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दो साल से बरसात में बह जाती है एप्रोच रोड। महीनों बंद रहता है आवागमन।

बिजनौर। आजादी के बाद से दो साल पहले एक अदद पुल मिला भी तो ऐसा कि लगातार बारिश में एप्रोच रोड कट जाने से महीनों यातायात बंद हो जाता है।
बिजनौर और उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के लोगों को दिल्ली के लिए गजरौला, बृजघाट, गढ़मुक्तेश्वर घूमकर जाना होता था। हरिद्वार में चंडीघाट पर पुल से बृजघाट की दूरी तकरीबन पौने दो सौ किलोमीटर की थी। इसलिए आजादी के बाद से ही गंगा पर एक पुल की मांग उठने लगी। 1970 के दशक के अंत में बिजनौर जिले में एक बैराज की मांग स्वीकृत हुई। विदुरकुटी पर इस बैराज का शिलान्यास भी हुआ लेकिन, 1980 के दशक में बैराज बिजनौर में बना। इसके चलते मेरठ, दिल्ली, मुजफ्फरनगर आदि की दूरी कम हो गई। बालावाली में रेलवे के पुराने पुल पर सड़क यातायात भी खोला गया। एक नया पुल भी बन गया।
वायदे करते रहे नेता:
बिजनौर में बैराज बन जाने के बाद भी चांदपुर क्षेत्र को इसका कुछ खास फायदा नहीं पहुंचा। लिहाजा वहां पुल की मांग लगातार उठती रही। हर आम या विधानसभा चुनाव में नेताओं ने चांदपुर और हस्तिनापुर के बीच गंगा पर पुल देने का वायदा किया। लेकिन, पुल नहीं मिला। गंगा आर-पार की जनता लगातार ठगा महसूस करती रही। 2007 में प्रदेश में बसपा सरकार बनी। तब उसने दशकों से चलती आ रही इस मांग की सुध ली। तत्कालीन सीएम मायावती ने पुल का शिलान्यास किया। 2012 तक पुल के पिलर बनकर तैयार हो गए थे।
राजनीति का शिकार हुआ पुल:
2012 में बसपा प्रदेश की सत्ता से बाहर हो गई। सपा सरकार में साढ़े चार साल तक गंगा की धार में पिलर खड़े रहे। पुल को बसपा की योजना बताकर सपा शासनकाल में इसके लिए धनराशि अवमुक्त नहीं हुई। प्रोजेक्ट कॉस्ट बढ़ने पर रीटेंडरिंग का मामला सपा शासनकाल के अंतिम वर्ष में उठा।

जब काम हुआ तब भी…
2017 में भाजपा की सरकार आने पर चांदपुर और हस्तिनापुर की जनता को पुल का सपना साकार होने की उम्मीद जगी। काम भी शुरू हुआ। 2021 के अप्रैल-मई में कामचलाऊ एप्रोच रोड भी बनकर तैयार हो गई। लेकिन, पहली ही बरसात में एप्रोच रोड हस्तिनापुर की ओर वेटलैंड में जमा पानी का दवाब नहीं झेल पाई। बुरी तरह से क्षतिग्रस्त होने के साथ ही कई जगह से पूरी तरह बह गई। महीनों यातायात बंद रखना पड़ा। बाद में मिट्टी भरकर जैसे-तैसे आवागमन शुरू कराया गया। उम्मीद थी कि 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पुल का लोकार्पण किया जाएगा, जो नहीं हो सका। चुनाव बीतने के बाद एप्रोच रोड को गुणवत्ता के साथ सही कर लोकार्पण की उम्मीद जगी। लेकिन, सावन महीने में कांवड़ियों के चलते ट्रैफिक डायवर्जन किया गया। तब रोडवेज बसों को इस पुल से निकाला गया। पुल से एकदम सटी एप्रोच रोड क्षतिग्रस्त होकर 10 से 12 फीट गहरी धंस गई। लोगों ने बताया कि बस के निकलते ही एप्रोच रोड धंसी। अगर बस के साथ धंस जाती तो उसी समय बड़ा हादसा हो सकता था।

बिना अनुमति चल केसे रही थी नाव?

बिजनौर। गंगा पर बने पुल की एप्रोच रोड बारिश में बहने के बाद आवागमन के लिए लोगों को नाव का सहारा लेना पड़ता है। नाव चलाने की अनुमति कैसे मिली। नावों के लिए कोई मानक क्यूं नहीं निर्धारित किए गए। बिना अनुमति के चल रही नावों पर कार्रवाई क्यूं नहीं हुई। ऐसे कई सवाल है जो अनुत्तरित है।

रोजी-रोटी की तलाश में गंगा पारकर सैकड़ों हजारों लोगों का आवागमन होता है। बिजनौर के जलीलपुर ब्लॉक में तैनात कई अध्यापक मेरठ में और मेरठ के हस्तिनापुर ब्लॉक में तैनात कई अध्यापक चांदपुर में रहते हैं। पुल की एप्रोच रोड बहने के बाद यह लोग नाव का सहारा लेने को मजबूर थे।मंगलवार को हुए हादसे के बाद बिना अनुमति के नाव संचालन पर कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है। पुलिस ने एक-दो बार नावों का संचालन बंद भी कराया लेकिन उसके बाद फिर से संचालन हो रहा था। कहना अब भी यही है कि कार्रवाई होगी।

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