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प्रकृति और मनुष्य: एक टूटता रिश्ता, विरासत में क्या देंगे हम?

विकास की अंधी दौड़ और प्रकृति का क्रंदन

~ ममता मेहंदीरत्ता की स्वरचित कविताएँ

आज का मनुष्य खुद को ब्रह्मांड का सबसे श्रेष्ठ प्राणी मानता है। श्रेष्ठता का यह अहंकार उसे यह अधिकार तो देता है कि वह जिए, लेकिन क्या यह उसे दूसरों के अस्तित्व को मिटाने का लाइसेंस भी देता है? ममता मेहंदीरत्ता जी की हालिया कविताएँ इसी चुभते हुए सवाल के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं।

विकास या विनाश?

कविता का एक हिस्सा हमें आईना दिखाता है—जब हम नदियों के प्राकृतिक मार्ग को रोककर वहाँ कंक्रीट के जंगल खड़े करते हैं, तो हम उसे ‘विकास’ का नाम देते हैं। परंतु, जब वही नदियाँ अपना स्थान वापस लेने आती हैं, तो हम उसे ‘प्रलय’ या ‘विनाश’ कहकर प्रकृति को दोष देते हैं। यह हमारी सोच का दोहरापन है। प्रकृति कभी विनाश नहीं करती, वह केवल अपना संतुलन पुन: प्राप्त करने का प्रयास करती है।

स्मृतियों में खोया स्वच्छ वातावरण

लेखिका पुरानी यादों और आज की भयावह वास्तविकता के बीच एक तुलनात्मक चित्र खींचती हैं। एक समय था जब जल स्वच्छ था, हवा में जीवन देने वाली ताजगी थी और रातें सुकून की नींद लेकर आती थीं। हमारे पूर्वज प्रकृति के शोषक नहीं, बल्कि उसके ‘उपासक’ थे। वे जानते थे कि अगर प्रकृति समृद्ध रहेगी, तभी मानव जीवन सुरक्षित रहेगा। आज हमने उसी पूजनीय प्रकृति को केवल एक ‘संसाधन’ बना दिया है, जिसका परिणाम हमारे सामने प्रदूषित वायु और प्लास्टिक के ढेरों के रूप में खड़ा है।

आने वाली पीढ़ियों का संकट

लेखिका की सबसे मार्मिक चिंता आने वाली पीढ़ियों को लेकर है। आज का विज्ञान और आधुनिक शिक्षा हमें प्रकृति के संरक्षण से दूर ले जा रहे हैं। हम अपने वंशजों को विरासत में क्या दे रहे हैं? बोतलबंद पानी, प्रदूषित हवा और प्लास्टिक का साम्राज्य। यदि आज हमने अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी, तो आने वाली पीढ़ियाँ कभी प्रकृति की उस असली समृद्धि को नहीं देख पाएँगी जिसे हमने भोगा है।

समय है जागने का

‘जब जागो तभी सवेरा’—यह लेखिका का स्पष्ट आह्वान है। हमें केवल सोचने और विचारने के दायरे से बाहर निकलकर धरातल पर कुछ करना होगा। प्लास्टिक के अति-उपयोग को कम करना, वनों का संरक्षण और नदियों के प्रति सम्मान, ये केवल शब्द नहीं बल्कि हमारे अस्तित्व की अनिवार्य शर्तें होनी चाहिए।

प्रकृति ईश्वर का एक अनुपम उपहार है। यदि हम इस धरा को सजाने और संवारने का संकल्प लेते हैं, तभी हमारा जीवन सफल कहलाएगा। याद रखिए, धरती के बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है। आइए, एकजुट होकर अपनी इस जिम्मेदारी को निभाएँ।

