
लेखिका – शीतल वाजपेयी
कानपुर
प्रेम के लग्न की पत्रिका हो गये।
नेह पंचाँग की साधिका हो गये।
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इस तरह रँग गये नेह के रंग में,
एक दिन कृष्ण भी राधिका हो गये।
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ज़िंदगी बाँसुरी की तरह बज उठी,
सुर सधे और हम गायिका हो गये।
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मौन था चित्र मेरा मुखर हो गया,
नैन प्रियतम के जब तूलिका हो गये।
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रीति की बेड़ियाँ टूट कर गिर गयीं,
तुम हुये शुक तो हम सारिका हो गये।
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दीप विश्वास का ज़िंदगी भर जले,
बस इसी आस में वर्तिका हो गये।
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श्वेत पृष्ठों पे जब चल पड़ी लेखनी
शब्द यों मिल गये गीतिका हो गये।


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