छत्तीसगढ़ की विश्व प्रसिद्ध अनूठी परंपरा
दशहरा से शुरू हो कर 75 दिन तक चलता है महापर्व
देवी-देवताओं को विदाई तक चलता है राशन वितरण
तहसील कार्यालय में लागू है विशेष व्यवस्था
जहां, राशन की कतार में लगते हैं देवी-देवता
बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर (Bastar) में मनाया जाने वाला विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व अपनी अनूठी और ऐतिहासिक परंपराओं के कारण दुनिया भर में जाना जाता है. यह पर्व किसी अन्य दशहरा उत्सव जैसा नहीं है, बल्कि यह पूरे 75 दिनों तक चलता है, जो इसे भारत का सबसे लंबा त्योहार बनाता है. इस पर्व की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें रावण दहन नहीं होता है, बल्कि यह देवी दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना को समर्पित है.

साभार: https://nz.vayambharat.com/Lnk/SRWR202510101437373022347084
अनोखी रस्म और सहभागिता
पर्व में शामिल होने आए देवी-देवताओं को राशन की लाइन में लगना होता है. पूरे संभाग के गांव-गांव से 700 से अधिक देवी-देवता (और कई बार 800 से 1700 तक) इस महापर्व में शामिल होने के लिए पहुंचते हैं.

राशन वितरण की अनोखी परंपरा
संभाग भर के गांव-गांव से जो देवी-देवता दशहरा पर्व में शामिल होने पहुंचते हैं, उनके पुजारियों को लाइन में लगकर राशन और पूजा का सामान लेना होता है. बस्तरवासी इस परंपरा को सालों से निभाते आ रहे हैं.
तहसील कार्यालय से व्यवस्था: यह राशन और पूजा सामग्री तहसील कार्यालय से उपलब्ध कराई जाती है, जिसकी व्यवस्था दशहरा समिति (जिसके अध्यक्ष सांसद और सचिव तहसीलदार होते हैं) द्वारा की जाती है.

चिह्नों की एंट्री: राशन पाने के लिए पुजारियों को अपने साथ लाए गए देवी-देवताओं के चिह्न (जैसे मंदिर का छत्र, तोड़ी और टंगिया) की प्रशासनिक अधिकारी के पास एंट्री करवानी होती है.
मिलने वाला सामान: इस पूजा के सामान में 2 किलो चावल, दाल, तेल, घी, नमक, नारियल समेत अन्य जरूरत के सामान दिए जाते हैं.

राशन वितरण की अवधि
यह अनोखा राशन वितरण एक दिन का नहीं होता, बल्कि यह तब तक चलता है जब तक पर्व में शामिल होने आए देवी-देवताओं की विदाई नहीं हो जाती. वितरण प्रक्रिया दशहरा पर्व की मुख्य रस्मों के दौरान शुरू हो जाती है. पुजारियों को दशहरा पर्व के दिनों में और उसके बाद रवाना होने तक राशन दिया जाता है. यानी, यह वितरण प्रक्रिया देवी-देवताओं को दी जाने वाली विदाई रस्म (‘डोली विदाई’) तक जारी रहती है.

आज के दौर में परंपरा का महत्व
ग्रामीण पुजारी अपने गांव के कुल देवी-देवताओं की छत्र, तोड़ी और अन्य चिन्हों को लेकर लाइन में खड़े होते हैं. इन्हीं चिह्नों के आधार पर एंट्री की जाती है, और यही कहा जाता है कि देवी-देवता भी लाइन में लगकर सामान ले रहे हैं.

लोक आस्था और जीवंत संस्कृति:
इस प्रक्रिया में देवी-देवताओं को पूजा के सामान के लिए लाइन लगाकर खड़े देख हर कोई हैरान हो जाता है. तहसील कार्यालय में पूजा सामान और राशन बांटने का काम पटवारी और अन्य कर्मचारी करते हैं, पटवारी सत्यनारायण सेठिया ने बताया कि हर साल इसी तरह लाइन से ही पूजा का सामान दिया जाता है जिससे देवी देवता लेकर पहुंचे पुजारियों को दिक्कतों का सामना न करना पड़े. देवी देवताओं को पूजा के सामान के लिए लाइन लगाकर खड़े देख हर कोई हैरान हो जाता है. आज के दौर में भी इस परंपरा को यहां के लोग जिंदा रखे हुए हैं, यह अपने आप में हैरान कर देने वाली बात है. कुल मिलाकर आज के दौर में भी इस सालों पुरानी परंपरा को यहां के लोग जीवित रखे हुए हैं, यह बस्तर की आस्था, संस्कृति और प्रशासनिक व्यवस्था का एक अनूठा उदाहरण है.
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