26 नवम्बर 1949 को बनकर पूर्ण हुआ था संविधान

संविधान सभा द्वारा देश के संविधान को 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में पूर्ण किया गया था। इस पर 114 दिन तक चर्चा हुई तथा 12 अधिवेशन आयोजित किए गए। भारतीय संविधान को बनाने में लगभग एक करोड़ की लागत आई थी।

किसी भी देश के लिए एक विधान की आवश्यकता होती है। देश के विधान को संविधान कहा जाता है। यह अधिनियमों का संग्रह है। भारत के संविधान को विश्व का सबसे लम्बा लिखित विधान होने का गौरव प्राप्त है। भारतीय संविधान हमारे देश की आत्मा है। इसका देश से वही संबंध है, जो आत्मा का शरीर से होता है।

संविधान दिवस का इतिहास

भारत का संविधान 26 नवम्बर 1949 को बनकर पूर्ण हुआ था। चूंकि डॉ. भीमराव आम्बेडकर संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, इसलिए भारत सरकार द्वारा उनकी 125वीं जयंती वर्ष के रूप में 26 नवम्बर 2015 को प्रथम बार संविधान दिवस संपूर्ण देश में मनाया गया। उसके पश्चात 26 नवम्बर को प्रत्येक वर्ष संविधान दिवस मनाया जाने लगा। इससे पूर्व इसे राष्ट्रीय विधि दिवस के रूप में मनाया जाता था। संविधान सभा द्वारा देश के संविधान को 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में पूर्ण किया गया था। इस पर 114 दिन तक चर्चा हुई तथा 12 अधिवेशन आयोजित किए गए। भारतीय संविधान को बनाने में लगभग एक करोड़ की लागत आई थी। भारतीय संविधान में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 11 दिसंबर 1946 में स्थाई अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। भारतीय संविधान पर 284 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे। यह 26 नवम्बर 1949 को पूर्ण कर राष्ट्र को समर्पित किया गया। इसके पश्चात 26 जनवरी 1950 से देश में संविधान लागू किया गया। इससे पूर्व देश में भारत सरकार अधिनियम-1935 का कानून लागू था। कोई भी वस्तु पूर्ण नहीं होती है। समय के अनुसार उसमें परिवर्तन होते रहते हैं। भारतीय संविधान लागू होने के पश्चात इसमें 100 से अधिक संशोधन किए जा चुके हैं। ऐसा भविष्य में भी होने की पूर्ण संभावना है।

भारतीय संविधान में सरकार के अधिकारियों के कर्तव्य एवं नागरिकों के अधिकारों के बारे में विस्तार से बताया गया है। संविधान सभा के कुल सदस्यों की संख्या 389 थी। इनमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के 4 चीफ कमिश्नर थे, जबकि 93 सदस्य देशी रियासतों के थे। विशेष बात यह है कि देश की स्वतंत्रता के पश्चात संविधान सभा के सदस्य ही देश की संसद के प्रथम सदस्य बने थे। देश की संविधान सभा का चुनाव भारतीय संविधान के निर्माण के लिए ही किया गया था। भारतीय संविधान के अनुसार केंद्रीय कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति होता है। भारतीय संविधान का निर्माण करने वाली संविधान सभा का गठन 19 जुलाई 1946 को किया गया था। संविधान के कुछ अनुच्छेदों को 26 नवंबर 1949 को पारित किया गया, जबकि शेष अनुच्छेदों को 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया।

भारत एक विशाल देश है। इसमें विभिन्न संस्कृतियों के लोग निवास करते हैं। यहां विभिन्न संप्रदायों, पंथों, जातियों आदि के लोग हैं। उनकी, रीति-रिवाज, भाषाएं, रहन-सहन एवं खान-पान भी भिन्न-भिन्न हैं। इस सबके मध्य वे आपस में मिलजुल कर रहते हैं। वास्तव में यही भारत का स्वभाव है। भारतीय संविधान में भारत के नागरिकों को छह मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिनका वर्णन अनुच्छेद 12 से 35 को मध्य किया गया है। इनमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, संस्कृति और शिक्षा से संबंधित अधिकार एवं संवैधानिक उपचारों का अधिकार सम्मिलित है। उल्लेखनीय है कि पहले संविधान में सात मौलिक अधिकार थे, जिसे 44वें संविधान संशोधन- 1978 के अंतर्गत हटा दिया गया। सातवां मौलिक अधिकार संपति का अधिकार था। मूल अधिकार का एक दृष्टांत है- “राज्य नागरिकों के बीच परस्पर विभेद नहीं करेगा। भारतीय संविधान में भी किसी के साथ किसी भी प्रकार का भेद नहीं किया जाता। यही इसकी विशेषता है।”

ऋषि परम्परा का धर्मशास्त्र

भारतीय संविधान “हम भारत के लोगों” के लिए हमारी अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत जनित स्वतंत्रता एवं समानता के आदर्श मूल्यों के प्रति एक राष्ट्र के रूप में हमारी प्रतिबद्धता का परिचायक है। वर्तमान के आधुनिक भारत की संकल्पना के समय संविधान निर्माताओं ने इसी सांस्कृतिक विरासत को उसके मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने के ध्येय से भारतीय संविधान की मूल प्रतिलिपि में सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व के रुचिकर चित्रों को स्थान दिया, जो मूलतः भारतीय संविधान के भारतीय चैतन्य को ही परिभाषित करते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा के अलोक में निर्मित भारतीय संविधान भारत की ऋषि परम्परा का धर्मशास्त्र है। भारतीय जीवन दर्शन का ग्रंथ है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां सबका सम्मान किया जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। यह सनातन धर्म का मूल संस्कार है। यह एक विचारधारा है। महा उपनिषद सहित कई ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् ।

उदारचरितानां वसुधैव कुटुम्बकम् ।।

अर्थात यह मेरा अपना है और यह नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों की तो संपूर्ण धरती ही परिवार है। कहने का अभिप्राय है कि धरती ही परिवार है। यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है।

निसंदेह भारत के लोग विराट हृदय वाले हैं। वे सबको अपना लेते हैं। विभिन्न संस्कृतियों के पश्चात भी सब आपस में परस्पर सहयोग भाव बनाए रखते हैं। एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहते हैं। यही हमारी भारतीय संस्कृति की महानता है।

उल्लेखनीय है कि भारत का संविधान बहुत ही परिश्रम से तैयार किया गया है। इसके निर्माण से पूर्व विश्व के अनेक देशों के संविधानों का अध्ययन किया गया। तत्पश्चात उन पर गंभीर चिंतन किया गया। इन संविधानों में से उपयोगी संविधानों के शब्दों को भारतीय संविधान में सम्मिलित किया गया। आजादी के बाद भारत का वैचारिक दृष्टिकोण भारतीय ज्ञान परम्परा के आलोक में विकास के पाठ पर खड़ा करने का प्रयास होना चाहिए था।

भारतीय संविधान की उद्देशिका

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बंधुता बढ़ाने के लिए, दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई॰ (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

भारतीय संविधान की इस उद्देशिका में भारत की आत्मा निवास करती है। इसका प्रत्येक शब्द एक मंत्र के समान है। हम भारत के लोग- से अभिप्राय है कि भारत एक प्रजातांत्रिक देश है तथा भारत के लोग ही सर्वोच्च संप्रभु है। इसी प्रकार संप्रभुता- से अभिप्राय है कि भारत किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं है। समाजवादी- से अभिप्राय है कि संपूर्ण साधनों आदि पर सार्वजनिक स्वामित्व या नियंत्रण के साथ वितरण में समतुल्य सामंजस्य। ‘पंथनिरपेक्ष राज्य’ शब्द का स्पष्ट रूप से संविधान में कोई उल्लेख नहीं है। लोकतांत्रिक- से अभिप्राय है कि लोक का तंत्र अर्थात जनता का शासन। गणतंत्र- से अभिप्राय है कि एक ऐसा शासन जिसमें राज्य का मुखिया एक निर्वाचित प्रतिनिधि होता है। न्याय- से आशय है कि सबको न्याय प्राप्त हो। स्वतंत्रता- से अभिप्राय है कि सभी नागरिकों को स्वतंत्रता से जीवन यापन करने का अधिकार है। समता- से अभिप्राय है कि देश के सभी नागिरकों को समान अधिकार प्राप्त हैं। इसी प्रकार बंधुत्व- से अभिप्राय है कि देशवासियों के मध्य भाईचारे की भावना।

विचारणीय विषय यह है कि भारतीय संविधान ने देश के सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान किए हैं तथा उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया। इसके बावजूद देश में आज भी ऊंच-नीच, अस्पृश्यता आदि जैसे बुराइयां व्याप्त हैं। इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए कानून भी बनाए गए, परन्तु इनका विशेष लाभ देखने को नहीं मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है। सामाजिक समरसता भारतीय समाज की खूबसूरती है, अस्पृश्यता से संबंधित अप्रिय घटनाएं भी चर्चा में रहती हैं। इन बुराइयों को समाप्त करने के लिए जागरूक लोगों को ही आगे आना चाहिए तथा सभी लोगों को अपने देश के संविधान का पालन करना चाहिए।

-डॉ. सौरभ मालवीय

(लेखक-मीडिया शिक्षक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

छह दशक बाद दौलतपुर और रायबरेली में द्विवेदी मेला

द्विवेदी मेला
(11-12 नवंबर 2022)

~गौरव अवस्थी रायबरेली, उन्नाव।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान के रजत जयंती वर्ष पर छह दशक बाद दौलतपुर और रायबरेली में द्विवेदी मेला आयोजित होने जा रहा है।

इसके पहले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की जन्म शताब्दी पर 1964 में दौलतपुर में द्विवेदी मेला आयोजित किया गया था। इसमें देश भर के तमाम साहित्यकार पहुंचे थे।

1964 के द्विवेदी मेला के तर्ज पर ही आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति द्वारा स्मृति संरक्षण अभियान के रजत जयंती वर्ष पर द्विवेदी मेला लगाया जा रहा है।
पहले दिन दौलतपुर में देशभर के साहित्यकारों का जमावड़ा होगा। दूसरे दिन रायबरेली में।
दौलतपुर आचार्य द्विवेदी की जन्म स्थली है और रायबरेली निर्वाण स्थली है।
इसीलिए समिति ने दोनों स्थानों पर कार्यक्रम आयोजित करने का संकल्प लिया है।

मेले के मुख्य आकर्षण

सम्मान समारोह
-कवि सम्मेलन
-साहित्य की यात्रा
-आचार्य पथ स्मारिका
-प्रदर्शनी
-पुस्तक मेला
-नाटक
-गीत और नृत्य
-संगोष्ठियां 

जयंती विशेष (24 सितंबर): जपो निरन्तर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान…

जयंती विशेष (24 सितंबर)

जपो निरन्तर एक ज़बान, हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान..

