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हर साल होता है बढ़ती फीस का शोर, पर होता कुछ नहीं

सजा और डांट के डर से बच्चे भी माता- पिता को चुप रहने के लिए करते मजबूर

पढ़ाई में महंगाई का बढ़ता बोझ : अब अभिभावकों को आदेश उपदेश नहीं बल्कि चाहिए केवल राहत

स्कूल में नया सत्र शुरू हो गया है। किताबें खरीदने के लिए अभिभावकों को अधिक धनराशि चुकानी पड़ रही है। ऊपर से बैग, बोतल और यूनिफॉर्म का खर्च अलग। अफसोस इस बात का है कि हर साल बढ़ती फीस का शोर होता है, पर होता कुछ नहीं।

अभिभावकों को चाहिए राहत~

शिक्षा का नया सत्र शुरू हो गया है। बच्चे उत्साह में हैं, लेकिन अभिभावक पशोपेश में; क्योंकि इस वर्ष भी उन्हें कॉपी-किताबों के लिए पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम 30 से 40 फीसदी अधिक धनराशि चुकानी पड़ रही है। कई किताबें ऐसी हैं, जिनमें मात्र एक-दो चैप्टर को आगे-पीछे किया जाता है या बदल दिया जाता है। किताबों के खर्चे के अलावा बैग, बोतल, यूनिफॉर्म का खर्च अभिभावक की कमर तोड़ने के लिए काफी है। उस पर भी गिनी- चुनी दुकानों से ही पुस्तकें खरीदने का दबाव। अभिभावक ऑफिस, घर छोड़कर वहाँ लाइन में खड़े होकर धक्के खाता है।

यहीं पर खत्म नहीं होती दुश्वारियां~
नई शिक्षा नीति के अनुसार, एनसीईआरटी की किताबें लगाकर माता- पिता को आर्थिक राहत और बच्चों के कंधों का बोझ हल्का करने की बात हुई थी, पर निजी स्कूलों में निजी प्रकाशकों की पुस्तकें भी पाठ्यक्रम में शामिल की जा रही हैं। यह एनसीईआरटी की किताबों की तुलना में लगभग 5 गुना अधिक महंगी हैं। मोटी-मोटी स्कूल डायरी, ड्राइंग और ग्राफ कॉपी साल के आखिर में खाली दिखाई देती हैं।

डेवलपमेंट फीस के नाम पर डेवलपमेंट किसका~
डेवलपमेंट फीस जैसे नए टर्म भी निजी स्कूलों द्वारा डेवलप कर लिए गए हैं। मतलब फीस के ऊपर भी फीस। अफसोस इस बात का शोर हर साल होता है, मगर होता कुछ नहीं। अगर कुछ लोग बोलना भी चाहें तो सबका साथ नहीं मिलता। बच्चे भी माता- पिता को चुप रहने के लिए मजबूर कर देते हैं, क्योंकि उन्हें सजा और डांट का डर रहता है। संबंधित विभाग को नियम बना कर इस संबंध में जरूरी कदम उठाने चाहिए, ताकि हर साल अप्रैल में बाहर आने वाले इस जिन्न का खात्मा हो और अभिभावक को राहत मिले।

✍️ अमृता पांडे, नैनीताल

Posted by प्राइमरी का मास्टर 2

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