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पापी पेट की खातिर जोखिम में नन्हीं जान…

किरतपुर रोड पर बच्चों के हैरतअंगेज करतब देख सिहर उठा शहर

मजबूरी की रस्सियों पर टिका बचपन: पढ़ाई की उम्र में ‘पापड़ बेलने’ को मजबूर नौनिहाल

~ भूपेंद्र निरंकारी

बिजनौर। कहते हैं कि ‘पापी पेट’ इंसान से क्या-कुछ नहीं कराता। बिजनौर नगर के किरतपुर रोड पर इन दिनों कुछ ऐसा ही मंजर देखने को मिल रहा है, जहाँ छोटे-छोटे मासूम बच्चे केवल दो वक्त की रोटी के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर बांस और बल्लियों के सहारे हैरतअंगेज करतब दिखा रहे हैं। जिस उम्र में इन नौनिहालों के हाथों में कलम और किताबें होनी चाहिए थीं, उस उम्र में वे सड़कों पर तमाशा दिखाकर अपना और अपने परिवार का पेट पालने को मजबूर हैं।

मात्र ₹10-20 देकर कर्तव्य की इतिश्री कर रहे लोग

सड़क से गुजरने वाले राहगीर इन बच्चों के खेल को देखते हैं और 10, 20 या अधिकतम 50 रुपये देकर आगे बढ़ जाते हैं। समाज का यह रवैया चिंताजनक है। केवल चंद रुपये देना इन बच्चों के भविष्य का समाधान नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग, जिला प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएं इन्हें शिक्षा के प्रति प्रेरित करें ताकि ये बच्चे इस नारकीय जीवन’ से बाहर निकलकर मुख्यधारा से जुड़ सकें।

समाजसेवियों ने बढ़ाया मदद का हाथ

इस हृदय विदारक दृश्य को देखकर वरिष्ठ समाजसेवी मानसिंह भुइयार ने गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने इन बच्चों की हर संभव मदद करने का आश्वासन दिया और शहर के जागरूक व संभ्रांत नागरिकों सहित जिला प्रशासन से अपील की कि इन बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। ज्ञात हो कि मानसिंह भुइयार पूर्व में भी समय-समय पर जरूरतमंदों की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं।

ब्रजवीर सिंह चौधरी ने भी जताई प्रतिबद्धता

इस अवसर पर ब्रजवीर सिंह चौधरी ने भी बच्चों की दयनीय स्थिति पर दुख जताते हुए कहा, “मुझसे जितना बन पड़ेगा, मैं इन बच्चों की व्यक्तिगत रूप से मदद करूँगा और अन्य लोगों को भी इनके भविष्य को संवारने के लिए प्रेरित करूँगा।”

विश्व गुरु बनने की राह में बड़ी बाधा

स्थानीय नागरिकों का मानना है कि जब तक हमारे देश का बचपन इस तरह सड़कों पर संघर्ष करेगा, तब तक ‘विश्व गुरु’ बनने का सपना अधूरा रहेगा। यदि इन बच्चों को सही दिशा और शिक्षा मिले, तभी हमारा भारत वास्तव में महान बनेगा। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन और समाज इन बच्चों की पुकार सुनता है या इनका बचपन यूँ ही सड़कों पर नीलाम होता रहेगा।

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