भारतेंदु युग के प्रमुख स्तंभ पंडित प्रताप नारायण मिश्र की अल्प आयु में पिता की मृत्यु के चलते औपचारिक पढ़ाई तो बहुत नहीं हो पाई लेकिन स्वाध्याय के बल पर वह पत्रकारिता और साहित्य के प्रकांड पंडित बने। परवर्ती साहित्यकारों और संपादकों में तो उनके प्रति सम्मान का भाव था ही पूर्ववर्ती साहित्यकार भी उनके पांडित्य से प्रभावित रहा करते थे।
24 सितंबर 1856 को जन्मे पंडित प्रताप नारायण मिश्र के जन्म स्थान को लेकर साहित्यकारों में कुछ मतभेद हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल और डॉ सुरेश चंद्र शुक्ल ने उनके जन्म स्थान के रूप में कानपुर को मान्यता दी है। इनका मत है कि पंडित प्रताप नारायण के पिता पंडित संकटा प्रसाद मिश्र को परिवार पालन के लिए 14 वर्ष की अल्पायु में कानपुर आना पड़ा। इसलिए उनका (प्रताप नारायण) जन्म कानपुर में ही हुआ होगा लेकिन अपने संपादन में ‘प्रताप नारायण मिश्र कवितावली’ प्रकाशित करने वाले नरेश चंद्र चतुर्वेदी और डॉ शांति प्रकाश वर्मा उनका जन्म उन्नाव जनपद के बैजेगांव (अब बेथर) ही मानते हैं। ‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ पुस्तक में रामचंद्र तिवारी लिखते हैं-‘मिश्रा जी का जन्म बैजेगांव में हुआ हो या ना हुआ हो उनकी रचनाओं में गांव का अंश कुछ अधिक ही है।’

मासिक पत्र ब्राह्मण का प्रकाशन :
भारतेंदु हरिश्चंद्र की परंपरा जारी रखने के लिए आर्थिक कठिनाइयों के बाद भी पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने मार्च 1883 में ब्राह्मण नाम से मासिक पत्र प्रकाशित करना शुरू किया। ब्राह्मण के प्रथम अंक में अपना उद्देश्य स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा था-‘अंतः करण से वास्तविक भलाई चाहते हुए सदा अपने यजमानों (ग्राहकों) का कल्याण करना ही हमारा मुख्य कर्म होगा’। 550 रुपए का घाटा सहकर वह 7 वर्षों तक ब्राम्हण का निरंतर प्रकाशन करते रहे। इसके बाद प्रकाशन का दायित्व खड्गविलास प्रेस बांकीपुर के मालिक बाबू रामदीन सिंह को सौंप दिया।

हिंदी के लिए पूर्णत: समर्पित:
पंडित प्रताप नारायण मिश्र हिंदी के बहुत बड़े हिमायती थे। अपने मासिक पत्र ब्राह्मण में हिंदी को लेकर वह जब का लेख लिखते रहते थे। एक बार समकालीन प्रकाशन ‘फतेहगढ़ पंच’ ने उनकी हिंदी पक्षधरता के खिलाफ लेख प्रकाशित किया। इस पर उनका गुस्सा बढ़ गया। उन्होंने फतेहगढ़ पंच के लेख के जवाब में ब्राह्मण में कई महीने तक लिखा। दोनों के बीच कई महीने विवाद चलता रहा। उसी बीच उन्होंने हिंदी पर एक कविता लिखी, जो काफी चर्चित हुई-

चहहु जो सांचे निज कल्यान, तो सब मिलि भारत संतान
जपो निरंतर एक ज़बान -हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान
तबहि सुधरिहे जन्म-निदान; तबहिं भलो करिहे भगवान

मसखरी की मिसालें :
प्रताप नारायण मिश्र स्वभाव से मस्त मौला थे। मसखरे थे। नाटकों में अभिनय भी करते थे। कानपुर की सड़कों पर वह लावनी गाते हुए कभी रिक्शे पर कभी पैदल निकलते थे। फागुन में इकतारा लेकर वह उपदेशपूर्ण, हास्य, होली, कबीर और पद आदि भी गाते थे। वह सांस बंद कर के घंटों तक मुर्दा से पड़े रहते थे। अपने कान एक या दोनों उन्हें हिलाते या फड़काते थे। तब उनके दूसरे अंग स्थिर रहते थे। उनकी मसखरी की मिसालें भी खूब चर्चित हैं।
एक बार नाटक में उनको स्त्री का रूप लेना था। मूछों का मुंड़ाना जरूरी था। भक्ति भाव से अपने पिता के सामने हाजिर हुए और बोले यदि आप आज्ञा दीजिए तो इनको (मूंछों) मुड़वा डालूं। मैं अनाज्ञाकारी नहीं बनना चाहता।’ पिता ने हंसकर आज्ञा दे दी। इसी तरह एक बार कानपुर म्युनिसिपिलटी में इस बात पर विचार हो रहा था कि भैरव घाट में मुर्दे बहाए जाएं या नहीं। चर्चा के बीच किसी ने कहा कि जले हुए मुर्दे की पिंडी यदि इतने इंच से अधिक न हो तो बहाई जाए। दर्शकों में प्रताप नारायण भी मौजूद थे। वह तत्क्षण खड़े होकर बोले- ‘अरे दैया रे दैया! मरेउ पर छाती नापी जाई!’ इस पर खूब जोर के ठहाके लगे।
ऐसा ही एक किस्सा पादरी से बातचीत का है। पादरी ने व्यंग्य पूर्ण लहजे में कहा-आप गाय को माता कहते हैं। उन्होंने कहा- हां। पादरी बोला तो बैल को आप चाचा कहेंगे। इस पर उनका जवाब था- बेशक रिश्ते से क्या इंकार है? पादरी ने तंज कसते हुए कहा-हमने तो 1 दिन अपनी आंखों से एक बार को महिला खाते देखा था। मिश्र जी ने कहा- अजी साहब, वह इसाई हो गया होगा! हिंदू समाज में ऐसे भी बैल होते हैं।’ पादरी मुंह लटका कर चला गया।

लावनी सुनकर कन्नौज के कसाइयों ने छोड़ दी थी गोहत्या:

पंडित प्रताप नारायण मिश्र गोरक्षा के बहुत बड़े हिमायती थे। कई कविताओं में उन्होंने गोरक्षा पर जोर दिया। अपने निबंध में महावीर प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं-‘सुनते हैं कानपुर में जो इस समय गौशाला है उसकी स्थापना के लिए प्रयत्न करने वालों में प्रताप नारायण भी थे। एक बार स्वामी भास्कर आनंद के साथ वह कन्नौज गए और गौ रक्षा पर व्याख्यान दिया। व्याख्यान में एक लावनी कही-

बां-बां करि तृण दाबि दांत सों, दुखित पुकारत गाई है

आचार्य द्विवेदी अपने निबंध में लिखते हैं- मिश्र जी की इस लावनी में करुण रस का इतना अतिरेक था कि मुसलमानों तक पर इसका असर हुआ और एक आध कसाइयों ने गौ हत्या से तौबा कर ली थी।

38 बरस में पूरी हो गई जीवन यात्रा:
अपने दैनंदिन जीवन में सदैव अस्त व्यस्त रहने वाले पंडित प्रताप नारायण मिश्र अक्सर बीमार रहा करते थे। इसी के चलते 38 वर्ष की कम उम्र में 1894 में उन्होंने अपनी जीवन यात्रा पूरी की। अपने इस छोटे से जीवन में उन्होंने साहित्य की हर विधा में लिखा। रामचंद्र तिवारी के अनुसार, प्रताप नारायण ग्रंथावली में उनके 190 निबंध और प्रताप नारायण मिश्र कवितावली में छोटी बड़ी 197 कविताएं संग्रहीत हैं। उन्होंने हिंदी गद्य को समृद्ध किया। उनके गद्य में लोक प्रचलित मुहावरे और कहावतें की भरमार है। डॉ शांति प्रकाश वर्मा ने उनके गद्य से छांटकर मुहावरे और कहावतों का पूरा कोष ही तैयार कर दिया। मुहावरा कोष लगभग 110 प्रश्न का है और कहावतें कुल 16 पृष्ठों में। मिश्रा जी ने अपने लेखों में संस्कृत की जिन सूक्तियों और श्लोकों का उदाहरण दिया है, उनकी संख्या 220 है। उर्दू और फारसी की सूक्तियां कुल 66 हैं। (‘भारतीय साहित्य के निर्माता प्रताप नारायण मिश्र’ लेखक-रामचंद्र तिवारी, पृष्ठ-68)
उनके निधन पर पूर्ववर्ती साहित्यकार बालकृष्ण भट्ट ने असमय निधन पर प्रताप नारायण मिश्र के प्रताप का उल्लेख कुछ यूं किया था-‘प्रातः स्मरणीय बाबू हरिश्चंद्र को जो हिंदी का जन्मदाता कहे तो प्रताप मिश्र को नि:संदेह उस स्तन अधन्या दूध मोहि बालिका का पालन पोषण करता कहना पड़ेगा क्योंकि हरिश्चंद्र के उपरांत उसे अनेक रोग दोष से सर्वथा नष्ट न हो जाने से बचा रखने वाले यही देख पड़े’।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 1906 की सरस्वती में एक निबंध ‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र’ लिखा था। वह लिखते हैं-‘मैं कोई संदेह नहीं कि प्रताप नारायण में प्रतिभा थी और थोड़ी नहीं बहुत थी। विधता होने से कविता शक्ति में कोई विशेषता नहीं आ सकती उल्टे हानि चाहे उससे कुछ हो जाए। प्रताप नारायण की कविता में प्रतिभा का प्रमाण अनेक जगह मिलता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भारतेंदु युग के प्रमुख निबंधकार प्रताप नारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट जी की एक साथ चर्चा करते हुए लिखा है-‘पंडित प्रताप नारायण मिश्र और पंडित बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी गद्य साहित्य में वही काम किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडिसन और स्टील ने किया था’। (हिंदी साहित्य का इतिहास- पृष्ठ 467)

