पाठ से पहले क्यों किया जाता है दुर्गा सप्तशती को शाप मुक्त ?
नवरात्र: मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की व्यवस्था
नवरात्र: नौ दिनों के शुभ पर्व🛕देशभर में तैयारियां जोरों पर
लखनऊ, [दिनांक, 21 सितम्बर, 2025] देशभर में देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का महापर्व, नवरात्र, कल यानी 22 सितंबर, 2025 से शुरू हो रहा है। यह पर्व पूरे नौ दिनों तक चलेगा और 30 सितंबर को विजयादशमी के साथ इसका समापन होगा। इस दौरान भक्त उपवास रखेंगे और मां दुर्गा की पूजा-अर्चना कर उनसे सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मांगेंगे।

नवरात्र का महत्व और पूजा विधि
नवरात्र का त्योहार साल में दो बार मनाया जाता है- चैत्र नवरात्र और शारदीय नवरात्र। शारदीय नवरात्र, जो कि अश्विन मास की प्रतिपदा से शुरू होता है, का विशेष धार्मिक महत्व है। माना जाता है कि इन नौ दिनों में मां दुर्गा पृथ्वी पर आती हैं और अपने भक्तों को दर्शन देती हैं।
~ कलश स्थापना: नवरात्र का पहला दिन घटस्थापना या कलश स्थापना से शुरू होता है। कलश को सुख, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसे सही मुहूर्त में स्थापित करना शुभ माना जाता है। कलश स्थापना के साथ ही नौ दिनों की पूजा-अर्चना का संकल्प लिया जाता है।
~ नौ रूपों की पूजा: इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों – शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। प्रत्येक दिन एक विशेष रंग और रूप से देवी की आराधना होती है।
नवरात्र 2025: तिथि और शुभ मुहूर्त
| तिथि | दिन | पूजा का रूप |
| 22 सितंबर | प्रतिपदा | माँ शैलपुत्री |
| 23 सितंबर | द्वितीया | माँ ब्रह्मचारिणी |
| 24 सितंबर | तृतीया | माँ चंद्रघंटा |
| 25 सितंबर | चतुर्थी | माँ कूष्मांडा |
| 26 सितंबर | पंचमी | माँ स्कंदमाता |
| 27 सितंबर | षष्ठी | माँ कात्यायनी |
| 28 सितंबर | सप्तमी | माँ कालरात्रि |
| 29 सितंबर | अष्टमी | माँ महागौरी |
| 30 सितंबर | नवमी | माँ सिद्धिदात्री |
घटस्थापना शुभ मुहूर्त: सुबह 6:11 बजे से 7:51 बजे तक रहेगा। इस दौरान कलश स्थापित करना अत्यंत शुभ माना गया है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का भी संदेश देता है।
खान-पान और रहन-सहन: नवरात्र में विशेष नियम
नवरात्र केवल पूजा-पाठ का ही नहीं, बल्कि सात्विक जीवनशैली अपनाने का भी पर्व है। इन नौ दिनों में भक्त अपने शरीर और मन को शुद्ध करने के लिए विशेष खान-पान और रहन-सहन के नियमों का पालन करते हैं।
~ अनाज का त्याग: सामान्यतः, नवरात्र में गेहूं, चावल, दाल और अन्य अनाज का सेवन नहीं किया जाता।
~ फलाहार: उपवास करने वाले लोग मुख्य रूप से फल, दूध, दही, और जूस का सेवन करते हैं।
नवरात्र में खाए जाने वाले खाद्य पदार्थ:
~ आटा: कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, और राजगिरा का आटा।
~ सब्जियां: आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू, लौकी और कच्चा केला।
~ साबूदाना: साबूदाना खिचड़ी या वड़ा।
~ नमक: सेंधा नमक (व्रत वाला नमक)।
~ मसाले: काली मिर्च, हरी इलायची, जीरा, दालचीनी और लौंग का इस्तेमाल किया जाता है।
क्या न खाएं: प्याज, लहसुन, मांसाहार, शराब, अंडे और अन्य तामसिक भोजन का सख्ती से त्याग किया जाता है।
नवरात्र में रहन-सहन
खान-पान के साथ ही, रहन-सहन में भी कुछ नियमों का पालन किया जाता है:
~ ब्रह्मचर्य: इन नौ दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करना शुभ माना जाता है।
~ सरल जीवन: भक्त सादगीपूर्ण जीवन जीते हैं।
~ सफाई और शुद्धता: घर और आसपास की जगहों को साफ-सुथरा रखा जाता है। पूजा स्थल की विशेष साफ-सफाई की जाती है।
~ रंग और वस्त्र: कई लोग इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित रंगों के अनुसार वस्त्र धारण करते हैं।
ये सभी नियम न केवल धार्मिक आस्था का हिस्सा हैं, बल्कि इनका वैज्ञानिक महत्व भी है। ये शरीर और मन को शांत रखने में मदद करते हैं और एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं।

