विनेश ठाकुर, सम्पादक, विधान केसरी की कलम से…
सामाजिक क्रांति के योद्धाओं का विमर्श और वर्तमान राजनीतिक पतन
बाबा साहब डॉ. अंबेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, कर्पूरी ठाकुर, ललाई यादव, कांशीराम जी, छत्रपति शाहूजी महाराज, ई.वी. रामासामी पेरियार, श्री नारायण गुरु, राम वर्मा, बाबू जगदेव प्रसाद – ये वे सामाजिक-आर्थिक क्रांति के योद्धा हैं, जिन्होंने सदियों से शोषित समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित किया। दु:खद है कि आज इन्हीं महापुरुषों के आदर्शों को ताक पर रखकर, ‘आदर्श धर्म’ का ढिंढोरा पीटने वाले तथाकथित नेता अपना राजनीतिक उल्लू सीधा कर रहे हैं।
आदर्शवाद से निजी स्वार्थ तक
यह एक कड़वी सच्चाई है कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), और अल्पसंख्यक समुदायों से उभरे अनेक नेता संविधान के समर्थक होने का दावा करते हुए भी, व्यावहारिक रूप से अल्पसंख्यकों के अधिकारों के भक्षक बने रहे हैं। ऐसे “कथित” नेताओं के आचरण से कोई भी इंकार नहीं कर सकता। एक समय ऐसा था जब सामाजिक, जातीय, और धार्मिक क्रांति का दावा करने वाले कैडर आधारित समूह उभरे थे। इन आंदोलनों से जो नेता निकले, उनमें से एकाध को छोड़कर, अधिकांश “जय भीम, नमो बुद्धाय” जैसे क्रांतिकारी नारों की शुरुआत भी समाज में या अपने परिवर्तित धर्म के दायरे में खुलकर नहीं कर सके। उनकी तथाकथित ‘राजनीतिक क्रांति’ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं तक सीमित होकर रह गई। जब भी कोई नया नेता इन समुदायों से आगे बढ़ा, SC, ST और अल्पसंख्यकों ने उस पर विश्वास किया और उसका साथ दिया, लेकिन कुछ समय बाद ही हर कोई नेता निजी स्वार्थ की पूर्ति में संलग्न पाया गया। मेरी व्यक्तिगत निराशा यह है कि जिन नेताओं में मैंने एकजुटता और भरोसे की उम्मीद देखी, वे भी अंततः निजी स्वार्थ के स्वामी साबित हुए। जो नेता संघ (RSS) जैसे संगठनों की आलोचना करते हैं, उनके आचरण में एकजुटता और समर्पण का एक प्रतिशत भी दिखाई नहीं देता।

सत्ता का मोह और परिवारवाद
आज देश की राजनीति में, स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक, सत्ता में बने रहने का एकमात्र उद्देश्य केवल निजी हित और राजनीतिक स्वार्थ रह गया है। मैं स्वयं को सबसे बड़ा गुनहगार मानता हूँ, क्योंकि मैंने देशभक्त होने के नाते, भारत माता को देश के समान मानकर, 140 करोड़ लोगों को संविधान की शपथ दिलाने के लिए संघर्ष किया। लेकिन आज मुझे यह देखकर पीड़ा होती है कि अवसर मिलते ही, ये नेता संवैधानिक प्रहरी बनने के बजाय, अपने परिवार – बहुओं, बेटों, पत्नियों, और रिश्तेदारों को सत्ता और आर्थिक रूप से मजबूत करने में जुट गए। इन नेताओं का दोगलापन तो देखिए: निजी हितों की पूर्ति के लिए ये सही काम से कम के लिए भी अपने गले में “जाँच का फंदा” जारी करवाने से नहीं डरते, मानो ये सब निजीकरण के लिए कर रहे हों। यह विडंबना है कि लोकतंत्र की शुरुआत से लेकर आज तक के राष्ट्रपति पद के नेता तक इस प्रवृत्ति से अछूते नहीं रहे।
क्रांति का भ्रम और शक्ति की कुंजी
बाबू जगदेव प्रसाद, ज्योतिबा फुले, पेरियार सामी, और कांशीराम जी जैसे लोग सामाजिक क्रांति में शामिल थे, लेकिन अफसोस! वे राजनीतिक क्रांति में कोई बड़ा बदलाव नहीं कर सके। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर के जन्मदिन पर जो ग्रंथ उन्हें अल्पसंख्यकों के बीच पहुँचाना था, उस पर आधारित उनकी जाति आज तक भी राजनीतिक सत्ता में अपनी वास्तविक भागीदारी (Zero) साबित कर रही है। 80 के दशक के बाद कांशीराम जी का उदय एक राजनीतिक क्रांति के रूप में हुआ था। उन्होंने बाबा साहब के उस उपदेश को पहचान दी कि “शक्ति ही हर समस्या की स्वामी कुंजी है।” डॉ. अंबेडकर ने घोषणा की थी, “मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ था, लेकिन हिंदू धर्म में मरूंगा नहीं।” उन्होंने यह कर भी दिखाया। लेकिन आज उनके नाम पर धन, दौलत, शोहरत, और पद पाने वाले ये नेता बस खुद को सही साबित करने में लगे हुए हैं।
85% के अनुयायियों का पतन
मेरे साथियों ने धोखा दिया। मैंने उनसे आग्रह किया था कि यदि मेरे द्वारा शुरू किए गए सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन को मजबूती नहीं दे सकते, तो कम से कम पीछे मत हटना। दु:खद है कि 85 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले ये बाबा साहब के अनुयायी आज अपने और अपने परिवार तक सिमट कर रह गए हैं। बहनजी ने भाई-भतीजों को आगे बढ़ाया, और अन्य साथियों ने पूरे खानदान के समर्थकों को SC, ST, और अल्पसंख्यकों के हितों से ऊपर रखा। यह घटियापन की पराकाष्ठा नहीं तो क्या है? आज यही अलग-अलग राजनीतिक दल और लोग खुद को बड़ा साबित करने के चक्कर में इस हद तक गिर चुके हैं कि ये जिला पंचायत सदस्य बनने की स्थिति में भी नहीं हैं। इसके बावजूद, बाबा साहब सहित महापुरुषों के नाम पर सत्ता का सपना दिखाने वाले ज़्यादातर नेता पद, धन, दौलत, और शोहरत के गुलाम बन चुके हैं और जनांदोलन के लिए समर्थकों को तैयार करने से कतराते हैं।
असली शत्रु कौन?
इससे भी अधिक शर्मनाक बात यह है कि वर्तमान में 85 प्रतिशत के हितों की रक्षा करने का दावा करने वाले SC, ST, और अल्पसंख्यक समुदायों में बने सामाजिक संगठन, वास्तव में इस आबादी की सबसे बड़ी शत्रु संपत्ति बन चुके हैं। उनके समूह उन 15 प्रतिशत लोगों द्वारा स्थापित और विकसित किए गए हैं जो समाज की मुख्य धारा में केवल दो प्रतिशत की संख्या में हैं। ये SC, ST, और अल्पसंख्यकों के शिष्यों के शिष्य बन चुके हैं। जब तक ये नेता और संगठन आत्म-निरीक्षण कर, महापुरुषों के सच्चे सिद्धांतों को नहीं अपनाते, तब तक सामाजिक-राजनीतिक क्रांति केवल एक सपना ही रहेगी। निजी स्वार्थ को त्याग कर, एकजुट होकर, शक्ति की कुंजी को साधने की दिशा में ही असली मुक्ति निहित है।
Leave a comment