ग़ज़ल

दिल में ये तमन्ना है के तड़पाए मुहब्बत।।
ऐ काश हमें आप से हो जाए मुहब्बत।।
दस्तूर ए मुहब्बत है के मिलते हैं जहां दिल।।
खिलते हैं वहीं दोस्तों गुल हाए मुहब्बत।।
जाना था जिसे छोड़ के वो छोड़ गया है।।
इस दिल से मगर कैसे चली जाए मुहब्बत।।
नफ़रत के पुजारी तो हैं सब ऐ़श में लेकिन।।
ना करदा गुनाहों की सज़ा पाए मुहब्बत।।
वो आए तो फिर एक भी आंसू नहीं निकला।।
चाहा था के आंखों से बरस जाए मुहब्बत।।
तुम हुस्न की महफ़िल में अदील आ तो गए हो।।
ऐसा ना हो दामन से लिपट जाए मुहब्बत।।

~इसरार अदील नूरपुरी
Leave a comment