बारिश, ठंडी हवाओं से मौसम हुआ सुहाना

नई दिल्ली (एजेंसी)। उत्तर भारत में झुलसा देने वाली गर्मी पड़ने के बाद पंजाब में पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने का असर नजर आया। शुक्रवार तड़के 3 बजे झमाझम बारिश हुई। बारिश से पहले रात 12 बजे से आसमान में बिजली कड़कती रही और तेज हवाएं चल रहीं थीं, जिससे लोगों को ठंडक का अहसास हुआ। इसके बाद बारिश होने से तापमान में गिरावट दर्ज की गई। सुबह 4 बजे तापमान 27 डिग्री था।

मौसम विभाग के अनुसार अभी 4 से 5 दिन बादल छाए रहेंगे। बादल छा जाने से लोगों को लू से राहत मिली। मौसम में बदलाव होते ही कई शहर वासियों ने पहाड़ों की ओर रुख कर लिया है। लोग मौसम का आनंद उठाने के लिए हिल  एरिया में जाने लगे हैं। ठंडी हवाओं ने जहां लोगों को राहत दी, वहीं लोगों की चहल कदमी भी अधिक हो गई। आज लुधियाना में हवा 40 किलोमीटर की रफ्तार से चली। बादलों की गरज के साथ बारिश रुक-रुक कर होती रही। हालांकि 17 से 21 जून तक आसमान में बादल छाए रहने की पूरी संभावना है।

शुक्रवार को लुधियाना का अधिकतम तापमान 28 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की संभावना है। फिरोजपुर जिले का 31 डिग्री, अमृतसर 27 डिग्री, पटियाला 29 डिग्री, जालंधर 29 डिग्री, बठिंडा 32 डिग्री, मोगा 31 डिग्री, श्री फतेहगढ़ साहिब 29 डिग्री रहेगा। मौसम के इस बदलाव का लोग खूब आनंद उठा रहे हैं।

राजधानी में पिछले कई दिनों से पड़ रही भीषण गर्मी से शुक्रवार सुबह थोड़ी राहत मिली। हल्की बूंदाबांदी से तापमान में काफी गिरावट आई। सुबह छह बजे गरज के साथ हुई हल्की बारिश से मौसम सुहाना हो गया। इस दौरान हल्की हवाएं भी चल रही थीं। तापमान 26 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। मौसम विभाग ने 21 जून तक तेज हवाओं के साथ बारिश होने का अनुमान जताया है। विभाग के मुताबिक, 22 जून के बाद मौसम साफ हो जाएगा और शुष्क पछुआ हवाएं चलेंगी हालांकि, तापमान तेजी से बढ़ने का पूर्वानुमान नहीं है. मानसून दिल्ली में सामान्य तिथि 27 जून या इससे एक या दो दिन पहले पहुंचने की उम्मीद है। आईएमडी ने अगले 5 दिनों में गरज के साथ छीटें पड़ने या हल्की बारिश की चेतावनी के साथ ‘येलो अलर्ट’ जारी किया है। पिछले साल आईएमडी ने अनुमान जताया था कि दिल्ली में अनुमान से करीब दो हफ्ते पहले मानसून आएगा। हालांकि, यह 13 जुलाई को आया था जिससे 19 वर्षों में यह सबसे देर से पहुंचने वाला मानसून बन गया था।

वहीं उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई हल्की बारिश ने मौसम को सुहावना बना दिया। तापमान में गिरावट आने से लोगों को गर्मी से थोड़ी राहत मिली। लोग अपने घरों और प्रतिष्ठानों के बाहर बैठकर ठंडी हवाओं और सुहावने मौसम का आनंद लेने लगे। हालांकि गुरुवार सुबह से ही गर्मी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। दोपहर होते-होते सूर्य के तेवर तल्ख होते गए और गर्मी से बेहाल लोग बारिश की आस लगा रहे थे। शाम होते ही मौसम का मिजाज बदला और आसमान में बादल छा गए। फिर हल्की बारिश हुई, तो लोगों को गर्मी से राहत मिली। बारिश और ठंडी हवाओं ने मौसम सुहावना कर दिया।

इससे पहले मई के आखिरी सप्ताह में मॉनसून 2022 को लेकर मौसम विभाग ने बड़ी अच्‍छी खबर सुनाई थी।  दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून तय समय से तीन दिन पहले ही केरल पहुंच चुका था। आमतौर पर केरल में मॉनसून 1 जून को पहुंचता है। मानसून के 20 जून तक गुजरात पहुंचने का पहले अनुमान लगाया गया है। IMD ने एक मैप जारी कर बताया है कि भारत के किन-किन राज्‍यों में मॉनसून की आमद कब तक होगी।

आपके यहां कब तक पहुंचेगा मॉनसून?

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पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में मॉनसून 15-20 जून के बीच पहुंचेगा। मौसम विभाग के मैप के अनुसार, आपके यहां मॉनसून पहुंचने की संभावित तारीख (नोट: इन अनुमानों में ±5 दिन का अंतर देखने को मिल सकता है।)

20 जून: गुजरात, मध्‍य प्रदेश के कुछ हिस्‍से, पूर्वी उत्‍तर प्रदेश, राजस्‍थान के कुछ हिस्‍से, उत्‍तराखंड, हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्‍से

25 जून: दक्षिणी राजस्‍थान, पंजाब-हरियाणा के कुछ हिस्‍से, मेन यूपी, हिमाचल प्रदेश का बाकी हिस्‍सा, जम्‍मू कश्‍मीर, लद्दाख

30 जून: मध्‍य राजस्‍थान, दिल्‍ली-एनसीआर, पंजाब-हरियाणा, मुजफ्फराबाद, गिलगित-बाल्टिस्तान

5 जुलाई: पश्चिमी राजस्‍थान, पंजाब-हरियाणा के सीमावर्ती हिस्‍से

पंजाब में मिले 282 भारतीय सैनिकों के कंकाल

अमृतसर (एजेंसी)। पंजाब में अमृतसर के पास अजनाला में एक कुएं के भीतर भारतीय सैनिकों के कंकाल बरामद हुए हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी में एन्थ्रोपोलॉजी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर जेएस सहरावत का कहना है कि ये कंकाल 282 भारतीय सैनिकों के हैं, जिनकी अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के समय हत्या कर दी गई थी। ये कुआं एक धार्मिक संरचना के नीचे पाया गया था। उन्होंने आगे कहा, अध्ययन में पता चला है कि इन सैनिकों ने सूअर और गाय की चर्बी से बने कारतूसों के इस्तेमाल के खिलाफ विद्रोह किया था।

