कार्यक्रम
खचाखच भरा रहा सभागार। आचार्य द्विवेदी को सभी ने किया याद


रायबरेली। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृति में आयोजित सम्मान समारोह में देश के विभिन्न राज्यों से आए कोरोना योद्धाओं को खचाखच भरे सभागार में सम्मानित किया गया। योद्धाओं की गाथा सुनकर लोगों की आंखों में आंसू आ गए। योद्धा भी भाव विह्वल हो गए।

रायबरेली ने किया असली सम्मान-
आचार्य स्मृति दिवस के उपलक्ष्य में फिरोज गांधी कालेज सभागार में आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में समाजसेवी मुकेश बहादुर सिंह ने सभी का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान लोगों की जान बचाने वाले यह योद्धा देश के प्रेरणा स्रोत हैं। नई दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार संजीव कुमार ने योद्धाओं के सम्मान में उमड़े जनसमूह का उल्लेख करते हुए कहा कि रायबरेली ने इन्हें योद्धाओं के प्रति असली सम्मान प्रकट किया है।


महाराष्ट्र से आए कोरोना योद्धा राहुल तिवरेकर ने कहा कि कोरोना संक्रमण के दौरान आदिवासियों की सेवा का संकल्प एक कठिन काम था, लेकिन दिगंत स्वराज फाउंडेशन के स्वयंसेवकों ने आदिवासियों के बच्चों की पढ़ाई जारी रखने की चुनौती स्वीकार की और 70 गांवों के करीब 2000 आदिवासी बच्चों की पढ़ाई स्पीकर के माध्यम से कराई गई।

गुजरात के सूरत शहर से आए कोरोना योद्धा अजय राय पलायन करने वाले मजदूरों की सेवा के बीच ही छोटे भाई के हुए निधन की बात कहते हुए रो पड़े। उनकी गाथा सुनकर लोग भी भाव विह्वल हो गए।
मणिपुर के कोरोना योद्धा मथनमी हुंग्यो ने बताया कि पहाड़ों में लॉकडाउन के दौरान भूखे लोगों को राशन पहुंचाना कितना कठिन था? उन्होंने कहा कि लोगों के सहयोग से राशन एकत्र कर गांवों में फंसे लोगों को जीवन दिया गया। पंजाब के कोरोना योद्धा हरजीत सिंह गिल ने उस वाकये का भावपूर्ण वर्णन किया, जब तलवार से लैस निहंगों ने हमला कर हाथ की कलाई काट दी थी। इस गाथा को सुनकर सब के रोंगटे खड़े हो गए।


लखनऊ की कोरोना योद्धा श्रीमती वर्षा वर्मा ने कहा कि लॉकडाउन संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार करा कर सम्मान से अंतिम विदाई के लिए “एक कोशिश ऐसी भी अभियान..” चलाया गया। एक साधन संपन्न दोस्त की मौत के बाद एंबुलेंस मिलने में आई कठिनाई ने इस काम के लिए प्रेरित किया। उनको एंबुलेंस की मुफ्त सेवा भी उपलब्ध कराई गई।


समिति के अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने रूपरेखा प्रस्तुत की और कोषाध्यक्ष विनय द्विवेदी ने अभियान पर प्रकाश डाला। महामंत्री अनिल मिश्रा ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। इस मौके पर डॉ आर. एस. मालवीय, पीएनबी के सर्किल हेड रोहिताश्व इंद्रायण, डॉ ज्ञानेंद्र चतुर्वेदी, डॉक्टर अमिता खुबेले, राजीव भार्गव, मुक्ता भार्गव, निर्मल सिंह, राजेश वर्मा, डॉ रुचि सिंह, महेश प्रताप सिंह, वीरेंद्र विक्रम सिंह भाजपा नेता अजय त्रिपाठी, डॉ मनीष चौहान राकेश भदौरिया, सभासद एसपी सिंह, डॉक्टर बृजेश सिंह, सुनील ओझा, अमर द्विवेदी, सुधीर द्विवेदी, राकेश मोहन मिश्रा, स्वतंत्र पांडे, राजेश द्विवेदी, घनश्याम मिश्रा, अभिषेक मिश्रा आदि उपस्थित रहे।

हरजीत सिंह को मिला प्रभाष जोशी स्मृति सम्मान

रायबरेली। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की ओर से पटियाला पंजाब से आए हरजीत सिंह गिल को प्रभाष जोशी स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। महाराष्ट्र के कोरोना योद्धा राहुल तिवरेकर को डॉक्टर राम मनोहर त्रिपाठी लोक सेवा सम्मान, मथनमी हुंग्यो को शिवानंद मिश्र लाले सम्मान और अजय राय को सरिता द्विवेदी स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।
पद्मश्री पुरस्कार मिलने की वजह से नई दिल्ली के कोरोना योद्धा जितेंद्र सिंह शंटी नहीं आ पाए। उन्हें ऑनलाइन आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग प्रेरक सम्मान दिया गया। उनका वीडियो मैसेज सभागार में सुनाया गया।

स्मारिका “आचार्य पथ” का विमोचन-
रायबरेली। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की ओर से प्रति वर्ष प्रकाशित की जाने वाली स्मारिका “आचार्य पथ” का विमोचन कोरोना योद्धाओं और समाजसेवी मुकेश बहादुर सिंह ने किया। संपादक आनंद स्वरूप श्रीवास्तव ने स्मारिका के विषय में विस्तार से बताया। इस मौके पर अरुण कुमार सिंह भी मौजूद रहे।

शोभा यात्रा में उमड़ जन समूह, शहीद चौक पर दीपदान
रायबरेली। कोरोना योद्धाओं के सम्मान समारोह के पहले शहर के सुपर मार्केट से शोभा यात्रा निकाली गई। कोरोना योद्धाओं के सम्मान में पूरा शहर उमड़ पड़ा। योद्धाओं को फूल मालाओं से लाद दिया गया। पुलिस अधीक्षक श्लोक कुमार ने देश भर से आए कोरोना योद्धाओं के काम की तारीफ करते हुए कहा कि संकट से उबारने में इनकी अहम भूमिका रही। शोभायात्रा शुरू होने के पहले पीएससी बैंड ने राष्ट्रीय धुन बजाई। एनसीसी और स्काउट गाइड ने योद्धाओं को सलामी दी। गुरु तेग बहादुर मार्केट व्यापार मंडल, व्यापारी नेता बसंत सिंह बग्गा, मनोज गुप्ता, रोटरी क्लब की ओर से उमेश सिकरिया, विभिन्न खेल संघों की ओर से मुन्ना लाल साहू, हिमांशु तिवारी, ममता पांडे, अनुपमा रावत आदि ने पुष्प वर्षा कर योद्धाओं का स्वागत किया।
सुपर मार्केट से सभागार तक योद्धाओं का जगह-जगह फूल मालाओं से स्वागत किया गया। योद्धाओं पर पुष्प वर्षा हुई। योद्धाओं ने शहीद चौक पर शहीदों की याद में दीपदान किया। शहीद चौक पर क्षमता मिश्रा अपनी महिला साथियों के साथ उपस्थित रहीं। इस मौके पर अभिषेक द्विवेदी करुणा शंकर मिश्रा नीलेश मिश्रा अभिषेक मिश्रा पीयूष द्विवेदी अजय दीक्षित शिखर द्विवेदी शिखर अवस्थी, यशी अवस्थी, कल्याणी मिश्रा, जागृति मिश्रा, तान्या सिंह आदि ने कोरोना योद्धाओं का स्वागत किया। संचालन सर्वेश पांडे ने किया।


