
तीसरी समीक्षा- किताब : ताकि सनद रहे (51 कोरोना योद्धाओं की सच्ची कहानियों का संग्रहणीय दस्तावेज़) संकलन-संपादन : गौरव अवस्थी समीक्षक: श्री हेमंत पाल, स्थानीय संपादक, सुबह सवेरे, इंदौर (म.प्र.)
कोरोना त्रासदी की पीड़ा अंतहीन है। जीवन का ये वो दौर था, जो अनसोचा और अनसमझा था। इस महामारी के सामने सारी सरकारी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो गई, जो स्वाभाविक भी था। किसी भी शहर, गांव या कस्बे में आबादी के अनुमान से ही स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाई जाती है, पर कोरोना ने उन सारे अनुमानों को गलत साबित कर दिया। प्रशासन भी समझ नहीं पा रहा था कि वो कैसे व्यवस्थाएं जुटाए, दवाइयों का इंतजाम करें, मरीजों और उनके परिजनों के लिए खाने-पीने की जिम्मेदारी पूरी करे और सबसे बड़ा काम ये था कि महामारी से संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार करना। लेकिन, ये सब हुआ, जिससे जितना हो सकता था, उसने वो सब किया। जो करने वाले थे, वे दुनिया के अलग ही लोग थे। कहते हैं कि इस धरती पर कहीं तो कोई है, जो सबकुछ संचालित कर रहा है। ईश्वर तो हर जगह प्रकट नहीं हो सकता, तो वह अपने ऐसे प्रतिरूपों को भेज देता है, जो ऐसी जिम्मेदारियां वहन कर लेते हैं, जो मनुष्य के बस से बाहर निकल जाती है। कोरोना काल में हर शहर, हर कस्बे और हर गांव में ऐसे कोरोना योद्धा अवतार की तरह सामने आए, जिन्होंने मानव धर्म का पालन किया।

इस किताब की 51 सच्चाइयां ऐसे ही ईश्वर अवतारों का संकलन है, जिन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए संक्रमित और परेशान लोगों के लिए दवाइयां भी जुटाई, स्वास्थ्य सुविधाएं भी और उनके परिजनों के लिए खाने-पीने के इंतजाम में भी कमी नहीं आने दी। उनका ये कर्म पूरी तरह नि:स्वार्थ और सेवा का चरमोत्कर्ष था। ऐसे लोगों को उनकी सेवा भावनाओं के लिए सिर्फ धन्यवाद नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कोरोना काल में जो किया, वो बरसों नहीं, सदियों तक याद किया जाएगा।
गौरव अवस्थी का ये किताब निकालने का प्रयास अतुलनीय है। ये अपनी तरह का अनोखा प्रयास है, जो वंदनीय है। किताब की 51 कथाओं में कोरोना योद्धाओं के योगदान को जिस तरह शब्दों में बांधा है, वो बेजोड़ है। नि:स्वार्थ भाव से किया गया उनका ये योगदान भी किसी कोरोना योद्धा से कम नहीं है। जाने-अनजाने इन कोरोना योद्धाओं के साथ गौरव अवस्थी का प्रयास तारीफ के शब्दों से कहीं बहुत विशाल है।

दुनियाभर में जब महामारी चरम पर थी, तब हम और आप घरों में बैठे थे! ऐसे में कई ऐसे लोग भी थे, जो जान की परवाह न करके दूसरों की जान बचाने, उनके लिए दवाइयों का इंतजाम करने, ऑक्सीजन का इंतजाम करने और जो सारी कोशिशों के बाद भी बच नहीं सके उनके अंतिम क्रिया कर्म में लगे थे। इन्हें किसी ने कहा नहीं था और इसके पीछे उनका कोई स्वार्थ था! जो कुछ था, वो इंसानियत और मानवीयता थी। ऐसे भी लोग थे, जिन्होंने अपने वाहनों को एम्बुलेंस बना दिया था। सिर्फ युवा ही नहीं, महिलाएं और बुजुर्ग भी जान की परवाह न करते हुए महीनों लगे रहे। किसी ने अपनी शादी को आगे बढ़ा दिया और वो सारा पैसा मरीजों की मदद में खर्च कर दिया। कहीं सरकारी अफसरों ने अपनी सीमा से आगे जाकर जनसेवा की ताकि टूटती सांसों में जान फूंकी जा सके। उन्हें टूटते बोल्ट के कारण खत्म होती ऑक्सीजन के पीछे लोगों की जान दिखाई दे रही थी। ये सिर्फ 51 सच्चे अनुभव ही नहीं, परोपकार के 51 शिखर हैं। जब एक-एक सांस की आस टूट रही थी, तब यही लोग थे, जिन्होंने उम्मीद जगाई कि हम हैं न! ये दुनिया उतनी बुरी नहीं है, जितना समझा जाता है, वास्तव में ऐसे ही लोगों से इस दुनिया में जीवन के रंग भी हैं।
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