डॉक्टर जेएस सहरावत ने आगे बताया कि सिक्के, पदक, डीएनए अध्ययन, विश्लेषण, मानव विज्ञान, रेडियो-कार्बन डेटिंग, सभी एक ही ओर इशारा करते हैं कि ये भारतीय सैनिकों के कंकाल हैं। सबसे पहले अजनाला में 2014 में नर कंकाल मिले थे। तब भी अध्ययन में बताया गया था कि ऐसा हो सकता है कि ये भारतीय सैनिकों के कंकाल हों। हालांकि मई की शुरुआत में आई रिपोर्ट में ये भी कहा गया कि हो सकता है कंकाल 1947 में हुए विभाजन के समय के हों। 28 अप्रैल को फ्रंटियर्स इन जेनेटिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए अध्ययन के अनुसार, पुरुष 26वीं मूल बंगाल इन्फैंट्री बटालियन का हिस्सा थे, जिसमें मुख्य रूप से बंगाल, ओडिशा, बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्सों के सैनिक शामिल थे।

जॉइंट स्टडी?
इस जॉइंट स्टडी को पंजाब यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजी विभाग, लखनऊ के बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियो साइंस, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जूलॉजी विभाग की साइटोजेनेटिक लैबोरेटरी, हैदराबाद के सीएसआईआर-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी और हैदराबाद के सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायगनॉस्टिक ने किया है। रिसर्च का नेतृत्व पंजाब यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजिस्ट जेएस सहरावत ने किया।

क्या हुआ था 2014 में?
सहरावत ने कहा कि इन सबकी शुरुआत 2014 में एक म्यूजियम लाइब्रेरी से हुई है। भारतीय रिसर्च स्कॉलर को एक सिविल सेवक की एक किताब मिली, जो 1857 में अमृतसर में तैनात था। किताब में पंजाब को लेकर जानकारी दी गई थी। किताब में 10 मई से 1858 में एफएच कूपर द्वारा दिल्ली के पतन तक के बारे में बताया गया है। इसी में उस जगह का उल्लेख किया गया है, जहां सैनिकों को मारकर सामूहिक रूप से दफन किया गया था। किताब में लिखा है कि ये जगह अजनाला (अमृतसर में) एक धार्मिक संरचना के नीचे है। सहरावत ने बताया, रिसर्चर खुद भी अजनाला से ही थे। वो अपने घर आए और प्रशासन को इस बात की जानकारी दी। तब किसी ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन स्थानीय लोगों ने खुद खुदाई का काम किया। उन्हें वाकई में धार्मिक ढांचे के नीचे कुंआ मिला, जिसमें मानव कंकाल, सिक्के और मेडल थे।
 

Punjab में कांग्रेस के CM चेहरे का ऐलान आज शाम 7 बजे!

Punjab में कांग्रेस का CM चेहरा कौन? ऐलान आज शाम 7 बजे! 

चंडीगढ़ (एजेंसी)। पंजाब विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री चेहरे पर कांग्रेस ने ट्वीट कर एक बड़ा इशारा किया है। अपने ट्विटर हैंडल से शेयर मैसेज में सीएम के चेहरे की आधिकारिक घोषणा के लिए शाम 7 बजे तक का इंतजार करने के लिए कहा गया है। 

कांग्रेस के ट्वीट में पंजाब में मुख्‍यमंत्री चरणजीत सिंह चन्‍नी और पंजाब अध्‍यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को डबल विंडो में दिखाया गया है। इस ट्वीट को देखने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि शाम 7 बजे आलाकमान के द्वारा पंजाब के सीएम फेस के नाम का ऐलान किया जा सकता है। बता दें कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कुछ दिन पहले ही जालंधर में कहा था कि पार्टी पंजाब विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के चेहरे के साथ उतरेगी और पार्टी कार्यकर्ताओं से परामर्श करने के बाद जल्द ही इस पर फैसला लिया जाएगा। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने भी सीएम मुख्यमंत्री का नाम ऐलान करने की मांग की थी। पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए 20 फरवरी को वोटिंग होगी।

सूत्रों के मुताबिक, सीएम चन्नी के 100 दिन के काम को पार्टी ने चयन का आधार बनाया है। चन्नी के आक्रामक काम की वजह से कांग्रेस की स्थिति ठीक हुई है। कांग्रेस चन्नी को मुख्यमंत्री पद की लड़ाई में इसलिए भी उतार सकती है, क्योंकि वह एक शिक्षित व्यक्ति हैं और उनके पास कई एकेडमिक डिग्रियां हैं। अपनी साख और आचरण के जरिए बीते कुछ महीनों में उन्होंने पार्टी के एक बड़े तबके के बीच खुद को लोकप्रिय बना लिया है। दलित समुदाय से होने की वजह से सीएम पद पर उनकी दावेदारी और मजबूत हो जाती है, ऐसा इसलिए क्योंकि पंजाब में दलित घनत्व (2011 की जनगणना के मुताबिक) सबसे अधिक है।

नहटौर पुलिस ने दबोचे ट्रक ड्राइवर की हत्या व लूट के 6 आरोपी

6 आरोपी गिरफ्तार, डेढ़ करोड़ की लूट में थे शामिल। घटना में प्रयुक्त दो ट्रक व एक कार भी बरामद। चंडीगढ़ पंजाब का था ट्रक चालक


बिजनौर। थाना नहटौर क्षेत्र में 4 दिन पूर्व ड्राइवर की हत्या कर ट्रक लूट कर शव को झाड़ियों में फेंक कर फरार हुए छह अभियुक्तों को बिजनौर पुलिस व स्वाट टीम ने गिरफ्तार कर लिया है। उनके कब्जे व निशानदेही पर लूटा गया ट्रक व नकदी के अलावा घटना में उपयोग किये गए दो ट्रक व एक कार भी बरामद किए गए हैं। यह जानकारी पुलिस अधीक्षक डॉ धर्मवीर सिंह ने प्रेस वार्ता में दी।


थाना नहटौर क्षेत्र के हल्दौर मार्ग पर गांव बेगराजपुर के पास एक अधेड़ व्यक्ति का शव 4 दिन पूर्व झाड़ियों में पड़ा मिला था। उसकी शिनाख्त की कोशिश में असफल होने पर पुलिस ने शव का फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर वायरल करते हुए शिनाख्त की अपील की थी। बताया गया कि मृतक के पुत्र ने नहटौर थाने पहुंचकर शव की शिनाख्त की। चंडीगढ़ पंजाब निवासी ट्रक चालक नारायण सिंह ट्रक लेकर चंडीगढ़ से निकला था। तभी से कुछ बदमाश उसके लूट के इरादे से पीछे लग गए। बिजनौर में योजनाबद्ध तरीके से सभी बदमाशों ने उसको शराब का सेवन करा कर हत्या कर दी और शव झाड़ियों में फेंक कर फरार हो गए। ट्रक में लाखों रुपए का माल (स्क्रैप) व 40 हजार की नकदी थी।

