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01 जून को नेशनल जनमत न्यूज चैनल और मासिक पत्रिका मिशन जनमत के प्रधान संपादक नीरज भाई पटेल का जन्म दिन था। वैसे तो इस युवा पत्रकार के प्रशंसकों की जमात समूचे उत्तर भारत में फैली हुई है जिससे उनको जगह-जगह से बधाइंया मिली लेकिन उनके गृह जनपद उरई में स्वाभाविक रूप से उत्साह कुछ अधिक ही रहा। इसके दो दिन पहले 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया गया। इस दिन पत्रकारों की दशा और दिशा को लेकर कई जगह व्यापक चर्चायें हुई। नीरज पटेल का संदर्भ जुड़ने से ये चर्चायें नये आयामों को छूने लगती हैं। चिंतन के वे आयाम जो समकालीन परिस्थितियों में बहुत जरूरी हैं।
नीरज पटेल की पत्रकारिता अतीत की पत्रकारिता की याद दिला देती है। आधुनिक पत्रकारिता के उदय काल में इस विधा का मुख्य उद्देश्य जनमत का निर्माण करना था जिसकी वजह से पत्रकारिता में सूचनाओं के व्यापार के स्थान पर विचारों को प्रसारित करने पर बल रहता था। स्वाधीनता की लड़ाई के महानायक गांधी जी की पत्रकारिता को इस संदर्भ में स्मरण किया जाना प्रासंगिक है। उन्होंने जब यंग इंडिया के संपादन का दायित्व स्वीकार किया उस समय इस द्विसाप्ताहिक समाचार पत्र की प्रसार संख्या मात्र 1200 थी लेकिन तीन वर्षो में ही इसका प्रसार 40 हजार की संख्या पर पहुंच गया था। इसलिए नहीं कि गांधी जी ने उसमें खबरों की संख्या बढ़ा दी हो या आज की पत्रकारिता की तरह प्रसार और टीआरपी बढ़ाने के बाजारू हथकंडे इस्तेमाल किये हों बल्कि लोग गांधी जी के विचारों से प्रेरणा ग्रहण करते थे और गांधी जी के उस समय की हर घटना परिघटना पर विचारों को जानने की ललक लोगों को यंग इंडिया की ओर तेजी से खींचने में कामयाब हुई। जब यंग इंडिया में लिखे उनके विचारों से नाराज होकर अंग्रेजों ने उन पर देश द्रोह का अभियोग लगाकर उन्हें कारावासित करा दिया तो कुछ ही दिनों में यंग इंडिया का प्रसार घटकर मात्र 08 हजार रह गया क्योंकि उसमें लोगों को अब गांधी जी के विचार पढ़ने का अवसर उपलब्ध नहीं रह गया था।
आजादी के बाद भी अखबार मूल रूप से विचारों के लिए ही पढ़े जाते थे। मैने अपने किशोर जीवन में दैनिक वीर अर्जुन में उसके प्रधान संपादक के0 नरेन्द्र के संपादकीय पढ़ने के लिए उस समय के प्रौढ़ों और बुजुर्गो में दीवानगी का आलम देखा था। के0 नरेन्द्र का लेखन हिन्दूवादी था और कांग्रेस का जमाना होते हुए भी एक खासा वर्ग ऐसे विचारों से प्रभावित रहता था जिसकी भीड़ सार्वजनिक पुस्तकालय के खुलने पर वीर अर्जुन पर उसमें प्रकाशित अग्र लेखों को पढ़ने के लिए टूट सी पड़ती थी। बैनेट कोलमैन एंड कंपनी की राजनीतिक पत्रिका दिनमान पर सोशलिस्टों का कब्जा रहता था और वे अपने एंगल से राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर वैचारिक प्रस्तुतियां पत्रिका में सजाते थे। इस पत्रिका की भी बहुत डिमांड थी साथ-साथ में बहुत प्रतिष्ठा भी। हर कुलीन घर में चाहे उसके लोग दिनमान पढ़ें या न पढ़ें पर अपने बैठके में रखने के लिए दिनमान मंगाते जरूर थे। ड्राइंग रूम में दिनमान का होना स्टेट्स सिम्बल का पर्याय था। बाद में बैनेट कोलमैन एंड कंपनी के मालिकों की नई पीढ़ी ने दिनमान को बंद करने का फरमान यह कहते हुए जारी कर दिया था कि इसमें गरीबों और नंगे भूखों की चर्चायें छपती हैं जो बाजार में कोई अहमियत नहीं रखते इस कारण उनके बीच प्रसार के आधार पर दिनमान के लिए हमें कभी विज्ञापन नहीं मिलेगें और घाटे वाले प्रकाशन हमको मंजूर नहीं हैं। बाद में लेआउट के महारथी बनकर पत्रकारिता जगत में स्थापित हुए घनश्याम पंकज ने दिनमान को फायदे में चलाने का मोर्चा संभाला और उसके वैचारिक तत्व को समाप्त कर उसे बाजारू सांचे में ढ़ाल डाला। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद वे दिनमान में कोई करिश्मा नहीं कर पाये।
