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बस होना चाहिए अपने भगवान पर पूर्ण विश्वास: देवी हरिप्रिया

बाबा हरिहर हनुमान मंदिर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत गीता का समापन

हमें किसी का ऋण नहीं रखना चाहिए: देवी हरिप्रिया

बिजनौर। स्थानीय मोहल्ला खत्रियान में स्थित बाबा हरिहर हनुमान मंदिर में सात दिवसीय श्रीमद्भागवत गीता का बुधवार को समापन हुआ।

इस अवसर पर श्री वृंदावन धाम से पधारी श्रीमद्भागवत गीता कथावाचक परम पूज्य देवी हरिप्रिया ने सातवें दिन समापन के अवसर पर भगवान श्री कृष्ण व उनके परम मित्र सुदामा का जिक्र करते हुए कथा सुनाई।

उन्होंने कहा कि भगवान श्री कृष्ण जी व सुदामा जी बचपन के मित्र थे तथा वे दोनों संदीपन मुनि के गुरुकुल में रहकर एक साथ शिक्षा ग्रहण की सुदामा जी ब्राह्मण थे। कहते हैं कि हमें किसी का ऋण नहीं रखना चाहिए। एक बार संदीपन मुनि ने सुदामा जी से जंगल से लकड़ी लाने के लिए कहा। भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी से कहा कि मित्र मैं भी आपके साथ चलूंगा। दोनों जंगल में लकड़ी बीनने के लिए चल दिए। जब वह जंगल में पहुंच गए तो भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि सुदामा जी आप इस पेड़ के नीचे बैठ जाओ, मैं लकड़ी बीन कर लाता हूं। इतना कहकर श्री कृष्ण जी लकड़ी बीनने के लिए चले गए। जंगल में जाने से पहले गुरु माता ने उन दोनों को खाने के लिए अपने अपने हिस्से के चने दिए थे। जब सुदामा जी को भूख लगी तो उन्होंने एक मुट्ठी चने खा लिए, जब उनकी भूख शांत नहीं हुई तो उन्होंने भगवान श्री कृष्ण जी के हिस्से के चने खा लिए। जब भगवान श्री कृष्ण लकड़ी लेकर सुदामा जी के पास आए तो उन्होंने कहा कि भैया चने लाओ, मुझे बड़े जोर की भूख लगी है। सुदामा जी विचार करने लगे की इनके हिस्से के चने तो मैंने खा लिए हैं, अब मैं क्या करूं। मैं भगवान श्री कृष्ण को क्या जवाब दूं। भगवान तो अंतर्यामी होते हैं, घट घट की जानने वाले होते हैं। वह सुदामा की मनो:स्थिति को जान गए तथा सुदामा जी ने भी सच्चाई बता दी। यह बात सुनकर भगवान श्रीकृष्ण नाराज हो गए और सुदामा जी को श्राप देते हुए कहा कि हक पराए को जो कोई खावे, जो दरिद्र ही तेर बुलावे। इतना कहने के बाद उन्होंने सुदामा से कहा कि जब तुम अति दरिद्र दीन व हीन हो जाओ तो मेरे पास आ जाना। मुझे वहां ज्यादा कुछ नहीं चाहिए… पत्र पुष्प तंदुल चाहूं, ना चाहूं धन और माल, जब तू आवे द्वारिका तो कर दूं मालामाल। इतना कहकर भगवान श्री कृष्ण जी अंतर्ध्यान हो गए।

समय बीतने पर भगवान श्री कृष्ण जी द्वारिका नगरी के राजा बने सुदामा जी की धर्मपत्नी सुशीला ने कहा कि द्वारिका के राजा भगवान श्री कृष्ण आपके परम मित्र हैं। आप मदद के लिए उनके पास चले जाओ। पत्नी के बार बार कहने पर सुदामा जी द्वारिका के लिए चल दिए। कहते हैं कि उनकी धर्मपत्नी ने उन्हें चलने से पहले उनके मित्र श्री कृष्ण के लिए तीन मुट्ठी चावल दिए थे। वे भी अलग-अलग तरह के थे, जब भगवान श्री कृष्ण ने पहली मुट्ठी चावल खाए तो एक लोक की संपत्ति, दूसरी मुट्ठी चावल खाए तो दो लोक की संपत्ति, जैसे ही तीसरी मुट्ठी खाने के लिए हुए तो भगवान श्री कृष्ण की धर्मपत्नी रुक्मणी ने भगवान श्री कृष्ण का हाथ पकड़ लिया और कहा कि भगवन आपने सब कुछ तो सुदामा जी को दे दिया अब कुछ अपने लिए भी छोड़ेंगे कि नहीं? तब भगवान मंद मंद मुस्कुराए और कहा कि देवी सच्ची मित्रता ऐसी ही होती है और जब भगवान देना शुरू करते हैं तो रखने को जगह कम पड़ जाती है। बस अपने भगवान पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए।

कथा के समापन के अवसर पर ट्रस्ट के अध्यक्ष नीरज शर्मा, कोषाध्यक्ष दीपक महर्षि, सुषमा शर्मा, प्रोमिला शर्मा, राहुल शर्मा, स्वाति वीरा, कंचन खन्ना, उज्जवल शर्मा, नेहा शर्मा, दर्शना शर्मा, प्रबोध रंजन, मंदिर के पुजारी पंडित श्याम उपाध्याय, बृजवासी स्नेह लता शर्मा, शशि प्रभा, राहुल शर्मा, आराध्या परी, पंडित मुकेश वर्मा, पंडित दिनेश शर्मा, पंडित सोनू शर्मा, पंडित पवन शर्मा वृंदावन सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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