बिजनौर स्वाट टीम व स्थानीय पुलिस ने संयुक्त ऑपरेशन में सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इनमें से दो अभियुक्त थाना अफजलगढ़ क्षेत्र के बताए जा रहे हैं, जबकि अन्य सभी अभियुक्त गैर जनपद के हैं।

एसपी डॉ धर्मवीर सिंह ने प्रेस वार्ता में घटना का खुलासा करते हुए बताया कि 4 दिन पूर्व थाना नहटौर क्षेत्र के अंतर्गत हुई ड्राइवर की हत्या और लूट के आरोपी अभियुक्तों गिरफ्तार कर जेल भेजा जा रहा है। अभियुक्तों के कब्जे से से लूट का माल, नगदी व घटना में उपयोग किये गए दो ट्रक व एक कार बरामद किए गए हैं।

अब किसान आंदोलन में लालकिले पर हंगामा करने वालों की मदद!

अब किसान आंदोलन में लालकिले पर हंगामा करने वालों की मदद। मदद के लिए दिया जाने वाला धन किसी मुख्यमंत्री की निजी संपत्ति नहीं होती। पंजाब सरकार अपराधी को मदद करती है तो प्रदेश की सारी जनता को दो−दो लाख क्यों नहीं देतीॽ

लगता है वोट की राजनीति देश को बर्बाद करके छोड़ेगी। इसने तो अपराधी और कानून के मानने वालों में फर्क करना ही बंद कर दिया। अपराधियों और कुपात्र की मदद के नाम पर सरकारी धन के दुरूपयोग को रोकने के लिए देश की दूसरी संस्थाओं को आगे आना होगा।

ये क्या हो रहा हैॽ मदद के लिए दिया जाने वाला धन किसी मुख्यमंत्री की निजी संपत्ति नहीं होती। राजकीय कोष होता है। प्रदेश और देश के जिम्मेदार नागरिकों द्वारा दिए गए टैक्स से संग्रह हुआ धन है, इसको इस तरह से लुटाने की अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। मुख्यमंत्री या किसी मंत्री के निर्णय को उचित −अनुचित बताने वाली कार्य पालिका है। संबधित अधिकारी हैं। उन्हें इसे रोकना चाहिए। क्योंकि जिम्मेदारी उनकी बनती है, किसी मंत्री या मुख्यमंत्री की नहीं। केंद्र द्वारा प्रदेश में राज्यपाल इसीलिए बैठाए जातें हैं कि वह सरकार के गलत और सही निर्णय पर विचार करें। गलत निर्णय पर रोक लगाए। इसके ऊपर संसद और राष्ट्रपति हैं। न्यायपालिका गलत और सही निर्णय को परीक्षण करने के लिए हैं।

पंजाब की चरण सिंह चन्नी सरकार ने निर्णय लिया है कि किसान आंदोलन के दौरान 26 जनवरी को लालकिले पर हुए उपद्रव में गिरफ्तार 83 लोगों को वह दो−दो लाख रुपए की मदद करेगी। केंद्र द्वारा संसद में पारित तीनों कृषि कानून को उसने लागू न करने का भी निर्णय लिया है। पंजाब सरकार इस उपद्रव में मरने वाले दो लोगों को पहले ही पांच −पांच लाख रुपया दे चुकी है।

मुझे याद आता है कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष से प्रदेश के पत्रकारों को उपकृत किया था। मायावती मुख्यमंत्री बनी तो उन्होंने इस कोष से अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं को ही पैसा बांटा। इसे लेकर शोर भी मचा था, पर सारे नेता एक ही थैली के चट्टे −बट्टे हैं। इसलिए ये मामला आगे नहीं बढ़ा। न कार्यपालिका ने जिम्मेदारी निभाई। न अन्य संस्थाओं ने।

लखीमपुर खीरी में किसानों के प्रदर्शन के दौरान हुई मौत में उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रत्येक मरने वाले के परिवार को 45−45 लाख रुपया दिया। फिर इनको पंजाब और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने कैसे 50−50 लाख रुपया अपने प्रदेश के कोष से दियाॽ पंजाब और छत्तीसगढ़ के प्रदेश का धन दूसरे प्रदेश में लुटाने का अधिकार इन प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को किसने दियाॽ स्वतः संज्ञान लेने वाली न्याय पालिका को इस पर विचार करना चाहिए। देखना चाहिए कि क्या कोई सरकार किसी अपराधी की इस तरह मदद कर सकती हैॽ आज किसान प्रदर्शन के नाम पर उपद्रव करने वालों की मदद की गई है, कल चोर, डकैत, देशद्रोही और आतंकवादियों की मदद की जाएगी!

उधर पंजाब सरकार अपराधी को मदद करती है तो प्रदेश की सारी जनता को दो−दो लाख क्यों नहीं देतीॽ पंजाब समेत पांच प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं। इन प्रदेश की जनता को इन मुख्यमंत्री से पूछना चाहिए कि अपराधी की, सरकारी खजाने से मदद क्यों की गईॽ मदद करनी है तो अपनी जेब से करो। अपने निजी पैसे से करो। अपराधी की मदद की है तो प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति, आम नागरिक को इनसे दुगनी राशि दो। नहीं देते तो इनका बहिष्कार किया जाना चाहिए।इन गलत निर्णय का विरोध करने के लिए प्रदेश और जिम्मदार देशवासियों को आगे आना होगा। किसी को तो पहल करनी पड़ेगी ही।

अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

BSF की अधिकार सीमा बढ़ाने के खिलाफ प्रस्ताव पारित

BSF की अधिकार सीमा बढ़ाने के खिलाफ पंजाब विधानसभा में प्रस्ताव पारित, सिद्धू और मजीठिया में तकरार

चंडीगढ़ (एजेंसी) पंजाब विधानसभा में गृह मंत्री सुखजिंदर रंधावा ने BSF की सीमा 15 किलोमीटर से बढ़ाकर 50 किलोमीटर करने के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश किया। इसमें केंद्र सरकार से 11 अक्तूबर को गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना वापस लेने की मांग की गई। इसके बाद विधानसभा ने सर्वसम्मति से इस संबंध में केंद्र सरकार की अधिसूचना को खारिज करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया। इस मामले पर विधानसभा में जमकर हंगामा भी हुआ। नवजोत सिद्धू और बिक्रम सिंह मजीठिया आमने-सामने हो गए। सिद्धू ने सवाल दागा कि सुखबीर बादल सर्वदलीय बैठक में क्यों नहीं आए। 