विजेता बच्चों को किया गया पुरस्कृत
रायबरेली। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिकी इकाई की ओर से हिंदी दिवस के उपलक्ष में आयोजित की गई अंतरष्ट्रीय काव्य पाठ प्रतियोगिता में प्रथम द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले रजत द्विवेदी उन्नाव, अचिंत्य शाही लखनऊ और कात्यायनी त्रिवेदी रायबरेली को पुरस्कृत किया गया। समिति की ओर से उन्हें प्रमाण पत्र और नकद पुरस्कार दिए गए। समिति की अमेरिकी इकाई की अध्यक्ष श्रीमती मंजु मिश्रा और श्रीमती रचना श्रीवास्तव ने सभी विजेता बच्चों को बधाई दी।

लाखों किसानों को बर्बाद फसलों का मुआवजा ₹ साढ़े 74 करोड़

लखनऊ (प्रयाण समाचार)। प्रदेश में 48 जिलों के 208793 किसानों को उनकी बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा देने के लिए 74 करोड़ 52 लाख 94 हजार 208 रुपए दिए जा रहे हैं। अपर मुख्य सचिव राजस्व मनोज कुमार सिंह ने बुधवार को इस संबंध में शासनादेश जारी कर दिया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विभागीय अधिकारियों को बाढ़ प्रभावित किसानों को हर संभव सहायता देने का निर्देश दिया है। इस आधार पर जिलों से फसलें बर्बाद होने से प्रभावित किसानों का ब्यौरा मांगा गया था।

राहत आयुक्त कार्यालय की वेबसाइट पर ऐसे 827451 प्रभावित किसानों की जानकारी फीड की गई है। इस आधार पर 48 जिलों के 208793 किसानों को सहायता राशि देने का फैसला किया गया है। किसानों को सहायता राशि बांटने की जानकारी राहत आयुक्त कार्यालय को ऑनलाइन दी जाएगी। राज्य सरकार इसके पहले भी बाढ़ प्रभावित किसानों को सहायता राशि बांटने के लिए पैसे दे चुकी है।

अपर मुख्य सचिव राजस्व ने झांसी, ललितपुर, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर, देवरिया, खीरी, बहराइच, अलीगढ़, गाजीपुर, मऊ, कुशीनगर, संतकबीर नगर, वाराणसी, सीतापुर, पीलीभीत, बलरामपुर, बलिया, बरेली, बाराबंकी, जालौन, बस्ती, चंदौली, कानपुर देहात, बिजनौर, अंबेडकरनगर, रामपुर, महोबा, हमीरपुर, मुरादाबाद, कानपुर शहर, श्रावस्ती, हरदोई, गोंडा, चित्रकूट, सुल्तानपुर, अमेठी, आजमगढ़, कन्नौज, फर्रुखाबाद, मेरठ, उन्नाव, बदायूं, भदोही व मुजफ्फरनगर के डीएम को इस संबंध में निर्देश भेजते हुए सहायता राशि देने का निर्देश दिया है।

Sameer Wankhede: जिनसे थर्राते हैं ड्रग माफिया

By Piyush Keshari

सुपस्टार शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को जेल की सलाखों के पीछे तक पहुंचाने वाले NCB (Narcotics Control Bureau) के जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े की छवि एक सख्त अधिकारी की है। सामने चाहे कितनी ही बड़ी सेलिब्रिटी क्यों ना हो, समीर वानखेड़े बिना किसी के दबाव में आए अपना काम करते हैं। समीर वानखेड़े के नेतृत्व में ही NCB ने कई बड़े सेलिब्रिटी पर कार्रवाई की है। समीर ने 2 अक्टूबर 2021 को एक क्रूज पर एक पार्टी में छापेमारी के बाद आर्यन को गिरफ्तार किया था। ड्रग्स के मामलों में समीर के खबरियों का जबरदस्त नेटवर्क है। उनके जोनल डायरेक्टर बनने के बाद महज 2 साल में ही NCB ने करीब 17 हजार करोड़ रुपए के नशे और ड्रग्स रैकेट का पर्दाफाश किया।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) के जोनल डायरेक्टर पिछले कई दिनों से चर्चा में हैं। पिछले साल सुशांत सिंह राजपूत केस से पहली बार सुर्खियों में आए। अब शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने को लेकर लगातार छाये हैं। इस बीच सोमवार (11 अक्टूबर 2021) को समीर वानखेड़े ने सनसनीखेज आरोप लगाए कि पिछले कुछ दिनों से उनकी जासूसी कराई जा रही है। समीर वानखेड़े ने महाराष्ट्र पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर आरोप लगाया है कि उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। समीर वानखेड़े ने अपनी शिकायत में कहा है कि सिविल कपड़े पहने दो पुलिसकर्मी उनका पीछा कर रहे हैं। वानखेड़े ने अपनी शिकायत के साथ सीसीटीवी फुटेज भी सौंपे हैं।

कौन हैं समीर वानखेड़े:

सुशांत सिंह राजपूत केस और अब बॉलीवुड के किंग खान Shahrukh Khan के बेटे Aryan Khan केस के बाद में चर्चा में रहने वाले NCB के जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े का जन्म मायानगरी मुंबई में ही हुआ है। समीर वानखेड़े के पिता एक पुलिस अधिकारी थे। समीर एक IAS अधिकारी हैं। उनका जन्म 1984, महाराष्ट्र में हुआ था और अब, वह 2021 तक 37 वर्ष के हो गए हैं। वह अपने काम में सख्त रहा है। समीर के निर्देशन में कई मशहूर हस्तियों के घरों से बड़ी संख्या में ड्रग्स का खुलासा हुआ है, जिसमें हंसी रानीभारती सिंह और उनके पति हर्ष लिम्बाचिया और अब अभिनेता शाहरुख खान के 23 साल के बेटे आर्यन खान शामिल हैं।

