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नाकामी छिपाने के लिये ही गरीबों को मुफ्त राशन देने जैसे टोटके करती है सरकार

सरकार ने बनाया हर सेवा को बनिया की दुकान

कभी-कभी भली-सी क्यों लगती है इमरजेंसी!

~केपी सिंह

इमरजेंसी की चर्चा की प्रासंगिकता जिस कारण से है वह चीज विमर्श से नदारद रहती है। वर्तमान सत्ता के लिये यह सुविधाजनक भी नहीं है कि ऐसे विमर्श को प्रोत्साहन दे फिर भी जून का महीना आते ही सत्ता बिरादरी के लिये इमरजेंसी का आलाप शुरू कर देना रिवाज जैसा हो गया है। सत्ता में रहते हुये 9 वर्ष व्यतीत हो जाने के बावजूद सत्ताधारियों के पास ऐसा कोई एजेण्डा नहीं है जिसे वे वैचारिक बहस में आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस कर सकें हालांकि यह कहीं न कहीं सत्तारूढ़ बिरादरी की दिशाहीनता का आभास कराने वाला तथ्य है जिसका एहसास शायद उसे नहीं है। इमरजेंसी की चर्चा करके वे कांग्रेस को फिर प्रतिरक्षा की स्थिति में धकेलते हैं जबकि अब उन्हें सकारात्मक दिशा में चलना चाहिए और ऐसे हथकंडों का सहारा लेने की बजाय सामाजिक परिवर्तन के लिये जिन कदमों को उठाने की योजना है उनके लिये जनमत तैयार करने में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिये।

हर साल इस महीने में देश को फिर कभी इमरजेंसी की पुनरावृत्ति न होने देने के लिये दृढ़ प्रतिज्ञ किया जाता है जबकि यह औचित्यहीन है। जिस लोकतंत्र की सुरक्षा की दुहाई में इसके लिये बांहे सिकोड़ी जाती हैं वह कितना लोक का तंत्र है आखिर इस पर भी तो विचार होना चाहिये। अगर यह तंत्र देश की पूरी सामाजिक आर्थिक सत्ता पर काबिज लोगों की सेवा में समर्पित हो गया है जो कि वास्तविक लोक के अस्तित्व की कीमत पर किया जा रहा है तो ऐसे छद्म लोकतंत्र को बचाने में लोग दिलचस्पी क्यों लें। अगर आज जागरूकता की कमी के कारण कुलीन तंत्र को लोकतंत्र समझकर इसके प्रति समर्पण की हुंकार लोग भर भी रहे हैं तो जब इसकी नियति उन्हें बर्बाद कर डालने की है तो एक दिन तो उनका इससे मोह भंग होना ही है।

लोकतंत्र का पैमाना अगर लोगों को अधिकार सम्पन्न कर देने से नापा जाता है तो मौजूदा व्यवस्था में लोगों के अधिकारों की सुरक्षा की क्या हालत है इसका जायजा लिया जाना चाहिये। संविधान में लोगों को अधिकार सम्पन्न बनाने के तकाजे के तहत मौलिक अधिकारों की गारंटी की गयी है, लेकिन व्यवहार के स्तर पर देखें तो इसका हश्र एकदम स्पष्ट है। मौलिक अधिकारों के लिये हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की जरूरत होती है। लेकिन आम आदमी को आवश्यकता पड़ जाये तो इन दरवाजों पर वह फटक तक नहीं सकता। इन दरवाजों के अंदर गुहार के लिये जिन वकीलों की उसे जरूरत होगी वे उसकी हैसियत के बाहर है।

उनकी महंगी फीस देना आम आदमी के लिये कतई संभव नहीं है। दूसरी ओर अपने खिलाफ सरकार के किसी भी जायज कदम को वे लोग तत्काल रोक देंगे जिनके पास योग्य वकीलों की फौज अदालत के सामने खड़ी करने के लिये दौलत की कोई कमी नहीं है। कानून के सामने सभी की समानता के सिद्धांत की व्यवहारिक स्थिति तो यही है। इमरजेंसी में मिलावटियों, जमाखोरों, टैक्स चोरों और काला धन रखने वालों पर डंडा चलाया गया था लेकिन आज सरकार क्या इस स्थिति में है कि ऐसे प्रभावशाली तत्वों से टकरा सके। इस नाम पर अपवाद के तौर पर होने वाली कार्रवाइयों को गिनाने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि उसके पीछे के कारणों को लोग अच्छी तरह जानते हैं। अगर सरकार इजारेदारों के आगे नतमस्तक न होती तो आंकड़े कोरोना में भी उनकी दौलत में इजाफे की गवाही न देते।

निहित स्वार्थों की समानान्तर सत्ता के आगे सरकार पस्त न हो तो देश की पूरी दौलत एक प्रतिशत काॅर्पोरेटरों के पास न पहुंच पाती। संसाधनों और संपत्ति का न्यायपूर्ण वितरण जो कि संवैधानिक लक्ष्य है किस तरह सरकार की कुब्बत से बाहर की चीज है पूंजी के केंद्रीयकरण के आंकड़े इसको उजागर कर देते हैं। अपनी नाकामी छिपाने के लिये ही सरकार गरीबों को मुफ्त राशन देने जैसे टोटके करती रहती है। अगर लाभ का न्याय संगत बटवारा सुनिश्चित हो तो सरकार को उनपर ऐसी मेहरबानी करने की जरूरत ही न पड़े। आज लोग दीनहीन हैं तो इसलिये कि मुनाफाखोर प्रभावशाली तबके पर उसका कोई जोर नहीं रह गया है। गरीबों पर यह मेहरबानी भी एक फरेब है क्योंकि दूसरों के अलावा सरकार भी उसे लूटने में लगी है ताकि अपना अस्तित्व बचाने के लिये संसाधन जुटाती रह सके।

