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सतेंद्र चौधरी कम्भौर, बिजनौर (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

देश में राजभाषा हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए हर साल 14 सिंतबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन को मनाने का मकसद लोगों में हिन्दी भाषा के प्रति जागरूकता लाना है. वैसे तो हमारे देश में कई भाषाएं व बोलियां बोली जाती हैं, लेकिन देश में 77 फीसदी से ज्यादा लोग बोलचाल के लिए सिर्फ हिन्दी का ही इस्तेमाल करते हैं. इसके साथ ही हिन्दी को विश्व में सबसे ज्यादा बोले जाने वाली चौथी भाषा का खिताब भी हासिल है. 

वर्ष 1949 में 14 सिंतबर के दिन ही संविधान सभा द्वारा हिन्दी को राज भाषा का दर्जा दिया गया था. इसके बाद  1953 में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की सलाह पर देश में पहली बार हिन्दी दिवस के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन शुरू किया गया. तभी से हर साल 14 सितंबर को स्कूल, कॉलेज, शिक्षण संस्थानों में हिन्दी दिवस के अवसर पर निबंध प्रतियोगिता, वाद-विवाद प्रतियोगता, कविता पाठ, नाटक समेत अन्य लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है, साथ ही सरकारी दफ्तरों में हिंदी पखवाड़े का भी आयोजन किया जाता है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के तहत हिंदी को आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दी गई है. सबसे पहले हिंदी को राज भाषा बनाये जाने का प्रस्ताव साल 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दौरान महात्मा गांधी द्वारा रखा गया था. 

फारसी भाषा का शब्द है हिन्दी

बहुत ही कम लोगों को ये पता होगा कि हिन्दी खुद एक फासरी शब्द है. जी हां, आप ने सही पढ़ा है हिन्दी शब्द मूलत फासरी भाषा का शब्द है, यह फारसी लोगों द्वारा सिन्धी की जगह पर बोला जाता था. फारसी में ‘स’ वर्ण होता ही नहीं है, वो लोग ‘स’ के जगह पर ‘ह’ का इस्तेमाल करते थे, जिसकी वजह से सिंध-हिन्द हो गया. सिन्धू के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को हिन्दू और उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को हिन्दी कहा जाने लगा.

1900 में हुई थी आज की हिंदी की शुरुआत

भाषाविदों की मानें तो हिन्दी के वर्तमान स्वरूप, जिसमें आज हम पढ़ व लिख रहे हैं; की शुरूआत 1900 ईसवी में हुई थी. खड़ी बोली यानी हिंदी में लिखी गई पहली कहानी इंदुमती थी. इसे किशोरीलाल गोस्वामी ने लिखा था. इसकी हिंदी भाषा काफी हद तक वैसी ही है जैसी आज लिखी और बोली जाती है.

हिन्दी की अनेक बोलियाँ (उपभाषाएँ ) हैं, जिनमें अवधी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, हड़ौती, भोजपुरी, हरयाणवी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुमाउँनी, मगही, मेवाती आदि प्रमुख हैं. इनमें से कुछ में अत्यन्त उच्च श्रेणी के साहित्य की रचना हुई है. ऐसी बोलियों में ब्रजभाषा और अवधी प्रमुख हैं. यह बोलियाँ हिन्दी की विविधता हैं और उसकी शक्ति भी. वे हिन्दी की जड़ों को गहरा बनाती हैं. हिन्दी की बोलियाँ और उन बोलियों की उप बोलियाँ हैं जो न केवल अपने में एक बड़ी परंपरा, इतिहास, सभ्यता को समेटे हुए हैं वरन स्वतंत्रता संग्राम, जनसंघर्ष, वर्तमान के बाजारवाद के खिलाफ भी उसका रचना संसार सचेत है.

पश्चिमी हिन्दी का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है. इसके अंतर्गत पाँच बोलियाँ हैं खड़ी बोली, हरियाणवी,  ब्रजभाषा, कन्नौजी और बुंदेली. खड़ी बोली अपने मूल रूप में मेरठ, रामपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, बागपत के आसपास बोली जाती है. इसी के आधार पर आधुनिक हिंदी और उर्दू का रूप खड़ा हुआ. बांगरू को जाटू या हरियाणवी भी कहते हैं. यह पंजाब के दक्षिण पूर्व में बोली जाती है. कुछ विद्वानों के अनुसार बांगरू खड़ी बोली का ही एक रूप है, जिसमें पंजाबी और राजस्थानी का मिश्रण है. ब्रजभाषा मथुरा के आसपास ब्रजमंडल में बोली जाती है. हिंदी साहित्य के मध्ययुग में ब्रजभाषा में उच्च कोटि का काव्य निर्मित हुआ. इसलिए इसे बोली न कहकर आदरपूर्वक भाषा कहा गया. मध्यकाल में यह बोली संपूर्ण हिंदी प्रदेश की साहित्यिक भाषा के रूप में मान्य हो गई थी, पर साहित्यिक ब्रजभाषा में ब्रज के ठेठ शब्दों के साथ अन्य प्रांतों के शब्दों और प्रयोगों का भी ग्रहण है. कन्नौजी गंगा के मध्य दोआब की बोली है. इसके एक ओर ब्रजमंडल है और दूसरी ओर अवधी का क्षेत्र. यह ब्रजभाषा से इतनी मिलती जुलती है कि इसमें रचा गया जो थोड़ा बहुत साहित्य है, वह ब्रजभाषा का ही माना जाता है. बुंदेली बुंदेलखंड की उपभाषा है. बुंदेलखंड में ब्रजभाषा के अच्छे कवि हुए हैं, जिनकी काव्यभाषा पर बुंदेली का प्रभाव है.

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