जिस तरह वकील को बहस करने से नहीं रोका जा सकता, उसी तरह पत्रकार को भी लिखने से रोका नहीं जा सकता-न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड ने बहुत बड़ी बात कही है। एक फैसले में उन्होंने पत्रकारों को कुछ कहने या लिखने से नहीं रोकने की व्यवस्था देते हुए कहा कि यह बिल्कुल वैसा होगा कि हम एक वकील से यह कहें कि आपको बहस नहीं करनी चाहिए।
दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार के अधिवक्ता ने पत्रकार द्वारा सरकार के खिलाफ भविष्य मे न लिखने की शर्त के साथ जमानत देने का अनुरोध किया था।
अखिल भारतीय राष्ट्रीय पत्रकार परिषद संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष/ संस्थापक एडवोकेट हरिमोहन दूबे ने अपने समर्थकों के साथ सुप्रीम कोर्ट के इस सुप्रीम फैसले का स्वागत करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति को पूरे देश के पत्रकार संगठनों की तरफ से धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि पत्रकार को देश में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। वह हमेशा देश को मजबूत करने और स्वस्थ समाज की परिकल्पना की आवाज को अपनी लेखनी से उजागर करता है। इसलिए उसके स्वस्थ लेखन पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक ना लगा कर देश के प्रशासनिक अधिकारियों को, एक बड़ा संदेश दिया है। उन्होंने अपने संगठन के लोगों की तरफ से उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा; “जिस तरह न्यायालय में वकील को बहस करने से नहीं रोका जा सकता है। उसी तरीके पत्रकार को खबर लिखने से रोका नहीं जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्णय है। यह निर्णय लोकतंत्र को मजबूत करने का स्तंभ है।”
नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट इंडिया की अयोध्या इकाई ने सुप्रीम कोर्ट के इस सुप्रीम फैसले का स्वागत करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति को पूरे देश के पत्रकार संगठनों की तरफ से धन्यवाद ज्ञापित किया है और कहा है कि पत्रकार को देश का चौथा स्तंभ माना जाता है और वह हमेशा देश को मजबूत करने और स्वस्थ समाज की परिकल्पना की आवाज को अपनी लेखनी से उजागर करता है। इसलिए उसके स्वस्थ लेखन पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक ना लगा कर देश की प्रशासनिक अधिकारियों को एक संदेश दिया।

यूनियन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष त्रियुग नारायण तिवारी, जिला अध्यक्ष नाथ बख्श सिंह, प्रदीप पाठक, जयप्रकाश सिंह सहित अनेक पत्रकारों ने उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा “जिस तरह न्यायालय में वकील को बहस करने से नहीं रोका जा सकता, उसी तरीके पत्रकार को खबर लिखने से रोका नहीं जा सकता”; सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लोकतंत्र को मजबूत करने का स्तंभ है।

दरअसल ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर को उत्तर प्रदेश में उनके खिलाफ दर्ज सभी प्राथमिकी में अंतरिम जमानत देते हुए न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ए. एस. बोपन्ना की पीठ ने कहा कि जुबैर को लगातार हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है। पीठ ने कहा कि जुबैर उत्तर प्रदेश पुलिस और दिल्ली पुलिस द्वारा दर्ज सभी प्राथमिकियों को रद्द करने के अनुरोध को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय जा सकते हैं, क्योंकि ये सभी प्राथमिकियां अब एक साथ जुड़ गई हैं। दिल्ली की अदालत ने उन्हें दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ द्वारा दर्ज प्राथमिकी में जमानत दे दी, जो पहले से ही उनके संगठन के ट्वीट और वित्तपोषण की पूरी जांच कर रही है। पीठ ने कहा कि यदि सभी मामलों की जांच विभिन्न अधिकारियों द्वारा अलग-अलग किये जाने के बजाय एक प्राधिकरण द्वारा की जाती है तो यह निष्पक्ष और उचित होगा। उच्चतम न्यायालय ने जुबैर को भविष्य में ट्वीट करने से रोकने से इंकार करते हुए कहा कि क्या एक वकील को बहस करने से रोका जा सकता है?
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