चन्नी ने जमकर साधा अकाली दल पर निशाना:
सदन में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने अकाली दल पर जमकर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा व आरएसएस को पंजाब में दाखिल कराने में अकाली दल की अहम भूमिका है। चन्नी ने आरएसएस व भाजपा को पंजाब की दुश्मन जमात करार दिया। साथ ही कहा कि शिरोमणि अकाली दल पंजाब की गद्दार पार्टी है। इसने हमेशा पंजाब को खराब किया। जम्मू कश्मीर से जब अन्याय हुआ तब अकाली दल भाजपा के साथ था।

तब क्यों चुप था अकाली दल: मुख्यमंत्री चन्नी ने सीधे-सीधे सुखबीर बादल पर निशाना साधा। कहा कि जब संसद में राज्यों के अधिकारों पर हमला किया जा रहा था, तब अकाली दल ने चुप्पी साधे रखी। चरणजीत सिंह चन्नी ने कहा कि अकाली दल ने आरोप लगाया कि वह वह पीएम से मिलने गए।

सदन में हंगामा, वॉकआउट: चन्नी के भषण पर सदन में हंगामा हो गया। आप के सदस्य नारेबाजी करते हुए वेल में पहुंचे। इसके बाद आप ने सदन से वॉकआउट कर लिया। अकाली दल के सदस्य भी वेल में पहुंचे। उन्होंने मुख्यमंत्री के भाषण का विरोध करते हुए वेल में नारेबाजी की।

…इस लड़ाई से, कमजोर तो कांग्रेस ही हो रही है

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में कहा है कि कांग्रेस के रवैये से भाजपा मजबूत हो रही है। उसके कार्यों से भाजपा को ताकत मिल रही है। देखने से लग भी ऐसा ही रहा है। कांग्रेस के उच्च नेतृत्व की गलती से पंजाब में कांग्रेस दो-फाड़ हो गई। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के रवैये से पंजाब में कांग्रेस विभाजित हो गई। पार्टी के मजबूत स्तंभ कैप्टन अमरिंदर सिंह अपनी पार्टी अलग बना ली।

कांग्रेस को लगता था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद वहां की राजनीति में गुटबंदी खत्म हो जाएगी, उसमें आया भूचाल रूक जाएगा, पर ऐसा हुआ नहीं। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू का विधवा विलाप पहले भी जारी था, अब भी जारी है। पार्टी के वर्तमान मुख्यमंत्री को कमजोर करने के उनके षड़यंत्र कम नहीं हुए।

कांटे से कांटा निकालने की रीति- पुराने क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सरकार में मंत्री रहे। बड़बोलेपन के कारण उन्होंने मंत्री पद छोड़ा। कैप्टन अमरिंदर सिंह का विरोध जारी रखा। कांग्रेस हाईकमान कैप्टन के बढ़ते कद से नाराज थी। उसने नवजोत सिंह सिद्धू को बढ़ाया। मुखयमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को कमजोर करने के लिए सिद्धू को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद सिद्धू को और पर लग गए। कैप्टन का विरोध और बढ़ गया। गुटबंदी घटने की जगह बढ़ी। पार्टी के रवैये का देख अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया।

कुत्ते की टेढी दुम- प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, पार्टी ने ऐसा होने नहीं दिया। पार्टी उन्हें कैप्टन को हटाने तक इस्तेमाल करना चाहती थी, उतना ही उसने किया। ऐसे हालात बने कि कैप्टन मंत्रिमंडल के सदस्य चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया। शुरूआत में तो सिद्धू उन्हें साथ लेकर घूमे। सिद्धू को लगा था कि मुख्यमंत्री चन्नी उसके पांव पर ही चलेंगे, अप्रत्यक्ष रूप से वे ही मुख्यमंत्री होंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। कहना न मानते देख सिद्धू चन्नी के विरोध पर उतर आए। कांग्रेस उच्च नेतृत्व ने पहले तो ध्यान नहीं दिया। चुप्पी साधे रहा कि खुद ही ठीक हो जाएगा। कुत्ते की टेढी हुई दुम कितने ही साल नलकी में रखो, वह कभी सीधी नहीं होती। ये कहावत सिद्धू पर पूरी तरह फिट बैठती है। अपनी न चलती देख उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। अब पार्टी की कार्यवाहक अध्यक्ष सोनिया गांधी सक्रिय हुईं। सिद्धू और मुख्यमंत्री चरण सिंह चन्नी को बुलाकर समझाया। नवजोत सिंह सिद्धू को साफ कहा कि जो कहना है पार्टी के अंदर कहें, बाहर नहीं। वहीं अपनी आदत से मजबूर सिद्धू ने दिल्ली से वापस आते ही मुख्यमंत्री चन्नी को लेकर प्रेस में फिर बयान जारी कर दिया। चन्नी की घोषणाओं का विरोध शुरू कर दिया।

पंजाब कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत ने हाल में कहा था कि सिद्धू के रवैये को देखते हुए पार्टी हाईकमान को उनका त्यागपत्र स्वीकार कर लेना चाहिए था, पर हुआ नहीं। ऐसा हो जाता तो पार्टी का विवाद खत्म हो जाता। ये भी हो सकता था कि मनाने पर कैप्टन मान जाते। पार्टी का विभाजन टल जाता। वह अलग पार्टी न बनाते।

या कर दें सिद्धू को पार्टी से बाहर- अब हालात यह हैं कि कैप्टन सिंह पार्टी से अलग हो गए। तीन दिन पूर्व उन्होंने अपनी पार्टी बना ली। वे कांग्रेस में लंबे समय रहे हैं। उनके पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं से खासे संबंध है। ये कटु सत्य है कि वे गए हैं, तो पार्टी के अन्य नाराज कार्यकर्ता और नेता भी उनके साथ जांएगे। कैप्टन के अलग पार्टी बनाने से कांग्रेस को ही नुकसान पहुंचा। सिद्धू के रवैये में कोई अंतर नहीं आया। उनका अपना रूदन जारी है। तब तक जारी रहेगा, जब तक उनकी मनचाही नहीं हो जाती। पार्टी उन्हें पंजाब का मुख्यमंत्री नहीं बना देती। वैसे उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष पद से त्यागपत्र वापस लेने की बात कही है, पर आरोप वे लगातार लगा रहे हैं। ऐसे में दूसरा रास्ता बचता है सिद्धू को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। अब कांग्रेस हाईकमान को सोचना होगा कि वह क्या करे। सिद्धू को मुख्यमंत्री बनाना चन्नी और कुछ अन्य को पंसद नहीं होगा। अगर पार्टी ऐसा करती है तो उन्हें भी खोएगी।

