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बा अदब-बा नसीब, बे अदब-बदनसीब- मनोज चतुर्वेदी

फ़िल्म “लावारिस” में अमज़द खान साहब का एक डायलॉग था- “औलाद अगर न हो तो मां-बाप को दुःख होता है, अगर होकर मर जाये तो बहुत दुःख होता है, और अगर ज़िंदा रहे लेकिन नालायक़ निकल जाए तो मां-बाप की जिंदगी नासूर बन जाती है।”

कितना कटु सत्य है। अपनी औलाद को मां अपना खून देकर पैदा करती है और दूध पिलाकर जिंदा रखती है। खुद गीले में सोती है और औलाद को सूखे में सुलाती है। वहीं दूसरी ओर बाप अपनी औलाद को उंगली पकड़कर चलना सिखाता है, और अपने खून-पसीने की कमाई से उसका पेट पालता है, उसकी हर ज़िद-ख्वाहिश को पूरा करने के लिए अपनी खुशियों और अरमानों का गला भी घोंट देता है।

…लेकिन झुलसती गर्मी में लू के थपेड़ों को सहते हुए दो जून की रोटी का इंतज़ाम करके वापस घर लौटने वाले बाप से जब औलाद यह पूछती है कि “आज तक तुमने हमारे लिए किया ही क्या है?” तब उस बाप का कलेजा फट जाता है।
दिल रो उठता है, जब एक बाप अपनी ही औलाद से माफ़ी मांगता है, सिर्फ इसलिये कि गुस्से में उसने अपने बेटे की ग़लत हरक़त पर उसे एक तमाचा जड़ दिया था। क्या एक बाप को अपने ही बेटे को उसकी ग़लत हरकत के लिए थप्पड़ लगाने भी अधिकार नहीं है?

दुनिया का कोई भी मां-बाप अपनी औलाद का कभी बुरा नहीं चाहता और न ही कभी चाह सकता है, लेकिन यह बात कभी उसकी ख़ुद की औलाद नहीं समझ पाती है।

दिल में टीस उठती है जब एक बेटी अपने बाप के सामने अपने आशिक का पक्ष लेते हुए बहुत बेशर्मी से कह देती है- मैं शादी करूंगी तो इसी के साथ, भले ही आपकी इज़्ज़त चौराहे पर नीलाम क्यों न हो जाये।

धरती फट क्यों नहीं जाती तब, जबकि एक सो कॉल्ड आधुनिक और पढ़ा लिखा बेटा अपनी मेमसाहब के इश्क़ में अंधा-बहरा और गूंगा होकर अपने माँ-बाप पर अत्याचार होते देखता रहता है।

दुनिया का कोई भी मां-बाप अपनी औलाद से यही आस लगाता है कि उनकी औलाद बड़े होकर उनके कमज़ोर कंधों को सहारा देगी। मां-बाप अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी खर्च करते हैं, ताकि उनकी औलाद किसी लायक बन जाये। …लेकिन उन्हें सपने में भी शायद यह गुमान नहीं होता कि जिस औलाद को लायक बनाने के लिए वह अपने अरमानों, खुशियों और जरूरतों का गला घोंट रहे हैं, वही औलाद एक दिन “नालायक़” बन जाएगी।

अपने माँ-बाप को भले ही दो वक्त की रोटी न दो, लेकिन कम से कम एक वक़्त उनकी इज़्ज़त जरूर करो। याद रखो कि एक दिन तुम भी किसी के बाप बनोगे, उस दिन तुम्हें एहसास होगा कि औलाद का दर्द क्या होता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होगी।

मेरे स्वर्गीय पिताश्री अक्सर कहा करते थे-

बा अदब- बा नसीब
बे अदब- बदनसीब

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना, आवश्यक नहीं है।

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