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बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में हुआ कार्यक्रम

“भारतीय ज्ञान परंपरा दृष्टि एवं सृष्टि” शीर्षक पर व्याख्यान

राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास बरखेड़ी पहुंचे लखनऊ

संस्कृत भाषा के महत्व के साथ पाश्चात्य और भारतीय दृष्टि की चर्चा

लखनऊ। “भारतीय ज्ञान परंपरा दृष्टि एवं सृष्टि” शीर्षक पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान नई दिल्ली के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास बरखेड़ी द्वारा व्याख्यान दिया गया। उन्होंने संस्कृत भाषा के महत्व को बताते हुए पाश्चात्य और भारतीय दृष्टि अर्थात खंडित और एकात्मक दृष्टि की चर्चा की। साथ ही उन्होंने डॉक्टर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के प्रसिद्ध कथन, जिसमें आर्य द्रविड़ सिद्धांत के भेद का खंडन किया गया है, पर विस्तार पूर्वक चर्चा की। उन्होंने भारतीय चिंतन परंपरा तथा इतिहास आदि को कालचक्र की भांति बताया, जो कि अनवरत चलता रहता है। उन्होंने पाश्चात्य चिंतन परंपरा को रेखीय बताया, जो कि कल सापेक्ष है। कहा कि प्रत्येक भारतीय चार सिद्धांतों को अवश्य ही मानता है जो कि हैं, कर्म सिद्धांत, भक्ति, आस्था व पुनर्जन्म। उन्होंने उपनिवेशवाद के प्रभावों का भारतीयों की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ा उसकी भी विस्तार पूर्वक चर्चा की।

कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास बरखेड़ी द्वारा व्याख्यान में सम्मिलित अन्य बिन्दु.......
1. संस्कृत को प्राचीन और क्लासिक भाषा न कहा जाए, यह समसामयिक प्रासंगिक भाषा है।
2. हमारी भारत वर्ष की दृष्टि एकत्ववादी है दो से एक की, वही पाश्चात्य की एक से दो की।
3. विदेशी आक्रांताओं ने हमारी सम्पदा की लूट की।
4. आक्रांताओं ने हमें बताया कि आर्य बाहर से आये परंतु वो भारतीय थे और उन्होंने बाबा साहेब अम्बेडकर का कथन उद्धरित किया।
5. उन्होंने कहा कि हमें बताया गया कि शहरी सही है श्रेष्ठ है और वन में रहने वाले जैसे आदिवासी हेय है परंतु हमारे यहां ज्ञान की परंपरा अरण्य से आई है ज्ञान वहां से शहर आया।

बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के संस्कृत एवं वैदिक अध्ययन विभाग के द्वारा अम्बेडकर सामाजिक अध्ययन पीठ सभागार में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। संगोष्ठी का समन्वय विभागाध्यक्ष प्रो. रिपुसूदन सिंह तथा संयोजन डा‌. बिपिन कुमार झा एवं डा. रमेशचन्द्र नैलवाल ने संयुक्त रूप से किया।

बाबा साहेब अम्बेडकर की प्रतिमा पर पुष्पार्चन एवं दीप प्रज्वलन से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। हिमांशु निकिता एवं प्रिया आदि ने मंगलाचरण किया। प्रोफेसर रिपुसूदन सिंह ने शाल मेमेण्टो से अतिथियों का स्वागत किया। डा. बिपिन कुमार झा ने अतिथि एवं विभाग परिचय प्रस्तुत किया। मुख्यातिथि के रूप में पधारे आचार्य श्रीनिवास वरखेडी (कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) ने संस्कृत चिन्तन की अभिनव दृष्टि हेतु अभिप्रेरित किया। आचार्य ने भारतीय होने हेतु भारती का बोध को आवश्यक बताया। रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शिशिर पाण्डेय ने मौलिक चिन्तन पर जोर दिया।

कार्यक्रम में शोध पत्रवाचन भी हुआ, जिसके सार रूप में कहा जा सकता है कि सनातन गङ्गा प्रवाहवत् अनवरत प्रवाहित भारतीय ज्ञान परम्परा वेद एवं वाङ्मय की विविध विधाओं में लिखित ज्ञान-विज्ञान के विविध ग्रन्थों के माध्यम से वैश्विक सन्दर्भ में आज भी अत्यन्त प्रासङ्गिक एवं उपादेय हैं। प्राचीन काल से ही यह ज्ञान सम्पदा भारतीय मनीषियों के द्वारा परिष्कार पूर्वक संरक्षित एवं प्रचारित की जाती रही है। वर्तमान राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी भारतीय ज्ञान परम्परा के महत्त्व को विस्तृत रूप से रेखाङ्कित किया गया है, जिसमें प्रायः ज्ञान-विज्ञान के सभी क्षेत्रों में भारतीय ज्ञान परम्परा को अपनाने एवं नवीन प्रकार से प्रकाशित करने का आह्वान किया गया है।
इस अवसर पर संकायाध्यक्ष प्रो. सर्वेश सिंह ने छात्रों को संस्कृत अध्ययन हेतु प्रोत्साहित किया। अन्त में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया। विभागीय छात्रा मैथ्रेया ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कल्याण मन्त्र से सभा का समापन किया गया। सभा का संचालन डा. रमेश चन्द्र नैलवाल ने किया। कार्यक्रम में योग, इतिहास, राजनीति शास्त्र, विधि आदि विभागों के विभागाध्यक्ष आचार्य एवं छात्रों की उपस्थिति रही।

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