समीर वानखेड़े ने अपनी स्कूली शिक्षा एक निजी स्कूल से पूरी की है। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद समीर वानखेड़े ने सिविल परीक्षा पास करने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने खूब मेहनत की। साल 2008 में उनकी मेहनत रंग लाई और वह IAS अधिकारी बन गए।

समीर वानखेड़े का करियर:-

भारतीय राजस्व सेवा ज्वाइन करने के बाद समीर वानखेड़े की नियुक्ति मुंबई के छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट (Chhatrapati Shivaji Maharaj International Airport) पर डिप्टी कस्टम कमिश्नर (deputy customs commissioner) के तौर पर हुई। यहां समीर वानखेड़े ने बेहतरीन काम किया और नियमों को सख्ती से लागू किया। मुंबई का छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट एक ऐसा एयरपोर्ट है, जहां लगातार सेलिब्रिटी का आना-जाना लगा रहता है। लेकिन समीर वानखेड़े को कभी इससे फर्क नहीं पड़ता कि सामने कौन है।

समीर वानखेड़े के अच्छे कामों को देखते हुए उन्हें पहले आंध्र प्रदेश और फिर दिल्ली भी भेजा गया। इसके बाद समीर वानखेड़े की तैनाती नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) मुंबई के जोनल डायरेक्टर तौर पर हुई। NCB में रहते हुए समीर वानखेड़े ने नशे और ड्रग्स रैकेट का पर्दाफाश करना शुरू किया।

समीर वानखेड़े नियमों को लेकर काफी सख्त रहे हैं। जब उनकी तैनाती मुंबई एयरपोर्ट पर हुई तो उन्होंने सबसे पहले अपने जूनियर्स को सेलेब्रिटीज के पीछे भागने या उनके साथ सेल्फी लेने से रोका। इसके बाद समीर वानखेड़े ने देखा कि बॉलीवुड स्टार्स विदेश से ज्यादा सामान लेकर आते हैं और अपने असिस्टेंट से सामान उठवाते थे। इसके अलावा बॉलीवुड स्टार्स के नखरों से भी समीर वानखेड़े परेशान हो गए। इसके बाद समीर वानखेड़े ने तय कर दिया कि हर यात्री अपना सामान खुद ही उठाएगा।

समीर वानखेड़े की पत्नी:

समीर वानखेड़े ने मराठी अभिनेत्री क्रांति रेडकर से 2017 में शादी की। अब दोनों जुड़वां बेटियों के माता- पिता हैं। क्रांति रेडकर का जन्म मुंबई में ही हुआ है। बहुत कम लोग जानते हैं कि समीर वानखेड़े की पत्नी क्रांति रेडकर एक बहुत ही मशहूर अभिनेत्री हैं। क्रांति ने अजय देवगन के साथ फिल्म गंगाजल में काम किया है। इसके अलावा वह कई टीवी सीरियल में काम कर चुकी हैं। क्रांति बॉलीवुड से ज्यादा मराठी सिनेमा में सक्रिय हैं। इसके साथ ही उन्होंने अंग्रेजी फिल्मों में भी काम किया है और उन्होंने निर्देशन में भी हाथ आजमाया है।

समीर वानखेड़े के बारे में कुछ अज्ञात तथ्य:

  • समीर वानखेड़े ने बताया कि कई बार सेलेब्रिटीज उनसे बहस करते हैं। कई बार उन्हें सीनियर्स से शिकायत करने की धमकी भी देते हैं लेकिन जब वह उन्हें बताते है कि यहाँ सबसे सीनियर वही हैं तो फिर चुपचाप लाइन में लग जाते हैं।
  • एक बार एक दिग्गज क्रिकेटर के एक्टर बेटे और एक अन्य क्रिकेटर की पत्नी से भी फाइन ना भरने को लेकर समीर वानखेड़े की बहस हो चुकी है। इसके बाद समीर वानखेड़े ने उन्हें टैक्स चोरी के आरोप में गिरफ्तार करने की बात कह दी, जिसके बाद मामला शांत हुआ और उन्होंने फाइन भरा।
  • साल 2013 में समीर वानखेड़े ने बॉलीवुड गायक मीका सिंह को मुंबई एयरपोर्ट पर विदेशी मुद्रा के साथ पकड़ा था।
  • समीर वानखेड़े नियमों को लेकर कितने सख्त हैं, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने साल 2011 में सोने से बनी क्रिकेट विश्वकप की ट्रॉफी को ड्यूटी चार्ज का भुगतान करने के बाद ही मुंबई हवाई अड्डे से जाने दिया था।
  • साल 2010 में महाराष्ट्र सेवा कर विभाग में तैनाती के बाद समीर वानखेड़े ने लिए बॉलीवुड की 200 मशहूर हस्तियों समेत 2500 लोगों के खिलाफ टैक्स चोरी के मामले में कार्रवाई की।
  • समीर वानखेड़े के रहते हुए दो साल में 87 करोड़ रुपए का राजस्व भी सरकारी खजाने में जोड़ा था, जो मुंबई में एक रिकॉर्ड है।
  • साल 2021 में समीर वानखेड़े के नेतृत्व में NCB ने मुंबई में एक पैसेंजर क्रूज शिप पर छापा मारा और एक रेव पार्टी का भंडाफोड़ किया। इस पार्टी में ड्रग्स का इस्तेमाल किया जा रहा था। NCB ने इस मामले में शाहरुख़ खाने के बेटे आर्यन खान सहित 3 लोगों को हिरासत में लिया था।

आज मधुप जी व रघुवंशी जी का सम्मान

भारत के शुरुआती हिंदी समाचार पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम की 20वीं वर्षगाँठ 26 अक्टूबर 2021 को ‘विचार संगम’ नामक कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार और स्तम्भ लेखक अशोक मधुप सहित देश के 25 सम्पादक पत्रकार, लेखकों को प्रतिवर्ष की भांति सम्मानित किया जाएगा।
ऑनलाइन होने वाले इस आयोजन में विभिन्न परिचर्चाओं के माध्यम से विभिन्न मंत्री गण, सांसद, राजनीतिक दलों के प्रवक्ता, धर्म, समाज तथा मीडिया से जुड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने विचार रखेंगे।

