ध्यान देने योग्य है ट्रंप की वापसी और इंदिरा गांधी का उदाहरण
लोकप्रियता के वास्तविक परीक्षण का साहस दिखा पाएंगे मोदी?
मोदी भी सत्ता से बाहर होकर उठा सकते हैं फिर वापसी का जोखिम ?
~ by KP Singh

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर एक विस्तृत विश्लेषण सामने आया है, जिसमें उनकी तुलना अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से की गई है। यह सवाल उठाया गया है कि क्या मोदी अपनी लोकप्रियता के वास्तविक परीक्षण का साहस दिखा सकते हैं, जैसा कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने किया।

ट्रंप की वापसी: एक तकनीकी जीत का उदाहरण
विश्लेषण में डोनाल्ड ट्रंप के 2020 के चुनाव परिणाम को एक तकनीकी हार बताया गया है, न कि जनता द्वारा स्पष्ट अस्वीकृति। वर्ष 2024 में 78 साल की उम्र में उनकी वापसी को अमेरिकी जनता द्वारा उनकी क्षमताओं में विश्वास का प्रमाण माना गया है। अमेरिका में राष्ट्रपति केवल दो कार्यकाल ही रह सकता है, चाहे वह लगातार हों या बीच में ब्रेक के बाद। लेख में यह तर्क दिया गया है कि अगर संविधान अनुमति देता तो शायद ट्रंप को तीसरा कार्यकाल भी मिल जाता। इसके बावजूद, अमेरिकी सिस्टम (अदालतें और मीडिया) ट्रंप की लोकप्रियता का लिहाज नहीं करते और उनकी निरंकुशता को स्वीकार नहीं करते।

भारत में इंदिरा गांधी की वापसी
भारत में भी ऐसा ही एक उदाहरण देखने को मिला है, जब 1977 में जनता ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया था, लेकिन ढाई साल बाद 1980 के मध्यावधि चुनाव में उन्हें भारी बहुमत से वापस सत्ता में लौटा दिया। लेख में सवाल किया गया है कि क्या मोदी को भी ऐसा होने का विश्वास है? क्या वे राजनीतिक शुचिता के लिए सत्ता से बाहर होने का जोखिम उठा सकते हैं? यह तर्क दिया गया है कि अगर उनमें यह आत्मविश्वास होता, तो वे 75 वर्ष की उम्र पूरी होने पर खुद अपने बनाए नियम का पालन करते हुए इस्तीफा दे देते और जनता की प्रतिक्रिया का इंतजार करते।

भागवत का बयान और 75 वर्ष की उम्र का नियम
प्रधानमंत्री के 76वें जन्मदिन से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत के बयानों का भी जिक्र किया गया है। शुरुआत में ऐसी खबरें थीं कि भागवत 75 वर्ष की उम्र में रिटायरमेंट की व्यवस्था पर जोर दे रहे थे, जिससे मोदी की बेचैनी बढ़ रही थी। हालांकि, बाद में भागवत ने स्पष्ट किया कि उन्होंने न तो अपने लिए और न ही किसी और के लिए रिटायरमेंट की ऐसी कोई बात कही है।
लेख में सुमित्रा महाजन जैसे नेताओं का उदाहरण दिया गया है, जिन्हें 75 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद रिटायर कर दिया गया था, जबकि उनकी ऊर्जा और क्षमता में कोई कमी नहीं थी। इस संदर्भ में संघ के सिद्धांत पर भी जोर दिया गया है, जिसमें व्यक्ति पूजा की जगह संगठन को सर्वोपरि माना जाता है।

लोकतंत्र की मजबूती: व्यक्तिवाद बनाम सिस्टम
विश्लेषण का अंतिम भाग लोकतंत्र की मजबूती पर केंद्रित है। अमेरिका का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि वहां सिस्टम व्यक्ति से ऊपर है! और चेहरा बदलने से भी व्यवस्था नहीं लड़खड़ाती। इसके विपरीत, भारत में व्यक्तिवाद को बढ़ावा देकर लोकतंत्र को कमजोर करने का आरोप लगाया गया है। यह विडंबना बताई गई है कि संघ, जिसने व्यक्ति को संगठन से ऊपर नहीं रखा, उसकी छत्रछाया में व्यक्ति पूजा को बढ़ावा मिल रहा है। लेख में यह सवाल भी उठाया गया है कि संघ का अगला कदम क्या होगा और भाजपा के नए अध्यक्ष के चुनाव पर इस बात का क्या असर पड़ेगा।
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