जहां तक मीडिया के वर्तमान के ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन बटोरने के प्रयोजन की बात है गांधी जी तो इसके बहुत खिलाफ थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रहने के अपने समय में ही इडियन ओपिनियन नाम के अखबार का संपादन किया था और इस दौरान यह संकल्प ले लिया था कि वे अपने अखबार के एक इंच स्पेस को भी विज्ञापन के लिए जाया नहीं होने देंगे। भारत आने के बाद उन्होंने यंग इंडिया, नवजीवन और हरिजन अखबारों में भी इस व्रत का पालन किया। उनके प्रभाव के कारण आजादी के बाद भी कई दशकों तक पत्र-पत्रिकाओं को लेकर अलग तरह की स्थिति बनी रही। कुलीन सेठों का रूझान पत्र-पत्रिकायें निकालने की ओर हुआ तो उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि भले ही उनमें घाटा हो जिसकी पूर्ति उनके अन्य धंधों से की जाये पर उनके प्रकाशनों की समाज में गरिमापूर्ण वैचारिक प्रतिष्ठा रहे। टाइम्स आफ इंडिया के मालिकान साहू शांति प्रसाद जैन अपने प्रकाशनों में इसी ख्याल का निर्वाह करते थे इसलिए उनके प्रकाशनों के संपादक साहित्य, संस्कृति और राजनीतिक विज्ञान की असाधारण हस्तियों में से चयनित किये जाते थे जिनके काम में खुद साहू शांति प्रसाद जैन भी दखल नहीं कर पाते थे पर उन्हें इसमें कोई हेठी महसूस नहीं होती थी।
पर जब मीडिया उद्योग बनने की ओर अग्रसर हुई तो पत्रकारिता के सरोकार बदल गये। जिन दिग्गज लिक्खाड़ों को यह गुमान था कि अखबार या न्यूज चैनल उनकी वजह से चलते हैं और अगर उन्होंने छोड़ दिया तो गांधी जी के हट जाने की तरह वे जिस प्रतिष्ठान में काम करते हैं वह भी औंधे मुंह जा गिरेगा उन सभी को मीडिया जगत से आज आउट किया जा चुका है। पुण्य प्रसून वाजपेयी के हटने के बाद आज तक न्यूज चैनल टीआरपी में पिछड़ने की बजाय आगे बढ़ा है। प्रिंट मीडिया का भी यही आलम है। किसी अखबार को चलाने के लिए अब दिग्गज संपादक की कोई जरूरत नहीं रह गई है।
लेकिन अब बात यही आती है कि क्या पत्रकारिता का उद्देश्य वास्तव में बदला जाना संभव है। अखबार और न्यूज चैनल सिर्फ विज्ञापनों के संवाहक हैं जिसके लिए पत्रकारिता में हर तरह का समझौता जायज है। इसी दृष्टि के चलते आज यह मांग भी उठने लगी है कि न्यूज चैनलों का दर्जा बदल कर उन्हें मनोरंजन चैनल के रूप में पंजीकृत किया जाना चाहिए। आज पाठको और दर्शकों की तादात कई गुना बढ़ चुकी है लेकिन क्या मीडिया रचनात्मक जनमत के निर्माण में कोई सक्षम भूमिका निर्वाह कर पा रहा है। इसी बिन्दु से आगे के विमर्श की राह खुलती है। मीडिया को व्यापारिक उद्यम की तरह चलाने की प्रवृत्ति ने पत्रकारिता के स्वरूप को ही बदल डाला है। अखबारों में हर जिले के लिए चार पेज एलाट किये जाते तो इसलिए नहीं कि उनमें लोगों को अपने क्षेत्र की सार्थक सूचनायें ज्यादा से ज्यादा परिमाण में दी जा सकें बल्कि सूचनाओं के नाम पर पीआरशिप को बढ़ावा दिया जा रहा है। कोई कार्यक्रम होता है तो रिपोर्टर काम के लोड के कारण उसकी सही रिपोर्टिंग के लिए पूरा समय नहीं दे सकता। वह फोटो खींचता है और चल देता है। इसके बाद आयोजक एक विज्ञप्ति बनाकर उसके पास भिजवा देते हैं कि कार्यक्रम में अमुक-अमुक ने प्रतिभाग किया। रिपोर्टर मुख्य अतिथि के संबोधन की