
लखनऊ (शैली सक्सेना)। भाई-बहन के प्यार का प्रतीक पर्व भाई दूज प्रदेश भर में अगाध श्रद्धा व उत्साह के साथ मनाया गया। बहनों ने भाई के माथे पर तिलक लगा उनके मंगल जीवन के साथ सुख-समृद्धि की कामना की। पर्व पर छोटों ने बड़ों से आशीर्वाद लिया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। बहनों ने मुहूर्त के अनुसार पूजा-अर्चना की। भाईयों ने भी बहनों को परम्परागत रूप से उपहार प्रदान किये और उनकी रक्षा का वचन दिया। दूर-दूर से लोग रिश्तेदारियाँ निबाहने आये।

पाँच दिवसीय दीपोत्सव आज शनिवार को भाईदूज के साथ सम्पन्न हो गया। भाई दूज का पर्व धूमधाम से मनाया गया। सुबह से ही बहनें अपने भाइयों के टीका करने को लालायित नजर आईं। घर की बुजुर्ग महिलाओं द्वारा घर के दरवाजे पर दूजों की स्थापना की गई। पूजन सामग्री तैयार करने के बाद दूजों की परम्परागत विधि से पूजन-अर्चन की। इसके बाद बहनों ने अपने-अपने भाइयों को तिलक लगाकर आरती उतारकर उनकी लम्बी आयु और सुख-समृद्धि की कामना की। भाइयों ने भी अपनी बहनों को इसी प्रकार स्नेह बनाए रखने की कामना की। वहीं दुकानदारों ने अपनी-अपनी दुकान की पूजन-अर्चना कर कारोबार की शुरूआत की।
जेल पर भी रही भीड़- इस अवसर पर प्रदेश के सभी कारागार में भी बड़े पैमाने पर बहनों की भीड़ देखी गई। कारागार में निरुद्ध बन्दियों को उनकी बहनों ने पहुँचकर उनकी लम्बी आयु की कामना के साथ टीका लगाकर और मिठाई खिलाकर शुभकामनाएं दीं।
बस स्टैण्ड व रेलवे स्टेशन पर बढ़ी आवाजाही– सुबह से ही निजी व रोडवेज बस स्टैण्ड के अलावा रेलवे स्टेशनों पर भाई-बहनों की खासी भीड़ नजर आई। कहीं बहनें भाइयों के यहां जाने की जल्दी में दिखीं तो कहीं भाई अपने बहन के घर टीका कराने के लिए जाते दिखे। सुबह से लेकर शाम तक भाई दूज का सिलसिला चलता रहा। इस प्रकार पूरे प्रदेश में दीपों के त्योहार दीपावली का पूरी श्रद्धा व उमंग के साथ आयोजन सम्पन्न हुआ।
वर्ष में दो बार भाई दूज- भारतीय परंपरानुसार वर्ष में दो बार भाई दूज आती हैं, पहली दीवाली पर गोवर्धन पूजा के अगले दिन और दूसरी होली के बाद आने वाली द्वितीया को। दीवाली की भाई दूज को भाई की पूजा और उसका तिलक कर भाई के लंबे जीवन की कामना की जाती है, वहीं होली के बाद आने वाली भाई दूज पर भाई का तिलक कर भाई पर आने वाले सभी संकटों को टालने की प्रार्थना की जाती है।

भाई दूज मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। उनमें से एक देवी यमुना या यामी और उनके भाई यमराज के बीच की कथा है।
क्यों मनाते हैं भाई दूज –
भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना (यामी) का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करो। अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालते रहे। कार्तिक शुक्ल पक्ष का दिन आया। यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया। यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया। यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया।
भगवान यम ने दिया था यामी को वरदान– यमुना द्वारा किए गए आथित्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने को कहा। यमुना ने कहा कि भद्र! आप प्रति वर्ष इसी दिन मेरे घर आया करो। मेरी तरह जो बहन इस दिन अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करें, उसे तुम्हारा भय न रहे। यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह की। इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि जो आथित्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता। इसीलिए भैयादूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।
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