मां के कहने पर 1798 में अलीगंज में बनवाया था हनुमान मंदिर
नवाब वाजिद अली शाह ने की थी लखनऊ में बड़ा मंगल पर भंडारे की शुरुआत
लखनऊ के अलीगंज में स्थित पुराना हनुमान मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी है। नवाब सआदत अली ने अपनी मां आलिया बेगम की इच्छा पर 1798 में इसका निर्माण कराया था।
हिंदू-मुस्लिम एकता का जीता जागता उदाहरण
अलीगंज का पुराना हनुमान मंदिर लखनऊ में हिंदू-मुस्लिम एकता का जीता जागता उदाहरण है। नवाब सआदत अली के कार्यकाल के दौरान वर्ष 1798 में उन्होंने अपनी मां आलिया बेगम के कहने पर अलीगंज में पुराना श्रीहनुमान मंदिर का निर्माण कराया था। संतान सुख की प्राप्ति होने पर आलिया बेगम ने मंदिर के निर्माण का वादा किया था।

मंदिर के गुंबद पर चांद की आकृति हिंदू-मुस्लिम एकता की कहानी बयां करती है। मां आलिया बेगम के आदेश पर नवाब सआदत अली ने मंदिर निर्माण के बाद ज्येष्ठ माह में हर मंगलवार को भंडारे का आयोजन शुरू किया था और तब से यहां पर मेला व भंडारा लगने लगा।
एक किवदंती यह भी ….
ज्येष्ठ माह में हर मंगलवार (बड़ा मंगल) को नवाब वाजिद अली शाह की ओर से भंडारा कराने को लेकर एक किवदंती यह भी है कि केसर के कुछ व्यापारी लखनऊ आए थे और उनका केसर बिक नहीं रहा था। तब नवाब वाजिद अली शाह ने पूरा केसर खरीद लिया था, वह महीना ज्येष्ठ का था और दिन मंगलवार था। व्यापारियों ने इसी खुशी में यहां भंडारा कराया, तब से यह परंपरा चल पड़ी।
स्वप्न में देखे स्थान पर खुदाई में मिली मूर्ति!
यह भी कहा जाता है कि अवध के तीसरे नवाब शुजा-उद-दौला (1753-1775 ईस्वी) की दूसरी पत्नी बेगम आलिया को स्वप्न में एक विशिष्ट स्थान का संकेत मिला। जहां हनुमान जी की मूर्ति दबी हुई थी। बेगम आलिया ने उस स्थान की खोदाई का आदेश दिया और जब मूर्ति मिल गई तब उन्होंने उसे हाथी पर ले जाने की व्यवस्था की। हालांकि हाथी रास्ते में रुक गया। बेगम ने वर्तमान अलीगंज में इसी स्थान पर हनुमान जी का मंदिर बनाने का आदेश दिया, जिसे नवाब सआदत अली ने वर्ष 1798 में बनवाया जो आज भी मौजूद है और तभी से ज्येष्ठ माह के हर मंगलवार को लखनऊ में भंडारे की परंपरा चली आ रही है।
इसी जगह पर सीता माता ने किया था विश्राम
बताते हैं कि आज जिस स्थान पर मंदिर मौजूद है, उसी स्थान पर सीता जी ने वनवास के समय विश्राम किया था। भगवान हनुमान उनकी सुरक्षा के लिए उपस्थित थे। इस मंदिर में बंदरों को चना भी खिलाया जाता था। खास बात ये है कि वाजिद अली शाह बजरंगबली के प्रति इतनी अधिक श्रद्धा रखते थे कि उनके नवाबी काल में बंदरों की हत्या पर भी प्रतिबंध था।
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