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/ उन्नाव

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के पैरोकार एकमात्र अहिंदी भाषी लक्ष्मी नारायण साहू

संदर्भ हिंदी दिवस-13 सितंबर

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के पैरोकार एकमात्र अहिंदी भाषी लक्ष्मी नारायण साहू

हिंदी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा बनाए जाने के प्रश्न पर संविधान सभा की तीन दिन तक चली गर्मागर्म बहस में 13 सितंबर की तारीख भी अहम थी। इस प्रश्न पर बहस दो धुरियों पर ही टिकी रही। हिंदी या रोमन अंकों के उपयोग पर पक्ष-विपक्ष में लंबी बहसें हुईं। अलग-अलग प्रांतों के प्रतिनिधियों ने उम्मीद के मुताबिक ही अपने-अपने तर्क और विचार प्रस्तुत किए। पंडित जवाहरलाल नेहरू, सभापति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित रविशंकर शुक्ल सरीखे सदस्यों ने जरूर बीच का रास्ता अपनाया। अधिकतर अहिंदी भाषी प्रतिनिधियों ने भारी मन से हिंदी को राजभाषा स्वीकार करते हुए सभा में आए संशोधन प्रस्तावों पर अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर संदेह प्रकट किए लेकिन संविधान परिषद में उड़ीसा प्रांत के प्रतिनिधि लक्ष्मी नारायण साहू एकमात्र अहिंदी भाषी थे जिन्होंने बहुत किंतु-परंतु लगाए बिना हिंदी को राजभाषा के बजाय राष्ट्रभाषा माने जाने की वकालत की। संविधान सभा के वाद-विवाद की सरकारी रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 2144-46 में बहस में भाग लेते हुए लक्ष्मी नारायण साहू के संशोधन और वक्तव्य दर्ज हैं।

उड़ीसा प्रांत के बालासोर में 3 अक्टूबर 1890 को जन्मे लक्ष्मी नारायण साहू ने पांच-पांच विषयों में परास्नातक की परीक्षा पास की। उन्होंने उड़ीसा राज्य के गठन के पहले 1936 में ‘उत्कल यूनियन कॉन्फ्रेंस’ की स्थापना के साथ सहकार, वैतरणी और स्टार आफ उत्कल पत्रों का संपादन भी किया। 1947 में उड़ीसा विधानसभा और संविधान परिषद के सदस्य चुने गए। छुआछूत और महिलाओं की स्थिति में सुधार आंदोलन में भी अपनी अहम भूमिका निभाई। आजादी के बाद उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। 18 जनवरी 1963 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

संशोधन प्रस्तावों पर चर्चा के दौरान लक्ष्मी नारायण साहू ने कहा- ‘ कोई सज्जन संशोधन लाए हैं कि बांग्ला भाषा राष्ट्रीय भाषा हो सकती है। तब मैं कहता हूं कि मेरी उड़िया भाषा बंगाली के मुकाबले प्राचीन है। जब उड़िया भाषा, भाषा के रूप में दिखाई दे चुकी थी तब बांग्ला भाषा का जन्म भी नहीं हुआ था। इस तरह दक्षिण के भाई कहेंगे कि उनकी भाषा बहुत प्राचीन है। यह सब ठीक नहीं है। जब भारत को एक राष्ट्र समझते हैं या बनाने की कोशिश करते हैं तो ऑफिशियल लैंग्वेज क्यों? इस (हिंदी) को नेशनल लैंग्वेज भी बना लेना चाहिए। हिंदी भाषा-भाषी देश में ज्यादा तादाद में हैं। इसलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा होना ही चाहिए। कुछ लोग कहते हैं कि हिंदी में शब्द भंडार पूर्ण नहीं है तो दूसरी भाषाओं के शब्दों को लेकर हिंदी भाषा की समृद्धि की जानी चाहिए। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने पर दूसरी प्रांतीय भाषाओं के रास्ते में रुकावट पैदा न हो। सब प्रांतीय भाषाएं अपनी-अपनी जगह उन्नति कर सकें, उनकी प्रगति रुके नहीं इसका भी ख्याल करना चाहिए। जब एक प्रांत और प्रांतीय भाषा दृढ़ हो जाएगी तो राष्ट्रभाषा भी दृढ़ होगी ही।’

राजभाषा के प्रश्न पर संविधान सभा में हुई बहस में कुछ प्रतिनिधियों ने अपना अंग्रेजी का मोह भी प्रकट किया था। ऐसे लोगों को भी आईना दिखाते हुए हिंदी भाषी लक्ष्मी नारायण साहू ने कहा था कि कुछ लोग समझते हैं कि अंग्रेजी नहीं होगी तो हम मर जाएंगे। यह तो ऐसा ही हुआ कि शराब पीना बंद हो जाए तो कुछ लोग मर जाएंगे अगर अंग्रेजी जाने से कुछ थोड़े आदमी मर जाते हैं तो क्या हुआ? हमें तो सारे राष्ट्र और देश हित को ध्यान में रखकर कदम उठाना चाहिए। रोमन में हिंदी लिखे जाने की वकालत करने वाले लोगों को जवाब देते हुए लक्ष्मी नारायण साहू ने कहा था कि ऐसे लोग यह नहीं समझते हैं कि स्क्रिप्ट कैसे बनती है। स्क्रिप्ट तो बनती है भाषा के स्वर से। रोमन कैरेक्टर में हिंदी भाषा को लिखने से वह समझ में नहीं आती और उसमें ठीक-ठीक उच्चारण नहीं कर पाते। इसलिए रोमान स्क्रिप्ट एकदम अग्रहणीय है। वह बहुत भद्दी और उसका साइंटिफिक बेसिस भी नहीं है। देवनागरी से लिखी जाने वाली हिंदी साइंटिफिक है और उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।अहिंदी भाषी लक्ष्मी नारायण साहू की इन बातों पर संविधान परिषद के सदस्यों ने अगर गौर किया होता तो आज देश में ‘अंग्रेजी राज’ के बजाय हिंदी और भारतीय भाषाओं का बोलबाला ही होता।

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली

वर्दी के पीछे धड़कता मासूम सा दिल

मानवता की बेहतरीन मिसाल कायम कर रहे आजमगढ़ के एएसपी सिटी

दीपक कुमार की विशेष रिपोर्ट 

लखनऊ। कहते हैं मानवता की सेवा करने के लिए दिल में  जज्बातों की जरूरत होती है। इसके लिए समय और धन जरूरी तो हैं लेकिन प्राथमिक नहीं माने जा सकते। आज के आपाधापी भरे दौर में जब इंसान अपने सगे संबंधियों तक से दूरी बनाए रहता है, ऐसे में एएसपी सिटी के पद पर आजमगढ़ में तैनात शैलेन्द्र लाल मानवता की बेहतरीन मिसाल कायम कर रहे हैं।


एक विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि उन्हें हमेशा से ही पशु पक्षी और प्रकृति से लगाव रहा है। मेरे यहां बगीचा है, साग सब्जी होती है। बंदर उनका कुछ भी नुकसान नहीं करते। एक फूल भी नहीं तोड़ते। जो साग सब्जी होती है, हम और बंदर के लिए काफी हो जाती है; दोनों खुश…।

जनपद लखीमपुर खीरी में तैनाती के दौरान उनके घर के बाहर कई गाय व कुत्ते आदि आते थे, इसलिए उनके लिए वे घर के बाहर चारा / खाना और पानी रखने लगे। यही नहीं चिड़ियों के लिए भी दाना और पानी की भरपूर व्यवस्था रहती।
उन्हें हमेशा से ही पशु पक्षियों के प्रति बेहद लगाव रहा है।  सहारनपुर में तैनाती के दौरान उन्होंने अलग-अलग किस्म के चार कुत्ते भी पाल रखे थे।


जब पोस्टिंग नोएडा में हुई, तब भी कई जानवर उनके घर आते थे। इस दौरान एक बंदर ने दोस्ती कर ली। वह घर आता था और जब पत्नी सब्जी लेने जाती थी तो कांधे पर आके बैठा जाता था।

यहां यह बताना भी समीचीन होगा कि इनकी गिनती एक तेज तर्रार पुलिस अधिकारी के तौर पर होती है। जनपद मुख्यालय बिजनौर के मोहल्ला जाटान में वर्ष 2014 में हुए बम विस्फोट कांड के दौरान सीओ सिटी रहे शैलेन्द्र लाल को एक तेज तर्रार पुलिस अफसर के तौर पर जाना पहचाना जाता है। सूचना मिलते ही घटनास्थल पर तत्काल वह न केवल खुद पहुंचे, बल्कि घटना के संबंध में पूरी जानकारी भी जुटाई। मामला बेहद ही खूंखार आतंकवादी संगठन सिमी से जुड़ा हुआ था।

