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मां: जो स्वयं मिटती है, पर संतान को कभी टूटने नहीं देती

मां को हर दिन याद रखना चाहिए, सिर्फ एक ‘मदर्स डे’ पर नहीं

जब भी सैलाब में क़श्ती मेरी आ जाती है, मां दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है

इस आधुनिक समय में जब संवेदनाएं अक्सर स्क्रीन की रोशनी में धुंधला जाती हैं और रिश्तों की गर्माहट डिजिटल संदेशों में सिमटती जा रही है, तब भी एक रिश्ता है जो हर तकनीक, हर युग, हर भाषा से ऊपर है — मां।

मां कोई पद नहीं, एक संपूर्ण अनुभव है — जिसे न किसी प्रमाणपत्र की आवश्यकता होती है, न किसी मान्यता की। वह अपनी ममता से हर दर्द को हर लेती है, अपनी चुप्पी से सब कह देती है और अपने आंसुओं से वह शब्द लिख जाती है, जिन्हें इतिहास भी दर्ज नहीं कर पाता।

बचपन में गिरी ठोकर पर उसका लिपटकर चुप कराना जितना सच्चा था, उतना ही सच्चा है उसका आज भी बिना कहे हमारी चिंता करना। जब हम बड़े हो जाते हैं, तो अक्सर सोचते हैं कि अब हम बहुत कुछ समझने लगे हैं। पर सच यह है कि मां के “बोल न सकने वाले मौन” को समझ पाना अब भी हमारे बस से बाहर की बात है।

मां वह धुरी है, जो एक बिखरते परिवार को जोड़े रखती है। वह चुपचाप सहती है, पर अपने बच्चों को कभी महसूस नहीं होने देती कि वह थक चुकी है। कई बार वह खुद अपने अस्तित्व को खो देती है, सिर्फ इसलिए कि हम अपनी पहचान पा सकें।

आज जब हम सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, या जीवन की राह में संघर्षों से जूझते हैं, तो एक बार पलटकर मां की ओर देखना चाहिए — वह अब भी वहीं है, उसी मुस्कान के साथ, उसी दुआ के साथ, जिसकी कोई कीमत नहीं, पर जिसका मूल्य अपार है। …क्योंकि मां को हर दिन याद रखना चाहिए, सिर्फ एक ‘मदर्स डे’ पर नहीं। वो हर उस सांस में शामिल है, जिसे हम बिना सोचे ले लेते हैं। (साभार)

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