अशोक मधुप (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

पहचान दिखाने के लिए ‘दलित’ शब्द के प्रयोग से किया जाए परहेज़

अनुसूचित जातियों से सम्बन्धित किसी भी व्यक्ति की पहचान दिखाने के लिए ‘दलित’ शब्द के प्रयोग से परहेज़ किया जाए: अनुसूचित जाति आयोग

चंडीगढ़ (एजेंसी)। पंजाब के नव-नियुक्त मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के लिए ‘दलित’ शब्द का प्रयोग किए जाने का नोटिस लेते हुए पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आयोग की चेयरपर्सन श्रीमती तजिन्दर कौर ने मंगलवार को हिदायत जारी की, कि सोशल मीडिया पेज, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अनुसूचित जाति से सम्बन्धित किसी भी व्यक्ति की पहचान को दिखाने के लिए ‘दलित’ शब्द का प्रयोग न किया जाए। इस संबंधी जानकारी देते हुए श्रीमती तजिन्दर कौर ने कहा कि ‘संविधान या किसी विधान में ‘दलित’ शब्द का जि़क्र नहीं मिलता और इसके अलावा भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा पहले ही राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के सभी मुख्य सचिवों को इस संबंधी निर्देश दिए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के माननीय हाईकोर्ट के ग्वालियर बेंच की तरफ से तारीख़ 15.01.2018 को केस नंबर डब्ल्यू.पी. 20420 ऑफ 2017 (पीआईएल)-डॉ. मोहन लाल माहौर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य के अंतर्गत नीचे लिखे अनुसार निर्देशित किया गया है:….. कि केंद्र सरकार /राज्य सरकार और इसके अधिकारी /कर्मचारी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के लिए ‘दलित’ शब्द का प्रयोग करने से परहेज़ करें क्योंकि यह भारत के संविधान या किसी कानून में मौजूद नहीं है।

उन्होंने आगे कहा कि माननीय हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों /केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि अनुसूचित जातियों से संबंधित व्यक्तियों के लिए दलित’’ की बजाय अनुसूचित जाति शब्द का प्रयोग किया जाए। इस संबंधी विभिन्न मीडिया समूहों द्वारा किए जा रहे उल्लंघनों की रिपोर्टों पर कार्रवाही करते हुए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने प्राईवेट सैटेलाइट टीवी चैनलों को नोटिस जारी करके उनको बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा पहले दिए गए आदेशों का पालन करते हुए रिपोर्टों में ‘दलित’ शब्द का प्रयोग न करने के लिए कहा है। 

विदित हो कि पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आयोग की चेयरपर्सन तेजिन्दर कौर ने 13 सितम्बर, 2021 को मुख्य सचिव विनी महाजन को लिए पत्र में जाति आधारित नामों वाले गाँवों, कस्बों और अन्य स्थानों जिनके नामों में चमार, शिकारी आदि शामिल है, को बदलने और ऐसे शब्दों का प्रयोग करने से परहेज़ करने के लिए कहा। इसके अलावा साल 2017 में राज्य सरकार की तरफ से जारी निर्देशों के सख्ती से पालन को यकीनी बनाकर सरकारी कामकाज में हरिजन और गिरिजन शब्द न बरतने का भी निर्देश दिया था।  

Cafe D, शॉपर्स प्राइड मॉल, बिजनौर

कर्जन वायली का वध करने वाले क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा की जयंती पर विशेष

बलिदान दिवस (17 अगस्त 1909) पर विशेष

कर्जन वायली का वध करने वाले क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा

राजस्थान के अजमेर में रेलवे स्टेशन के बाहर क्रांतिवीर मदन लाल धींगरा का स्मारक

बचपन में कुत्तों की भाषा बता कर अंग्रेजी पर प्रहार, किशोरवय में पिता की अंग्रेज परस्त बनाने की कोशिश को असफल, छात्र जीवन में आजादी के बीज का अंकुरण, युवावस्था में अंग्रेज अफसर कर्जन वायली का वध और हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लेना किसी सामान्य व्यक्ति के लक्षण नहीं थे. ऐसे क्रांतिवीर का नाम था मदन लाल धींगरा. सिर्फ 25 साल की उम्र में धींगरा ने भारत को आजाद कराने के लिए मृत्यु का वरण किया था.
1 जुलाई 1909 की रात लंदन के इंडियन नेशनल एसोसिएशन के जलसे में कंपनी सरकार में भारतीयों पर तरह-तरह के जुल्म ढहाने वाले कर्जन वायली के सीने में अपनी पिस्टल से तड़ातड़ 2 गोलियां भरी सभा में उतार दी. धींगरा यह मौका किसी भी सूरत में हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे. वही हुआ और कर्जन वायली मारा गया. उसे बचाने आया एक फ्रांसीसी नागरिक भी धींगरा की गोलियों का शिकार बना था. कुछ विद्वानों का मत है कि वायली के वध के बाद वीर धींगरा ने खुद को गोली मारने का जतन किया लेकिन पकड़े जाने पर वह इरादा पूरा नहीं हुआ. दूसरी ओर कुछ इतिहासकारों का मत है कि सभा से भागने के बजाय साहसी धींगरा वही खड़े रहे और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. धींगरा के इस साहस भरे कारनामे की अखबारों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा भी हुई. वायली के वध की खबर लंदन और पेरिस समेत कई देशों के समाचार पत्रों की सुर्खियां बना था. अंग्रेजों की मंशा ना होने के बावजूद भारत में भी यह समाचार तेज गति से फैल गया था.