अब फोटोज देखकर उनके पशु एवं प्रकृति प्रेम के प्रति कुछ भी कहना, लिखना बेमानी ही होगा। किस कदर अकेले एक बंदर हो या झुंड में परिवार सहित…बड़े प्रेम से खाते पीते हैं और चले जाते हैं। किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं करते।

परिचयमूल रूप से जनपद उरई जालौन निवासी इनके पिता यूपी कैडर 1971 बैच के आईपीएस अफसर थे, लिहाजा इनकी अधिकांश पढ़ाई हॉस्टल में रहकर ही हुई। सेंट जोसेफ कॉलेज नैनीताल से कक्षा 10 तक पढ़ने के बाद उन्होंने डीपीएस आरकेपुरम नई दिल्ली से इंटरमीडिएट किया। दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। बिजनौर में तैनाती के दौरान विवेक कॉलेज में एडमिशन लेकर रुहेलखंड विश्वविद्यालय से एलएलबी कंप्लीट किया। पत्नी दिल्ली हाईकोर्ट में वकालत करती हैं जबकि पुत्री जर्मनी में जॉब कर रही है। इनके बेटे का सेलेक्शन आईबी में असिस्टेंट इंटेलिजेंस ऑफिसर के तौर पर हुआ है। परिवार प्रदेश की राजधानी लखनऊ में रहता है।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय पुरस्कार 9 जुलाई को

लखनऊ। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान के रजत जयंती वर्ष पर समारोह की श्रंखला नई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में 9 जुलाई 2022 दिन शनिवार को प्रारंभ होने जा रही है।
राष्ट्रीय आयोजन समिति के संयोजक वरिष्ठ पत्रकार गौरव अवस्थी ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि समारोह की मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार श्रीमती चित्रा मुद्गल जी हैं।

समारोह में बुजुर्ग पत्रकार आदरणीय श्री त्रिलोकदीप जी को आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया जाएगा। उनके अतिरिक्त अन्य दिग्गज पत्रकार-साहित्यकार विभिन्न पुरस्कारों से पुरस्कृत किए जाएंगे (विस्तार से विवरण आमंत्रण पत्र में उल्लिखित है)। उन्होंने कहा कि अपने पूर्वज की स्मृतियों से जुड़ने का यह सुनहरा मौका हाथ से जाने न दें।

मातृभाषा प्रेमी पंडित माधव राव सप्रे

151वीं जयंती पर विशेष

मातृभाषा प्रेमी पंडित माधव राव सप्रे

हिंदी नवजागरण और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में बढ़चढ़ कर योगदान देने वाले पंडित माधव राव सप्रे का मातृभाषा प्रेम महात्मा गांधी और महावीर प्रसाद द्विवेदी से कतई कमतर नहीं था। गुलाम भारत में प्रभुत्व जमाती अंग्रेजी के खिलाफ मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के प्रश्न पर ‘म’ अक्षर वाले तीनों महारथी- महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे और महावीर प्रसाद द्विवेदी ही मोर्चा संभालने वाले लोगों में अग्रणी थे। यह तीनों ही महानुभाव राष्ट्रभाषा के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के महत्व पर जोर देते हुए हिंदी नवजागरण और भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को अपनी-अपनी तरह से गतिशील बना रहे थे।
1917 की ‘सरस्वती’ में माधव राव सप्रे का एक लेख छपा था-‘राष्ट्रीयता की हानि का कारण’। इस लेख में उन्होंने कहा-‘अंग्रेजी भाषा के अधिक प्रचार और देशी भाषाओं के अनादर से राष्ट्रीयता की जो हानि हो रही है, उसका पूरा पूरा वर्णन करना कठिन है। जब तक अंग्रेजी भाषा का अनावश्यक महत्व न घटाया जाएगा और जब तक शिक्षा का द्वार देशी भाषाओं को बनाकर वर्तमान शिक्षा पद्धति में उचित परिवर्तन न किया जाएगा, तब तक ऊपर लिखी गई बुराइयों से हमारा छुटकारा नहीं हो सकता।’
इसी एक में उनका कथन है-‘किसी समय रूस में उच्च वैज्ञानिक शिक्षा जर्मन और फ्रेंच भाषाओं के द्वारा दी जाती थी परंतु अब वहां यह बात नहीं है। सन् 1880 ईस्वी में एक प्रोफेसर ने रूसी भाषा में वैज्ञानिक शिक्षा देना आरंभ किया। दूसरे प्रोफेसरों ने भी उसका अनुकरण किया। फल यह हुआ कि अब रूसी भाषा बोलने वाले रूस के समस्त प्रांतों में वैज्ञानिक शिक्षा रूसी भाषा ही के द्वारा दी जा रही है।’ अपने उसी लेख में सप्रे जी यह भी लिखते हैं-‘जापान के विश्वविद्यालयों का भी यही हाल है। वहां कठिन से कठिन और गहन से गहन तत्वपूर्ण विषयों पर व्याख्यान जापानी भाषा में ही होते हैं। जापानी भाषा का साहित्य थोड़े समय पहले ऐसा था कि उसकी तुलना भारतीय देशी भाषाओं के साहित्य से करना उसको सम्मान देना कहा जा सकता है। ऐसी अवस्था में भारतवासी ही अपनी मातृभाषा में शिक्षा पाने से वंचित क्यों रहें?
अपने इस लेख में वह राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषा के सवाल को इस तरह भी रेखांकित करते हुए आलोचनात्मक जस्ट भ डालते हैं-‘संसार के अग्रगण्य वैज्ञानिकों में भारतवर्ष के सुप्रसिद्ध अध्यापक जगदीश चंद्र बसु भी हैं। वे अपने सभी आविष्कारों का वर्णन अंग्रेजी भाषा में करते हैं और ग्रंथ लेखन भी उसी भाषा में यदि वे बंगला भाषा का उपयोग करने लगे तो देशी भाषाओं में वैज्ञानिक ग्रंथों का आंशिक अभाव दूर हो सकता है।’ सप्रे जी केवल राष्ट्रभाषा और भारतीय भाषाओं के महत्व पर ही जोर नहीं दे रहे थे। अपने समकालीन और अपनी से आगे की पीढ़ी के महत्वपूर्ण लोगों को यह आईना भी दिखा रहे थे कि मातृभाषा को महत्व देना देश की उन्नति, राष्ट्र की एकता, भारत और भारतीय भाषाओं को गुलामी की दास्तां से मुक्ति दिलाने का एकमात्र माध्यम मातृभाषा ही है।
महात्मा गांधी का मातृभाषा और राष्ट्रभाषा प्रेम जगजाहिर ही है। गांधीजी भारतीय भाषाओं के व्यवहार के प्रबल समर्थक थे। उन्हें हिंदी बोलने पर ही नहीं गुजराती का व्यवहार करने पर भी धक्के खाने पड़े थे। राष्ट्रभाषा और मातृभाषा को महात्मा गांधी देशोद्धार और देशोन्नति का प्रधान साधन समझते थे। दक्षिण अफ्रीका की जेल में बंद रहते समय महात्मा गांधी को अपनी पत्नी की बीमारी का तार मिलने का किस्सा सबको पता ही है। महात्मा गांधी यदि जुर्माना अदा कर देते तो उन्हें जेल से छुटकारा मिल जाता और वे अपने घर जाकर अपनी पत्नी की सेवा आदि कर सकते थे पर उन्होंने अपने सिद्धांत से समझौता नहीं किया। जेलर की आज्ञा प्राप्त करके अपनी पत्नी को उन्होंने गुजराती में एक पत्र लिखा। पत्र देखकर जेलर चौंक गया, क्योंकि वह उसे पढ़ न सका। जेलर ने उस पत्र को तो जाने दिया पर आज्ञा दी कि गांधीजी अपने अगले पत्र अंग्रेजी में ही लिखेंगे। गांधी जी ने उस जेलर से कहा-‘ मेरे हाथ के गुजराती पत्र इस बीमारी की दशा में मेरी पत्नी के लिए दवा का काम करेंगे। इस कारण आप मुझे गुजराती में ही लिखने की आज्ञा दीजिए’ पर जेलर नहीं माना और फल यह हुआ कि गांधी जी ने अंग्रेजी में लिखने से इंकार कर दिया। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे दृढ़ प्रतिज्ञ और मातृभाषा भक्त महात्मा गांधी को इंदौर के आठवें हिंदी साहित्य सम्मेलन का सभापति बनाए जाने की भी प्रशंसा की थी।
महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती के माध्यम से मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के सवाल पर खुद तो लिख ही रहे थे और दूसरे लेखकों के लेख भी प्रमुखता से छपते हुए अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई को अपने ढंग और सरस्वती के मालिकों की रीति-नीति पर खरा उतरते हुए नई ताकत दे रहे थे। द्विवेदी जी ने बहुतसंख्यक जनता को शिक्षित करने की नीति अपनाई थी। उनका स्पष्ट मानना था कि विभिन्न प्रदेशों की जनता अपनी-अपनी मातृभाषाओं के माध्यम से ही शिक्षित हो सकती थी। द्विवेदी जी ने कहा कि शिक्षित होने का अर्थ अंग्रेजी भाषा का ज्ञान नहीं है। वे लगातार सवाल उठा रहे थे-‘अच्छा शिक्षा के मानी क्या? अंग्रेजी भाषा में धड़ल्ले के साथ बोलना और लिखना आ जाना ही क्या शिक्षा है? द्विवेदी जी ने लिखा था-’30 करोड़ भारतवासियों की ज्ञान वृद्धि क्या इन अंग्रेजी के मुट्ठी भर शुद्ध लेखकों से हो जाएगी?’ अंग्रेजी राज से निराश होकर उन्होंने लिखा-‘लक्षणों से तो यही मालूम होता है कि घर के धान भी पयाल में जाना चाहते हैं। इस दशा में जब तक हम लोग स्वयं ही अपने उद्योग से अपने स्कूल खोल कर अपने मन की शिक्षा न देंगे तब तक यथेष्ट उद्धार की आशा नहीं है।’
पंडित माधव राव सप्रे की आज 151वीं जयंती है। जयंती पर हम मराठी भाषी सप्रे जी के मातृभाषा और राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए दिए गए योगदान को याद रखने नई पीढ़ी को याद दिलाना महत्वपूर्ण है। उनके उठाए हुए कदम 100 साल पहले भी प्रासंगिक थे और आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक ही बने हुए हैं।

ऐसे माधव राव सप्रे जी को शत्-शत् नमन!!!

