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वैचारिकी पर सवाल: एक विशेष रिपोर्ट

बिहार से हरियाणा तक प्रतीकों की राजनीति विफल

गलत दिशा में ले जा रहे हैं राहुल गांधी के सलाहकार?

वैचारिकी पर सवाल: वामपंथी चश्मे से जमीनी हकीकत देख रही है कांग्रेस?

नई दिल्ली/ब्यूरो रिपोर्ट: अखिल भारतीय संगठन से लैस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ वह लोक मर्म और जनता की बुनियादी जरूरतों को छूने वाले विचारों से दूर होती दिख रही है। ताज़ा राजनीतिक हालातों का विश्लेषण करें तो बिहार की 243 सीटों वाली विधानसभा में 61 सीटों पर लड़ कर महज 6 सीटें जीतना कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का विषय है। जानकारों का मानना है कि पार्टी की रणनीति और शीर्ष नेतृत्व की वैचारिकी अब चुनावी सफलता दिलाने में नाकाम साबित हो रही है।

प्रतीकों की राजनीति और चुनावी हकीकत

राजनीति में प्रतीकों के जरिए जनता तक संदेश पहुँचाने की पुरानी परंपरा रही है। राहुल गांधी ने भी बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान मखाने के खेत में उतरने से लेकर हरियाणा चुनाव में ट्रैक्टर चलाने और धान की रोपाई करने तक कई प्रयास किए। बौद्धिक वर्ग इसे ‘अभूतपूर्व’ कदम करार देता है, लेकिन चुनावी नतीजे बताते हैं कि जनता इसे स्वीकार नहीं कर पा रही है। सवाल यह उठता है कि इन कोशिशों के बावजूद लोग कांग्रेस के साथ जुड़ क्यों नहीं रहे?

वामपंथी सोच का ‘शिकंजा’

विश्लेषकों का दावा है कि कांग्रेस आज उन मुद्दों को ज्यादा हवा दे रही है जो उनके वामपंथी सलाहकार सुझाते हैं। बौद्धिक और अकादमिक जगत में ये मुद्दे भले ही आकर्षक लगें, लेकिन जमीनी स्तर पर ये अस्वीकार्य हो चुके हैं। उदाहरण के तौर पर, निजीकरण की कुछ कमियां हो सकती हैं, लेकिन इसने देश में जो आर्थिक चमक और अवसर पैदा किए हैं, उसे वामपंथी वैचारिकी नहीं देख पा रही है। पार्टी के भीतर भी कई वरिष्ठ नेता सच बोलने से कतरा रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि ‘कड़वी दवा’ सुझाना उनके करियर के लिए हानिकारक हो सकता है।

इंदिरा गांधी की समझ बनाम वर्तमान नेतृत्व

कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से की जा रही है। इंदिरा गांधी की भारतीय समाज को लेकर समझ बहुत गहरी थी। वे वक्त और इलाके की परंपरा के अनुसार खुद को ढालना जानती थीं। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कांग्रेस की छतरी तले कई विचारधाराएं थीं, लेकिन आज पार्टी पर वामपंथ का असर इतना गहरा है कि वह अपनी बुनियादी ‘मध्यमार्गी’ और ‘समाजवादी’ विचारधारा को खोती जा रही है।

भाजपा के ‘प्रतिकार’ के सामने पस्त होती रणनीति

भाजपा के खिलाफ हर बार सांप्रदायिकता को चुनावी मुद्दा बनाना भी कांग्रेस की सलाहकार मंडली की एक ऐसी रणनीति मानी जा रही है जिसका तोड़ भाजपा ने ढूंढ लिया है। इसी वैचारिक कमजोरी के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस उन क्षेत्रीय दलों के सामने ‘छोटे भाई’ की भूमिका में सिमट गई है, जिनका उदय ही कभी कांग्रेस विरोध की राजनीति से हुआ था।

अस्तित्व का संकट?

प्रकृति का नियम है कि हर वस्तु की एक निश्चित आयु होती है। जिस तरह से कांग्रेस अपने बुनियादी सिद्धांतों से भटककर वामपंथी एजेंडे की ओर झुकी है, उससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या पार्टी अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है? आज का साक्षर और सूचनाओं से लैस मतदाता प्रतीकों के पीछे के असली संदेशों को समझने लगा है, लेकिन कांग्रेस शायद इस बदलाव को भांपने में देरी कर रही है।

~ आर्य राजेश
उप-संपादक (सुपर इंडिया न्यूज़ TV / Z9 न्यूज़ TV)

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