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कुछ बड़े लोग कमजोर लोगों को नीचा दिखाते और उनके साथ करते बदसलूकी…!!

जो दूसरों के घर का सहारा बनते उनकी इज्जत और मान सम्मान से नहीं होना चाहिए खिलवाड़

काम के एवज में मिलना चाहिए उन्हें सम्मान और मेहनताना..!

समानता और बराबरी की बात अब सिर्फ कागजी..!!

तस्लीम बेनकाब, मुजफ्फरनगर

कभी गार्ड को थप्पड़ मारना, कभी घर मे काम करने वाली महिला व बच्ची के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट, कभी गंदी मानसिकता का ओछापन दिखाते हुए काम करने वाली महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करना…ऐसी ही कुछ घटनाएं लगातार हमारे कथित सभ्य समाज पर प्रश्नचिह्न खड़े करती हैं! हमें यह सोचने की जरूरत है कि क्या एक गरीब व्यक्ति का मान सम्मान नहीं होता। काम के एवज में चंद पैसे देने वाले कुछ बड़े घरों के लोग कमजोर लोगों को नीचा दिखाने और उनके साथ बदसलूकी करने में तनिक देर नहीं लगाते, जबकि उन्हें पता होता है कि घर की सुरक्षा से लेकर साफ सफाई तक सब यही कामगार करते हैं। क्या यह एक आभिजात्य अहं की वजह से होता है? क्या इस तरह कुंठाओं के रहते कोई खुद के सभ्य होने का दावा कर सकता है? देखा जाए तो यह सामंती मानसिकता का परिचायक है!आज कल बहुत सारे घरों में नौकर रखने का चलन तो बढ़ रहा है लेकिन बिना किसी सुविधा के कम वेतन पर काम कराया जाता है। यहां तक कि कई बार बंधुआ मजदूर बना कर लोगों को रखा जाता है। घरेलू कामकाज को आज भी अन्य कामों की तरह नहीं समझा जाता। यहां तक कि समाज में भी इस काम को कोई इज्जत नहीं दी जाती और इस काम की आड़ में सबसे ज्यादा किसी का शोषण होता है तो वे महिला मासूम बच्चे कामगार हैं। उनका आर्थिक और कई बार शारीरिक, दोनों तरह से शोषण किया जाता है।

भले ही सरकार ने घरेलू कामगार महिलाओं के अधिकारों के लिए कानून बना रखा हो पर इसे व्यवहार में आज तक लागू नहीं किया गया। आज भी समाज में घरेलू कामगारों की दयनीय स्थिति बनी हुई है, जबकि अगर ये कामगार घरों में काम करना बंद कर दें तो बड़े बड़े घरों और कोठियों में रहने वालों की सहज जिंदगी में आफत आ जाए। इन बड़े घरों के बच्चे समय से न स्कूल पहुंचेंगे और न नौकरी पेशा वाले लोग काम पर। जिस काम से तकरीबन कई करोड़ महिलाएं, बच्चे और जवान जुड़े हुए हों और वह दलित वंचित तबके से आते हों, उनके साथ उच्च-कुलीन वर्ग के लोग ऐसा व्यवहार करते हैं। यह सब उस संवैधानिक ढांचे वाले देश की स्थिति है, जहां बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने समानता और बराबरी की बात कही थी। चलिए एक दफा बराबरी के सपने अलग देखते हैं लेकिन किसी का हक मारना और उससे काम करवाने के बाद उसे ही प्रताड़ित करना कहां का न्याय है और ऐसे बर्ताव का स्रोत क्या है? कहते हैं कि मानव सेवा ही माधव सेवा है। ऐसे में सेवा करते नहीं बनता तो कोई बात नहीं लेकिन जो दूसरों के घर का सहारा बनते हैं उनकी इज्जत और मान-सम्मान से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए और उनके काम के एवज में सम्मान और मेहनताना मिलना चाहिए। इसे सुनिश्चित करने का काम सरकार और सभ्य समाज दोनों का है।

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