∆ गौरव अवस्थी
रायबरेली/उन्नाव

आचार्य द्विवेदी स्मृति अभियान के रजत जयंती समारोह में होगा देशभर के साहित्यकारों-पत्रकारों का जमावड़ा

आचार्य द्विवेदी स्मृति अभियान का 25वां वर्ष

रजत जयंती समारोह में होगा देशभर के साहित्यकारों-पत्रकारों का जमावड़ा

मुख्य आकर्षण
-दौलतपुर में महावीर चौरा पर सुंदरकांड पाठ से रजत जयंती समारोह की शुरुआत
-दो दिवसीय मुख्य वार्षिक समारोह 11-12 नवंबर को
-ऐतिहासिक दस्तावेजों और दुर्लभ फोटो वाली प्रदर्शनी का आयोजन
-रायबरेली शहर में आचार्य द्विवेदी स्मृति खेल महाकुंभ
-गीत-संगीत, नृत्य और नाटक के माध्यम से आचार्य द्विवेदी के जीवन वृत्त की प्रस्तुति
-“आचार्य पथ” स्मारिका/पत्रिका का विशेषांक

रायबरेली से शुरू हुआ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर गया है। अभियान की रजत जयंती धूमधाम से मनाई जाएगी। रजत जयंती वर्ष को यादगार बनाने की तैयारियां अभी से शुरू हो गई हैं। 11-12 नवंबर 2022 को आयोजित होने वाले रजत जयंती समारोह में देशभर के साहित्यकारों पत्रकारों को आमंत्रित किया जाएगा। लखनऊ और दिल्ली में भी कार्यक्रम आयोजित करने का संकल्प लिया गया। आचार्य पथ स्मारिका का विशेषांक भी निकालने की तैयारी है।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की रायबरेली के आशीर्वाद इन होटल में आयोजित बैठक में तय किया गया कि रजत जयंती वर्ष में आचार्य द्विवेदी की स्मृतियों को नए रूप में संजोया जाएगा। वर्ष पर्यंत कार्यक्रमों की श्रंखला चलेगी। इसकी शुरुआत आचार्य द्विवेदी के जन्म ग्राम दौलतपुर में सुंदरकांड के पाठ के साथ होगी। आचार्य द्विवेदी स्मृति खेल महाकुंभ के साथ ही जनपद के साहित्यिक स्वाधीनता संग्राम इतिहास को समेटने वाली प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी। 12 नवंबर को वार्षिक आयोजन भी इस बार दो दिवसीय होगा। इसमें देशभर के पत्रकार-साहित्यकार शामिल होंगे। आचार्य द्विवेदी के जीवन वृत्त को गीत-संगीत, नाटक और नृत्य के माध्यम से भी प्रस्तुत करने की तैयारी की जा रही है।


अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने बताया कि स्मृति संरक्षण अभियान 9 मई 1998 को समाज और सरकार को जगाने के लिए ध्यानाकर्षण धरने के माध्यम से प्रारंभ हुआ था। यह स्मृति अभियान 9 मई से रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर गया है। 25 वर्ष के सफर में कई सोपान तय किए गए। शहर से लेकर गांव तक तीन स्मृति द्वार बनाए गए। कई सरकारी और निजी संस्थाओं में सभागार आचार्य द्विवेदी के नाम पर रखे गए।
उन्होंने बताया कि आचार्य द्विवेदी की स्मृतियां सात समंदर पार अमेरिका तक पहुंच गई। अमेरिका इकाई की कमान श्रीमती मंजु मिश्रा एवं सदस्य श्रीमती रचना श्रीवास्तव, श्रीमती शुभ्रा ओझा, कुसुम नैपसिक, डॉक्टर ममता त्रिपाठी संभाले हुए हैं। अमेरिका इकाई साल में आचार्य द्विवेदी की स्मृति और हिंदी के प्रचार- प्रसार के लिए ऑनलाइन चार कार्यक्रम आयोजित कर रही है। इनमें बच्चों की प्रतियोगिताएं भी शामिल हैं।

कार्यक्रमों के लिए अलग-अलग प्रभारियों की नियुक्ति-
महामंत्री अनिल मिश्र ने बताया कि कार्यक्रमों के लिए अलग-अलग प्रभारियों की नियुक्ति की गई है। खेल प्रतियोगिताओं के लिए मुन्ना लाल साहू, स्मिता दुबे, अनुपमा रावत और हिमांशु तिवारी को प्रभारी बनाया गया है। नाटक-नृत्य आदि के लिए अमित सिंह, रवि प्रताप सिंह और क्षमता मिश्रा को जिम्मेदारी दी गई है। प्रदर्शनी का प्रभार अभिषेक द्विवेदी, नीलेश मिश्रा और अरुण पांडे को सौंपा गया है।
बैठक के अंत में डॉ सुशील चंद्र मिश्र ने सभी को रजत जयंती वर्ष की शुभकामनाएं दीं। बैठक में राजीव भार्गव, दिनेश शुक्ला, सुधीर द्विवेदी, स्वतंत्र पांडे, राजेश वर्मा, श्रीमती रजनी सक्सेना, रामेंद्र मिश्रा, अमर द्विवेदी, दीपक तिवारी, लंबू बाजपेई, शशिकांत अवस्थी, घनश्याम मिश्रा, राकेश मोहन मिश्रा, राजेश द्विवेदी, कृष्ण मनोहर मिश्रा, अभिषेक मिश्रा, रोहित मिश्रा, यशी अवस्थी, शिखर अवस्थी, हर्षित द्विवेदी आदि मौजूद रहे।

आचार्य द्विवेदी के नाम पर चौराहे का सुंदरीकरण करने का सुझाव

रजत जयंती वर्ष की तैयारियों के सिलसिले में आयोजित बैठक में कई सुझाव भी आए। समिति के सदस्य राजेश वर्मा ने सुझाव दिया कि आचार्य द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान के रजत जयंती वर्ष को यादगार बनाने के लिए शहर के एक चौराहे को विकसित किया जाए। सदस्य चंद्रमणि बाजपेई ने छात्र-छात्राओं के लिए पुस्तकालय- वाचनालय स्थापित किए जाने पर जोर दिया।

आचार्य द्विवेदी के साहित्य का डिजिटलाइजेशन भी होगा

रजत जयंती वर्ष मनाने की तैयारियों से संबंधित बैठक में आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिका इकाई की अध्यक्ष श्रीमती मंजु मिश्रा भी ऑनलाइन शामिल हुईं। उन्होंने आचार्य द्विवेदी के साहित्य समेत अन्य विषयों पर लिखी गई पुस्तकों को डिजिटल फॉर्म पर उपलब्ध कराने का सुझाव दिया। अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने आश्वस्त किया कि इस दिशा में भी काम तेज किया जाएगा।

रजत जयंती वर्ष: हम हैं राही स्मृति अभियान के

रजत जयंती वर्ष: हम हैं राही स्मृति अभियान के

यही तारीख थी नौ मई। साल 1998। अपने ही गांव-घर, जनपद, प्रदेश और देश में भुला-बिसरा दिए गए हिंदी के प्रथम आचार्य हम सबको एक भाषा, एक बोली-बानी और नवीन व्याकरण देने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की स्मृतियों को संजोने से जुड़ा अभियान शुरू हुआ। शुरुआत 42 डिग्री सेल्सियस की भीषण गर्मी के बीच रायबरेली शहर के शहीद चौक से ध्यानाकर्षण धरने के माध्यम से हुई। यह एक शुरुआत भर थी। कोई खाका नहीं। कोई आका नहीं। कुल जमा 40-50 और पवित्र संकल्प इस अभियान की नींव में थे। प्रकृति या यूं कहें खुद आचार्य जी ने शहीद चौक पर जुटे अनुयायियों की परीक्षा ली। टेंट के नीचे बैठे लोग अपने इस पूर्वज और हिंदी के पुरोधा की यादों को जीवंत बनाने का संकल्प ले ही रहे थे कि तेज अंधड़ से 18×36 का टेंट उड़ गया। लोग बाल बाल बचे लेकिन कोई डिगा न हटा। ध्यानाकर्षण धरना अपने तय समय पर ही खत्म हुआ।

