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नई दिल्ली/लखनऊ। भारतीय संविधान ने 26 नवंबर को अपने 76 वर्ष पूर्ण किए हैं। यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें देश के गणतंत्रात्मक, संघात्मक और लोकतांत्रिक स्वरूप को सशक्त किया गया है। …जबकि पड़ोसी देशों में संविधान कई बार बदले गए, भारतीय जनता ने अपने मूल संविधान में अटूट आस्था बनाए रखी है। संसद ने अब तक 106 संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से कानून और सामाजिक विकास के बीच समन्वय बनाए रखा है, जो हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है।

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय की पाँच सदस्यीय खंडपीठ ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा अनुच्छेद 143(1) के तहत मांगे गए 14 बिंदुओं पर महत्वपूर्ण परामर्श दिया। इस परामर्श में न्यायमूर्तियों ने ‘स्वदेशी व्याख्या’ पद्धति अपनाई और ‘शक्ति विभाजन सिद्धांत’ (Separation of Powers) की पुनर्स्थापना पर जोर दिया।

न्यायिक परामर्श में न्यायपालिका को स्वयं सचेष्ट किया गया कि वह कार्यपालिका (अर्थात राष्ट्रपति एवं राज्यपालों) द्वारा विधेयकों को स्वीकृत करने के संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप न करे। यह एक महत्वपूर्ण न्यायिक संकेत है, जो न्यायपालिका के लिए ‘लक्ष्मण रेखा’ खींचता है और व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच पारस्परिकता एवं सौहार्द की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

टकराव के दो प्रमुख बिंदु: कॉलेजियम और मूल ढाँचा
जनता और कई विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय ने दो प्रमुख निर्णयों में संभवतः इस ‘लक्ष्मण रेखा’ का अतिक्रमण किया है, जिससे संवैधानिक संस्थाओं के बीच शक्ति संतुलन प्रभावित हुआ है।

    • अतिक्रमण: 1993 में न्यायिक नियुक्तियों के लिए बनी कॉलेजियम प्रणाली के तहत, न्यायपालिका ने उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थानांतरण का अधिकार स्वयं ले लिया।
    • संवैधानिक प्रावधान के विपरीत: यह व्यवस्था अनुच्छेद 124 में वर्णित प्रक्रिया के विपरीत है, जो राष्ट्रपति को मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से परामर्श कर नियुक्तियाँ करने का अधिकार देती है।
    • अंतर्राष्ट्रीय तुलना: प्रमुख लोकतंत्रों में यह एक असामान्य व्यवस्था है जहाँ न्यायपालिका ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करती है।
    • प्रभाव: विशेषज्ञों का मानना है कि कॉलेजियम व्यवस्था से न्यायिक नियुक्तियों में निष्पक्षता एवं पारदर्शिता प्रभावित हुई है, जिससे कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति का संतुलन बिगड़ गया है।
      • उद्देश्य और उत्पत्ति: केशवानंद भारती मामले (1973) में न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान के मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं कर सकती।
      • अस्पष्टता: न्यायालय ने मूल ढांचे की कोई अंतिम परिभाषा या सूची नहीं बनाई। कालांतर में, शीर्ष अदालत मूल ढांचे के अलग-अलग पहलू चिह्नित करती रही है।
      • संसद की अनिश्चितता: इस अस्पष्टता के कारण संसद कभी भी आश्वस्त नहीं हो पाती कि उसके द्वारा किया गया संविधान संशोधन कहीं किसी अज्ञात मूल ढांचे का उल्लंघन तो नहीं कर रहा है।
      • न्यायिक वर्चस्व: मूल ढांचे के सिद्धांत का प्रयोग कर सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं को एक प्रकार का ‘न्यायिक वीटो’ प्रदान कर दिया है, जो कानूनों और संवैधानिक संशोधनों को भी निरस्त कर सकता है। यह शक्ति विभाजन सिद्धांत के प्रतिकूल है और न्यायपालिका के वर्चस्व को स्थापित करता है।
      • न्यायपालिका में विलंब और सरलीकरण की आवश्यकता:
        सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में राष्ट्रपति एवं राज्यपालों को विधेयकों को स्वीकृत करने में अति-विलंब न करने का संकेत दिया। यह एक सकारात्मक कदम है, लेकिन यह सवाल भी उठाता है कि क्या यह संकेत न्यायपालिका तक भी जाएगा?
      • वादों के निपटारे में विलंब: न्यायपालिका में वादों को निपटाने में लगने वाला अत्यधिक समय एक बड़ी समस्या है। यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय किसी ऐसी व्यवस्था को जन्म दे सकता है, जिससे मुकदमों पर एक-सप्ताह, एक-महीने या एक-वर्ष में अंतिम निर्णय हो सके।
      • संविधान की भाषा का सरलीकरण: एक विकसित राष्ट्र के लिए संविधान की क्लिष्ट भाषा का सरलीकरण अत्यंत आवश्यक है।।संविधान की भाषा ऐसी होनी चाहिए कि न केवल विधि विशेषज्ञ, बल्कि आम नागरिक भी संविधान को पढ़-समझ सकें।
      • व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका अपनी-अपनी उत्तरदायित्वों की लक्ष्मण रेखा को पहचानें।
      • ये तीनों स्तंभ भारतीय संस्कृति और मूल्यों को ध्यान में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें। तभी भारत विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ लोकतंत्र भी बन सकेगा। संवैधानिक संस्थाओं के बीच पारस्परिक सम्मान और सौहार्द ही हमारे संविधान की 76 वर्षों की सफलता को आगे भी कायम रख सकता है।
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