आंकड़े बताते हैं कि तथाकथित टैक्सपेयर देश की व्यवस्था को चलाने का श्रेय अपने को देते हैं जो कि एकदम फर्जी बात है। आंकड़े बताते हैं कि इनसे नाम मात्र का करसंग्रह होता है जबकि व्यवस्था चलती है आम आदमी के द्वारा की जाने वाली अदायगियों से क्योंकि उसके पास कर देने के नाम पर चोर गली से निकल जाने का कोई रास्ता नहीं होता। उदाहरण जीएसटी है। वह जब बाजार में सामान खरीदने जाता है तो दुकानदार उससे तो जीएसटी ऐंठ ही लेता है यह दूसरी बात है कि सरकार के खजाने में जमा नहीं करता। आयकर के बारे में भी यही बात है। संपन्न वर्ग जितना टैक्स नहीं देता उससे कई गुना ज्यादा फर्जी हिसाब किताब तैयार करवाकर मार जाता है। जो टैक्स देता भी है उसे वापिस ले लेने की भी पूरी तरकीब उसके पास है।

इस देश में जितने टैक्स वसूले जाते हैं उतना शायद ही किसी देश में लोगों को देना पड़ता हो। गरीब आदमी भी अगर छोटा मोटा प्लाट खरीदे तो भरपूर फीस उसे देनी पड़ती है। मकान का नक्शा पास कराने का भी टैक्स हर शहर में भारी भरकम हो गया है। कदम कदम पर लोगों को टैक्स भरना पड़ता है, जिसमें आम आदमी के सामने राहत टटोलने का कोई रास्ता नहीं होता जबकि पेशेवर तो हर मद में टैक्स गोल करना जानते हैं। अब तो बैंक में पैसा जमा करने वाले से भी सरकार वसूली पर आमादा है। उसने हर सेवा को बनिया की दुकान बना दिया है। रोडवेज का किराया तय होगा तो सरकार मुनाफा के हिसाब से तय करेगी।

कोरोना में एक यात्री से दो यात्रियों का किराया वसूल करने का आदेश इस नाम पर कर दिया गया था कि कोरोना के कारण ज्यादा यात्रियों को टिकट दिये नहीं जा सकते लेकिन कोरोना खत्म होने के बाद में भी बढ़ा किराया जारी है। रेलवे प्लेटफाॅर्म और बस अड्डों के भीतर जाने के लिये भी टैक्स देना पड़ेगा। ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने की दर मनमानी कर दी गयी है। चालान भी मुंह देखकर होते हैं। अगर कोई चलते पुर्जा बिना हेलमेट के मोटरसाइकिल से जा रहा है तो ट्रैफिक वाले उसे टोकते तक नहीं हैं। जबकि किसान और मजदूर का चालान सारी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद भी कर दिया जाता है।

यह वसूली न तो आम आदमी के फायदे के विकास के लिये हो रही है और न सेना को संसाधन देने के लिये। विकास कार्य हों या सप्लाई अथवा सरकारी खरीद कमीशन का परसेंटेज पिछले कुछ सालों में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा बढ़ गया है। सरकार लोगों से उनका खून चूसकर टैक्स वसूल रही है और यह पैसा अधिकारियों, नेताओं व दलालों की जेब में जा रहा है इसलिये कितना भी टैक्स ले लिया जाये सरकार की पूर्ति नहीं होने वाली। नेताओं और अधिकारियों की सुख सुविधा पर भी बेतहाशा खर्च हो रहा है और यह लोगों से वसूले जाने वाले टैक्स की कमाई से।

सही बात यह है कि पानी सर के ऊपर हो चुका है। कोई भी परिवर्तनवादी सरकार अगर इस स्थिति को बदलना चाहे तो उसे जामे से बाहर हो चुके तत्वों पर डंडा चलाना ही पड़ेगा भले ही इसके लिये कुछ समय तक तथाकथित लोकतंत्र को स्थगित कर इमरजेंसी लगानी पड़े। इमरजेंसी की ज्यादतियों के तमाम किस्सों के बावजूद ढाई वर्ष में ही लोग इंदिरा गांधी को फिर सिर आंखों पर बैठाकर सत्ता में वापिस ले आये थे। इसके कारण पर विचार होना चाहिये। जनता पार्टी का शासन आज की तरह ही अराजक शासन था, जिसमें जिसकी लाठी वह भैंस हांके ले जा रहा था।

ऐसे में उसे इमरजेंसी के दिन सुहाने लगे होंगे जब नेता भले ही जेल में बंद रहें हो लेकिन समय से ट्रेन चलने लगी थी, दफ्तरों में रिश्वतखोरी पर बहुत हद तक अंकुश हो गया था, जमाखोरी और मिलावट बंद हो गयी थी जिससे आम जनता को बहुत सुकून था और इसका पुरस्कार उसने 1980 में अपना फैसला पलटकर कांग्रेस को देने का इरादा जता दिया था। वर्तमान सरकार के लिये भी अवसर है कि इमरजेंसी के मामले में वह अपनी रची कारा का अपने को बंदी न बनाकर सही लोकतंत्र की स्थापना के लिये सीमित समय का आपातकाल लगाने की सोचें।

केपी सिंह राजनीतिक विश्लेषक हैं. उनसे संपर्क bebakvichar2012@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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