25 लोगों को ‘हिंदी सेवा सम्मान’
इस अवसर पर प्रतिवर्ष की भाँति 25 लोगों को ‘हिंदी सेवा सम्मान’ से सम्मानित किया जायेगा। चयन मंडल ने ‘हिंदी सेवा सम्मान’ के लिए जिन नामों को अपनी स्वीकृति प्रदान की हैं वह इस प्रकार हैं-
-श्री अक्षत शर्मा
प्रबंध संपादक- स्वदेश, भोपाल।
-डॉ. राकेश शर्मा
संपादक- वीणा, इंदौर।
-प्रो. गोविंद सिंह
आईआईएमसी, नयी दिल्ली।
-डॉ. सौरभ मालवीय
विशेषज्ञ- राज्य परियोजना कार्यालय, सर्व शिक्षा अभियान- उत्तर प्रदेश।

-श्री धनंजय चोपड़ा
मीडिया शिक्षक- इलाहाबाद विश्वविद्यालय।
-डॉ. सी. जयशंकर बाबू
विभागाध्यक्ष- हिंदी, पांडिचेरी विश्वविद्यालय।
-श्री वीर विक्रम बहादुर मिश्रा, पूर्व संपादक, स्वतंत्र भारत
-श्री भगवंत प्रसाद पाण्डेय
संपादक, चरित्र विकास
-श्री सुरेंद्र दुबे
पूर्व ब्यूरो प्रमुख- यूएनआई
-श्री के. बक्स सिंह
सलाहकार संपादक, के न्यूज चैनल
-श्री प्रमोद गोस्वामी
पूर्व ब्यूरो प्रमुख, पीटीआई/भाषा
-श्रीमती गीता शुक्ला
संपादक, स्पूतनिक
-श्री सूर्य मणि रघुवंशी
संपादक, चिंगारी बिजनौर उत्तर प्रदेश।
-श्री निशीथ जोशी
स्थानीय संपादक- पंजाब केसरी, उत्तराखण्ड
-डॉ. ऋतु दुबे
प्रधानाचार्य- निस्कोर्ट, गाजियाबाद
-श्रीमती ऋचा सिंह
अध्यापिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता
-श्रीमती वर्षा मेहर
प्रख्यात कवयित्री
-श्री राजेन्द्र श्रीवास्तव
शिक्षाविद् एवं बाल साहित्यकार
-डॉ. कायनात काज़ी
लेखिका व पयर्टनविद्
-श्री प्रभात कुमार ‘उत्सुक’
प्रख्यात लेखक
-डॉ. इंदिरा दांगी
साहित्यकार
-श्री दीपक गिरकर
लेखक
-श्री अशोक मधुप
वरिष्ठ पत्रकार
-डॉ. शंकर सुवन सिंह
प्राध्यापक

डॉ. सूर्यमणि रघुवंशी
संपादक, चिंगारी बिजनौर उत्तर प्रदेश।

भाजपा UP, पंजाब कांग्रेस को भी पुरस्कार-
इसके अलावा सर्वाधिक तीव्र गति से मीडिया को अपडेट्स मुहैया कराने के लिए भाजपा की उत्तर प्रदेश इकाई और कांग्रेस की पंजाब इकाई को इस वर्ष का पुरस्कार प्रदान किया जायेगा। दिल्ली स्थित राज्य सूचना भवनों में इस वर्ष सर्वाधिक तीव्र गति से मीडिया को अपडेट्स मुहैया कराने के लिए बिहार को पुरस्कार किया जायेगा।

विक्रांत चौधरी ने किया चिकित्सकों का अभिनंदन

बिजनौर। भारत सरकार द्वारा 100 करोड़ कोविड वैक्सीन का आँकड़ा सबसे कम समय में सफलता पूर्वक पूरा करने के उपलक्ष्य में नजीबाबाद स्थित लाला भोजराम नेत्र चिकित्सालय में अभिनंदन कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

इस अवसर पर भाजपा जिला सह मीडिया प्रभारी विक्रांत चौधरी ने वैक्सीनेशन टीम का अभिनंदन किया। साथ ही अस्पताल में मौजूद सभी चिकित्सकों  और स्टाफ़ का धन्यवाद किया। सभी ने देशवासियों की कोरोना काल में समय हर सुविधा मुहैया कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करते हुए कहा कि हमारे पीएम वास्तव में जननायक हैं, जो बिना भेदभाव किए हमेशा देशवासियों की चिंता में लगे रहते हैं।

कार्यक्रम में मुख्य रूप से प्रभारी चिकित्सा अधिकारी डॉ फ़ैज़ हैदर, ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर निपेंद्र चौधरी, अखिलेश वर्मा, वैशाली कुमारी, अभिषेक त्यागी, संदीप पांडे फार्मेसिस्ट, बृजेश कुमार फार्मेसिस्ट, कौशिक, विशाल कुमार, राजवीर कुशवाहा बाला देवी  आदि उपस्थित रहे।

भाजपा युवा मोर्चा ने किया सैनिकों के परिवारों को सम्मानित

भारतीय जनता युवा मोर्चा मना रहा आजादी का अमृत महोत्सव। मंडल मंडावर अंतर्गत गांव फजलपुर में सैनिकों के सम्मान में सैनिकों के परिवारों को किया सम्मानित।


बिजनौर। आजादी का अमृत महोत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। इसी क्रम में भारतीय जनता युवा मोर्चा द्वारा सैनिकों के सम्मान में सैनिकों के परिवारों को सम्मानित किया गया।

बिजनौर विधानसभा के मंडल मंडावर अंतर्गत गांव फजलपुर में ओमवीर सिंह व बंटी कुमार के परिवार को भारतीय जनता युवा मोर्चा द्वारा सम्मानित किया गया। इस शुभ अवसर पर संकित राठी जिला मंत्री भाजपा युवा मोर्चा बिजनौर, सुभाष कुमार, अनुज कुमार, गौरव कुमार, प्रमोद कुमार, गोविंदा सिंह, सानू कुमार आदि उपस्थित रहे।

एनडीआरएफ की विशिष्ट टीम ने दिया NCC कैंडेटों को प्रशिक्षण

लखनऊ। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल लखनऊ की एक विशिष्ठ प्रशिक्षित टीम ने सोमवार को मनोज कुमार शर्मा कमाण्डेंट के दिशा निर्देशन में NCC के संयुक्त वार्षिक प्रक्षिक्षण शिविर -213 का आयोजन किया।

इस मौके पर बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विवि विद्या विहार, रायबरेली रोड, लखनऊ में एनडीआरएफ की विशिष्ट प्रशिक्षण टीम द्वारा क्षमता संवर्धन कार्यक्रम आयोजित कर NCC कैंडेटों को प्रशिक्षण दिया गया।