कविता 1: मनुष्य की जागृति

हाँ, माना कि मनुष्य है श्रेष्ठ, है जीने का अधिकार,
लेकिन यह क्या—अपने अधिकार से सभी पर अत्याचार?
जब मनुष्य ने ली नदियों की जगह, तो इसे दिया ‘विकास’ का नाम,
और जब नदियों ने ली अपनी जगह, तो इसे दे दिया ‘विनाश’ का नाम।
धरा पर जिसने जन्म लिया, अवश्य उसका मरण होगा,
पर जीवन जीने के लिए, करना प्रकृति का संरक्षण होगा।
वरना यह धरा यूँ ही दुःख सहते-सहते मुरझा जाएगी,
युगों-युगों तक मनुष्य की अनुदारता की दास्तान सुनाएगी।
जब जागो तभी सवेरा, मनुष्य! जाग जरा,
धरती ही नहीं, अपना अस्तित्व भी है अब संकट में पड़ा।
अभी तो सोचना है आने वाली पीढ़ियों के बारे में भी,
अगर नहीं जागे, तो क्या फल पाएँगी वे कभी?
आओ साथ मिलकर चलें और करें जतन,
ताकि प्रकृति का रक्षण हो और न हो हमारा पतन।
सोचना-विचारना बहुत हुआ, अब कुछ करने की है बारी,
एकजुट हो जाएँ चलो, निभाएँ अपनी जिम्मेदारी।

कविता 2: स्मृतियाँ और संरक्षण

स्मृतियाँ ही शेष रह जाती हैं,
बीती बातें कहाँ लौट कर आती हैं।
वह स्वच्छ जल की नदियाँ, वनों की हरियाली,
कहाँ गई वह स्वच्छ हवा, जीवन देने वाली?
खो गया अपनेपन का वातावरण,
प्लास्टिक और प्रदूषण से जब मुक्त था जीवन।
रातें थीं जब नींदों वाली, दिनों में भरी थी उमंग,
चिंताएँ तो तब भी थीं, पर बाँट लेते थे सबके संग।
हमारे पूर्वज किया करते थे पूजा प्रकृति की,
तो देखो, उन्हें उपहार स्वरूप मिली समृद्धि प्रकृति की।
और हमने तो किया केवल प्रकृति का शोषण,
तो हमें मिले प्रदूषित वायु, जल और कटे हुए वन।
हमारे वंशज—उन्हें तो विज्ञान ने है सिखाया,
प्रकृति न पूज्य है, न करना इसका संरक्षण।
तो देखो आज क्या बचा है उनके लिए,
बोतल वाला पानी, चारों ओर प्लास्टिक, संकट में जीवन।
आओ, अब जो बचा है उसी को समेटें,
शिक्षा दें अपने वंशजों को प्रकृति के संरक्षण की,
ताकि वे भी हमारी तरह देख सकें प्रकृति की समृद्धि।
क्योंकि हमारे प्लास्टिक के अति-प्रयोग ने बढ़ाई है मुश्किल,
चारों तरफ संकट में हैं—जंगल, जीवन, वायु, जल।
धरा के पुत्र (मानव), धरा के लिए ही ले आए संकट,
इस तरह की लापरवाही तो बना रही समस्या को विकट।
करना है इन मुश्किलों का हमें ही हल,
केवल सोचते ही रहे, तो जीवन जाएगा निकल।
‘कभी नहीं’ से ‘देर भली’, चलो सब जाग जाएँ,
प्रकृति के साथ मिलकर इस धरा को सजाएँ।
प्रकृति है ईश्वर का उपहार अनुपम,
इस धरा को बेहतर बनाएँ, तो जीवन हो जाएगा सफल।

“ममता मेहंदीरत्ता जी की ये पंक्तियाँ इस कड़वे सच को उजागर करती हैं कि जिसे हम ‘विकास’ कह रहे हैं, वह वास्तव में प्रकृति पर किया गया ‘अतिक्रमण’ है। लेखिका ने बहुत ही मार्मिक ढंग से याद दिलाया है कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को ‘पूजनीय’ मानकर समृद्धि पाई थी, जबकि हमने इसे केवल ‘उपभोग की वस्तु’ मानकर संकट मोल ले लिया है। यह कविता केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए एक चेतावनी और पुकार है।”

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