newsdaily24

update रहें…हर दम, हर पल

न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता

ज्वलंत मुद्दा: लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों का हनन

Author: Bhupendra Nirankari
Editor: Sanjay Saxena

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में कुछ लोगों का मानना है कि वर्तमान परिदृश्य में लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है और उनकी आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के बावजूद, लोग अपनी बात कहने में संकोच कर रहे हैं।
इस स्थिति पर लेखक ने न्यायपालिका से हस्तक्षेप की अपील की है। उनका मानना है कि न्यायपालिका, जिस पर लोगों की पूर्ण आस्था और निष्ठा है, को इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। उनका तर्क है कि एक मजबूत लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि हर नागरिक को अपनी बात कहने का संवैधानिक अधिकार मिले और उसका ठीक से पालन हो। इस तरह के दुरुपयोग को रोकना न्यायिक प्रणाली के लिए एक गंभीर चुनौती है।

दरअसल, यह एक महत्त्वपूर्ण और वर्तमान भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के बावजूद लोगों में अपनी बात कहने में संकोच और मौलिक अधिकारों के हनन की आशंका एक मजबूत लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। न्यायपालिका से हस्तक्षेप की अपील बिल्कुल जायज है, क्योंकि उसे ही संविधान का संरक्षक माना जाता है।

Bhupendra Nirankari

मौलिक अधिकार और संवैधानिक प्रावधान

भारत का संविधान नागरिकों को कई मौलिक अधिकार प्रदान करता है, जिनका उल्लंघन होने पर वे सीधे उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) या उच्च न्यायालय (High Court) जा सकते हैं।

~ वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19(1)(a)): यह अनुच्छेद प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण और बिना किसी डर के अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है। यदि लोगों को लगता है कि उनकी आवाज दबाई जा रही है या वे बोलने में संकोच कर रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर इस मूलभूत अधिकार का हनन है।
~ संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Article 32): यह मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रावधान है। इसके तहत कोई भी नागरिक मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में सीधे उच्चतम न्यायालय जा सकता है, जो ‘रिट’ (जैसे बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, उत्प्रेषण आदि) जारी कर सकता है। उच्च न्यायालय भी अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी कर सकते हैं। यह प्रावधान ही न्यायपालिका को ‘मौलिक अधिकारों का संरक्षक’ बनाता है।
~ कानून के समक्ष समानता (Article 14) और जीवन का अधिकार (Article 21): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन, किसी नागरिक की गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार (Article 21) पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

न्यायपालिका की भूमिका और चुनौतियाँ

न्यायपालिका ने अतीत में मौलिक अधिकारों की रक्षा में एक सक्रिय और ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में इसकी भूमिका पर विशेष ध्यान आवश्यक है:
~ न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) की शक्ति: न्यायपालिका के पास यह शक्ति है कि वह विधायिका या कार्यपालिका द्वारा बनाए गए ऐसे किसी भी कानून या आदेश को अवैध घोषित कर सकती है जो संविधान और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो (अनुच्छेद 13)। मौलिक अधिकारों के हनन को रोकने के लिए यह शक्ति न्यायपालिका के लिए एक शक्तिशाली उपकरण है।
~ जनहित याचिका (PIL): न्यायपालिका ने जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) की अवधारणा विकसित करके न्याय तक पहुंच को आसान बनाया है। इसके माध्यम से, कोई भी व्यक्ति या संस्था ऐसे लोगों की ओर से न्याय की मांग कर सकता है जिनके मौलिक अधिकार खतरे में हैं, जो स्वयं न्यायालय तक नहीं पहुँच सकते।
~ बढ़ते न्यायिक सक्रियतावाद (Judicial Activism) का महत्व: ऐसे मामलों में, न्यायपालिका से सक्रिय भूमिका निभाने की अपेक्षा की जाती है। उच्चतम न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना न्यायाधीशों का कर्तव्य है, भले ही की गई टिप्पणियां सत्ता में बैठे लोगों को अप्रिय लगें।
~ चुनौतियाँ: मौलिक अधिकारों के दुरुपयोग को रोकना न्यायिक प्रणाली के लिए एक गंभीर चुनौती है क्योंकि न्यायपालिका को एक ओर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी है, तो दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, मानहानि और शिष्टाचार जैसे उचित प्रतिबंधों (reasonable restrictions) को भी ध्यान में रखना होता है, जैसा कि अनुच्छेद 19(2) में वर्णित है। हाल के फैसलों में, न्यायालय ने भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार (Article 21) के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है, ताकि समाज में नफरत या विघटन न फैले।

कुल मिलाकर एक मजबूत लोकतंत्र के लिए, यह आवश्यक है कि नागरिक बिना किसी भय के अपनी सरकार की आलोचना कर सकें। यदि नागरिक चुप हो जाते हैं या अपनी आवाज़ दबाते हैं, तो जवाबदेही (Accountability) और पारदर्शिता (Transparency) जैसे लोकतांत्रिक स्तंभ कमजोर हो जाते हैं। इसलिए, यह न्यायपालिका का दायित्व है कि वह एक ‘निष्पक्ष’ संस्था के रूप में कार्य करते हुए, लोगों की पूर्ण आस्था और निष्ठा को कायम रखे और संविधान द्वारा सुनिश्चित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करे। (लेख में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी का प्रयोग किया गया है)

Posted in , , , , ,

Leave a comment