सर्वप्रथम निरीक्षक बिनय कुमार आपदा के निहितार्थ एवं एनडीआरएफ की कार्यशैली पर व्याख्यान दिया तथा तत्पश्चात् उनकी टीम द्वारा भूकम्प में लगने वाली चोटों को स्थिर करना, ध्वस्त ढांचे में फंसे व्यक्तियों को विभिन्न तरीकों से बाहर निकालने व स्थानीय संसाधनों की मदद से बचाने का तरीका सिखाया। इसमें कम्बल, रस्सी एवं बोरी से स्ट्रेक्चर बनाना शामिल हैं।

विनय कुमार ने भूकम्प के दौरान घायलों की अस्पताल पूर्व की जाने वाली चिकित्सा के बारे में बताया। इसमें मुख्य रूप से सिर में चोट लगने, आँख में चोट लगने, हाथ एवं पैर में फैक्चर हो जाने एवं उन चोटों को स्थिर करने का तरीका बताया। इसके अलावा दिल के दौरे का प्राथमिक उपचार भी बताया गया।

इस अवसर पर एनडीआरएफ की तरफ से निरीक्षक विनय कुमार एव 07 जवान शामिल रहे तथा NCC की तरफ से कमांडिंग ऑफिसर गौतम गुहा एवं 365 प्रशिक्षुओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का आयोजन  COVID- 19 के नियमों को ध्यान रखते हुए किया गया ।

छत्तीसगढ़ के SP ‘आईएसीपी अवार्ड 2021’ से होंगे सम्मानित

छत्तीसगढ़ के SP व यूपी कैडर के अमित कुमार ‘आईएसीपी अवार्ड 2021’ से होंगे सम्मानित, 6 देशों के 40 पुलिस अधिकारियों को मिलेगा यह अवार्ड

रायपुर। छत्तीसगढ़ के कोरिया के पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार सिंह को अमेरिका में स्थित अंतर्राष्ट्रीय पुलिसिंग संस्था आईएसीपी (इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ चीफ्स ऑफ पुलिस) ने ‘आईएसीपी अवार्ड 2021′ से सम्मानित करने की घोषणा की है. इस पुलिस संगठन में विश्व के 165 देशों के पुलिस अधिकारी शामिल हैं. संतोष सिंह को यह अवार्ड ’40 अंडर 40’ कैटेगरी में दिया जा रहा है. यह विश्व के 40 वर्ष से कम आयु के ऐसे पुलिस अधिकारी जिन्होंने बेहतर नेतृत्व क्षमता के साथ पुलिसिंग कार्यों में नये प्रयोगों और अच्छे कार्यों से परिवर्तन लाने का प्रयास किया है, उन्हें दिया जाता है.

एसपी संतोष कुमार सिंह को उनके द्वारा पिछले 8 वर्षों में बेहतर पुलिसिंग और पुलिस की छवि सुधारने में किए गए कार्यों के आंकलन के आधार पर यह अवार्ड दिया जा रहा है. इस बार विश्व के 6 देशों- संयुक्त राज्य अमेरिका, यूएई, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, कोरिया और भारत के 40 पुलिस अधिकारियों को इस अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा. इसमें देश से उत्तरप्रदेश कैडर के आईपीएस अमित कुमार का नाम भी शामिल है. द आईएसीपी प्रतिवर्ष इस तरह के अवार्डस सितंबर माह में अपने वार्षिक समारोह में घोषित करता है. अगले साल के समारोह में अवार्ड पाने वाले को अपने मुख्यालय टेक्सास में व्यक्तिगत रूप से बुलाकर सम्मानित करता है. अधिकारियों को अक्टूबर 2022 में टेक्सास, अमेरिका में यह अवार्ड प्रदान किया जाएगा. पूर्व में छत्तीसगढ़ से डीआईजी ईओडब्ल्यू आरिफ शेख को यह अवार्ड प्राप्त हुआ है.

बेहतरीन कार्य के लिए विख्यात- संतोष सिंह ने बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लंबे समय तक सराहनीय काम किया है. महासमुंद पदस्थापना के दौरान बाल हितैषी पुलिसिंग को मजबूत करते हुये लगभग एक लाख बच्चों को सेल्फ-डिफेंस का प्रशिक्षण दिलवाया, जो कि एक विश्व रिकार्ड के रूप में दर्ज हुआ. इन कार्यों के लिए उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू के हाथों दिल्ली के विज्ञान भवन में दिसंबर 2018 में ‘चैंपियंस ऑफ चेंज’ अवार्ड मिला. रायगढ़ पदस्थापना के दौरान रायगढ़ पुलिस ने अपराध नियंत्रण के साथ कोविड में प्रशंसनीय कार्य किया. पुलिस हेल्प-डेस्क के माध्यम से जरूरतमंदों को कोविड के प्रथम चरण में लगभग एक लाख और द्वितीय चरण में चालीस हजार सूखा राशन और फूड पैकेट्स उपलब्ध कराया गया.

बनाए कई विश्व रिकॉर्ड- रायगढ़ पुलिस ने जनसहयोग से मॉस्क-जागरूकता के चर्चित अभियान ‘एक रक्षा-सूत्र मास्क का’ के तहत पिछले वर्ष रक्षाबंधन के दिन, एक ही दिन में 12.37 लाख मॉस्क बंटवाकर विश्व रिकार्ड बनाया, जो गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड, एशिया बुक ऑफ रिकार्ड और इण्डिया बुक ऑफ रिकार्ड आदि में दर्ज हुआ. कोरिया में इनके नेतृत्व में निजात अभियान के तहत नारकोटिक्स और ड्रग्स के विरुद्ध पुलिस द्वारा सख्त वैधानिक कार्रवाई और जन-जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. संतोष सिंह ने दोस्तों, पुलिस विभाग के सहकर्मियों और सीनियर्स का धन्यवाद ज्ञापित किया है, जिनके सहयोग और योगदान से ‘आईएसीपी अवार्ड 2021’ अवार्ड मिला है.

