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बिजनौर। जिला पंचायत चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की राह उतनी आसान नहीं दिखाई दे रही, जितना प्रदेश नेतृत्व को फीडबैक दिया जा रहा है। किसान आंदोलन, बढ़ती मंहगाई, महिला उत्पीड़न की घटनाएं, सरकारी विभागों में बेतहाशा भ्रष्टाचार जैसे कई मुद्दे भाजपा की राह का रोड़ा बने हुए हैं। कुल मिला कर भाजपा के लिए सब कुछ ऑल इज वैल नहीं रह गया है। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल की जुगलबंदी, बहुजन समाज पार्टी व कांग्रेस के परंपरागत वोटर बीजेपी प्रत्याशियों को नाकों चने चबाने के लिए मजबूर करने को आतुर बैठे हैं। भाजपा ने हाल ही में पार्टी के कुछ ऐसे नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया, जिन्होंने संगठन के लिए एक तरह से कुर्बानी देने से भी गुरेज नहीं किया। ऐसा हुआ भी इसलिए, क्योंकि वो वरिष्ठों की चरण वंदना से अलग हटकर पार्टी व समाज के लिए कार्य करते रहे। एक समय अनुशासन के लिए मानी जाने वाली भाजपा में सत्ता की चकाचौंध इतनी हावी हो गई है कि समर्पित कार्यकर्ता दरकिनार कर दिया गया है। चाहे सीएमओ से महीना बंदी का मामला हो या अन्य सरकारी विभागों में दखलअंदाजी, शिकायतों के बावजूद सब कुछ साधारण तौर पर लिया गया। यही नहीं जिला पंचायत सदस्य चुनाव में उतरे एक नेताजी ऐसे भी हैं जो कई साल पूर्व कराए गए प्रचार की रकम हजम कर गए हैं। अभी विज्ञापन के नाम पर एक और घोटाला सामने आने की गुंजाइश बनी हुई है! प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह को बिजनौर आगमन पर काले झंडे दिखाने की घटना को भी पार्टी की अंदरूनी कलह के तौर पर देखा जा सकता है। वह बात अलग है कि घटना की भेंट शहर कोतवाल चढ़ गए और पार्टी के भितरघाती स्वछंद विचरण करते रहे!

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