वायली के वध को दुनिया के सामने गलत तरीके से पेश न किए जाने और अपनी अंतिम इच्छा एक पत्र के रूप में लिखकर उन्होंने जेब में रख लिया था लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में कंपनी राज कमजोर न पड़ने देने के लिए उस पत्र को गायब कर दिया. हालांकि ब्रिटिश सरकार को यह नहीं पता था कि धींगरा उस पत्र की एक प्रति पहले ही वीर सावरकर को सौंप चुके थे. वीर सावरकर ने धींगरा का वह पत्र चोरी-छिपे पेरिस पहुंचा कर फ्रांस के एक समाचार पत्र में छपवाने का प्रबंध कर दिया. उसके बाद ब्रिटिश सरकार वायली के वध के कारणों को लेकर को दुनिया को गुमराह नहीं कर सकने में कामयाब हुई. धींगरा से ब्रिटिश हुकूमत इतनी डरी हुई थी कि उसने भारत में राज करने वाली कंपनी सरकार को पत्र लिखकर कहा-” हम यह नहीं चाहते हैं कि इस शहीद के अवशेष पार्सल से भारत भेजे जाएं”

एक दिन जरूर आजाद होगा भारत:
साहस की प्रतिमूर्ति मदन लाल धींगरा भारत के एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने अंग्रेजों की धरती पर भारत विरोधी और अपने पिता भाइयों के करीबी अंग्रेज अफसर का वध करके दुनिया को एक संदेश दिया था कि वह दिन दूर नहीं जब भारत आजाद होगा. भारतीयों को वायली के वध के जुर्म में ब्रिटिश अदालत में दिया गया। धींगरा का वह बयान जरूर पढ़ना चाहिए जिसका एक-एक शब्द साहस को व्यक्त करने वाला है. वह मानते थे कि भारत पर राज करने वाले अंग्रेज अफसर 33 करोड़ भारतीयों के अपराधी हैं. अपने “चुनौती” नामक एक वक्तव्य में उन्होंने साफ-साफ कहा था- “मेरे को विश्वास है कि संगीनों के साए में पनप रहे भारत में एक युद्ध की तैयारी अवश्य चल रही होगी. क्योंकि यह लड़ाई असंभव मालूम पड़ती है और तमाम बंदूकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. ऐसे स्थिति में मैं यही कर सकता था कि अपनी पिस्तौल से गोली मार दूं. मेरे जैसा गरीब और सामाजिक रुप से अप्रतिष्ठित व्यक्ति यही कर सकता था कि अपनी मातृभूमि के लिए अपना रक्त बहाऊं और मैंने यही किया. आज की स्थिति में हर भारतीय के लिए एक ही सबक है कि वह यह सीखे कि मृत्यु का वरण कैसे किया जाए? यह शिक्षा तभी फलीभूत होगी जब हम अपने प्राणों को मातृभूमि पर बलि चढ़ा दें. इसलिए मैं मर रहा हूं और मेरे शहीद होने से मातृभूमि का मस्तक ऊंचा ही होगा”

38 साल बाद अस्थियों को नसीब हुई देश की माटी:
17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटोनविले जेल में उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया. अपनी अंतिम इच्छा में मदनलाल धींगरा ने कहा था कि उनके शव को कोई भी गैर हिंदू हाथ न लगाए और शव वीर सावरकर को सौंप दिया जाए. हिंदू रीति रवाज से ही मेरा अंतिम संस्कार हो लेकिन अंग्रेज हुकूमत ने उनकी आखिरी इच्छा डर के मारे पूरी नहीं की. सनातन हिंदू धर्म की परंपरा के विरुद्ध एक कोड नंबर एलाट कर शव को दफना दिया गया. शहादत के 38 वर्ष बाद भारत के आजाद होने पर भी इस क्रांतिवीर को सरकार की उपेक्षा सहन करनी पड़ी. वर्ष 1976 में मदनलाल धींगरा के अवशेष भारत लाए जा पाए थे. वह भी तब जब शहीद उधम सिंह के अवशेष को खोजते हुए धींगरा के अवशेषों पर खोजकर्ताओ की नजर पड़ी. इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने उनके अवशेष भारत को सौंपा. वीर धगरा के अवशेष पंजाब भेजे गए लेकिन आज तक पंजाब में उनका कोई स्मारक का पता नहीं चलता. राजस्थान के अजमेर में जरूर रेलवे स्टेशन के बाहर एक छोटा सा स्मारक बना हुआ है.

विदेश में भारत की आजादी के लिए बलिदान देने वाले वह पहले क्रांतिवीर माने जाते हैं. उनकी शहादत को दुनियाभर ने सलाम किया था. फांसी दिए जाने के बाद एक आयरिश समाचार पत्र ने धींगरा को बहादुर व्यक्ति की संज्ञा दी थी. काहिरा से प्रकाशित होने वाले मिश्र के समाचार पत्र “लल्ल पेटी इजिप्शियन” ने धीगरा को अमर शहीद की उपाधि देते हुए आगामी 40 वर्षों में ब्रिटिश साम्राज्य के पतन की भविष्यवाणी की थी. यह भविष्यवाणी सच भी साबित हुई. धींगरा की शहादत के 38 साल बाद ही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का पतन हो गया. कांगेस की संस्थापक मानी जाने वाली श्रीमती एनी बेसेंट ने कहा था कि देश को इस समय बहुत से मदनलाल की जरूरत है. वीरेंद्र नाथ चट्टोपाध्याय ने धींगरा की स्मृति में एक मासिक पत्रिका प्रारंभ की थी, जिसका नाम था “मदन तलवार” यानी (मदनलाल की तलवार). कुछ समय बाद ही यह पत्रिका विदेश के भारतीय क्रांतिकारियों के लिए मुखपत्र बन गई थी. यह पत्रिका बर्लिन में मैडम कामा द्वारा प्रिंट कराई जाती थी. शहादत के 10 वर्ष बाद 1919 में डब्लू डब्लू ब्लंट की प्रकाशित पुस्तक में भी धींगरा की बहादुरी की प्रशंसा करते हुए लिखा गया- “धींगरा ने जिस बहादुरी के साथ एक न्यायाधीश के सामने अपना ओजस्वी बयान दिया वैसा किसी भी ईसाई शहीद ने नहीं दिया होगा”
1857 में प्रथम स्वाधीनता संग्राम के असफल होने और भारत पर ब्रिटिश हुकूमत के एकाधिकार के बीच 18 सितंबर 1886 ( अनुमान के आधार पर क्योंकि लंदन में अंग्रेज अफसर कर्जन वायली के वध के बाद संभवत अंग्रेजों के पिट्ठू पिता और भाई में सबूत मिटा दिए) को वीरों की धरती पंजाब के अमृतसर में जन्मे क्रांतिकारी मदन लाल धींगरा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के चमकते सितारे थे. हालांकि अंग्रेज परस उनके पिता और भाइयों ने वायली के वध के बाद उनसे अपने सारे संबंध समाप्त कर लिए थे लेकिन देश के लोगों ने उन्हें शहीद का दर्जा दिया.
देश की आजादी और मातृभूमि के लिए प्राणों का उत्सर्ग करने वाले मदनलाल धींगरा को शहादत दिवस पर हर भारतीय की तरफ से शत-शत नमन..