पंक्तियां अपने मन से लिखकर और प्रतिभागियों की लिस्ट टांचकर फोटो के साथ हैडिंग और क्रासर का इस्तेमाल करके चार कालम की खबर साया कर देता है। अगर कोई अकादमिक आयोजन हुआ तो उसे भी यही ट्रीटमेंट मिलेगा और राजनैतिक हुआ तो उसे भी। ऐसी खबरों की क्या सार्थकता हो सकती है। सूचनाओं की अधिकता व्यापार बढ़ाने में सहायक होती है इसलिए अंधाधुंध सूचनायें बढ़ा दी गई हैं जबकि विचार और विश्लेषण के लिए स्पेस सिकोड़ दिया गया है। न्यूज चैनलों में भी यही हाल है। न्यूज चैनलों और अखबारों के मुकाबले प्रमुख पत्रकारों, विचारकों द्वारा संचालित पोर्टलों के दर्शकों का बढ़ना यह बताता है कि संक्रमण कालीन अलबेली, अटपटी पत्रकारिता से लोग ऊबने लगे हैं।
नीरज पटेल की पत्रकारिता विचारों की पत्रकारिता के पुनर्जीवन का आभास कराने वाली है। सामाजिक उपनिवेशवाद के पुनरूत्थान के इस दौर के खतरों को समय रहते भांपने की जरूरत है वरना यह देश फिर उसी कगार पर पहुंच जायेगा जहां इसने दासता की कई सदियों को भोगा है। सामाजिक अन्याय के सोच पर उनका चैनल और पत्रिका जबरदस्त प्रहार कर रहे हैं जिससे वंचितों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आने की प्रेरणा मिल रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि नीरज की पत्रकारिता में प्रतिशोध और प्रतिक्रिया का कोई पुट नहीं है जबकि सामाजिक न्याय की वैचारिकी में इस तरह के जोखिम की बहुतायत होती है। इसीलिए वे डा0 लोहिया से लेकर वीपी सिंह तक को नवाजने से नहीं चूकते जो भले ही उस वर्ग से आये हों जो सामाजिक अन्याय के लिए जिम्मेदार रहा है पर उन्होंने व्यवस्था और समाज को मानवीय बनाने में योगदान दिया। नीरज पटेल कहते हैं कि वंचितों को ऐसे महापुरूषों के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करने में संकोच नहीं करना चाहिए। वे वंचितों के बीच के विभीषणों की शिनाख्त में भी पूरी तरह निर्मम रहते हैं जो एक पत्रकार की बेबाकी के अनुरूप है। युवा होते हुए भी उनकी परिपक्वता बेमिसाल है। सामाजिक परिवर्तन के कई अभियान गिरोहबंदी की भावना की तार्किक परिणति पर पहुंचने के पहले ही बलि चढ़ा दिये गये। मधु लिमये इसका उदाहरण है जिनके त्याग पर संदेह नहीं किया जा सकता पर उन्हें मालूम था कि मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद लोहियावाद की अग्रसरता किस ओर होना चाहिए फिर भी शायद उनकी वर्ग चेतना जाग गई या अन्य कारणों से वे गिरोहबाजी निभाने के लिए अभिशप्त हो गये। उन्हांेने लोहियावाद का बाना पहन रखा फिर भी उन्हें मुलायम सिंह की वंशवादी, परिवारवादी और डाला सीमेंट फैक्ट्री के मजदूरों पर गोली चलवाने की राजनीति का समर्थन करने में कोई धर्म संकट महसूस नहीं हुआ क्योंकि उन्हें बाहर से आये वीपी सिंह को सामाजिक न्याय की राजनीति को तार्किक परिणति पर पहुंचाने का श्रेय मिलना गवारा नहीं था। पौराणिक युग के उन तपस्यियों और ऋषियों को याद किया जाना चाहिए जिन्होंने त्यागपूर्ण जीवन इसलिए जिया ताकि सामाजिक उपनिवेशवाद को नैतिक प्रतिष्ठा दिलवाने के लिए अपना उपयोग करा सकें। हर शातिर षणयंत्र में ऐसे अवयव जुड़कर महत्वपूर्ण योगदान करते रहे हैं। बहरहाल नीरज पटेल किसी ऐसी गिरोहबंदी की जकड़ में नहीं हैं इसलिए दोहरे चेहरे वाले अपने भी उनके तीरों से बेहाल रहते हैं। जन्म दिन पर मेरी ओर से भी उन्हें बधाई और उनकी पत्रकारिता के फलदायी होने की शुभकामनाएं।

-केपी सिंह (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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