दिल्ली हाई कोर्ट ने जारी किया अदालतों को एक महत्वपूर्ण सर्कुलर
सशस्त्र बलों और अर्धसैनिक बलों के मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण सर्कुलर जारी कर दिल्ली की सभी अदालतों को सशस्त्र बलों (थल सेना, नौसेना, वायु सेना) और अर्धसैनिक बलों के कर्मियों से संबंधित मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है। यह फैसला इन कर्मियों द्वारा देश की सेवा में दिए जाने वाले योगदान और उनके कर्तव्यों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।

सर्कुलर में दिए गए निर्देश
रजिस्ट्रार जनरल अरुण भारद्वाज द्वारा 7 अगस्त 2025 को जारी किए गए इस सर्कुलर (संख्या 146/Rules/DHC/2025) में कहा गया है कि माननीय मुख्य न्यायाधीश ने सभी अदालतों को निर्देश दिया है कि वे सशस्त्र बलों से संबंधित दीवानी या राजस्व अदालतों/आपराधिक मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता दें।
सर्कुलर में इन बिंदुओं पर दिया गया है जोर
1. सशस्त्र बल अधिनियमों का संदर्भ: सर्कुलर में सेना अधिनियम 1950 (धारा 32), नौसेना अधिनियम 1957 (धारा 24) और वायु सेना अधिनियम 1950 (धारा 32) में दी गई विशेष प्रावधानों का उल्लेख किया गया है, जो इन कर्मियों के मामलों को प्राथमिकता देने की बात करते हैं।
2 भारतीय सैनिक (मुकदमेबाजी) अधिनियम, 1925: इस अधिनियम में विशेष परिस्थितियों में सेवारत भारतीय सैनिकों को दीवानी और राजस्व मुकदमों में विशेष सुरक्षा प्रदान करने का भी जिक्र है।
3. दिल्ली उच्च न्यायालय के नियम और आदेश: दिल्ली उच्च न्यायालय के नियमों और आदेशों, खंड-1 के अध्याय 6 में भी सेना/वायु सेना कर्मियों से जुड़े मुकदमों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया है।
4. अर्धसैनिक बलों के मामले: मुख्य न्यायाधीश ने यह भी निर्देश दिया है कि अर्धसैनिक बलों के कर्मियों के मामलों में भी, जहाँ तक संभव हो, शीघ्र सुनवाई और अंतिम निपटान की व्यवस्था की जाए।

अदालतों को भेजा गया सर्कुलर
यह सर्कुलर दिल्ली के सभी प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को भेजा गया है, जिसमें तीस हजारी, रोहिणी, साकेत, द्वारका, कड़कड़डूमा और पटियाला हाउस कोर्ट शामिल हैं। रोहिणी कोर्ट्स के लिंक ऑफिसर इंचार्ज सुशील कुमार ने 12 अगस्त 2025 को अपने न्यायिक अधिकारियों और संबंधित शाखाओं को इस सर्कुलर की प्रति भेजकर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
यह निर्णय सशस्त्र और अर्धसैनिक बलों के कर्मियों को कानूनी प्रक्रिया में अनावश्यक देरी से बचाने और उनके हितों की रक्षा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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