◇ गौरव अवस्थी, वरिष्ठ पत्रकार
रायबरेली (उप्र)

पंजाब के सबसे सुरक्षित दुर्ग को बनाये रखने में कांग्रेस हाईकमान का छूट रहा पसीना

पंजाब के सबसे सुरक्षित दुर्ग को बनाये रखने में कांग्रेस हाईकमान का छूट रहा पसीना

मोदी के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को अभी तक सबसे मजबूती से पंजाब ने रोका


नरेन्द्र मोदी के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को अभी तक सबसे मजबूती से पंजाब ने रोका है। देश का यह सीमावर्ती राज्य नरेन्द्र मोदी के तूफान के आगे शुरू से कांग्रेस के सबसे सुरक्षित द्वीप के रूप में कायम बना हुआ है। लेकिन क्या यहां कांग्रेस का रूतबा अगले चुनाव के बाद भी बना रहेगा या इस राज्य में पार्टी की अंदरूनी खींचतान उसकी नैया ले डूबेगी यह सवाल इसके बावजूद भी बना हुआ है कि अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद भाजपा यहां मुकाबले से बाहर हो चुकी है और अकाली दल भी अलग होने के बावजूद कृषि कानूनों को पारित कराने में भाजपा की सहयोगी रहने के पाप से जनमानस की निगाह में बरी नहीं हो पा रही है। वजह यह है कि इस घटनाक्रम के कारण राज्य में कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंदी बनकर उभरी आम आदमी पार्टी कांग्रेस के जरा से चूकने पर हाथ मारकर सत्ता हथिया ले जाने में सफल हो सकती है। फिलहाल कांग्रेस हाईकमान ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के लाख सिर पटकने के बावजूद उनके और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच युद्ध विराम का फार्मूला तय करते हुए राज्य में पार्टी की बागडोर सिद्धू को सौंप डाली है। संयोग यह है कि अमरिंदर सिंह और सिद्धू न केवल एक ही जिले पटियाला के निवासी हैं बल्कि दोनों के गोत्र भी समान यानी सिद्धू ही हैं। सिद्धुओं की यह लड़ाई शेरों की लड़ाई में तब्दील हो चुकी थी। लेकिन नवजोत मनमाफिक हैसियत मिल जाने के बावजूद कैप्टन को उखाड़ने से बाज नहीं आ रहे और उन्हें आशीर्वाद दे देने के बावजूद कैप्टन भी हार मानने को तैयार नहीं है। अब देखना है कि दोनों के बीच शह और मात के इस खेल की नाव किस ठोर लगेगी।

नया विकल्प तलाशना कांग्रेस के लिए लाजिमी-
वैसे पंजाब में कांग्रेस को पुर्नस्थापित करने का श्रेय तो कैप्टन अमरिंदर सिंह को ही है लेकिन पार्टी क्या करे। कैप्टन की उम्र 79 वर्ष की हो चुकी है इसलिए स्वाभाविक है कि कांग्रेस आगे के लिए उनके भरोसे नहीं रह सकती। नया विकल्प तलाशना उसके लिए लाजिमी है। कांग्रेस हाईकमान की यह इमेज भी बनती जा रही थी कि पार्टी के लगातार चुनाव हारने से वह पंगु हो चुका है और क्षेत्रीय क्षत्रपों से उलझना उसके बूते की बात नहीं रह गई है। इसलिए पार्टी हाईकमान ने जब कैप्टन की नाराजगी के बावजूद नवजोत को राज्य में पार्टी की बागडोर सौंपने का एलान किया उस समय अपनी हनक क्षत्रपों पर फिर से कायम करने का उसका इरादा भी निश्चित रूप से काम कर रहा होगा।

अति महत्वाकांक्षी होने के कारण छोड़नी पड़ी थी BJP-
नवजोत सिंह सिद्धू को अति महत्वाकांक्षी माना जाता है। 2016 में उनको इसी कारण भाजपा छोड़नी पड़ी। कांग्रेस में आकर शुरू से उनकी निगाह मुख्यमंत्री पद पर थी लेकिन जब इसका फैसला अमरिंदर सिंह के हक में चला गया तो उन्होंने उनके मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री पद पाने की लाबिंग की। कैप्टन ने इसे मंजूर नहीं किया हालांकि अपने मंत्रिमंडल में स्थान दे दिया। लेकिन नवजोत सिंह अपनी ब्राडिंग मजबूत करने के लिए कुछ न कुछ ऐसा करते रहे जो अमरिंदर सिंह के लिए नागवार था। करतारपुर साहब गलियारे के उदघाटन में उनके पाकिस्तान जाने पर जब कैप्टन ने एतराज जताया तो उन्होंने कह दिया कि मेरे कैप्टन तो राहुल गांधी हैं। कैप्टन इससे बुरी तरह चिढ़ गये। बाद में मामला यहां तक पहुंच गया कि कैप्टन ने उनको मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के लिए बाध्य कर दिया। कांग्रेस हाईकमान ने कई बार चाहा कि कैप्टन नवजोत को कहीं न कहीं एडजस्ट कर लें लेकिन कैप्टन को यह बिल्कुल भी मंजूर नहीं था। हाईकमान भी अपनी देश भर में कमजोर स्थिति के कारण बेचारगी का शिकार था। इसलिए कैप्टन पर ज्यादा दबाव बनाना उसके बस में नहीं था।

