हिंदू धर्म के महाकाव्य ‘रामायण’ के रचयिता
डाकू रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि तक का सफर
~ भूपेंद्र निरंकारी
महर्षि वाल्मीकि भारतीय इतिहास और साहित्य की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक हस्ती हैं। उन्हें हिंदू धर्म के महाकाव्य ‘रामायण’ का रचयिता माना जाता है।
वाल्मीकि जयंती के अवसर पर देश के कई हिस्सों में भव्य शोभायात्राएं, भजन-कीर्तन, रामायण पाठ और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने देशवासियों को महर्षि वाल्मीकि जयंती की शुभकामनाएं दी हैं।
महर्षि वाल्मीकि को संस्कृत साहित्य का ‘आदिकवि’ (प्रथम कवि) कहा जाता है, क्योंकि रामायण को संस्कृत का प्रथम महाकाव्य (आदिकाव्य) माना जाता है। उन्होंने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना की, जिसमें भगवान राम के जीवन, आदर्शों और धर्मपरायणता का वर्णन है। यह ग्रंथ प्रेम, त्याग, कर्तव्य और सत्य की शिक्षा देता है। किंवदंतियों के अनुसार, जब वे कठोर तपस्या में लीन थे, तो उनके शरीर पर दीमकों ने बांबी (मिट्टी का टीला) बना ली थी। ‘वाल्मीकि’ शब्द का अर्थ है ‘बांबी से उत्पन्न’, इसलिए उनका नाम वाल्मीकि पड़ा। इसके अलावा उन्हें प्राचेतस् भी कहा जाता है, क्योंकि कुछ ग्रंथों में उन्हें वरुण (प्रचेत) का पुत्र बताया गया है।

डाकू रत्नाकर से महर्षि वाल्मीकि तक का सफर
महर्षि वाल्मीकि का जीवन एक महान परिवर्तन की कहानी है, जो उन्हें और भी प्रेरणादायक बनाती है। मान्यताओं के अनुसार, उनका प्रारंभिक नाम रत्नाकर था और वह एक कुख्यात डाकू थे। वह लोगों को लूटकर और मारकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। एक दिन उनकी मुलाकात देवर्षि नारद या सप्त ऋषियों से हुई। नारद मुनि ने उनसे पूछा कि वह जो पाप कर रहे हैं, क्या उनके परिवार के सदस्य उस पाप के भागीदार बनेंगे? रत्नाकर ने जब अपने परिवार से पूछा, तो सभी ने पाप का भागीदार बनने से इनकार कर दिया। इस बात से उन्हें गहरा सदमा लगा और उन्हें अपने कर्मों का बोध हुआ। इसी क्षण उनका हृदय परिवर्तन हुआ।
कठोर तपस्या: नारद मुनि के निर्देश पर, रत्नाकर ने ‘राम’ नाम का जाप शुरू किया। चूंकि वह ‘राम’ शब्द ठीक से नहीं बोल पाते थे, इसलिए उन्होंने ‘मरा-मरा’ जपना शुरू किया, जो लगातार जपने पर ‘राम-राम’ बन गया। उन्होंने वर्षों तक कठोर तपस्या की और इसी दौरान उनके शरीर पर दीमकों की बांबी बन गई।
महर्षि की पदवी: अपनी तपस्या पूरी करने के बाद वह बांबी से बाहर निकले और उन्हें महर्षि वाल्मीकि के रूप में जाना जाने लगा।

रामायण में योगदान
प्रथम श्लोक: कथाओं के अनुसार, एक बार महर्षि ने क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को शिकारी द्वारा मारे जाते हुए देखा। इस दुख से उनके मुख से स्वतः ही संस्कृत का पहला श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठां…) निकल गया। ब्रह्मा जी ने प्रकट होकर उन्हें श्रीराम के चरित्र पर महाकाव्य रचने की प्रेरणा दी।
लव-कुश के गुरु: वनवास के दौरान माता सीता ने उन्हीं के आश्रम में शरण ली थी, जहाँ उन्होंने भगवान राम के पुत्रों लव और कुश का पालन-पोषण किया और उन्हें रामायण का ज्ञान दिया।
महर्षि वाल्मीकि का जीवन हमें यह सिखाता है कि व्यक्ति का अतीत चाहे जैसा भी रहा हो, तपस्या, ज्ञान और सही मार्गदर्शन से वह एक महान और पूजनीय आत्मा बन सकता है।
वाल्मीकि जयंती (प्रगट दिवस) 2025:
इस वर्ष महर्षि वाल्मीकि जयंती 7 अक्टूबर, मंगलवार को मनाई जा रही है। यह पर्व पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।
सार्वजनिक अवकाश: उत्तर प्रदेश (UP): योगी सरकार ने महर्षि वाल्मीकि जयंती (7 अक्टूबर) पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। पहले यह निबंधित अवकाश (Restricted Holiday) की श्रेणी में था। दिल्ली सरकार ने भी 7 अक्टूबर को महर्षि वाल्मीकि जयंती के उपलक्ष्य में सभी सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और कॉलेजों में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है।
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