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निकाय चुनाव को लेकर एक बार फिर से छिड़ी बहस

यक्ष प्रश्न! जो न हुए अपनों के, क्या होंगे हमारे?

लखनऊ (शादाब अनवर)। चुनाव कोई भी हो, चाहे लोकसभा हो या फिर विधानसभा अथवा ग्राम पंचायत और निकाय चुनाव! आम मतदाता के सामने एक यक्ष प्रश्न हमेशा खड़ा हो जाता है कि उसे करना क्या चाहिए? कुछ ऐसा ही अब भी है। निकाय चुनाव को लेकर मतदाताओं में एक बार फिर विचार मंथन शुरू हो गया है कि आखिरकार मतदान किसके पक्ष में किया जाए? पार्टी सिंबल देख कर या प्रत्याशी का चेहरा देखकर?

व्यवस्थाओं का परिणाम

यह बात हर कोई भली भांति जानता है कि कोई भी एक संस्थान अथवा राजनैतिक दल निश्चित व्यवस्थाओं के तहत चलता है। कार्यकर्ताओं की एक लंबी चौड़ी फेहरिस्त होती है ऊपर लेकर नीचे तक या कह लीजिए नीचे से ऊपर तक। सबके अपने काम, अपनी जिम्मेदारियां। बस खास बात ये होती है कि उन्हीं में से एक उनका मुखिया, बाकी सब नीचे। … लेकिन होता टीम वर्क है। मुखिया का साथ संभालने को कुछ और सहयोगी भी अन्य के मुकाबले ज्यादा जिम्मेदारियों का बोझ उठाते हैं। इसके बावजूद सब कुछ अनवरत, निरंतर, निर्विघ्न चलता रहता है। लोकतंत्र की मूल अवधारणाओं में से एक है ये। यही कारण है कि कोई ये नहीं कहता कि अपने ही बीच के किसी एक की नुमाइंदगी में काम क्यों करें?

छवि किसकी, पार्टी या प्रत्याशी की?

कई बार प्रत्याशी अच्छी छवि का होता है लेकिन वह जिस पार्टी से चुनाव मैदान में उतरता है, उसकी छवि निर्विवाद नहीं होती। इसके विपरित प्रत्याशी कमजोर अथवा विवादित छवि का है और उस पर भरोसा जताने वाला दल खुद में सर्व स्वीकार्य है। ऐसे में मतदाता का पसोपेश में पड़ जाना स्वाभाविक है। इसलिए मतदाता की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह अपने अमूल्य मताधिकार का प्रयोग सोच समझ कर करे।

हिकारत भरी नजर से देखा जाता है दल बदलने वाला

दल बदलने वाले को हमेशा हिकारत भरी नजर से ही देखा जाता है। आम मतदाता ही नहीं संगठन, पार्टी से जुड़े जमीनी लोग भी इनको दिल से तवज्जो नहीं देते। मतदाता सोचता है कि कितने समय तक अमुक व्यक्ति जिनके साथ जुड़ा हुआ था, उसकी तारीफ के कसीदे काढ़ते थकता नहीं था। टिकट न मिलने पर अचानक उसकी आस्थाओं के केंद्र बदल गए? तब ऐसे व्यक्ति पर विश्वास भला क्यों और किन कारणों से किया जाए। वहीं जिस पार्टी में दल बदलू पहुंचता है, उसके कार्यकर्ता के मन में सवाल उठता है कि हमारी बरसों की मेहनत का परिणाम यह हुआ कि बाहरी व्यक्ति को ऊपर थोप दिया गया।

निर्दलीय भी कमजोर नहीं

पार्टी से इतर निर्दलीय भी खुद में कई जगह पावरफुल साबित होते हैं। पावरफुल का मतलब बाहुबलि नहीं निकाला जाना चाहिए। बाहुबलियों को तो बिल्कुल ही नकार देना चाहिए। जहां किसी पार्टी का प्रत्याशी जनता की मनोभावनाओं पर खरा उतरता न हो, वहां साफ सुथरी छवि के निर्दलीय पर ही विश्वास जताना चाहिए। इसमें भी ध्यान देने वाली बात यह है कि उक्त प्रत्याशी भी कहीं अपनी पिछली आस्थाओं को लात मारकर न आया हो!

विशेष~(विभिन्न राजनैतिक दलों, संस्थाओं, व्यक्तियों से वार्ता पर आधारित)

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