जहर पिया कल्याण ने बीजेपी ने अमृत

लखनऊ। जब ढांचा टूट रहा था तब कल्याण सिंह 5 कालिदास मार्ग… मुख्यमंत्री आवास की छत पर आराम से जाड़े की धूप सेंक रहे थे… अगर तब कल्याण सिंह नहीं होते तो आज भूमिपूजन भी नहीं होता।

  • एक छोटे कद का आदमी… जो दिखने में बहुत सुंदर नहीं था… काला रंग…चेहरे पर दाग… लेकिन संघर्षों में तपा हुआ व्यक्तित्व… ऐसी पर्सनेलिटी की जहां वो पहुंच जाए वहां बड़े से बड़े नेता का कद छोटा हो जाए । व्यक्तित्व की धमक ऐसी बड़े बड़े किरदार बौने दिखने लगें… ऐसे थे कल्याण सिंह
  • कल्याण सिंह ऐसे इसलिए थे क्योंकि उनकी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं था… उनके दिल और दिमाग में कोई अंतर नहीं था… उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा उसूल था… भगवान राम की भक्ति… भगवान राम के प्रति के समर्पण को लेकर उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया
  • 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन इकट्ठा करने का लक्ष्य लेकर राम रथयात्रा निकाली । बिहार में तब लालू यादव मुख्यमंत्री थे और उन्होंने आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया । जिसके बाद राम राथ यात्रा को भारी मात्रा में जनसमर्थन मिल गया और उत्तर प्रदेश में पहली बार बीजेपी की सरकार चुन ली गई जिसके मुख्यमंत्री कल्याण सिंह चुने गए
  • जून 1991 में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने और इसके बाद राम मंदिर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे विश्व हिंदू परिषद में उत्साह की लहर दौड़ गई और उसने ये घोषणा कर दी कि 6 दिसंबर 1992 को राम मंदिर का निर्माण आरंभ किया जाएगा
  • वीएचपी की घोषणा के वक्त मुख्यमंत्री के पद पर कल्याण सिंह थे और प्रदेश की कानून व्यवस्था को संभालने का पूरा जिम्मा कल्याण सिंह पर था । वीएचपी की घोषणा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव के कान खड़े हो गए और उन्होंने बातचीत के लिए कल्याण सिंह को दिल्ली बुलाया
  • कल्याण सिंह से पी वी नरसिम्हा राव ने कहा कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दीजिए लेकिन कल्याण सिंह ने साफ जवाब दिया कि विवाद का एक ही हल है और वो ये कि बाबरी मस्जिद की जमीन हिंदुओं को सौंप दी जाए । इस तरह बात नहीं बनी और केंद्र – राज्य के बीच टकराव तय हो गया

-नरसिम्हा राव ने ऐहतियात बरतते हुए पहले ही केंद्रीय सुरक्षा बल अयोध्या रवाना कर दिए… केंद्रीय सुरक्षा बल अयोध्या के चारों तरफ फैला दिए गए

  • 6 दिसंबर तक अयोध्या में राम जन्मभूमि के आस पास 3 लाख कारसेवक इकट्ठे हो गए थे… ऐसे में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन के पास पूरी ताकत थी कि वो कारसेवकों पर गोली चला सकती थी… इससे पहले भी जब मुलायम सिंह यादव की सरकार थी तब मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलवाई थी
  • कल्याण सिंह को इस बात का अंदेशा लग गया था कि 6 दिसंबर को कारसेवकों को कंट्रोल करने के लिए उनपर फायरिंग का आदेश कोई भी अधिकारी दे सकता है । इसलिए कल्याण सिंह ने 5 दिसंबर की शाम को ही समस्त अधिकारियों को एक लिखित आदेश जारी किया था और वो ये था कि कोई भी कारसेवकों पर गोली नहीं चलाएगा ।
  • ये फैसला लेना… संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी व्यक्ति के लिए आसान नहीं था । कल्याण सिंह इस बात को जानते थे कि जब वो ये फैसला ले रहे हैं तो अगर अयोध्या में कुछ हो जाता है तो इससे उनकी कुर्सी चली जाएगी… सारी दुनिया उन पर आरोप लगाएगी… ये कहा जाएगा कि कल्याण सिंह एक अराजक मुख्यमंत्री हैं… ये आरोप ही मंदिर आंदोलन का वो विष था… जिसे कल्याण सिंह ने अमृत मानकर पी लिया ।

-आखिर वही हुआ 6 दिसंबर 1992 को दोपहर साढ़े 11 बजे कारसेवक ढांचे को तोड़ने लगे… कल्याण सिंह को पल पल की खबर मिल रही थी…. लेकिन वो आराम से अपने मुख्यमंत्री आवास पर जाड़े की धूप सेंक रहे थे… दिल्ली से फोन घनघना रहे थे लेकिन कल्याण सिंह ने राम भक्ति को प्राथमिकता दी और किसी की कोई बात नहीं सुनी

  • केंद्र से गृहमंत्री चव्हाण का फोन आया और उन्होंने कहा कि कल्याण जी मैंने ये सुना है कि कारसेवक ढांचे पर चढ गए हैं तब कल्याण सिंह ने जवाब दिया कि मेरे पास आगे की खबर है और वो ये है कि कारसेवकों ने ढांचा तोड़ना शुरू भी कर दिया है लेकिन ये जान लो कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा गोली नहीं चलाऊंगा गोली नहीं चलाऊंगा
  • कल्याण सिंह के पूरे व्यक्तित्व और महानता का दर्शन सिर्फ इसी एक लाइन से हो जाता है… कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा… मैं गोली नहीं चलाऊँगा… मैं गोली नहीं चलाऊंगा । ढांचा टूट रहा था और केंद्रीय सुरक्षा बल विवादित स्थल पर आने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कल्याण सिंह ने ऐसी व्यवस्था करवा दी कि केंद्रीय सुरक्षा बल भी ढांचे तक नहीं पहुंच सके और आखिरकार ढांचा टूट गया… वो कलंक… वो छाती का शूल… वो बलात्कार अनाचार का दुर्दम्य प्रतीक भारत मां की छाती से हटा दिया गया… चारों तरफ हर्ष फैल गया… जन्मभूमि मुक्त हो गई
  • नरसिम्हा राव अब कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त करने का फैसला लेने जा रहे थे लेकिन उससे पहले ही शाम साढे 5 बजे कल्याण सिंह राजभवन गए राज्यपाल से मिले और अपना इस्तीफा सौंप दिया… यानी कुर्सी छोड़ दी लेकिन गोली नहीं चलाई… सिंहासन को लात मार दिया और श्री राम की गोद में बैठ गए… श्रीराम के प्यारे भक्त बन गए । ऐसे थे हमारे कल्याण सिंह
  • अगर कल्याण सिंह नहीं होते तो शायद किसी और मुख्यमंत्री में ये फैसला लेने की ताकत नहीं होती । कल्याण सिंह ने इसलिए भी गोली ना चलाने का लिखित आदेश दिया ताकि कल को कोई अफसरों को जिम्मेदार नहीं ठहराए । कल्याण सिंह ने कहा कि सारी जिम्मेदारी मेरी है जो करना है वो मेरे साथ करो । सजा मुझे दो ।
  • अगर कल्याण सिंह नहीं होते तो बाबरी नहीं गिरती… अगर बाबरी की दीवारें नहीं गिरतीं तो पुरातत्विक सर्वेक्षण नहीं होता… बाबरी की दीवार के नीचे मौजूद मंदिर की दीवार नहीं मिलती… कोर्ट में ये साबित नहीं हो पाता कि यही रामजन्मभूमि है ।
  • उस कलंक के मिटने का जो शुभ कार्य हुआ…. उसका श्रेय स्वर्गीय कल्याण सिंह जी को है… 6 दिसंबर कल्याण सिंह के पॉलिटिकल करियर को कालसर्प की तरह डस गया लेकिन कल्याण सिंह का यश दिग दिगंत में फैल गया ।
  • सबसे जरूरी बात अगर कल्याण सिंह ने गोली चलवा दी होती तो बीजेपी और एसपी में कोई फर्क नहीं रह जाता और आज मोदी प्रधानमंत्री भी नहीं होते इसीलिए ये सत्य है कि जहर पिया कल्याण ने अमृत पिया बीजेपी ने ।