पहली परीक्षा में पास होने के बाद चल पड़ा स्मृति संरक्षण अभियान आप सब के सहयोग-स्नेह और संरक्षण से कई पड़ाव पार करते हुए आज यहां तक पहुंचा है। अभियान का यह 25वां वर्ष प्रारंभ हुआ है। किसी भी परंपरा के 25 वर्ष कम नहीं होते। इस दरमियान कुछ बदला, कुछ छूटा और बहुत कुछ नया शामिल भी हुआ। इस टूटे-फूटे ही सही अभियान के भवन में न जाने कितने लोगों का पैसा, पसीना और प्यारभाव ईंट-गारे के रूप में लगा है। सबके नाम गिनाने बैठे तो कागज नामों से ही भर जाए। मन की बहुत बातें मन में ही रखनी पड़ जाएं। इसलिए बात केवल उन पड़ावों की जो यादों में अंकित-टंकित हो चुकी हैं।
    अभियान का शुरुआती मुख्य मकसद साहित्यधाम दौलतपुर को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में घोषित कराने से जुड़ा था। इसके प्रयास भी दिल्ली से लेकर लखनऊ तक हुए। खूब हुए लेकिन हिंदी के पुरोधा का जन्मस्थान राष्ट्रीय स्मारक नहीं बन पाया तो नहीं बन पाया। अब इसके लिए हम खुद को गुनाहगार ठहराएं या शासन सत्ता को? राष्ट्रीय स्मारक तो छोड़िए जन्मस्थान पर एक ऐसा स्थान तक नहीं बन पाया जहां बैठकर आज  हिंदी भाषा और अपने पुरोधाओं से प्रेम करने वाली पीढ़ी प्रेम से बैठ ही सके। बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, इसलिए जरूरी है दूसरी तरफ चला जाए। अभियान से जुड़ी कुछ ऐसी तारीखें हैं, जो तवारीख बन गई।
   भला हो, कांग्रेस के सांसद रहे कैप्टन सतीश शर्मा का, जिन्होंने अभियान से प्रभावित होकर अपनी सांसद निधि से पुस्तकालय-वाचनालय का भवन जन्म स्थान के सामने आचार्य जी के सहन की भूमि पर ही निर्मित कराया। भला हिंदी के उन पुरोधा डॉ नामवर सिंह का भी हो जिन्होंने उस पुस्तकालय-वाचनालय भवन का लोकार्पण किया। यह अलग बात है कि तमाम मुश्किलों की वजह से पुस्तकालय वाचनालय संचालित नहीं हो पाया।
     साल वर्ष 2004 में एक नई शुरुआत आचार्य स्मृति दिवस के बहाने हुई। देश के शीर्षस्थ कवियों में शुमार रहे बालकवि बैरागी के एकल काव्य पाठ से शुरू हुई यह परंपरा आज भी जारी है। वर्ष-प्रतिवर्ष यह परंपरा नई होती गई। निखरती गई। आज ‘आचार्य स्मृति दिवस’ अभियान का मुख्य केंद्र है। इस दिवस के बहाने देश भर के न जाने कितने स्नावनामधन्य साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और खिलाड़ियों को सुनने-गुनने, देखने-समझने के अवसर हम सबको मिल चुके हैं।
   

अभियान का एक असल पड़ाव तो ‘आचार्य पथ’ स्मारिका-पत्रिका भी है। प्रधान संपादक साहित्यकार -गीतकार आनंद स्वरूप श्रीवास्तव के कुशल संपादन में निरंतर 11 वर्षों से प्रकाशित हो रही इस स्मारिका ने आचार्य द्विवेदी की स्मृतियों को जीवंत बनाने में कम योगदान नहीं दिया है। देशभर के साहित्यकार आचार्य द्विवेदी पर केंद्रित लेख लिखते हैं। छपते हैं। प्रधान संपादक ने स्मारिका को ‘सरस्वती’ की तरह ही विविध ज्ञान की पत्रिका बनाने का उपक्रम भी लगातार किया है और कर रहे हैं।
    अभियान वर्ष 2015 कि वह तारीख भी नहीं भूल सकता जब ‘द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ’‌ का पुन: प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट-नई दिल्ली ने किया। इस काम में अभियान की भूमिका दुर्लभ ग्रंथों को उपलब्ध कराने भर की ही थी पर यह भूमिका भी कम नहीं थी। अभियान अपने अग्रज-बुजुर्ग रमाशंकर अग्निहोत्री को हमेशा याद करता है और रहेगा, जिन्होंने यह दुर्लभ ग्रंथ अभियान से जुड़ी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति को खुशी-खुशी सौंपा और नेशनल बुक ट्रस्ट के सहायक संपादक हिंदी पंकज चतुर्वेदी के योगदान को भी हम नहीं भूल सकते। ग्रंथ का पुनः प्रकाशन उन्हीं की बदौलत हुआ।
    हम नहीं भूल सकते राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (निफ्ट रायबरेली) के निदेशक डॉ. भारत साह के उस योगदान को जो एक ऐसी किताब के रूप में दर्ज है, जिसका ऐतिहासिक महत्त्व है। इस किताब का नाम है विज्ञान वार्ता। आचार्य द्विवेदी द्वारा सरस्वती के संपादन के दौरान लिखे गए तकनीक, विज्ञान और नई नई खोजों से संबंधित लेखों को मुंशी प्रेमचंद ने अपने संपादन में संग्रहित कर वर्ष1930 में विज्ञान वार्ता नाम से पुस्तक प्रकाशित की थी। इस दुर्लभ पुस्तक को भी समिति ने निफ्ट रायबरेली के निदेशक को उपलब्ध और उन्होंने पुनः प्रकाशित कराया।
    तारीख तो नहीं भूलने वाली है,10 जनवरी 2021भी। ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युग प्रेरक सम्मान’ से सम्मानित प्रवासी भारतीय और कैलिफोर्निया अमेरिका में हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान देने वाली हिंदीसेवी श्रीमती मंजू मिश्रा ने आचार्य जी की स्मृतियों को सात समंदर पार जीवंत बनाने और इस बहाने प्रवासी भारतीयों की नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़े रखने का बीड़ा अपनी प्रवासी साथी श्रीमती ममता कांडपाल त्रिपाठी, श्रीमती रचना श्रीवास्तव, श्रीमती शुभ्रा ओझा और श्रीमती कुसुम नैपसिक से प्राप्त नैतिक-भौतिक-साहित्यिक-सामाजिक सहयोग के बल पर इसी दिन उठाया था। आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति की अमेरिकी इकाई की शुरुआत इसी दिन हुई। एक छोटे से शहर की छोटी सी शुरुआत के दुनिया के सबसे संपन्न देश अमेरिका तक पहुंचना हम जैसे अकंचिनों के लिए स्वप्न सरीखा है। समिति शुक्रगुजार है अमेरिका इकाई की सभी सदस्यों की।
     हमें याद है, 21 दिसंबर 1998 को रायबरेली शहर के राही ब्लाक परिसर में तत्कालीन खंड विकास अधिकारी श्री विनोद सिंह और (अब दिवंगत) की अगुवाई में स्थापित की गई आचार्य श्री की आवक्ष प्रतिमा के अनावरण समारोह में पधारे अनेक साहित्यकार अपने संबोधन में महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम गिना रहे थे लेकिन अनवरत 25 वर्षों के प्रयासों से अब लोगों के दिल-दिमाग में महावीर प्रसाद द्विवेदी पुनर्जीवित हो चुके हैं।
     एक साहित्यकार-संपादक की स्मृतियों को भूलने बिसराने वाले समाज के मन में पुनः स्थापित करने का काम बिना समाज के सहयोग के संभव कहां था? इस मामले में आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति समाज के सभी वर्गों-धर्मो-जातियों के लोगों की हमेशा ऋणी थी, है और रहेगी। आचार्य द्विवेदी स्मृति संरक्षण अभियान समाज के सहयोग से आज अपने रजत जयंती वर्ष में प्रवेश कर चुका है। आचार्य द्विवेदी राष्ट्रीय स्मारक समिति अभियान को सहयोग देने वाले ऐसे सभी गणमान्य, सामान्य और कार्यक्रमों की शोभा बढ़ाने वाले श्रोताओं-दर्शकों के प्रति हृदय से कृतज्ञता ज्ञापित करती है और आशा भी करती है कि अभियान की स्वर्ण जयंती पूर्ण कराने में भी आपका पूर्ण सहयोग-स्नेह-संरक्षण बना रहेगा।

गौरव अवस्थी
रायबरेली

लाल चौक पर झंडा फहराने जाते हुए थे गिरफ्तार

बिजनौर। वर्ष 1992 में लाल चौक पर तिरंगा फहराने पूरे देश से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के हजारों कार्यकर्ता भी ट्रेनों में सवार होकर जम्मू पहुंचे थे। जम्मू से सभी बसों आदि वाहनों से कश्मीर के लाल चौक की ओर रवाना हो गए। पुलिस ने सभी को उधमपुर में गिरफ्तार कर लिया। इन पंक्तियों का लेखक पत्रकार संजय सक्सेना (तत्कालीन नगर मंत्री अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद उरई जालौन), वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भाजपा श्री स्वतंत्र देव सिंह, पूर्व जेल मंत्री हरिओम उपाध्याय, शिवेंद्र बुंदेला, ब्रजभूषण सिंह मुन्नू, विधायक मूलचंद निरंजन आदि भी गिरफ्तार होने वालों में शामिल थे। हम लोगों को एक डिग्री कालेज में तीन दिन तक हिरासत में रखा गया। तत्कालीन जम्मू कश्मीर सरकार ने मात्र गिनती के कुछ वरिष्ठ लोगों को हवाई रास्ते से पहुंचा कर तिरंगा फहराने की अनुमति दी थी। बाद में हम लोगों को कड़ी सुरक्षा के बीच ट्रेनों से दिल्ली के लिए रवाना कर दिया गया।

साल 1992 में मुरली मनोहर जोशी और नरेन्द्र मोदी श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराते हुए
1992 में मुरली मनोहर जोशी और नरेन्द्र मोदी श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराते हुए 

भारतीय जनता पार्टी ने कन्याकुमारी से शुरू एकता यात्रा का 26 जनवरी 1992 को लाल चौक पर तिरंगा फहराते हुए संपन्न करने का एलान किया था। कश्मीर में अलगाववादियों, आतंकियों और मुख्यधारा की सियासत करने वाले राजनीतिक दलों, राष्ट्रवादियों और सुरक्षाबलों के लिए पहली बार प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था।

साल 1992 में मुरली मनोहर जोशी और नरेन्द्र मोदी श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराते हुए

आतंकी और अलगाववादियों ने खुलेआम एलान किया था कि तिरंगा नहीं फहराने दिया जाएगा। भाजपा की एकता यात्रा पूरी होने से पहले ही आतंकियों ने पुलिस मुख्यालय पर ग्रेनेड धमाका किया था, जिसमें तत्कालीन पुलिस महानिदेशक श्री जेएन सक्सेना जख्मी हुए थे। भाजपा के इस एलान के बाद पूरी रियासत में स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई थी।

साल 1992 में मुरली मनोहर जोशी और नरेन्द्र मोदी श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराते हुए

