ऐसा करना क्यों माना जाता है अशुभ?
जानें धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं
थाली में एक साथ क्यों नहीं परोसनी चाहिए 3 रोटी
भारतीय संस्कृति में भोजन के नियम केवल पोषण तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका गहरा संबंध धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक व्यवहार से भी है। इसी कड़ी में, थाली में एक साथ तीन रोटियां परोसने से जुड़ी एक पुरानी परंपरा है, जिसे कई घरों में आज भी निभाया जाता है। अक्सर बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि थाली में तीन रोटियां एक साथ नहीं रखनी चाहिए। लेकिन इसके पीछे की असली वजह क्या है? आइए जानते हैं।
धार्मिक और आध्यात्मिक कारण
भारतीय धर्म और संस्कृति में, तीन की संख्या को अक्सर अशुभ माना जाता है, खासकर जब यह भोजन से जुड़ी हो। कई धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, थाली में तीन रोटी रखना मृतक के भोजन के समान माना जाता है। तेरहवीं संस्कार के दौरान मृतक के लिए जो भोजन निकाला जाता है, उसमें कुछ जगहों पर तीन रोटियां रखने का रिवाज है। यही कारण है कि जीवित व्यक्ति के लिए तीन रोटी एक साथ परोसना अशुभ माना जाता है।
इसके अलावा, कुछ लोगों का मानना है कि तीन रोटियां परोसने से घर में नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है। इसका असर परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है, जिससे वे बीमार हो सकते हैं।
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण
धार्मिक मान्यताओं के अलावा, इस परंपरा के कुछ सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी बताए जाते हैं:
1. शत्रुता का भाव: कुछ मान्यताओं के अनुसार, एक थाली में तीन रोटियां खाने से व्यक्ति के मन में दूसरों के लिए शत्रुता का भाव उत्पन्न हो सकता है। यह भावना लड़ाई-झगड़े का कारण बन सकती है और आपसी रिश्तों में कड़वाहट ला सकती है।
2. आंकड़ों का महत्व: हिंदू धर्म में खाने-पीने की चीजों को अक्सर सम संख्या में देने और लेने का चलन है। तीन की विषम संख्या को इस संदर्भ में शुभ नहीं माना जाता है।
क्या कहता है विज्ञान?
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि थाली में तीन रोटियां न परोसने की ये सभी मान्यताएं धार्मिक आस्था और लोक परंपराओं पर आधारित हैं। इनका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार, भोजन की संख्या का व्यक्ति के स्वास्थ्य या मानसिक स्थिति पर कोई सीधा नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है।
अतः, यह एक ऐसी परंपरा है जो हमारी संस्कृति और आस्था से जुड़ी है। इसका गहरा संबंध हमारे रीति-रिवाजों और विश्वासों से है। यद्यपि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, फिर भी यह भारतीय घरों में एक महत्वपूर्ण परंपरा बनी हुई है। इसे मानना या न मानना पूरी तरह से व्यक्ति की अपनी सोच और विश्वास पर निर्भर करता है।
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