मैं उस पुण्य आत्मा को अपने हृदय और आत्मा में मौजूद समस्त ऊर्जा के साथ नमन करता हूं… प्रणाम करता हूं… ईश्वर आपको मोक्ष दे

ये लेख अपने बच्चों को पढ़ाना… हर ग्रुप में शेयर कर देना, जय श्री राम

(नोट- मेरे कई मित्र ऐसे हैं जिन्होंने मेरा नंबर 7011795136 को दिलीप नाम से सेव तो कर लिया है लेकिन मिस्ड कॉल नहीं की है… जो मित्र मुझे मिस्ड कॉल भी करेंगे और मेरा नंबर भी सेव करेंगे… यानी ये दोनों काम करेंगे सिर्फ उनको ही मेरे लेख सीधे व्हाट्सएप पर मिल पाएंगे… व्हाट्सएप स्टेटस पर भी आर्टिकल के लिंक होते हैं) साभार

सफाई नायकों के प्रति रखें कुशल व्यवहार एवं स्वास्थ्य, सुरक्षा का ख्याल

बरेली। जैम एनवायरो मैनेजमेंट प्रा.लि. एवं नगर निगम बरेली के द्वारा “ग्रीन अर्थ मूवमेंट मुहिम” कार्यक्रम का आयोजन आईंएमए, बरेली के सभागार में किया गया।

मुख्य अतिथि पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद संतोष गंगवार, विशिष्ट अतिथि मंडल आयुक्त रमेश कुमार, महापौर नगर निगम डॉ. उमेश गौतम, नगर आयुक्त बरेली के द्वारा दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। “ग्रीन अर्थ मूवमेंट मुहिम” के अंतर्गत सूचना एवं जनसंपर्क विभाग उत्तर प्रदेश लखनऊ द्वारा पंजीकृत “नवज्योति नृत्य नाट्य संस्था” के सरंक्षक डॉ. रजनीश सक्सेना के सरंक्षण में बरेली के कलाकारों ने नाटक का मंचन किया। इसके अंतर्गत कलाकारों ने स्वच्छता एवं सफाई नायकों की भूमिका प्रस्तुत कर दर्शाया कि (रेगपिकर) सफाई नायकों के प्रति हम सभी को कुशल व्यवहार एवं स्वास्थ्य, सुरक्षा का ख्याल रखना चाहिए।

कार्यक्रम का नेतृत्व संस्था की संस्थापक/सचिव हरजीत कौर एवं संचालन रवि सक्सेना के द्वारा किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिनिधि, अधिकारीगण, नगर आयुक्त, अपर नगर आयुक्त, पर्यावरण अधिशासी अधिकारी एवं जैम एनवायरो मैनेजमेंट प्रा.लि. कंपनी से विक्रम शर्मा के द्वारा कलाकारों की सफल प्रस्तुति के लिए खूब सराहना मिली। कंपनी के द्वारा डोर टू डोर कूड़ा कलेक्ट करने वाले सफाई नायकों को सुरक्षा किट भी वितरण किया गया। अन्त में आभार डॉ. रजनीश सक्सेना ने व्यक्त किया।

नम आंखों से याद किये गए पूर्व पीएम

मलिहाबाद,लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के पुरोधा संस्थापक भारत रत्न पंडित अटल बिहारी बाजपेयी की पुण्यतिथि परम शिवाला में भाजपा मंडल कार्यालय पर श्रदांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। क्षेत्रीय विधायक जयदेवी कौशल ने दीप प्रज्वलित कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अटल बिहारी बाजपेयी के चित्र पर माल्यार्पण किया।कार्यक्रम में उपस्थित मंडल अध्यक्ष जितेंद्र अवस्थी, जिला उपाध्यक्ष रामविलास रावत, जिला संयोजक पंकज गुप्ता, भाजपा महामंत्री आशीष द्विवेदी, प्रमोद पाठक, राजेश लोधी, मूलचंद यादव, भूमि विकास बैंक के अध्यक्ष अरविंद शर्मा, वरिष्ठ भाजपा कार्यकर्ता खलील अहमद, मारूफ अंसारी, प्रधान प्रतिनिधि पुरवा अंजू सिंह सहित दर्जनों कार्यकर्ता उपस्थित रहे। कार्यक्रम में भाजपा नेताओं ने पंडित अटल बिहारी बाजपेयी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए देश और पार्टी के प्रति किये योगदान से सीख लेकर उनके विचारों को और आगे बढ़ाने का सभी कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया।

कर्जन वायली का वध करने वाले क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा की जयंती पर विशेष

बलिदान दिवस (17 अगस्त 1909) पर विशेष

कर्जन वायली का वध करने वाले क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा

राजस्थान के अजमेर में रेलवे स्टेशन के बाहर क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा का स्मारक

बचपन में कुत्तों की भाषा बता कर अंग्रेजी पर प्रहार, किशोरवय में पिता की अंग्रेज परस्त बनाने की कोशिश को असफल, छात्र जीवन में आजादी के बीज का अंकुरण, युवावस्था में अंग्रेज अफसर कर्जन वायली का वध और हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लेना किसी सामान्य व्यक्ति के लक्षण नहीं थे. ऐसे क्रांतिवीर का नाम था मदन लाल धींगरा. सिर्फ 25 साल की उम्र में धींगरा ने भारत को आजाद कराने के लिए मृत्यु का वरण किया था.
1 जुलाई 1909 की रात लंदन के इंडियन नेशनल एसोसिएशन के जलसे में कंपनी सरकार में भारतीयों पर तरह-तरह के जुल्म ढहाने वाले कर्जन वायली के सीने में अपनी पिस्टल से तड़ातड़ 2 गोलियां भरी सभा में उतार दी. धींगरा यह मौका किसी भी सूरत में हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे. वही हुआ और कर्जन वायली मारा गया. उसे बचाने आया एक फ्रांसीसी नागरिक भी धींगरा की गोलियों का शिकार बना था. कुछ विद्वानों का मत है कि वायली के वध के बाद वीर धींगरा ने खुद को गोली मारने का जतन किया लेकिन पकड़े जाने पर वह इरादा पूरा नहीं हुआ. दूसरी ओर कुछ इतिहासकारों का मत है कि सभा से भागने के बजाय साहसी धींगरा वही खड़े रहे और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. धींगरा के इस साहस भरे कारनामे की अखबारों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा भी हुई. वायली के वध की खबर लंदन और पेरिस समेत कई देशों के समाचार पत्रों की सुर्खियां बना था. अंग्रेजों की मंशा ना होने के बावजूद भारत में भी यह समाचार तेज गति से फैल गया था.