हवाई जहाज से पहुंचाया था श्रीनगर
हालात को भांपते हुए तत्कालीन प्रशासन ने श्री मुरली मनोहर जोशी, श्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं को हवाई जहाज के जरिए श्रीनगर पहुंचाया था। लाल चौक पूरी तरह से युद्घक्षेत्र बना हुआ था। चारों तरफ सिर्फ सुरक्षाकर्मी ही थे। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच लगभग 15 मिनट में ही श्री मुरली मनोहर जोशी व उनकी टीम के सदस्य के रूप में शामिल श्री नरेंद्र मोदी व अन्य ने तिरंगा फहराया। इस दौरान आतंकियों ने रॉकेट भी दागे जो निशाने पर नहीं लगे। इसके बाद सभी नेता सुरक्षित वापस लौट गए थे। 

साल 1992 में मुरली मनोहर जोशी और नरेन्द्र मोदी श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराते हुए

प्रधानमंत्री श्री मोदी उस वक्त जोशी जी की उस टीम के सदस्य थे, जो घनघोर आतंकवाद के उस दौर में श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराने पहुंची थी।

साल 1992 में मुरली मनोहर जोशी और नरेन्द्र मोदी श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराते हुए

कई जगह ट्रेन पटरियों पर विस्फोट- उस समय कश्मीर में स्थिति बेहद विस्फोटक थी। आतंकवादी रेल पटरियों को उड़ाने से पीछे नहीं हट रहे थे। जब हम लोग जम्मू स्टेशन पहुंचे तो पता चला कि हमारी ट्रेन पहुंचने के लगभग आधा घंटा पहले और बाद में भी आतंकवादियों ने कई जगह ट्रेन पटरियों पर विस्फोट किये।

(फोटो व कुछ तथ्य विभिन्न स्रोतों से लिये गए हैं)

चंद्रशेखर आजाद और उनका फरारी जीवन

शहादत के 91वें साल (27 फरवरी) पर विशेष

शहादत के 91वें साल (27 फरवरी) पर विशेष

चंद्रशेखर आजाद और उनका फरारी जीवन

गुलाम भारत को आजाद कराने में अपने प्राणों का बलिदान देने वाले शहीद-ए-आजम चंद्रशेखर आजाद की शूरता-वीरता के किस्से आम हैं। काकोरी कांड के बाद आजाद; कभी हरिशंकर ब्रह्मचारी बने, कभी पंडित जी और कभी अंग्रेज सरकार के अफसर के ड्राइवर भी। क्रांतिकारी दल को मजबूत करने के लिए उन्होंने गाजीपुर के एक मठ के बीमार महंत से दीक्षा इसलिए ली कि उनके निधन के बाद मठ की संपत्ति क्रांति के काम आएगी। तीन-चार महीने महंत के मठ में समय बिताने के बाद जब संपत्ति प्राप्त करने के कोई आसार नजर नहीं आए तो वह पुनः क्रांति दल में सक्रिय हो गए। काकोरी कांड में फरारी के बाद आजाद के यह किस्से इतिहास में ही दफन होकर रह गए। आम लोगों के जेहन में उनके फरारी जीवन की जिंदगी घर नहीं कर पाई। आज उनकी शहादत का 91वां वर्ष है। आइए! आजाद के जीवन से जुड़े इन किस्सों से जुड़ा जाए..

सातार नदी का तट और हरिशंकर ब्रह्मचारी

काकोरी कांड में कई साथी तो अंग्रेज हुकूमत के हत्थे चढ़ गए लेकिन आजाद ‘आजाद’ ही रहे। हिंदुस्तानी विभीषण और अंग्रेजी सेना की खुफिया आजाद को पकड़ने के लिए पूरे देश में सक्रिय रही लेकिन आजाद पकड़े नहीं जा सके। फरार होने के बाद आजाद का अगला ठिकाना झांसी बना। खतरा देख आजाद ढिमरापुर में सातार नदी के तट पर कुटी बनाकर रहने लगे। यहां उन्होंने अपना नाम रखा ‘हरिशंकर ब्रह्मचारी’। इस बीच उनका झांसी आना-जाना भी बना रहा। ब्रह्मचारी के रूप में आजाद प्रवचन देते थे और बच्चों को पढ़ाते-लिखाते भी थे। एक दिन झांसी से साइकिल से लौटते समय इनाम के लालच में‌ दो सिपाहियों ने रोक कर उनसे थाने चलने को कहा।
सिपाहियों ने कहा-‘ क्यों तू आजाद है?’ आजाद ने उन्हें समझाते हुए कहा- आजाद जो है सो तो है। हम बाबा लोग होते ही आजाद हैं। हमें क्या बंधन? आजाद ने हर तरह से बचने की कोशिश की। सिपाहियों को हनुमान जी का डर भी दिखाया लेकिन वह मानने को तैयार नहीं हुए। सिपाहियों के साथ थोड़ी दूर चलकर आजाद बिगड़े और कहा कि तुम्हारे दरोगा से बड़े हमारे हनुमान जी हैं। हम तो हनुमान जी का ही हुक्म मानेंगे। हमें हनुमान जी का चोला चढ़ाना है। कहते हुए आजाद भाग खड़े हुए। बलिष्ठ शरीर देखकर सिपाही पकड़ने के लिए उनके पीछे भागने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।

अचूक निशाने की अग्निपरीक्षा!

फरारी के दौरान झांसी के पास खनियाधाना के तत्कालीन नरेश खड़क सिंह जूदेव के यहां आजाद का आना-जाना हो गया। आजाद अपने साथी मास्टर रूद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर और भगवानदास माहौर के साथ जूदेव के यहां अतिथि बनकर गए। वह राजा साहब के छोटे भाई बने हुए थे और उनके दरबार के अन्य लोगों के लिए ‘पंडित जी’। राजा साहब की कोठी के बगीचे में दरबार जमा हुआ था। बात निशानेबाजी की शुरू हुई। आजाद की बातें दरबार में उपस्थित ठाकुरों को पसंद नहीं आई। राजा के दरबारियों ने निशानेबाजी की परीक्षा लेनी चाही। बातों-बातों में आजाद के हाथों में बंदूक भी थमा दी गई। उनके साथी मास्टर रूद्र नारायण को आजाद की परीक्षा लेना उचित नहीं लगा। उन्हें डर था कि कहीं भेद खुल न जाए। उन्होंने बहाने से आजाद से बंदूक ले ली। भगवानदास माहौर ने बाल हठ करते हुए निशाना साधने की जिद की। बंदूक भगवानदास के हाथ में आ गई । एक पेड़ की सूखी टहनी पर सूखा अनार खोसा हुआ था। आजाद ने उन्हें अचूक निशानेबाजी की बारीक बातें बताई। भगवानदास माहौर के एक निशाने में सूखी टहनी पर खोसा हुआ अनार उड़ गया। इसके बाद माहौल सामान्य हुआ और आजाद अपने साथियों के साथ लौट आए।

बनारसी पितांबर और रेशमी कुर्ता-साफा

आजाद और उनके साथियों का क्रांतिकारी दल शुरुआती दौर में आर्थिक संकटों से गुजर रहा था। इसी बीच बनारस में क्रांति दल के साथियों को पता चला कि गाजीपुर में एक मठ के महंत बीमारी की अवस्था के चलते ऐसे लड़के की तलाश में थे, जिसको सन्यासी बनाकर मठ जिम्मेदारी सौंप दें। क्रांतिकारी दल की आर्थिक दिक्कतों को दूर करने के लिए आजाद ने अपने साथियों का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्हें महंत का शिष्य बनना था। साथी लोग लेकर उन्हें गाजीपुर के मठ में पहुंचे। यहां आजाद का नाम चंद्रशेखर तिवारी बताया गया। ‘आजाद’ उपनाम की चर्चा ही नहीं की गई। पंडित लड़का पाकर महंत जी काफी खुश हुए और अगले ही दिन मठ में आजाद को दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया। दीक्षा के पहले सिर मुंड़ाकर उन्हें रेशमी साफा पहनाया गया। शरीर पर कीमती बनारसी पीतांबर और रेशमी कुर्ता हल्के भगवा रंग का धारण कराया गया। माथे पर शुद्ध चंदन-केसर का लेप भी। इस सबमें मठ के हजार रुपए तक खर्च हुए होने का अनुमान भी क्रांतिकारी दल के सदस्यों ने लगाया था। आजाद मठ में करीब 4 महीने रहे। इस बीच महंत पूरी तरह स्वस्थ हो गए। आजाद को जब यह महसूस हुआ कि उनका क्रांतिकारी दल का संपत्ति प्राप्ति का सपना यहां पूरा नहीं होगा तो आजाद एक दिन चुपके से वहां से खिसक लिए।

मजदूर जीवन

छात्र जीवन में आजाद का पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मन युद्ध कौशल सीखने, तलवार आदि चलाने में लगता था। इसके बाद भी उन्हें तहसील में नौकरी मिल गई थी लेकिन आजाद ‘आजाद’ थे। उन्हें अंग्रेजों की नौकरी पसंद कैसे आती? एक दिन वह एक मोती बेचने वाले के साथ मुंबई चले गए। कुछ मजदूरों की सहायता से उन्हें जहाजों को रंगने वाले रंगसाज का काम भी मिल गया। मजदूरी से मिले पैसों से वह अपना जीवन चलाते थे। मजदूरों की मदद से लेटने भर की जगह भी एक कोठरी में मिली लेकिन उस घुटन भरे माहौल में आजाद का मन नहीं लगा। कभी-कभी तो वह रात भर सिनेमा हाल में बैठे रहते। नींद लगने पर ही अपने बिस्तर पर आते। मुंबई का यंत्रवत जीवन आजाद को रास नहीं आया लेकिन मजदूर जीवन का अनुभव लेकर एक दिन बनारस जाने वाली ट्रेन में बिना टिकट बैठ गए। यहां उन्नाव के शिव विनायक मिश्र से उनकी भेंट हुई। उनकी मदद से संस्कृत पाठशाला में उन्हें प्रवेश मिल गया। 1921 के असहयोग आंदोलन में संस्कृत कॉलेज बनारस पर धरना देते हुए ही वह पहली बार गिरफ्तार हुए थे और 15 बेंतों की सजा हुई थी। यहीं से बालक चंद्रशेखर तिवारी चंद्र शेखर आजाद बना और आजीवन आजाद ही रहा।

