जज़्बात
सूई भी नहीं देते, धागा भी नहीं देते, तुरपाई का ज़ख्मों की नुस्खा भी नहीं देते।।
खामोश निकल जाते हैं, नाराज़ हैं वो शायद, हँसते भी नहीं, हम पर ताना भी नहीं देते।।

जिस बाप की दौलत पर ये शान से जीते हैं, उस बाप को नालायक़ खाना भी नहीं देते।।
बहनों से मुहब्बत का क्या खूब दिखावा है, बहनों को विरासत में हिस्सा भी नहीं देते।।
औलाद की नज़रों में हम पेड़ हैं अब ऐसे, जो फल भी नहीं देते, साया भी नहीं देते।।
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