वायली के वध को दुनिया के सामने गलत तरीके से पेश न किए जाने और अपनी अंतिम इच्छा एक पत्र के रूप में लिखकर उन्होंने जेब में रख लिया था लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में कंपनी राज कमजोर न पड़ने देने के लिए उस पत्र को गायब कर दिया. हालांकि ब्रिटिश सरकार को यह नहीं पता था कि धींगरा उस पत्र की एक प्रति पहले ही वीर सावरकर को सौंप चुके थे. वीर सावरकर ने धींगरा का वह पत्र चोरी-छिपे पेरिस पहुंचा कर फ्रांस के एक समाचार पत्र में छपवाने का प्रबंध कर दिया. उसके बाद ब्रिटिश सरकार वायली के वध के कारणों को लेकर को दुनिया को गुमराह नहीं कर सकने में कामयाब हुई. धींगरा से ब्रिटिश हुकूमत इतनी डरी हुई थी कि उसने भारत में राज करने वाली कंपनी सरकार को पत्र लिखकर कहा-” हम यह नहीं चाहते हैं कि इस शहीद के अवशेष पार्सल से भारत भेजे जाएं”

एक दिन जरूर आजाद होगा भारत:
साहस की प्रतिमूर्ति मदन लाल धींगरा भारत के एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने अंग्रेजों की धरती पर भारत विरोधी और अपने पिता भाइयों के करीबी अंग्रेज अफसर का वध करके दुनिया को एक संदेश दिया था कि वह दिन दूर नहीं जब भारत आजाद होगा. भारतीयों को वायली के वध के जुर्म में ब्रिटिश अदालत में दिया गया। धींगरा का वह बयान जरूर पढ़ना चाहिए जिसका एक-एक शब्द साहस को व्यक्त करने वाला है. वह मानते थे कि भारत पर राज करने वाले अंग्रेज अफसर 33 करोड़ भारतीयों के अपराधी हैं. अपने “चुनौती” नामक एक वक्तव्य में उन्होंने साफ-साफ कहा था- “मेरे को विश्वास है कि संगीनों के साए में पनप रहे भारत में एक युद्ध की तैयारी अवश्य चल रही होगी. क्योंकि यह लड़ाई असंभव मालूम पड़ती है और तमाम बंदूकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. ऐसे स्थिति में मैं यही कर सकता था कि अपनी पिस्तौल से गोली मार दूं. मेरे जैसा गरीब और सामाजिक रुप से अप्रतिष्ठित व्यक्ति यही कर सकता था कि अपनी मातृभूमि के लिए अपना रक्त बहाऊं और मैंने यही किया. आज की स्थिति में हर भारतीय के लिए एक ही सबक है कि वह यह सीखे कि मृत्यु का वरण कैसे किया जाए? यह शिक्षा तभी फलीभूत होगी जब हम अपने प्राणों को मातृभूमि पर बलि चढ़ा दें. इसलिए मैं मर रहा हूं और मेरे शहीद होने से मातृभूमि का मस्तक ऊंचा ही होगा”

38 साल बाद अस्थियों को नसीब हुई देश की माटी:
17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटोनविले जेल में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया. अपनी अंतिम इच्छा में मदनलाल धींगरा ने कहा था कि उनके शव को कोई भी गैर हिंदू हाथ न लगाए और शव वीर सावरकर को सौंप दिया जाए. हिंदू रीति रवाज से ही मेरा अंतिम संस्कार हो लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने उनकी आखिरी इच्छा डर के मारे पूरी नहीं की. सनातन हिंदू धर्म की परंपरा के विरुद्ध एक कोड नंबर एलाट कर शव को दफना दिया गया. शहादत के 38 वर्ष बाद भारत के आजाद होने पर भी इस क्रांतिवीर को सरकार की उपेक्षा सहन करनी पड़ी. वर्ष 1976 में मदनलाल धींगरा के अवशेष भारत लाए जा पाए थे. वह भी तब जब शहीद उधम सिंह के अवशेष को खोजते हुए धींगरा के अवशेषों पर खोजकर्ताओ की नजर पड़ी. इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उनके अवशेष भारत को सौंपा. वीर धगरा के अवशेष पंजाब भेजे गए लेकिन आज तक पंजाब में उनका कोई स्मारक का पता नहीं चलता. राजस्थान के अजमेर में जरूर रेलवे स्टेशन के बाहर एक छोटा सा स्मारक बना हुआ है.

विदेश में भारत की आजादी के लिए बलिदान देने वाले वह पहले क्रांतिवीर माने जाते हैं. उनकी शहादत को दुनियाभर ने सलाम किया था. फांसी दिए जाने के बाद एक आयरिश समाचार पत्र ने धींगरा को बहादुर व्यक्ति की संज्ञा दी थी. काहिरा से प्रकाशित होने वाले मिश्र के समाचार पत्र “लल्ल पेटी इजिप्शियन” ने धीगरा को अमर शहीद की उपाधि देते हुए आगामी 40 वर्षों में ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की भविष्यवाणी की थी. यह भविष्यवाणी सच भी साबित हुई. धींगरा की शहादत के 38 साल बाद ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का पतन हो गया. कांगेस की संस्थापक मानी जाने वाली श्रीमती एनी बेसेंट ने कहा था कि देश को इस समय बहुत से मदनलाल की जरूरत है. वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय ने धींगरा की स्मृति में एक मासिक पत्रिका प्रारंभ की थी, जिसका नाम था “मदन तलवार” यानी (मदनलाल की तलवार). कुछ समय बाद ही यह पत्रिका विदेश के भारतीय क्रांतिकारियों के लिए मुखपत्र बन गई थी. यह पत्रिका बर्लिन में मैडम कामा द्वारा प्रिंट कराई जाती थी. शहादत के 10 वर्ष बाद 1919 में डब्लू डब्लू ब्लंट की प्रकाशित पु