जब अंग्रेज सिपाही को पटक-पटक कर मारा

चंद्रशेखर आजाद बनारस रेलवे स्टेशन पर रामकृष्ण खत्री और बनवारी लाल (जो काकोरी केस में इकबाली मुलजिम बने और 4 वर्ष की सजा मिली थी) के साथ प्लेटफार्म पर टहल रहे थे। कुछ अंग्रेज सिपाही भी प्लेटफार्म पर थे। एक अंग्रेज सिपाही ने प्लेटफार्म पर जा रही हिंदुस्तानी नौजवान बहन के मुंह पर सिगरेट का धुआं फेंका। आजाद को अपनी हिंदुस्तानी बहन के साथ इस तरह की अभद्रता बर्दाश्त नहीं हुई और तुरंत अंग्रेज सिपाही पर झपट पड़े। लात, घूंसा थप्पड़ मारकर अंग्रेज सिपाही को गिरा दिया। अंग्रेज सिपाही इतना डर गया कि अपने दोनों हाथ ऊपर करके मार खाता रहा और कहता रहा-‘आई एम सॉरी, रियली आई एम वेरी सॉरी’। उसके अन्य साथी तो भाग ही खड़े हुए। आजाद ने तब अपने साथियों से कहा भी था कि इस साले अंग्रेज को सबक सिखाना जरूरी था ताकि आगे किसी हिंदुस्तानी बहन-बेटी के साथ छेड़खानी न कर सके।

ब्रह्मचारी का ‘ब्रम्हचर्य’ तोड़ने की वह कोशिशें

चंद्र शेखर आजाद ने देश को आजाद कराने की खातिर शादी न करने का वृत ले रखा था। आजीवन ब्रम्हचर्य भी उनका दृढ़ संकल्प था। उनके जीवन से जुड़े यह दो किस्से बड़े महत्वपूर्ण हैं। फरारी जीवन में ढिमरापुर में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से सातार नदी के किनारे रहते समय गांव की एक बाला उनके पीछे पड़ गई। किसी भी तरह उसके प्रभाव में न आने पर उस बाला ने अश्रु सरिता से मोहित-प्रभावित करने की भी कोशिश की लेकिन आजाद तो आजाद थे। गांव की बाला उनके पीछे लगाने में गांव के ही एक चतुर नंबरदार की साजिश थी। किसी भी तरह आजाद के बाला के प्रभाव में न आने पर वह नंबरदार आजाद का भक्त हो गया। उस नंबरदार ने आजाद को अपना पांचवा भाई मान लिया। उसे अपने सगे भाइयों से ज्यादा आजाद पर विश्वास हो चुका था। यहां तक कि उसने अपनी तिजोरी की चाबी भी आजाद को सौंप दी थी। बंदूकें भी उन्हीं की देखरेख में रहने लगीं। यह किस्सा स्वयं आजाद ने झांसी में अपने साथियों को सुनाया था।
दूसरा किस्सा, आजाद की एक जमींदार मित्र के घर का है। आजाद एक बार अपने धनी जमींदार मित्र के यहां रुके थे। मित्र को अचानक एक दिन के लिए बाहर जाना पड़ा। आजाद ने अन्यत्र रुकने का प्रस्ताव किया लेकिन जमींदार मित्र नहीं माने। आजाद उनके विशाल भवन के ऊपरी खंड में ठहरे थे। रात में कमरे में सो रहे थे। आधी रात के बाद जमींदार की विधवा बहन कमरे में आ गई। उसने कामेच्छा से धीरे से आजाद को जगाया। 24:00 अपने कमरे में विधवा बहन को देखकर आजाद को काटो तो खून नहीं। उन्होंने बहन को समझाया। बताया भी कि सांसारिक बंधन में बंधने का उनके पास अवसर ही नहीं है। विधवा बहन के न समझने पर आजाद बिजली की गति से बाहर निकले और तिमंजिले भवन की दीवार से नीचे कूद गए। कड़ाके की सर्दी वाली वह रात आजाद ने जंगल में एक पेड़ के नीचे गुजारी। कूदने के कारण चोट भी लगी लेकिन अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिए उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया।

आजीवन आजाद रहे आजाद जी को बलिदान दिवस पर शत शत नमन!

∆ गौरव अवस्थी ‘आशीष’
रायबरेली/उन्नाव

खाना पकाने के शौकीन हैं स्वतंत्र देव सिंह

एक संस्मरण। -संजय सक्सेना

लखनऊजिला बिजनौर के विधानसभा क्षेत्र धामपुर की दलित बस्ती में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने पूड़ी बेल कर क्या तली, कि मीडिया की सुर्खियां बन गया। दरअसल स्वतंत्र देव जी एक अच्छे राजनैतिज्ञ होने के साथ ही खाना पकाने के शौकीन भी हैं। यही नहीं पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सफलता पूर्वक अपना जौहर दिखा चुके हैं। यह बात इन पंक्तियों का लेखक दावे के साथ इसलिए कह सकता है क्योंकि वह स्वयं इसका साक्षी व भागीदार भी है।

बात 90 के दशक की है, जब जम्मू कश्मीर और अयोध्या बेहद ज्वलंत मुद्दों में शामिल थे। उस दौर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े स्वतंत्र देव सिंह (वह लोगों में कांग्रेस सिंह के नाम से जाने जाते थे) जिला जालौन के मुख्यालय उरई स्थित डीवी डिग्री कालेज की छात्र राजनीति में सक्रिय थे। तब मैं बीएससी में अध्ययनरत था। कांग्रेस जी की एक पूरी की पूरी मंडली थी। उसमें शिवेंद्र बुंदेला, ब्रजभूषण सिंह मुन्नू, हरिओम उपाध्याय (अब पूर्व जेल मंत्री), मूलचंद निरंजन (अब विधायक), ठेकेदार संतराम  सिंह सेंगर (अब विधायक) आदि शामिल थे। कालेज के नाते कांग्रेस जी से जानपहचान हुई। मेरे साथ हमेशा युवाओं की भारी तादाद देखकर एक दिन बोले संजय जी, आप एबीवीपी में आ जाइए। फिर मेरी नियुक्ति उरई के नगर मंत्री के रूप में कर दी गई। इस तरह स्वतंत्र देव जी के साथ काफी मिलना जुलना हो गया।…जो इतना बढ़ा कि वह दिनभर के 8-10 घंटे मेरे ही स्कूटर, मोटरसाइकिल पर घूमते फिरते। तब झांसी रोड स्थित सनातन धर्म इंटर कालेज के ठीक बाहर के मकान में नीचे मूलचंद निरंजन जी रहते थे। उसी मकान के ऊपरी हिस्से में कांग्रेस जी भी रहते थे। यही कारण रहा कि रोजाना उन्हें लेने छोड़ने उनके घर आना-जाना होता था। वैसे तो भाभी जी चाय, नाश्ता, खाना आदि खिलाती ही थीं, लेकिन जब वो अपने मायके जातीं, तब हम दोनों योद्धा रसोई घर में अपनी पाक कला को धार देते। चाय के अलावा सब्जी, रोटी, दाल, चावल, पूड़ी, पराठा जो मन किया, बनाया और खाया।  छोटी सी रसोई में जमीन पर रखे गैस चूल्हे के सामने लकड़ी की पटली पर बैठकर एक आटा माढ़ता तो दूसरा तवे पर रोटी सेंकता। अपने आप बनाकर खाने का मजा ही अलग है, भले ही रोटी आड़ी, बेड़ी और मोटी ही क्यों न हों! बाद में जब कांग्रेस जी भारतीय जनता युवा मोर्चा के जिला से लेकर प्रदेश महामंत्री, फिर अध्यक्ष भी बने और हम जिला प्रवक्ता।

रही बात पत्रकारिता की तो… कुछ साल बाद छात्र राजनीति के साथ साथ वह लखनऊ से प्रकाशित दैनिक स्वतंत्र भारत के प्रभारी बन गए। उस समय उरई से प्रकाशित “दैनिक लोक सारथी” खुद में सबसे बड़ा अखबार था। दैनिक जागरण झांसी और कानपुर दोनों जगह की कुछ प्रतियां आती थीं। अमर उजाला, हिंदुस्तान नहीं थे वहां। मेरे पत्रकारिता के गुरु; श्री केपी सिंह जी लोक सारथी के प्रभारी संपादक थे और मैं सह संपादक। उस नाते भी कांग्रेस जी की ओर से उनके लिए रोजाना समाचार बनाने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।

दरअसल धामपुर में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह अलग अंदाज में दिखे। एक दिन पूर्व गांव पुराना धामपुर की दलित बस्ती में भोजन करने के बाद उन्होंने महिलाओं का उत्साहवर्धन करते हुए खुद पूड़ी बनाई। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह बुधवार दोपहर धामपुर धामपुर के शुभम मंडप में कार्यकर्ता सम्मेलन में पहुंचे थे। सम्मेलन के बाद वह गांव पुराना धामपुर की दलित बस्ती पहुंचे। यहां उन्होंने भाजपा सेक्टर संयोजक मिथलेश देवी के घर पर भोजन किया। इसके बाद उन्होंने भोजन बना रही महिलाओं के उत्साहवर्धन के लिए स्वयं पूड़ी बेली और कढ़ाई में तली। इससे वहां मौजूद महिलाएं बहुत खुश हुई। इसके बाद उन्होंने गांव में घर-घर जाकर जनसंपर्क किया और भाजपा को विजयी बनाने की अपील की।