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आज बड़े हो गए हैं, कल तो छोटे से थे!

बिजनौर। वर्तमान के हालात में नेताओं की रंगत गिरगिट को फेल करने पर तुली हुई है। यह सभी जगह का हाल है। इक्का दुक्का को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश नेता निचले पायदान से धीरे धीरे ऊपर तक पहुंचे गए। जो पैदल थे, आज उनके नीचे भारी भरकम गाड़ियां हैं। लकदक दिखाई देने के लिए कपड़े धुलवा कर धोबियों तक को पैसा देने में रुलाने वाले सिर तानकर चल रहे हैं। खबर छपवाने के लिए मीडिया वालों की चरण वंदना में जुटे रहने वालों को आज RO (रिलीज़ ऑर्डर) का जादुई शब्द भी पता है। ऐसे ही एक छोटे से नेता जी आज बहुत तो नहीं, फिर भी काफी बड़े हो गए हैं। तकरीबन 10 से 12 साल पहले के दरमियान अलग अलग अवसरों पर उन्होंने मौखिक रूप से एक दैनिक, एक सांध्य व एक साप्ताहिक अखबार में विज्ञापन प्रकाशित कराए। पहले का पेमेंट टलते रहने के बावजूद अखबार नवीस को भरोसा था कि आज नहीं तो कल 30 हजार रुपए का भुगतान हो ही जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पहले तो नेता जी आज, कल और परसों कह कर टालते रहे। फिर दिन, महीने साल बीतते रहे। वो भी छोटे से बड़े का सफर तय करते रहे। बीच में उन्होंने विज्ञापन का रिलीज़ आर्डर (RO) दिखाने की बात कह कर अपनी असली रंगत दिखा दी। अब नाम बताने की जरूरत तो है नहीं क्योंकि सुधि पाठकों को समझ में आ रहा होगा कि आखिरकार कौन हो सकते हैं वो नेताजी? RO शब्द का इस्तेमाल कब, कहां और कौन करता है। हालांकि अब वो सिर्फ बड़े लोगों के साथ ही उठते बैठते हैं, अपने दुर्दिनों के समय के पालनहारों के फोन तक रिसीव नहीं करते।

छोटा, बड़ा अखबार- यह बात तो जनता को बखूबी मालूम है कि जन समस्याओं को आला अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए अधिकतर तथाकथित नेताओं द्वारा पीड़ितों के ज्ञापन की टाइपिंग, फोटो कॉपी और तो और मीडिया में प्रकाशित कराने के नाम पर भी रकम ऐंठी जाती रही है। यही हाल जिला पंचायत चुनाव के दौरान एक बड़े राजनीतिक दल के पदाधिकारियों ने भी किया था। अब विधानसभा चुनाव में भी उसी पुरानी परंपरा का निर्वहन बखूबी किया जा रहा है?

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