दुर्गा सप्तशती पाठ का नियम
नवरात्रि के पहले दिन से दुर्गा सप्तशती पाठ की शुरुआत करनी चाहिए।
पाठ करते समय लाल रंग का वस्त्र धारण करें।
पाठ के दौरान बातचीत न करें।
पाठ करते समय सफाई का विशेष ध्यान दें।
दुर्गा सप्तशती के 13 अध्याय को एक ही दिन में पूरा करने का विधान है।
दुर्गा सप्तशती पाठ के लाभ
यह पाठ मनोकामना पूर्ण करता है और सभी प्रकार के कष्टों को दूर करता है।
यह भक्तों को देवी माँ की कृपा प्राप्त करने में सहायता करता है।
जो लोग दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, वे महान शक्ति और सुरक्षा प्राप्त करते हैं।
संकल्प: पाठ शुरू करने से पहले देवी माँ के समक्ष संकल्प लेना चाहिए।
यदि आप समय और सुविधा के अभाव में संपूर्ण दुर्गा सप्तशती का पाठ नहीं कर पा रहे हैं, तो सिद्ध कुंजीका स्तोत्र का पाठ करना भी एक अच्छा विकल्प है, जिससे आपको समान फल प्राप्त होता है।

दुर्गा कवच का पाठ कैसे करें?
सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें, माँ दुर्गा का ध्यान करें और घी का दीपक जलाएं। पाठ शुरू करने से पहले और बाद में ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे मंत्र का जाप करें। यदि संभव हो तो पाठ से पहले देवी सूक्तम का पाठ करें। पाठ करते समय शरीर के उन हिस्सों के बारे में कल्पना करें जहाँ देवी आपकी रक्षा कर रही हैं। शरीर के विभिन्न अंगों के लिए देवी से रक्षा की प्रार्थना करें। पाठ को हिंदी में भी कर सकते हैं।
भाव: कवच में शरीर के अंगों के नाम के साथ मंत्र आते हैं, उन पर ध्यान केंद्रित करते हुए यह कल्पना करें कि देवी उन अंगों की रक्षा कर रही हैं।
समापन: पाठ पूरा करने के बाद माँ दुर्गा से क्षमा याचना करें।
‘दुर्गा दुर्गा’ जप का महत्व
यदि आपको समय नहीं मिलता है, तो आप देवी के नाम (जैसे ‘दुर्गा दुर्गा’ कह कर) का भी जप कर सकते हैं, यह भी रक्षा कवच का कार्य करता है.
कवच में शरीर के सभी अंगों की सुरक्षा का वर्णन है. इसलिए, इस पाठ से शरीर पर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है और आप स्वस्थ महसूस करते हैं.
अगर आप लंबे समय तक कोई पाठ नहीं कर सकते, तो दुर्गा कवच का संक्षिप्त पाठ भी आपकी मदद कर सकता है.
क्यों शापित है दुर्गा सप्तशती ?
चूंकि दुर्गा सप्तशती के सभी मंत्र बहुत ही प्रभावशाली हैं, इसलिए इस ग्रंथ के मंत्रों का दुरूपयोग न हो, इसके हेतु भगवान शंकर ने इस ग्रंथ को शापित कर रखा है, और जब तक इस ग्रंथ को शापोद्धार विधि का प्रयोग करते हुए शाप मुक्त नहीं किया जाता, तब तक इस ग्रंथ में लिखे किसी भी मंत्र का जप नहीं करें। दुर्गा सप्तशती के पाठ से पहले किए जाने वाले शापोद्धार का मुख्य मंत्र है: “ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा।” इस मंत्र का जप सप्तशती के पाठ से पहले और पाठ पूरा होने के बाद सात-सात बार किया जाता है, ताकि मंत्र में आई किसी भी त्रुटि का प्रभाव दूर हो सके और पाठ का पूरा फल प्राप्त हो सके।
मंत्र का विवरण:
मंत्र: ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा।
उद्देश्य: यह मंत्र दुर्गा सप्तशती के बीज मंत्रों के शाप को दूर करने के लिए होता है, जिससे पाठ प्रभावी और निर्दोष हो सके।
जप की विधि: इस मंत्र का जप पहले एक बार पाठ आरंभ करने से पूर्व और फिर पाठ पूरा होने के बाद सात बार किया जाता है।
शापोद्धार का महत्व:
दुर्गा सप्तशती के मंत्रों को शापित माना जाता है, और शापोद्धार के बिना इनका पाठ करने से साधक को अपेक्षित फल नहीं मिलता, या इसका उलटा प्रभाव भी पड़ सकता है।
यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि मंत्रों का उच्चारण सही हो और पाठ का सकारात्मक प्रभाव ही पड़े।
देशभर में उत्साह का माहौल और तैयारियां
नवरात्र के आगमन को लेकर देशभर में भक्तों के बीच खासा उत्साह देखा जा रहा है। मंदिरों में विशेष सजावट की गई है और लाइटिंग से उन्हें रौशन किया गया है। जगह-जगह दुर्गा पूजा पंडाल बनाए जा रहे हैं।
~ दिल्ली: राजधानी दिल्ली में झंडेवालान मंदिर और कालकाजी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ने की संभावना है। प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं।
~ पश्चिम बंगाल: दुर्गा पूजा, जो कि नवरात्र के दौरान मनाई जाती है, पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है। कोलकाता में भव्य पंडालों और देवी दुर्गा की सुंदर मूर्तियों की स्थापना की जा रही है।
~ गुजरात: गुजरात में गरबा और डांडिया रास का आयोजन नवरात्र का मुख्य आकर्षण है। यहां लोग पारंपरिक परिधान पहनकर गरबा खेलते हैं और मां दुर्गा की आराधना करते हैं।
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