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“मित्रों” को दरकिनार कर कैसे सफल होगी पुलिस? सिर्फ इन्फॉर्मर ही नहीं, बल्कि ये हैं पुलिस के आंख-कान।

बिजनौर। ब्रिटिश काल से ही पुलिस इन्फाॅर्मर रखती रही है। पिछले कुछ साल तक भी लगभग सभी राज्यों में एसपी स्तर पर एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) रखने का प्रचलन था। यह अब भी है, इन्हें पुलिस आईकार्ड भी देती रही है। पुलिस-प्रशासन के लोगों के बीच भी उनकी पैठ इस मामले में रहती है कि उनकी सूचनाओं पर पुलिस ज्यादा यकीन करती है। वहीं यूपी में जब से योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली, “पुलिस मित्र” रखने पर खासा जोर दिया जाने लगा। इसके बावजूद बिजनौर में पूरी व्यवस्था धवस्त पड़ी हुई है। “मित्रों” को “पुलिस” किसी भी पर्व या कार्यक्रम में शरीक करना मुनासिब नहीं समझती!

शुरुआत- विभागीय सूत्रों के अनुसार पुलिस मित्र बनाने के अभूतपूर्व प्रयोग की शुरुआत मुजफ्फरनगर के तत्कालीन पुलिस कप्तान अनंतदेव तिवारी ने की। उन्होंने हजारों की संख्या में पुलिस मित्र बनाए। बाद में, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन डीजीपी ओपी सिंह ने इसे संस्थागत तौर पर बढ़ावा दिया। जून, 2018 में यूपी के आईजी (कानून व्यवस्था) प्रवीण कुमार ने कहा था कि यह एक तरह की वालिंटियर सेवा है और इसके लिए किसी को कुछ भी भुगतान नहीं किया जाएगा। सभी को पहचान पत्र जारी किया गया बल्कि सभी जिला पुलिस कप्तानों को इस संबंध में पत्र भी भेजा गया। असर यह हुआ कि अकेले आगरा में 72 घंटे में 15,000 पुलिस मित्र बना दिए गए। प्रवीण कुमार ने दावा किया कि पुलिस मित्रों की यह व्यवस्था पुलिस को विभिन्न त्योहारों पर कानून-व्यवस्था बनाने और पुलिस को फीडबैक देने में कारगर साबित हुई है। गोरखपुर के तत्कालीन एसएसपी डाॅ. सुनील गुप्ता ने भी कहा था कि पुलिस मित्र बनाने से पहले व्यक्ति का पूरा ब्यौरा जुटाया जाता है। बिना वेरीफिकेशन के किसी को सदस्य नहीं बनाया जाता।

तब कहा था DGP ने- यूपी पुलिस अब गांव और शहरी क्षेत्रों में पुलिस मित्र बनाएगी। पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने कहा कि स्थानीय स्तर पर प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के विवाद होते रहते हैं। इनके निराकरण के लिए पुलिस अपनी भूमिका का निर्वाह करती है, लेकिन पुलिस की भूमिका की एक सीमा है और उस भूमिका में स्थानीय स्तर पर सक्रिय योगदान के लिए यदि जनपद के संभ्रांत व्यक्तियों का भी सहयोग लिया जाए, तो विवादों के निपटारे अधिक कुशलता से किए जा सकते हैं। यूपी पुलिस, पुलिस मित्र, पुलिस महानिदेशक, up police, law and order

पुलिस वालों के असली आंख कान- पुलिस मित्र सिर्फ इन्फाॅर्मर ही नहीं हैं। ये अब पुलिस की तरफ से हर किस्म का काम करने लगे हैं। ये सीधे थाना स्तर पर सूचनाएं मुहैया कराते हैं। ये पुलिस वालों के असली आंख-कान हैं। अब थाना पुलिस को हर मौके पर जाने की जरूरत नहीं होती। थाना पुलिस किसी को भी इनके मार्फत ही बुला लेती है।

बिजनौर में गहरा रहा असंतोष- जनपद बिजनौर के कई पुलिस मित्रों में इस बात को लेकर असंतोष गहरा रहा है कि अब उन्हें पहले की तरह तवज्जो नहीं दी जाती। उदाहरण के तौर पर बताते हैं कि पहले, सावन माह में मोटा महादेव मंदिर पर शांति, सुरक्षा व्यवस्था को लेकर होने वाली बैठकों में उन्हें बुलाया जाता था। इस बार बैठकें सम्पन्न भी हो गईं और उन्हें समाचार पत्रों के जरिए पता चला। उन्हें कोई सूचना तक नहीं दी गई? यहां इनकी संख्या करीब ढाई सौ बताई गई है।

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