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विधि विधान से हुआ पंडालों और घरों में स्थापित गणेश मूर्तियों का विसर्जन

गुंजायमान रहा गणपति बप्पा मोरया अगले बरस तू जल्दी आ, का उदघोष

बिजनौर। श्री गणेश चतुर्थी महोत्सव का समापन मूर्ति विसर्जन के साथ हो गया। गणपति बप्पा मोरया अगले बरस तू जल्दी आ, आदि के अलावा भगवान गणेश के पारंपरिक जयकारों से माहौल गुंजायमान रहा। गंगा बैराज तक विसर्जन यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं ने जमकर गुलाल खेला। बहुत से लोगों ने बैराज के अलावा अन्य नदी, नहर, तालाबों आदि स्थानों पर भी मूर्ति विसर्जन किया। वहीं ऐसे लोगों की भी कमी नहीं रही, जिन्होंने अपने घरों के गमलों या अन्य पात्रों में विसर्जन अनुष्ठान पूर्ण किया।

10 दिन तक रही धार्मिक उत्सव की धूम

बिजनौर में बुधवार से शुरू हुआ गणेश प्रतिमा का विसर्जन कार्यक्रम गुरुवार को भी जारी रहा। शहर से लेकर गंगा बैराज तक गणेश यात्रा निकाली गई। गंगा बैराज पर गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया गया। रामलीला मैदान क्षेत्र, शम्भा बाजार, सर्राफा बाजार, नई बस्ती, सिविल लाइंस, पंजाबी कॉलोनी आदि शहर के कई हिस्सों में इस साल भी गणेश उत्सव के अवसर पर पंडालों के अलावा भक्तों ने अपने घरों में भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित की थीं। विसर्जन से पूर्व महाआरती व हवन का आयोजन किया गया। भक्तिमय वातावरण में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लेकर पुण्य लाभ प्राप्त किया। इसके बाद ढोल नगाड़ों के साथ विसर्जन यात्रा शुरू की गई।

विसर्जन यात्रा में हजारों की संख्या में भक्तों ने ढोल नगाड़े की धुन पर नाचते गाते जमकर गुलाल खेला। विसर्जन यात्रा में भगवान श्री गणेश, राधा कृष्ण, शंकर पार्वती आदि की झांकियां आकर्षण का केंद्र बनी रहीं। विसर्जन यात्रा शहर के विभिन्न हिस्सों से होते हुए प्रदर्शनी चौक पर पहुंची। बाद में वहां से वाहनों के माध्यम से गणेश की प्रतिमा को गंगा बैराज ले जा कर विसर्जित कर दिया गया। हालांकि कुछ स्थानों पर इस अवधि के बीच भी विसर्जन किया गया।

पौराणिक कथा के मुताबिक भादो माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। भगवान गणेश के जन्मोत्सव के दिन लोग उन्हें अपने घरों में लेकर आते हैं और विधि-विधान से 10 दिन तक उनका पूजन करते हैं। इस साल, गणेश चतुर्थी 19 सितंबर को मनाई गई और गणेश विसर्जन दस दिन बाद यानी 28 सितंबर, गुरुवार को किया गया। गणेश चतुर्थी पर भक्तों ने शिव पार्वती नंदन गणेश का स्वागत किया। पूजा अर्चना के बाद प्रतिमा स्थापित की गई। गणपति विसर्जन तक रोजाना सुबह-शाम विशेष पूजा अर्चना की गई। पंडालों को फूल-मालाओं से सजाया गया। प्रतिमा स्थापित होने वाले स्थानों पर भगवान गणेश के भजनों की धूम रही।

इतिहास में यह वर्णन मिलता है कि शिवाजी महाराज के बाल्यकाल में उनकी मां जीजाबाई ने पुणे के ग्राम देवता कस्बा गणपति की स्थापना की थी। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। शिवाजी महाराजा के बाद पेशवा राजाओं ने गणेशोत्सव को बढ़ावा दिया। गणेश उत्सव का यह त्योहार महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

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