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प्यार को एहसास से मिलवाती “इश्क़ आउट ऑफ़ बजट” की लेखिका प्रियंवदा दीक्षित कभी जीत लिखती है, कभी आगाज़ लिखती है, वो अल्हड़ सी लड़की, खुद की पहचान लिखती है।”

यह पंक्तियां इलाहाबाद की युवा लेखिका पर सटीक बैठती हैं। काका हाथरसी की ही भूमि ‘हाथरस’ में जन्म और महादेवी वर्मा के शहर ‘इलाहाबाद’ से शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की। माता-पिता इलाहाबाद हाई कोर्ट में अधिवक्ता हैं, फिर भी उन्होंने लेखन को चुना। डिप्रेशन, लोगों के ताने, कई बार विफ़ल होने के बाद भी, उन्होंने हार जाने के दर्द से खुद को रोका नहीं बल्कि दर्द को शब्दों में बदल दिया। एक लेख़क बनने का सपना जल्दी ही पूरा हुआ, जब उन्होंने अपनी पहली किताब “तुम्हारी प्रियम”, जिसको भारत के बड़े प्रकाशन “hindyugm” ने प्रकाशित किया। इस पुस्तक में उन्होंने प्यार को अलग ढंग से बताया है। “तुम्हारी प्रियम” ने पाठकों के दिल में अलग जगह बनाई। लोगों से मिलते प्यार ने एक बार कलम फिर उठाने की प्रेरणा दी और इस तरह दूसरी किताब “इश्क; आउट ऑफ़ बजट” से पाठकों के दिल में जल्द ही जगह बनाई ।

उनके हिसाब से “हार वो सफ़र होता है, जिसका कोई हमसफ़र नहीं बनना चाहता”, लगातार असफ़लता देखने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और ज़िन्दगी में कुछ कर दिखने का जज़्बा रखा। आज शायद इसलिए वो कई सारे लोगों को जीवन में कुछ कर दिखाने का हौसला देती है। जीत जाना बड़ी बात नहीं, पर लगातार हार कर जीतना बड़ी बात है।

इस मशीनी दुनिया के इश्क से अलग एक ऐसी कहानी जिसमें नज़रे मिलने से ही दिल की धड़कन तेज़ हो जाती थी? क्या शब्दों से अलग और गुत्थम गुत्था होते भावों से अलग भी प्यार की कोई दुनिया है? प्यार असल में है क्या? प्रियंवदा दीक्षित की क़िताबें इन सवालों का जवाब देती हैं।

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