खाता धारक, बिचौलिया और एनजीओ मालिक समेत 5 गिरफ्तार
देश का सबसे बड़ा ‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम: रिटायर्ड बैंकर से 22.92 करोड़ की ठगी
नई दिल्ली (एजेंसियां)। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ठगी का अब तक का सबसे बड़ा मामला सामने आया है। दक्षिण दिल्ली के गुलमोहर पार्क इलाके में रहने वाले 78 वर्षीय सेवानिवृत्त बैंकर नरेश मल्होत्रा से साइबर अपराधियों ने 22.92 करोड़ रुपये की ठगी की है। दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूजन एंड स्ट्रैटेजिक ऑपरेशंस (IFSO) ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए पांच आरोपितों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए लोगों में तीन खाताधारक, एक बिचौलिया और एक एनजीओ का मालिक शामिल है।
रोज दो घंटे, छह हफ़्तों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’
सेवानिवृत्त बैंकर नरेश मल्होत्रा को साइबर ठगों ने लगभग छह हफ्ते तक डिजिटल अरेस्ट में रखा। इस दौरान, उन्हें प्रतिदिन वीडियो कॉल के माध्यम से दो-दो घंटे ‘कैद’ रखा जाता था। ठगी की शुरुआत 1 अगस्त को हुई, जब मल्होत्रा के पास एक महिला का फोन आया। महिला ने खुद को एक दूरसंचार कंपनी की वरिष्ठ अधिकारी बताया और दावा किया कि उनके मोबाइल नंबर का इस्तेमाल धोखाधड़ी के लिए किया गया है। बाद में, उन्हें मुंबई पुलिस, प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीबीआई अधिकारी बनकर डराया गया और आतंकी फंडिंग तथा पुलवामा हमले से उनके आधार कार्ड डिटेल जुड़ने का झूठा आरोप लगाकर धमकाया गया। मल्होत्रा को मजबूर किया गया कि वे अपने इक्विटी शेयर बेचकर यह रकम आरोपियों के खातों में ट्रांसफर कर दें, यह आश्वासन देकर कि सत्यापन के बाद पैसा वापस मिल जाएगा।

एनजीओ के जरिए विदेश भेजी गई मोटी रकम
ठगी गई मोटी रकम (22.92 करोड़ रुपये) को कंबोडिया में बैठे चीन के साइबर अपराधियों तक पहुंचाने और कानूनी अड़चनों से बचने के लिए उत्तराखंड के एक गांव में स्कूल व एनजीओ चलाने वाले व्यक्ति को भी कमीशन के लालच में इस साजिश में शामिल किया गया था। कंबोडिया में बैठे मुख्य ठगों ने दिल्ली में अपने भारतीय एजेंटों के माध्यम से इस बड़ी वारदात को अंजाम दिया। पुलिस ने इस मामले की जांच के दौरान कुछ बैंक खातों में जमा करीब 3 करोड़ रुपये को फ्रीज करा दिया है।
बैंकर होते हुए भी शिकार होने का कारण जागरूकता की कमी
यह मामला एक सेवानिवृत्त बैंकर से जुड़ा है, जो बैंकिंग और वित्तीय लेनदेन की गहरी समझ रखते थे। इसके बावजूद, वे 22.92 करोड़ रुपये की ठगी का शिकार हुए, जो आम लोगों में जागरूकता की कमी के गंभीर सवाल खड़े करता है।
अथॉरिटी का डर (Fear of Authority): साइबर ठग अक्सर खुद को पुलिस, सीबीआई, या ईडी जैसे उच्च सरकारी विभागों के अधिकारी बताते हैं। भारतीय समाज में इन एजेंसियों के प्रति एक स्वाभाविक डर और सम्मान होता है, जिसका फायदा उठाकर ठग पीड़ित को इतना डरा देते हैं कि वे सोचने-समझने की क्षमता खो देते हैं।
भावनात्मक ब्लैकमेल और गोपनीयता: ठग अक्सर मनी लॉन्ड्रिंग या टेरर फंडिंग जैसे गंभीर और संवेदनशील मामलों का जिक्र करते हैं, जिससे पीड़ित बदनामी और गिरफ्तारी के डर से गोपनीयता बनाए रखने को मजबूर हो जाता है और किसी से सलाह नहीं लेता। नरेश मल्होत्रा को भी बेटियों और नाती-पोतों को जान से मारने की धमकी देकर किसी को न बताने के लिए मजबूर किया गया था।
डिजिटल अरेस्ट एक नई तकनीक: ‘डिजिटल अरेस्ट’ एक नई तकनीक है, जिसमें ठग वीडियो कॉल के माध्यम से लगातार दबाव बनाकर पीड़ित को एक वर्चुअल ‘कैद’ में रखते हैं। लगातार दबाव और निगरानी से पीड़ित मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है और ठगों के निर्देशों का पालन करने लगता है।
तकनीकी समझ का अभाव: भले ही पीड़ित सेवानिवृत्त बैंकर हों, लेकिन नई साइबर अपराध तकनीकों और ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे खतरों के बारे में उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं थी। यह दिखाता है कि साइबर सुरक्षा जागरूकता का ज्ञान हर उम्र और पेशे के व्यक्ति के लिए लगातार अपडेट होते रहना जरूरी है।
पुलिस प्रक्रिया की जानकारी का अभाव: आम इंसान और यहाँ तक कि अनुभवी बैंकर भी, पुलिस या जांच एजेंसियों की वास्तविक कार्यप्रणाली से परिचित नहीं होते। उन्हें यह नहीं पता होता कि कोई भी जांच एजेंसी व्हाट्सएप या वीडियो कॉल पर डिजिटल अरेस्ट वारंट जारी नहीं करती और न ही निजी खातों में पैसा ट्रांसफर करने को कहती है। इस जानकारी के अभाव में वे आसानी से जाल में फंस जाते हैं।
Leave a comment