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🙏बुरा मानो या भला🙏 निःसन्देह मॉबलिंचिंग एक अभिशाप है, लेकिन……मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”

अभी एक ख़बर पढ़ी, जिसमें एक शख़्स को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। मरने वाला शख़्स हिन्दू था या मुसलमान, यह मैं नहीं जानता, लेकिन वह एक इंसान था इतना अवश्य जानता हूँ। भीड़ द्वारा पीट-पीटकर किसी व्यक्ति की हत्या करना ही मॉबलिंचिंग कहलाता है। मॉबलिंचिंग इस देश के लिए सबसे बड़ा अभिशाप है, लेकिन उससे भी अधिक दुःखद यह है कि मॉबलिंचिंग जैसे अमानवीय कृत्य पर भी राजनीतिक हित और मज़हब देखा जाता है।

जब एक अख़लाक़ या एजाज़ मरता है तो तमाम “सेक्युलर गैंग” सड़कों पर छातियाँ पीटता है। संविधान की दुहाई दी जाती है, मज़हब ख़तरे में आ जाता है। सरकारी मदद की आड़ में जनता की गाढ़ी खून-पसीने की कमाई को दोनों हाथों से लुटाया जाता है और मोमबत्ती जलाकर मगरमच्छ के आंसू बहाए जाते हैं। टीवी चैनलों पर डिबेट की आड़ में देश और बहुसंख्यक विरोधी बयान दिए जाते हैं। अदालतों में जनहित याचिकाओं की बाढ़ सी आ जाती है। …और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का लाइसेंस जारी हो जाता है।

…लेकिन जब साम्प्रदायिक गुंडे अंकित शर्मा को चाकू से 400 बार गोदते हैं, चंदन गुप्ता की नृशंस हत्या की जाती है, पश्चिम बंगाल, केरल, कश्मीर और आसाम जैसे राज्यों में निर्दोष और मासूम बच्चों के गले काटे जाते हैं, बेबस और लाचार महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है, युवाओं के गले रेत दिए जाते हैं, तब कोई सेक्युलर, कोई समाजवादी और कोई ईमानवाला बाहर नहीं निकलता। किसी को संविधान याद नहीं रहता, कोई मज़हब खतरे में नहीं आता। तब सरकारी मदद के नाम पर कोई फूटी कौड़ी नहीं देना पसंद करता। गंगा-जमुनी तहज़ीब की मानो नदियां बहने लगती हैं। भाईचारे के नाम पर “चारा” बनाने वाले अपने-अपने दड़बों में घुस जाते हैं।

सत्य बहुत कड़वा होता है लेकिन सत्य हमेशा सत्य ही रहता है। मॉबलिंचिंग किसी की भी और किसी ने भी की हो, उचित नहीं ठहराई जा सकती। अपराध केवल अपराध है, अपराधी का मज़हब उसके दुष्प्रभाव को कम या अधिक नहीं कर सकता।
हत्यारा कोई भी हो वह मानवता का शत्रु ही है, मरने वाला हिन्दू-मुसलमान नहीं होता, वह इंसान होता है।

इंसानियत मज़हब या राजनीतिक हित नहीं देखती बल्कि केवल और केवल मानवता और मानव जीवन का मूल्य आंकती है।

सेक्युलरिज्म और सोशलिज्म हमारे लोकतंत्र की नींव हैं, परन्तु उसमें दोगलापन और तुष्टिकरण की दीमक नहीं लगनी चाहिए।

आइये राष्ट्रहित और समाजहित में हम सब मिलकर इस घृणित और अमानवीय व्यवहार को रोकने की शपथ लें। मानवीय मूल्यों को जीवित रखने हेतु मॉबलिंचिंग जैसे अभिशाप को समाप्त करना ही होगा।

🖋️ मनोज चतुर्वेदी “शास्त्री”
समाचार सम्पादक- उगता भारत हिंदी समाचार-
(नोएडा से प्रकाशित एक राष्ट्रवादी समाचार-पत्र)

विशेष नोट- उपरोक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। उगता भारत समाचार पत्र व newsdaily24 के सम्पादक मंडल का उनसे सहमत होना न होना आवश्यक नहीं है।

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