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2014 और 2019 में नहीं मिल सकी थी एक भी सीट

रालोद को संजीवनी नहीं दे सका अन्य दलों से गठबंधन

10 साल वनवास के बाद अब भाजपा के सहारे ही पार होगी चुनावी वैतरणी

लखनऊ। सपा-बसपा के साथ मजबूत गठबंधन भी रालोद को पिछली बार चुनावी वैतरणी पार नहीं करा पाया था। हालात ये रहे कि रालोद 2014 की तरह 2019 में भी एक बार फिर शून्य पर सिमट गई। न तो छोटे चौधरी मुजफ्फरनगर में सीट निकाल सके और न ही जयंत चौधरी को बागपत में अपनी राजनैतिक विरासत सौंपने की उनकी हसरत पूरी हो सकी। मथुरा में हेमा मालिनी ने करीब दो लाख 90 हजार वोट से रालोद उम्मीदवार कुंवर नरेंद्र सिंह के खिलाफ एकतरफा जीत हासिल की थी।

मुजफ्फरनगर दंगे के बाद 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में रालोद की सियासी जमीन खिसक चुकी थी और कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ा और उसका एक भी प्रत्याशी नहीं जीत पाया। वर्ष 2019 में सपा-बसपा का मजबूत गठबंधन और कांग्रेस का अघोषित समर्थन रालोद के साथ था। चौधरी अजित सिंह अपनी परंपरागत सीट बागपत को छोड़कर मुजफ्फरनगर से चुनाव मैदान में थे, जबकि उनके पुत्र जयंत चौधरी बागपत में अपने पिता की विरासत संभालने के लिए मैदान में थे। मथुरा में कुंवर नरेंद्र सिंह को प्रत्याशी बनाया गया था। गठबंधन में यही तीनों सीटें रालोद के खाते में आईं, लेकिन इन तीनों ही सीट पर शिकस्त के बाद रालोद की गठबंधन के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की हसरत परिणाम घोषणा के साथ ही दम तोड़ बैठी।

भाजपा के साथ मुफीद रहा गठबंधन

रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह के लिए 2009 में भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ना सबसे ज्यादा फायदेमंद रहा। सात सीटों पर चुनाव लड़ कर रालोद ने पांच पर जीत दर्ज की थी। बागपत से चौधरी अजित सिंह, बिजनौर से संजय चौहान, अमरोहा से देवेंद्र नागपाल, हाथरस से सारिका बघेल और मथुरा से जयंत चौधरी सांसद बने थे।
इससे पहले 2004 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बावजूद मात्र तीन प्रत्याशी ही जीत पाए। बागपत में स्वयं रालोद मुखिया, कैराना में अनुराधा चौधरी और बिजनौर में मुंशीराम पाल सांसद बने थे। वहीं 2014 के चुनाव में सभी समीकरण बदल गए क्योंकि 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे और मोदी लहर ने अन्य दलों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। ऐसे में रालोद की जमीन भी जाती रही। कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बावजूद रालोद एक भी सीट नहीं जीत पाई। वर्ष 2019 में बसपा-सपा के साथ 03 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ा लेकिन एक भी सीट नहीं मिली।

लोकसभा चुनाव में रालोद की स्थिति
वर्ष लड़ा जीते
1999 15 02
2004 32 03
2009 09 05
2014 10 00
2019 03 00


विधानसभा चुनाव के आंकड़े-

यूपी विधानसभा चुनाव वर्ष 2002 में रालोद, बीजेपी के साथ 38 सीटों पर चुनावी मैदान में उतरी और 2.48% वोट लेकर 14 पर विजयी रही। वर्ष 2007 में रालोद अकेले 254 सीटों पर चुनाव लड़कर सिर्फ 10 पर जीत हासिल कर सकी, उसे कुल मत में से 3.70% वोट मिले। वर्ष 2012 में कांग्रेस के साथ 46 सीटों पर चुनाव लड़ कर रालोद को 9 पर विजय हासिल हुई। उस चुनाव में रालोद को 2.33 फीसदी वोट मिले, फिर 2017 में रालोद ने अकेले चुनाव लड़ा और 277 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन 1.78 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 1 सीट ही मिल सकी। इसके बाद 2022 में सपा के साथ रालोद ने 33 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ा, उसे 2.85 फीसदी वोटों के साथ 8 सीटों पर सफलता मिली।

लोकसभा चुनाव

वर्ष 1999 में 15 सीटों पर अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने वाली रालोद सिर्फ 02 सीट पर जीत सकी और उसे 0.37 फीसदी वोट मिले। वहीं 2004 में रालोद ने सपा के साथ गठबंधन कर 10 सीटों पर भाग्य आजमाया और 4.49 फीसदी वोटों के साथ 03 सीटों पर जीत हासिल की। वर्ष 2009 में रालोद ने बीजेपी के साथ 07 सीटों पर चुनाव लड़ा और 01 फीसदी वोट के साथ 05 सीटों पर जीत हासिल की। इसके बाद वर्ष 2014 में कांग्रेस के साथ 08 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली रालोद का 0.50 फीसदी वोट के साथ खाता भी नहीं खुल सका। वर्ष 2019 में रालोद ने बसपा-सपा के साथ 03 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ा और 1.7 फीसदी वोट हासिल कर एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई।

2022 विधानसभा चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन का प्रदर्शन

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा-रालोद गठबंधन ने शामली जिले की सभी तीन सीट, मुरादाबाद की 6 में से 5, मुजफ्फरनगर की 6 में 4, संभल की 4 में से 3, मेरठ की 7 में से 4, रामपुर की 5 में से 3 और फिरोजाबाद की 5 में से 3, बिजनौर की 8 में से 4 सीट, अमरोहा की 4 में से 2, बदायूं की 6 में से 3 और मैनपुरी की 4 में से 2 सीट पर विजय का परचम फहरा कर भाजपा को कांटे की टक्कर दी थी।

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