कैप्टन का बौखला जाना लाजिमी-
इस जद्दोजहद के बीच अब जब विधानसभा के चुनाव के लिए कुछ महीने का समय रह गया है तो नवजोत अधीर हो उठे और उन्होंने सोशल मीडिया पर कैप्टन की सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने ऐसे मुद्दे उठाये जो कार्यकर्ताओं और आम जनमानस को छू रहे थे। जैसे उन्होंने 2015 में फिरोजपुर में अकाली सरकार के समय गुरूग्रंथ साहब की बेअदबी के मामले में कार्यवाही में सरकार की ढ़ील पोल को आड़े हाथों लिया। वायदे के मुताबिक बादल परिवार के खिलाफ कार्रवाई न कर नरम रवैये बरतने का आरोप लगाया। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने सरकार को भ्रष्ट साबित करने में यह कहकर कसर नहीं छोड़ी कि कैप्टन की सरकार प्रापर्टी माफिया, खनन माफिया और ड्रग माफिया को संरक्षण दे रही है। इस पर कैप्टन का बौखला जाना लाजिमी था।
इस बीच कांग्रेस हाईकमान सक्रिय हुआ कि राज्य में पार्टी की इस अंदरूनी लड़ाई को चुनाव के समय कैसे रोका जाये। खुद राहुल और प्रियंका ने नवजोत सिंह सिद्धू से बात की तो सोनिया गांधी ने कैप्टन का पक्ष सुना। विवाद सुलझाने के लिए राज्य सभा में पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गई जिसमें राज्य के प्रभारी हरीश रावत और जेपी अग्रवाल शामिल थे। इस कमेटी ने मंथन के बाद पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को रिपोर्ट सौंपकर चुनाव तक कैप्टन को ही मुख्यमंत्री बनाये रखने की सिफारिश तो की लेकिन उनके समानान्तर सिद्धू को पार्टी का अध्यक्ष बनाने का सुझाव भी दे दिया। लाजिमी है कि कैप्टन को यह हजम नहीं हुआ। इस कारण एक बार फिर सिद्धू को अध्यक्ष बनाने की घोषणा टल गई तो सिद्धू ने आम आदमी पार्टी की तारीफ करने का पैंतरा खेल दिया जिसे लेकर कांग्रेस हाईकमान को चेताया गया कि अगर सिद्धू का चेहरा आम आदमी पार्टी को मिल गया तो विधानसभा चुनाव में उसके मुकाबले कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ सकती है।
अंततोगत्वा 18 जुलाई को कांग्रेस हाईकमान ने सुनील जाखड़ की जगह नवजोत सिंह सिद्धू को राज्य में पार्टी का अध्यक्ष बनाने की घोषणा कर दी लेकिन इसमें फिर पेंच फंस गया। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कह दिया कि वे तब तक सिद्धू को स्वीकार नहीं करेंगे जब तक कि उनकी सरकार के खिलाफ अपमानजनक ट्वीट करने के लिए सिद्धू माफी नहीं मांगते। उन्होंने और सांसद मनीष तिवारी ने यह मुद्दा भी उठाया कि पंजाब के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों ही सिख नहीं होने चाहिए। इससे गलत संदेश जायेगा। कैप्टन ने अपने मंत्रियों और समर्थक सांसदों से अनुशासनहीनता के कारण सिद्धू को पार्टी से निकालने की मांग भी उठवा दी। अब बाजी पलटने की जिम्मेदारी सिद्धू की थी। अध्यक्ष के रूप में अपनी नियुक्ति पर मोहर लगते ही सिद्धू ने इस दिशा में जोरदार कोशिशें करके रूख बदल दिया। कैप्टन के पक्ष के तमाम विधायक उनकी आलोचना छोड़कर सिद्धू में ही अपना भविष्य देखने की वजह से पलट गये। सिद्धू ने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के अवसर पर शक्ति प्रदर्शन किया जिसमें पार्टी के 80 में से 62 विधायक उनके पक्ष में खड़े दिखाई दिये। इससे कैप्टन के हौसले पस्त हो गये। 23 जुलाई को जब सिद्धू का पदभार ग्रहण कार्यक्रम था प्रियंका का भी फोन कैप्टन के पास आ गया जिसमें उनसे इस कार्यक्रम में उपस्थित होकर सिद्धू को आशीर्वाद देने की गुजारिश की गई। अब कैप्टन के लिए मान जाने में ही गनीमत थी उन्होंने सिद्धू के पदभार ग्रहण के कार्यक्रम में उन्हें आशीर्वाद भी दिया और उनके साथ अपने पुराने संबंधों की चर्चा भी की। दूसरी ओर सिद्धू ने अपने भाषण में उनका नाम भी नहीं लिया और इस तरह भाषण किया जैसे पंजाब में अभी कांग्रेस की सरकार न हो और चुनाव बाद उनके द्वारा सरकार संभाले जाने की संभावना हो जिसके लिए उनके संकल्प क्या-क्या हैं यह गिनाये।
फिलहाल तो समाधान के फार्मूले में पार्टी के लिए जितनी भी आशंकायें थी सभी के निराकरण का प्रयास कांग्रेस हाईकमान ने किया है जिसमें बड़ी भूमिका प्रशांत किशोर की रही है। नवजोत सिंह सिद्धू के साथ चार कार्यवाहक प्रमुख बनाये गये हैं ताकि अनुसूचित जातियों और गैर सिखों को संतुष्ट किया जा सके। कैप्टन को मंत्रिमंडल में फ्री हैंड होकर विस्तार करने की हरी झंडी दे दी गई है जिसे लेकर उनको आश्वस्त किया गया है कि सिद्धू इसमें कोई दखल नहीं करेंगे। निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ को राष्ट्रीय जिम्मेदारी देने का संकेत दिया गया है लेकिन अभी भी कुछ मसले अनसुलझे हैं। अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद समितियों का गठन होना है जिसमें घोषणा पत्र समिति मुख्य है। सिद्धू आरोप लगाते रहे हैं कि कैप्टन सरकार ने चुनावी घोषणाओं को पूरा नहीं किया है इसलिए अगर उनके आदमी को इस समिति की बागडोर मिलती है तो वह कैप्टन के लिए मुश्किल पैदा करेगा। नतीजतन कैप्टन चाहेंगे कि घोषणा पत्र समिति का अध्यक्ष उनकी पसंद का हो। राज्य के प्रभारी हरीश रावत को उत्तराखंड के लिए चेहरा घोषित कर दिया गया है इसलिए उन्हें उत्तराखंड में पूरा समय देने को राष्ट्रीय जिम्मेदारी से मुक्त किया जाना अनिवार्य है। ऐसे में प्रदेश का प्रभारी अपनी-अपनी सुविधा के अनुकूल नेता को बनवाने के लिए भी दोनों में खींचतान होगी। नवजोत सिंह सिद्धू अगले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए अपने को चेहरा मान रहे हैं इसलिए वे यह भी चाहेंगे कि ज्यादा से ज्यादा टिकट उनके लोगों के हों जबकि कैप्टन को यह भी स्वीकार नहीं होगा। इसलिए टकराव बरकरार रहने का एक मोर्चा यह भी है।

कहीं हिल न जाए कांग्रेस का अजेय दुर्ग!
राज्य के अगले चेहरे को लेकर कैप्टन के मन में क्या है यह तो स्पष्ट नहीं है लेकिन अभी वे अपने ऊपर सिद्धू को कतई हावी नहीं होने देना चाहते। राज्य में बिजली महंगी होने को लेकर सिद्धू ने उनके सामने आने का उपक्रम किया तो कैप्टन ने इसकी हवा निकालने के लिए निजी थर्मल और सोलर प्लांट कंपनियों के साथ बिजली खरीद का प्रस्ताव रद्द कर दिया। इसी तरह सिद्धू ने अनुसूचित जाति के विधायकों की बैठक बुलाई लेकिन उसके शुरू होने के पहले ही कैप्टन ने एससी वेलफेयर बिल को मंजूरी दे डाली। जाहिर है कि समाधान फार्मूले के बाद भी दोनों में निभने वाली नहीं है ऐसे में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का यह अजेय दुर्ग कहीं हिलने पर न पहुंच जाये।

केपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार